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रविवार, नवंबर 28, 2010

क्या मुझे कोई फेसबुक पर पिशिंग की समस्या का हल दे सकता है |

 बहुत दिनों से मेरा फेसबुक पर पिशिंग की समस्या आ गयी है, मुझे तो नहीं पता था,यह पिशिंग क्या होता है,फेसबुक में जब अपना यूसर आई डि और पासवर्ड डालता हूँ,तो फेसबुक की ओर से सन्देश,आता है,आपका खाता अस्थाई रूप से स्थगित कर दिया गया है,और फेसबुक यह बताता है,फिशिंग का अर्थ होता है  बिलकुल फेसबुक लगने वाला साईट,फिर फेसबुक की ओर से आगे जारी करने का सन्देश आता है और दो शब्दों को वेरीफाई करने को कहता है,उसके बाद मेरेको मेरा  इ मेल दिखाता है,और नीचे सीकुरेटि कोड को वेरीफाई करने को कहता है,और फेसबुक यह कहता है आपको मेल भेज दिया गया है,और मेरे मेल में फेसबुक द्वारा भेजा हुआ  सेकुरिटी कोड होता है,जब में उस सेकुरिटी कोड को कोपी करके फेसबुक में उसके द्वारा पूछे हुए सेकुरिटी कोड को   पेस्ट करता हूँ,तो वोह फेसबुक का पासवर्ड बदलने को  कहता है,जब में फेसबुक का पासवर्ड बदलता हूँ,फिर मुझे सन्देश मिलता है,आपको मेल भेज दिया गया है,और जब में अपने खाते को खोलता हूँ,तो वहां फेसबुक द्वाराएक लिंक भेज कर  सन्देश मिलता है,अपने फेसबुक पर नियंत्रण कर लें,जब में उस लिंक पर चटका लगाता हूँ,तो फेसबुक खुल जाता है,और यही सन्देश मिलता है,आपका खाता फिशिंग के कारण अस्थायी रूप से  स्थगित कर दिया गया है,फेसबुक की सहायता में मुझे इस समस्या का कोई समाधान नहीं मिला,बस जैसे मैंने विवरण दिया है,यह प्रक्रिया 10-15 से दोहरा रहा हूँ,मुझे कोई मेरी इस समस्या का निदान दे सकता है कोई ?
मेरे पी.सी में एंटीवायरस भी है,पर मुझे नहीं लगता इस समस्या का निदान एंटीवायरस है,फेसबुक मेरे बहुत सारे मित्र हैं,जो भी कोई मुझे इस समस्या से बचा सकता है,उसके लिए बहुत,बहुत धन्यवाद |
धन्यवाद

रविवार, नवंबर 14, 2010

कार रखने वाले परिवार में परिवार के सभी व्यस्क लोगों को कार चलाना आना चाहिए |

कल संगीता जी का एक आलेख पड़ रहा था, अब कम्पूयुटर ही पूरा करेगा मेरा शौक, यह तो सत्य है,अगर कोई शौक पूरा नहीं हो पाता तो इन्सान उसका विकल्प खोज ही लेता है, जैसे संगीता जी ने लिखा था,कि वोह गाड़ी चलाना नहीं सीख पायीं तो उन्होंने उसका विकल्प कम्पूयुटर पर कार चलाने वाला नए,नए खेल इंस्टाल करके अपना गाड़ी चलाने का शौक पूरा करतीं हैं, और कोई भी सीखी हुई चीज व्यर्थ नहीं जाती, उनके इस आलेख से मुझे एक दुर्घटना  स्मरण हो आयी जो कि,जो हमारी बेटी के जेठ कि पत्नी की बहिन के साथ घटी थी |
वोह दोनों बहने गंगा तट पर बसी धार्मिक नगरी गंगा तट पर बसी हरिद्वार की हैं,हमारी बेटी के जेठ की पत्नी का प्रेम विवाह हुआ था,उसका पति जो अब इस लोक में ना होकर परलोक का हो गया है, वोह भी हरिद्वार का ही है, और उंनका एक बेटा भी है,उस मासूम बालक की आयु उस समय मात्र तीन वर्ष का था, जब उस पति का एक दुर्घटना में अंत हो गया था, किसी एक्सीडेंट वाली दुर्घटना नहीं, दोनों पति पत्नी की नौकरी दिल्ली में थी, तो इसलिए वोह परिवार के तीनो सदयस्य दिल्ली में ही रहते थे, चूंकि दोनों का घर हरिद्वार में होने के कारण उनका दिल्ली से हरिद्वार आना जाता रहता ही था, बहुत दिनों से उनका आवागमन बस या रेलगाड़ी से दिल्ली से हरिद्वार और हरिद्वार से दिल्ली के लिए होता रहता ही था,परन्तु उन लोगों ने एक नई मारुती गाड़ी खरीद ली,और अब उनका हरिद्वार से दिल्ली और दिल्ली से हरिद्वार उसी गाड़ी से होने लगा,सब कुछ बहुत दिनों से ठीक ठाक चलता रहा, परन्तु एक दिन ऐसा आया,उस परिवार में मेरी बेटी के जेठ की बहिन का पति,इस लोक को छोड़ कर अपनी पत्नी को रोता,बिलखता और उस मासूम बच्चे को छोड़ कर इस दुनिया से चला गया,और उसी समय मेरे मस्तिष्क में यह विचार आया,अगर हमारी बेटी के जेठ की पत्नी को गाड़ी चलाना आती तो उसका सुहाग बच जाता |
उस मनहूस दिन को मेरे मोबाइल की घंटी बजी,और मुझे हमारी बेटी के पति के द्वारा  सन्देश दिया गया,गाजियाबाद  के यशोदा
 अस्पताल में तुरन्त पहुँचिये,सन्देश में यह भी कहा गया,हमारी बेटी के जेठ की पत्नी जिसका नाम सुषमा(काल्पनिक नाम) है,उसके पति का देहांत हो गया है,और आप को मोदीनगर से गाड़ी लानी है,(मोदीनगर दिल्ली से हरिद्वार के रास्ते में पड़ता है, जब में और मेरी पत्नी यशोदा अस्पताल पहुंचे रोती बिलखती सुषमा को कोई,उसके पति के ऑफिस का सहकर्मी उसी गाड़ी में लेकर आ गया |
बाद में मुझे पता चला हरिद्वार से ही सुषमा के पति को उल्टियाँ हो रही थी,और मोदीनगर आ कर वोह बेहोश हो गया, कुयोंकी मोदीनगर में बहुत अच्छा अस्पताल तो है,नहीं वहां के अस्पताल के डाक्टर ने उसकी जाँच परख कर कहा,वक्त बहुत कम है,इनको गाजियाबाद ले जाओ, चूंकि सुषमा को गाड़ी चलाना नहीं आता है,वोह बेचारी बेबस फ़ोन ही करती रही,और जब वोह गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल अपने पति को लेकर पहुंची,तब वहाँ के डाक्टरों ने,उसके पति को मृत घोषित कर दिया,तब में  में सोचता रहा अगर सुषमा को गाड़ी चलानी आती,तो संभवत: उसके पति की जीवन लीला समाप्त नहीं होती  |
अब सुषमा का दूसरा विवाह हो चुका है |
परन्तु यह घटना मुझे भुलाये नहीं बनती |
गाड़ी चलाना परिवार के सब व्यस्क सदस्यों को आनी चाहिए |

मंगलवार, अक्तूबर 26, 2010

हो सकता है,में किसी समय के बाद नेट पर ना दिखूं |

हो सकता है, किसी समय के बाद में नेट पर ना दिखूं , एक तो  वायरस का कभी भी, किसी भी साईट पर अप्रतायाषित आक्रमण,और दूसरा मेरे कोम्पयुटर के सी.पी.यु की मरानासाण अवस्था, यह संघनक महाशय का सी.पी.यु,अपनी दो बार चिकित्सा करवाने के बाद,इस अवस्था में पहुँच चुका है,अब यह खराब होगा तो इसकी मृत्यु निश्चित ही है, पहली बार जब सी.पी.यु महाशय जब अपनी चिकित्सा करवाने के लिए, चिकित्सालय में पहुंचे थे, तो कुछ समय बाद आ गये थे,लेकिन इस बार यह दूसरी बार चिकित्सालय में दिल्ली पहुंचे थे,तो कोमनवेल्थ के कारण   गाजियाबाद से चार पहियों के वाहन का दिल्ली आना जाना कठिन था, इस कारण  यह लम्बे अन्तराल के बाद आये हैं,पता नहीं कब इनको आई.सी.यु की आवश्यकता पड़ जाये |

दूसरा कारण वायरस का इतना तो विस्तृत नहीं है, और भाई हमने तो एंटी वायरस अपने कोम्प्यूटर में डाल रखा है,जब वायरस का आकर्मण  अमीरका के  गुप्त संचार ठिकानों  पर हो सकता है,तो हम नाचीज की क्या औकात ? एंटीवायरस बनाने वालों का अथक परिश्रम  वायरस नाम के रोग को दूर करने का प्रयत्न  और वायरस बनाने वालों की नए,नए वायरस के अस्त्र शस्त्र बनाने का प्रत्यंन   ,पता नहीं कब हमला हो जाये,और आपका ऑपरेटिंग सिस्टम जो भी हो,वोह धुल,धूसरित हो जाये,वैसे तो हमारे यहाँ,विंडो ही सबसे अधिक प्रचलित है, पता नहीं कब यह वायरस विंडो को मृत्यु प्राप्त करा दे, और नई विंडो का जन्म हो |

तीसरा कारण तो बहुत संक्षिप्त है,वोह है,विजली रानी की बिना सूचना के आवाजाही,जिसने मेरे बहुत से विदेशी मित्रों को संशय के घेरे में डाल दिया है, बहुधा नेट पर बात करते,करते अचानक बिजली रानी चली जाती है,जैसे विदेशों में,बाय,सी यू इत्यादि कहने के बाद सम्बन्ध विच्छेद किया जाता है,नहीं तो असभ्यता  समझी जाती है,लेकिन यह बिजली रानी तो अचानक बिना सोचे ही सम्बन्ध विच्छेद करा कर नाक कटवा देती हैं, अगर वोह लोग भारत भ्रमण के लिए,कभी आयें हों,तो विवशता समझ जातें हैं,नहीं तो अत्यधिक कठिनाई होती है |
नेट पर कुछ समय बाद मेरा दृष्टिगोचर ना होना की सम्भावना ना होने का तो प्रमुख कारण तो पहला ही है,और दूसरा कारण तो कुछ समय के अन्तराल पर मेरा आना संभावित है,तीसरा कारण तो ऐसा ही,भाई आना जाना तो लगा ही रहता है |

शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

कोमनवेल्थ गेम्स की क्यों की तय्यारी की क्यों दुर्दशा कर दी |

3 अक्टोबर  से कोमन वेल्थ गेम्स को उद्द घाटन होना है, और अभी तक एक प्रातिशिष्ट समारहो,जिसमें देश विदेश से आने वाले खिलाड़ी हैं,अपने भारत की क्या छबी लेकर जायेंगे?,बहुत से देशो ने तो अपने खिलाड़ियों की रवानगी,कुछ समय के लिए टाल दी, में समाचार पत्रों  में,प्रकशित खबरों के बारें में,ना के बराबर लिखता हूँ, परन्तु नित,नित कोमनवेल्थ के समाचारों से आहात हो गया हूँ, एक बार मैंने अपने इसी ब्लॉग में,एक लेख लिखा था, जिसका आशय यही था,क्या विरोधी पार्टियाँ एक दूसरे पर,आरोप प्रत्यारोप लगाने की बजाये,मिल कर काम नहीं कर सकतीं, और यही कोमनवेल्थ गेम्स की तय्यारी में दृष्टिगोचर हुआ है, अगर देश की प्रतिष्ठा को लेकर,यह लोग मिल जुल कर काम करतें,तो विदेशी आने वाले मेहमानों की छेट्टाकशी सुनने को ना मिलती, जैसा किसी खेल सयोंजक ने कहा है,की कोरिया में वोह गएँ थे,और सब कोरिया की पार्टियों ने,आपसी मतभेद भुला कर मिल जुल कर खेल का प्रबंध किया था, जब कश्मीर की जवलन्त समस्या,उग्रबाद के लिए,सब पार्टी के लोग मिल जुल कर गये थे, जब यह लोग देश के आन्तरिक मसले को मिल,जुल कर सुलझाने का प्र्यतन कर सकते हैं, तो देश के सम्मान का इनके लिए कोई,मूल्य नहीं हैं ? कुछ समय पहले भी मैंने,अपने एक लेख में यह सवाल उठाया था,कोमन वेल्थ गेम,इस प्रकार की अव्यवस्था में कैसे होंगे?
 अगर प्रश्न यह है,अत्यधिक वर्षा के कारण प्रबंध नहीं हो पाया,तो चीन ने इसी वर्षा ऋतू में,एशिया में होने वाले खेल जो नवम्बर में होने हैं,उसके लिए कैसे उचित प्रबंध कर लियें हैं ?
 जब कोई विदेशी कहता हैं, कि गंदगी के कारण खेल गाँव रहने के लिए,उचित नहीं हैं,तो कहा जाता हैं,पश्चिम और हमारे देश की सफाई के मापदंड अलग है, अगर कुछ भी गेरेत हैं,तो उन विदेशियों के मापदंड के हिसाब से बनाते खेलगाँव , यह कितना बड़ा अपमान हैं,इंग्लॅण्ड की टीम,खेलगांव में ना रह कर होटल में रह रही है, भारतवर्ष तो अतिथतियों के स्वागत के लिए परसिद्ध है, यह कैसा स्वागत है ?
जामा मस्जिद के पास कोई,अंधाधुन्द गोलियां चला कर चला जाता है, और ना ही सी.सी.टी.वी केमरे हैं,और ना ही मेटल डिटेक्टर काम कर रहें हैं, ताइवान के दो पर्यटक गोलियों के शिकार हो जातें हैं,और कुछ पता नहीं चलता,जब देश में विदेशिओं का समूह,आ कर रूकने को है,तब यह परिस्थति है,इन लोगों से बेहतर तो वोह ऑटो वाला है,जिसने अपनी जान की परवाह ना  करते हुए, उन आतंकवादियों को पत्थर से मारने का प्र्यतन किया,सीखों आम नागरिक से,और वोह आतंकवादी भाग गये  |
जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम के सामने बना,फूट ओवर ब्रिज, इस समारोह के कुछ दिन पहले ही,गिर जाता है,अरे सबक लो मेट्रो ट्रेन का जाल बिछाने वाले अधिकारीयों से,दिल्ली के अधिकांश भागों में,जिनोहने मेट्रो का जाल विछा दिया,और कुछ ही छुट,पुट घटना हुई थी, और जिस पर मेट्रो के मुख्य अधिकारी ने उसकी जिम्मेवारी लेने के कारण,अपना त्याग पत्र दे दिया था,यह होता नेतिक मूल्य ,सीखों इन अधिकारीयों से |
ऐसा नासूर ना दो जो घाव बन जाये 

मंगलवार, सितंबर 14, 2010

प्रभु की अर्चना,पूजा,ध्यान सार्थक या समय की बर्बादी |

हर्निया के ऑपेरशन के बाद, असहेज होने के कारण,लिख नहीं पाया,अब कुछ सहज हुआ हूँ,और ऑपेरशन के बाद यह पहला लेख लिख रहा हूँ, इस लेख को लिखने से पहले,स्वामी परमहंस योगानन्द द्वारा लिखी हुई,एक कहानी लिख रहा हूँ |
एक बार भगवान विष्णु से ब्रह्मऋषि नारद जी से, प्रश्न किया,"भगवन यह बताइए आप का सब बड़ा भक्त मृत्यु लोक में कौन है?"
भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा," नारद तुम्ही जा कर पृथ्वी लोक पर जा कर देख लो", यह सुन कर नारद जी पृथ्वी लोक में आये, और विचरण करते हुए उन्होंने पहले जो देखा,एक व्यक्ति मदिरा के नशे में चूर,पृथ्वी में खुदे हुए गड्ढो में,कुछ बांस गाड़ने का प्रयत्न कर रहा था,परन्तु मदिरा के नशे में,चूर उस व्यक्ति से गड्ढो में,बांस नहीं जा रहे थे,नारद जी ने उससे,पूछा,"तुम्हरी इच्छा क्या है?", उसने उत्तर दिया विष्णु भगवान से साक्षात्कार की", नारद जी असमंजस में पड़ गये,और आगे चल पड़े,और उन्होंने देखा, "एक व्यक्ति नदी के किनारे एक पैर पर खड़ा होकर के,शीत ऋतू हो, बर्षा ऋतू हो या ग्रीष्म,बिना वस्त्रों के वर्षों से तपस्या कर रहा था, नारद जी ने उससे भी यही प्रश्न किया,"भाई यह सब तुम क्यों कर रहे हो?", उसने भी वोही उत्तर दिया विष्णु भगवान से साक्षात्कार के लिए ",अब नारद जी बैकुंठ लोक में पहुंचे,तो विष्णु भगवान ने,नारद जी से पूछा देख लिया?",नारद जी ने हाँ कहा,तब विष्णु भगवान ने ने पूछा "क्या देखा?" नारद जी ने पहले उस व्यक्ति के बारे में बताया,जो नदी किनारे एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या कर रहा था,नारद जी के बताने पर विष्णु  भगवान ने कोई रूचि नहीं दिखाई,विष्णु भगवान ने कहा "उस व्यक्ति को देखा था,जो पृथ्वी के गड्ढों में बांस गाड़ने का प्रयत्न कर रहा था?",नारद जी ने असमंजस में पड़ते हुए हाँ कहा, और पूछा,"है लक्ष्मीपति जी उस में क्या विशेष बात है?",विष्णु भगवान ने कहा वोह ही,"मेरा सबसे बड़ा भक्त है", नारद जी ने कहा,"वोह कैसे प्रभु?", विष्णु भगवान बोले,पुन: "पृथ्वी लोक पर,जाओ और",उसव्यक्ति को जो मदिरा के नशे में चूर था,उसको कहना तुम से विष्णु जी मिलने आयेंगे,और उस व्यक्ति को जो एक पैर पर खड़ा हो कर तपस्या कर रहा है, उसको मेरा यह सन्देश देना,"तुम से मिलने विष्णु भगवान नहीं आयेंगे", नारद जी मृत्यु लोक में पुन: पधारे और जैसा विष्णु भगवान ने सन्देश दिया था,वोही अलग,अलग सन्देश दोनों व्यक्ति को दिया, जो व्यक्ति नशे में था,वोह तो बांस छोड़ कर नाचने लगा,और नाच,नाच कर कहने लगा,"विष्णु भगवान आयेंगे",और दूसरे व्यक्ति को जो तपस्या कर रहा था,उसको जब नारद जी ने कहा,"तुम से मिलने विष्णु भगवान नहीं आयेंगे",तो वोह तपस्या छोड़ कर दोनों पैरो पर खड़ा हो गया,और बोला "में तो यह तपस्या व्यर्थ ही कर रहा हूँ |",और उसने तपस्या छोड़ दी,थोड़े अन्तराल के बाद,विष्णु भगवान आये और उस व्यक्ति के साथ में नाचने लगे जो,मदिरा के नशे में चूर था,और नारद जी भी वीणा बजाते हुए,उस नृत्य में सम्मलित हो गये |
प्रभु कोई आडम्बर के भूखे हैं,उनको केवल भाव से किसी भी रूप में,किसी भी विधि से पूजा,अर्चना,ध्यान से,वंदना की आवश्यकता है |
जैसे संत कबीर ने कहा है,"मन मैला और तन को धोये",आपमें ,लाख व्यसन हैं",अगर सच्चे मन से प्रेम भाव से प्रभु का स्मरण करोगे तो प्रभु को अवश्य पाओगे, इसी सन्दर्भ में मुझे एक भजन की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं |
"तेरे को काहे की चड़ाऊं पूजा |
जल चड़ाऊं  पूजा,मछली ने कर दिया झूठा ||
फूल चड़ाऊं तो भँवरे ने कर दिया जूठा|
दूध चड़ाऊं तो बछड़े ने कर दिया झूठा ||
तुझे चड़ाऊं प्रेम की पूजा |
भाई इस ढाई अक्षर के शब्द में,बहुत शक्ति है, इस ढाई अक्षर के शब्द ने ही तो प्रभु राम ने शबरी के झूठे बैर खाए थे,कुछ लोगों को मेरे इस वाक्य से असुबिधा हो सकती है,"आप में लाख व्यसन हों....."
अब इन व्यसनों और दुर्गुणों से दूर रखने वाला तो सदगुरु होता है, गुरु शब्द का अर्थ है,"अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला",और इसी से प्रचलित है,"असतो मा सदगमय,तमसो मा ज्योतिर्गमय",अर्थार्त हमें   अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ",सदगुरु का तो ईश्वर का सामीप्य होता है,और सदगुरु अपने शिष्य के सब,व्यसन और दुर्गुण दूर करके,भगवद प्राप्ति करवा देता है |
आजकल जागरण,या किसी भी धार्मिक सम्मलेन में,लाउड स्पीकर पर जोर,जोर से भजन गाये जाते हैं,बिना यह सोचे कोई गंभीर रूप से पीड़ित है,और सड़क के एक किनारे से लेकर दूसरे किनारे तक,लोगों का अवागमन वाधित करके,जब मन में परोपकार की तो बात छोड़ो,इस प्रकार से लोगों को कष्ट दे कर,तो कहाँ से ईश्वर को पाओगे?
अगर झूठे,आडम्बर,से लोगों को कष्ट देकर,बिना श्रद्धा के,बिना प्रेम के तो, भाई पूजा,अर्चना,ध्यान सब व्यर्थ है |
पूजा का अर्थ समझो 

शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

विनाश काले बुद्धि विप्रेते (पंचम भाग )अंतिम कड़ी

मोदीनगर में, उस रहस्यमय व्यक्ति से संपर्क समाप्त कर चुका था,और फिर मैंने हनुमान जी की साधना प्रारंभ कर दी थी, दिनचर्या यह रहती थी, नित्य क्रम से निब्रित होकर ,हनुमान जी की साधना फिर कुछ योगासन और उसके बाद अपनी जीविका कमाने के लिए,फेक्टरी जाना,और लौट के आने के बाद,कुछ अल्पाहार करके,बेडमिन्टन या बिल्यर्ड खेलना,और बाकि समय अपने परिवार में व्यतीत करना, मंगल बार को हनुमान जी का ब्रत रखना और कुछ मीठा,खाकर के व्रत का समापन करना, मोदीपोन छोड़ कर सूरत कार्य के लिए चला गया था,और मेरी दिनचर्या वैसी ही रही, तीन वर्ष सूरत में व्यतीत करने के बाद, हापूड़ और बुलंदशहर के मध्य में पड़ने वाले गुलावठी नाम के कसबे में,कार्य के कारण आ गया था,दिनचर्या वैसी ही थी,और हापूड़ में मेरा संपर्क एक सन्यासी से हुई,जो अपने जीवन के कुछ वर्ष थलसेना में व्यतीत कर चुके थे,और जिनकी आयु उस समय 95 वर्ष की थी,और इस आयु में भी उनमे ऐसी फुर्ती किसी नौजवान में क्या होगी, बस अपनी दोनों आँखों की दृष्टि खो चुके थे, और गजब का हर प्रकार का ज्ञान था उनको,चाहे,विज्ञान हो,ज्योतिष हो,अध्यातम हो,मनोविज्ञान होआयुर्वेद हो कोई भी विषय हो ,हर प्रकार का ज्ञान था उनको, मेरी व्यस्तता मेरे जनरल मेनेजर होने के कारण मेरी व्यस्तता बहुत बड़ी हुई थी,संसथान के हित में सब प्रकार के कार्य देखने पड़ते थे, चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी, उन सन्यासी के पास जाना कुछ कम हो गया था, एक बार उनसे मैंने पूछा, "मुझे हनुमान जी के दर्शन की इच्छा है",उन्होंने पूछा "किस रूप में",मैंने कहा "साक्षात्".वोह  वोले गुरु पूर्णिमा को मेरे पास आना,और वोह दिन कभी नहीं आ पाया,क्योंकि उनका देहावसान हो चुका था | 
अब में अपने परिवार के साथ गाजियाबाद आ चुका था,हनुमान जी के प्रति आस्था तो थी ही,परन्तु मेरा एक मित्र जो कि गुलावठी में मेरे साथ ही था,उसने गाजियाबाद में ही रहने वाली एक माँ शेरा वालीं की भक्त से परिचय करवया था, उन पर माँ का आवेश भी आता है, और वोह स्वयं ही माँ की कृपा से प्रश्न करता के प्रश्न से पहले ही यह कहतीं हैं,"यह है ना प्रश्न हैं
आपका ?",और उसके बारें में जानकारी देतीं हैं, उस माँ के दरबार की विशेष बात यह है,वहाँ कोई दान,दक्षिणा चड़ावे की बात नहीं हैं,और अपने पास से ही माँ का जल देतीं हैं, मैंने वहाँ जाना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि वहाँ अभूतपूर्व शांति का अनुभव होता है,और एक बार उन्होंने मेरे गले में माँ के नाम का कलावा बांध दिया था |
इसी बीच मेरे पिता जी मुझे दिल्ली स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की गोल डाकखाने के पास है,वहाँ ले गये,और वहाँ से मुझे एक फार्म भरवा दिया,जिसमें कुछ प्रश्न थे,जिनका मैंने उत्तर दे दिया था,वोह फार्म रांची स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की मुख्य शाखा है,वहाँ पहुँच गया और मेरे पास हर माह एक योगदा का एक अध्याय जिसमें स्वामी परमहंस योगानंद द्वारा स्वयं अपने को जानने के बारे में थे,आने लगे |
इन्ही दिनों मैंने प्राणिक हीलिंग भी सीखी थी, जिससे अपना स्वयं का,अपने पास बैठे व्यक्ति का और कितनी भी दूर बैठे व्यक्ति की चिकत्सा संभव है |
दिन अच्छे प्रकार से सुचारू रूप से चल रहे थे, हमारी गाजियाबाद की कोलोनी में,एक मंदिर है,वहाँ हर रविवार को भेरो के साधक आते थे,जो कि मंगलवार को हनुमान जी को चोला चडाते थे,और उस मंदिर में में भी माँ के दर्शन के लिए चला जाता था, जब वोह भेरो के साधक दरवार भेरो का दरबार लगाते थे, उपलों की अग्नि धुनें में जलाते थे, एक बार में जिज्ञासावश वहाँ देख रहा था,वोह बोले"यहाँ आना चाहते हो", मेरे हाँ कहने पर वोह बोले 2.5 रुपए का समान ले कर आ जाओ,जो में ले आया था,और उसको जैसे और लोग अपने पर से उतार रहे थे,वैसे ही में उतार कर बैठ गया, पहले बार वहाँ कुछ पूछने का नियम नहीं था,जब में अगले रविवार को में वहाँ पहुंचा,क्योंकि मेरी नौकरी छूट चुकी थी,मैंने उनसे अपनी नौकरी लगवाने का प्रस्ताव रखा,वोह मेरे गले में बंधा हुआ लाल धागा देख कर उन्होंने पूछा,"यह धागा किसका है ?",मैंने कहा माँ का,फिर वोह बोले काला धागा ले आओ,और उसके अगले रविवार को में काला धागा ले आया,जो उन्होंने मेरे गले में बांध दिया, दो तीन रविवार और बीत गये,और क्योंकि मेरी नौकरी नहीं लगी थी, उसका कारण मैंने उनसे पूछा,तो वोह वोले तुम्हारे घर आ कर देखता हूँ, और एक दिन वोह मेरे घर आये तो मैंने पूछा देख लिया,वोह बोले हाँ,तुम्हारा संकट माँ ही काटेगी, और इस प्रकार फिर मुझे माँ की लगन लग गयी थी,एक रविवार को जब मैंने उनको माँ के दर्शन की बात बताई तो उन्होंने सारा वृतांत माँ के द्वारा मुझे दर्शन दिए वाला बता दिया, मैंने उनसे कहा माँ के दर्शन मुझे पुन: प्राप्त करने है,तो वोह बोले कोई गुरु बनाओ,मेरे यह कहने पर आप ही मेरे गुरु बन जाओ,तो वोह बोले मंगलवार को मंदिर में आना |
मंगलवार को जब में,मंदिर पहुंचा तो वोह हनुमान जी का चोला चड़ा कर ध्यान में बैठे थे,जब उनके नेत्र खुले जो बात वोह मुझे भेरो के दरवार के समय बता चुके थे,उसी की पुनरावर्ती की,पहले झंडे वाले मंदिर जाना वहाँ माँ की थाली चडाना फिर कालका मंदिर जाना और फिर भेरो मंदिर,इस प्रकार उनसे संपर्क बड़ता गया,मेरे में एक विशेष बात थी,जब भी माँ के भजन होते तो मेरे शरीर में तरंगे सी उठने लगती थीं, जिस पर मेरा नियंत्रण नहीं था, यह उनको भी पता चल गया था,वोह अपने शरीर पर देवी,देवता को बुलाने में विश्वास करते थे,पर में मन से इसके विरुद्ध था,पर कहता नहीं था,और भी जो बात मुझे नापसंद थी,भेरो को सिगरेट और मदिरा का भोग चडाना,एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया और कुछ लोग उनके घर में उपस्थित थे, उनमें से एक के घर सब लोग मुझे लेकर चल पड़े,और वहाँ पहुँच कर मेरे से वोह भेरो के साधक माँ के आवाहन के लिए कहने लगे,परन्तु इस प्रकार से ना माँ को आना था और वोह नहीं आयीं,में माँ के शांत रूप में आस्था रखता हूँ,जैसे माँ दुर्गा,परन्तु उनकी आसक्ति देवी देवताओं के रोद्र रूप में हैं,जैसे काल भेरव माँ काली इत्यादि ,उनपर भेरो का आवेश आ गया था,वहाँ उपस्थित लोग उनसे प्रश्न पूछ रहें थे, पर में माँ के ना आने के कारण में संकोच कर रहा था,और इसका लाभ उठा कर वोह लोग मेरी बारी आने ही नहीं दे रहें थें, उन दिनों मैंने माँ का मंदिर छत पर बनाया हुआ था,उन्ही लोगों में से एक ने कहा आपने तो यह बहुत गलत कर रखा है,छत पर उलटी सीधी चीजे आ जाती है,और उन भेरो और हनुमान जी के साधक से एक दिन मेरा प्रश्न था,मेरे भेरव के सामने नंबर क्यों नहीं आया ? यह मेरा पूछना था,उन्होंने मुझे बुरी तरह से दुत्कार दिया,और उसके बाद मेरे मस्तिष्क पर उस फटकार का ऐसा प्रभाव पड़ा,मेरे को चार दिन नींद ही नहीं आई और हीलिंग करने में अक्षम हो गया, माँ की जोत सुबह शाम माँ के मंदिर में जलाये बिना मुझे चैन नहीं मिलता था,वोह जलाना छोड़ दिया,माँ मेरी पत्नी के स्वपन में कंजक रूप में आयीं और मेरे लिए बोली,उससे पूछो मेरी जोत जलाना क्यों बंद कर दिया,मेरा बहुत अपमान हो चुका हैं,में इस घर से जा रहीं हूँ,जाते,जाते यह कह गयी,अब तुम दोनों जिन्होंने अपनी बेटी का नाम मेरे नाम पर रखा है,उसके बारें में सोचो और उसका ख्याल रखो, अब तो में संभल चुका हूँ,प्रात: काल पॉँच बजे उठ कर पहले माँ का ध्यान और फिर योगदा के गुरुओं का ध्यान करता हूँ,और राजीव जी के मार्गदर्शन पर चल रहा हूँ,यह सब विवादित लेख जिनको में लिखने में विवादित टिप्पणियों के कारण लिखने में संकोच करता था,अब बिना किसी भय के निर्भीकता से लिखें हैं,और यही पर मेरी इस लेखों की श्रृंखला की इतिश्री होती है |
अब तो कहता हूँ, प्रभु सदा मुझे और सब को उचित पथ दिखाना,हम बालक तेरे ऊँगली पकड़ कर गलत रहा से उचित पथ पर ले जाना |
  राजीव जी मुझे भीरु से निर्भीक बनाने के लिए कोटि,कोटि धन्यबाद,लेकिन अभी शारीरक बिमारियों की शल्य क्रिया से डरता हूँ |
जय,जय श्री गुरुदेव  |

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

सृष्टि के काम में बाधक बनना हानिकारक ही होता है (चतुर्थ भाग )

किसी प्रकार का लालच या लोभ, हानि ही पहुँचाता है, और में भी अपने लोभ बश सृष्टि के काम में बाधक बन ही गया,और इस प्रकार हमारी भारी हानि हुई, यह बात उस समय कि है,जब में मोदीनगर की मोदीपोन संस्था में कार्यरत था, घटना क्रम का प्रारंभ हुआ हमारे घर में, मेरी पत्नी के आभूषण चोरी होने से, हम लोग मोदीपोन की पोश कालोनी आलोक पार्क में रहते थे, और यह तो स्पष्ट सी बात है,इस प्रकार की कालोनियों की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही सुरक्षित होती है, अगर कोई काम वाली को कुछ देता है,तो कालोनी के गेट पर इंटरकोम  द्वारा सूचना देनी होती है,और गेट पर उपस्थित सुरक्षा कर्मी उनकी जांच करके संतुष्ट होने पर ही जाने देते हैं,बाकि और संसाधन जैसे क्लब इत्यादि,तीज त्यौहार सांस्कृतिक रूप से मनाये जाते थे, नव वर्ष आगमन पर पार्टी का आयोजन होता था,होली,दिवाली को क्लब में,शाम के खाने का आयोजन होता था, और सब लोग एक दूसरे को जानते थे, और ऐसे वातावरण में मेरी पत्नी के कुछ आभूषण चोरी हो गये थे, मेरी पत्नी के अलमारी खोलने से पहले,अलमारी के पास एक कान का बुन्दा गिरा हुआ दिखाई दिया,और जब उसने अलमारी खोली तो उसके साथ का बुन्दा नहीं दिखाई दिया,और जब उसने और आभूषणओं को खोजने का प्रयत्न किया तो बहुत से आभूषण चोरी हो गये थे, इस प्रकार के वातावरण में आभूषणओं  की चोरी हो जाना एक असमंजस बना हुआ था |
उसके अगले दिन हमारी काम वाली ने बताया, मोदीपोन कालोनी जो कि आलोक पार्क से निकलते ही थी,वहाँ एक आदमी रहता है,और वोह बता देता है कि,किसने चोरी की,में उस व्यक्ति के पास में चला गया, उसने बताया कि में पड़ कर चावल दूंगा,जिसने चोरी की है,उसके मुख से खून निकलने लगेगा, लेकिन उसके लिए में सहमत नहीं हुआ, परन्तु उस रहस्यमय में व्यक्ति से मेरा परिचय हो गया था , वोह व्यक्ति बहुत सी और विद्यायें जानता था, कौन उसके गुरु,इष्ट इत्यादि थे,में नहीं जानता था |
 मेरी एक बेटी तो थी ही,और मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी थी,वैसे तो मेरे मन में,बेटी,बेटे के बीच में कभी बेहद,भाव नहीं था, परन्तु कुछ सोच कर मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि हमारे बेटी  होगी कि बेटा और उसने बताया पत्नी के गर्भ में कन्या है, यह सोच कर कि अगर हमारे बेटा हो जायेगा तो हमारी बिटिया को भाई मिल जायेगा, मैंने उससे पूछा बेटा हो सकता है,तो वोह बोला अपने गुरु से पूछ कर बताऊंगा,उस दिन में उसके पास से चला आया,और अगले दिन जब में उसके पास गया तो वोह बोला मेरे गुरु जी ने लड़की के पिंड को लड़के के पिंड में बदल दिया है, हुआ तो बेटा ही पर जन्म जात ऐसी बीमारी से ग्रसित जिसको डाक्टर बताते थे,करोड़ों में कभी ऐसी संतान उत्पन्न होती है,और वोह हमारा बेटा तो डाक्टरों के लिए शोध का कारण बन गया था,और अपने जन्म के ढाई महीने बाद वोह हमारा बेटा चल बसा |
एक बार उस रहस्यमय व्यक्ति ने मुझे कुछ दिया था,और कहा इसके नीचे जितना धन रखोगे वोह दुगुना हो जायेगा, जैसा में समझता हूँ,उसने भूत,प्रेत सिद्ध कर रखे थे,और उनसे ही वोह यह काम लेता था,कभी हवा में से उसकी हथेली पर नारियल आ जाता था, उस व्यक्ति से मैंने स्वार्थवश उस परमपिता परमेश्वर की सृष्टि के नियमों को बदलवाने का प्रयत्न किया,और स्वयं ही नुकसान उठाया, यह परमपिता परमेश्वर का अपमान हैं |
 कभी इस प्रकार से सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं |

बुधवार, अगस्त 18, 2010

दुर्गा माँ और माँ काली के दर्शन| (त्रितय भाग)

सर्व मंगल मांग्लय शिवे सर्वार्ध साधिके |
नारायणी त्रियअम्बके गौरी नामोस्तेय ||
सबका मंगल चाहने वाली माता,आपके तीन नेत्र हैं,आपको नमस्कार है |
माँ के शस्त्र धारण करने का कारण यही है, दुष्टों का विनाश करना और संतो को अभयदान देना,माँ आपके दुर्गा सप्तशती के मन्त्र इतने सशक्त है, जो तुरन्त फल देते हैं, कहीं यह दुष्टों के हाथ ना पड़ जाये इसलिए देवादि देव महादेव को इनको कीलित करना पड़ा, जिसकी एक हुँकार से दुष्टों का विनाश हो सकता है, आपकी सोच इतनी उत्तम है, मेरे शस्त्रों से जो मारे जाये वोह उत्तम लोको को जाएँ, इसलिए आपने दुष्टों का संघार करने के लिए शस्त्र उठाये |
बस में,शिव,शिवा और गौरी पुत्र गणेश को कर बध नमस्कार करके  कहता हूँ |
माँ की हर बात निराली है, माँ की शान निराली है ||
अपराध मेरे बहुतेरे माँ ध्यान ना धरना माँ
अपराधो समेत तेरी शरण में आया हूँ |
माँ तेरा ही जाया हूँ ||
मन्त्र,तंत्र ना जानू माँ |
कर्म कांड के मंत्र क्या हैं,पहचानू ना माँ ||
है,जाग जननी,है योगमाया आपको नमस्कार करके,आपके सहज दिए हुए दर्शन के बारे में लिख रहा हूँ,
या देवी सर्वभूतेषु मात्र रूपेण,संस्थिता,नम्स्त्सय,नमस्तस्य,नमो: नम :
है ! भोली माता लिखने में,कोई त्रुटी हो तो क्षमा कर देना माँ, इस लेख श्रृंखला के द्वतीय भाग में,मैंने लिखा था,मेरी ममेरी बहिन मुझ से कटने लगी, एक तो मेरा उसकी ओर जाना, और उसका मुझ से दूर,दूर रहना मेरी बुद्धि पर असर करने लगा, मेरी माँ अक्सर दुर्गा स्तुति का पाठ करती है, इसी कारणवश में एक रविवार को अपने मामा जी के यहाँ ना जाकर के, दुर्गा स्तुति का पाठ,माँ की मूर्ति के सामने बैठ कर करने लगा,वोह भी माँ की जोत जलाये बिना, उस दुर्गा स्तुति में,माँ का स्वरुप ढूंढ़ता लेकिन उसमें तो माँ की महिमा का वखान है, दुर्गा स्तुति का पाठ समाप्त करने के बाद में,दिल्ली की जमुना के घाट पर जा पहुंचा, उस  स्थान उससमय चीनी खाने बनते थे, जिसका प्रारंभ ही हुआ था,जो कि तिब्बत के विस्थापित लोगों द्वारा नया,नया ही प्रारम्भ हुआ था,पर वहाँ ना जाकर के जमुना घाट पर बैठ कर दूसरे किनारे की ओर देखता और खुली आँखों से माँ के चिंतन में खोया हुआ था, कुछ समय वहाँ व्यतीत करके घर आ गया,और जब शयन का समय हुआ,तब सो गया, पता नहीं वोह कौन सा रात्रि का प्रहर था,या प्रात: काल का वोह समय होगा जब अंधकार होता है,उस समय दुर्गा माँ और माँ काली मेरे स्वपन में आयीं, पता नहीं में कैसे उठ कर बैठ गया और देखता हूँ, मेरा वोह शयन कक्ष आलोकिक प्रकाश से भरा हुआ था,
माँ अम्बे और माँ काली मेरे समक्ष खड़ी हुईं थीं,और माँ अम्बे ने संकेत से पूछा भी,"क्या चाहिए", लेकिन में तो माँ काली के स्वरुप से भयभीत था,और दूसरे कमरे की ओर जिसमें मेरे माँ और पिता  जी सोये हुए थे वहाँ भागा कोई गुरु तो था नहीं मेरा जो मुझे संभालता और जब लौट कर अपने कमरे में आया,तो माँ दुर्गा और माँ काली वहीँ विद्यमान और माँ अम्बे का वही संकेत तब मेरे मुख से भय और घबराहट से यही निकला,"मुझे कुछ नहीं चाहिए आप जाइए",और दोनों अंतरध्यान हो गयीं,उसके पश्चात बहुत प्रयास किया पर माँ के साक्षात् पुन: दर्शन नहीं हुए,हाँ कभी,कभी अम्बे माँ का आभास हो जाता है, और कंजक रूप में आ कर कुछ ना कुछ गलतियों का एहसास करा जातीं है, माँ का दिल ममता से भरा हुआ है,वोह बार,बार क्षमा करतीं हैं |
में तो येही सोचता था, ऐसी लगी लगन मीरा हुई मगन प्रभु के गुण गाने लगी |
जयकारा शेरा वालीं माँ का |

अपराध मेरे बहुतेरे | (द्वतीय भाग)

 मैंने राजीव जी से पूछा था,अब इतना प्रयास करने के बाद माँ दुर्गा और माँ काली का दर्शन अब क्यों नहीं होता,जो कि मुझे सहज ही दुर्गा स्तुति का पहली बार में हो गया था, और राजीव जी ने बताया था,यह फल करोड़ो करने के कारण हो गया था, जब ऐसा हो जाता है,तो मानव अपने को करता समझ लेता है,इस बात को मन्युष का अचेतन जानता है |
कहा जाता है,जिसमें सब गुण वोह देवता,जिसमें सब अबगुण वोह  शैतान,और जिसमें सम्मलित गुण और अबगुण दोनों वोह इंसान,लेकिन एक बात और किसी भी वस्तु,घटना,क्रिया इत्यादि को देखने का नजरिया अलग,अलग होता है,जैसे पानी से भरे हुए आधे गिलास को आशावादी व्यक्ति कहता है,गिलास आधा भरा हुआ है,कोई निराशावादी कहता है कि,गिलास आधा खाली है, इसी प्रकार किसी स्त्री के शरीर पर किसी कामुक की दृष्टि पड़ती है,तो वोह स्त्री को काम भावना से देखता है,कोई दार्शनिक देखता है,तो वोह सोचता है,हाड़ मांस का बना हुआ शरीर है,और कोई साधू देखता है तो वोह सोचता है,की आत्मा ने पंचतत्व के शरीर में परवेश किया हुआ,यह शरीर तो आत्मा का वस्त्र है |
अब में बात करने जा रहा हूँ, जब बाल्यावस्था के अगले चरण किशोर अवस्था में पहुँचता है, तब किशोर अथवा किशोरी में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन का सूत्रपात हो जाता है, किशोरों का दाड़ी,मुछ निकलने का प्रारंभ तथा,वाणी में कठोरता आना,और किशोरियों के स्तन के विकास का प्रारंभ होना और वाणी का कोमल होना इत्यादि ,दोनों किशोर अथवा किशोरी इस अवस्था में एक दूसरे के प्रति आकर्षित होतें हैं, किशोरों में काम भावना जागृत होने लगती है, और एक शोध के अनुसार पुरषों में एस्ट्रोजन वाला हारमोन होने के कारण जो कि वासना की ओर प्रेरित करता है,वोह मस्तिष्क वाला भाग जो काम वासना को संचालित करता है,स्त्रियों के ओस्ट्रोजन काम वासना का प्रेरित करने वाले भाग से 2.5 गुना अधिक होता है,इसी कारण अगर पुरुष की दृष्टि निरंकुश हो तो सबसे पहले स्त्रियों के स्तनों पर पड़ती है |
यह सब लिखने का मेरा कारण यही था की में भी किशोर अवस्था में कभी था,और में भी किशोरियों के बारे में सोचता था,और उनके साथ रति क्रिया के सपने बुनता था, और दो बार अलग.अलग किशोरियों ने मुझे निमंत्रण भी दिया था,और हमें अवसर नहीं मिला,मतलब कि यह मेरे में अवगुण था,और भी होंगे.फिर भी अम्बे माँ और माँ काली के दर्शन प्राप्त हुए थे |
अबगुण तो बहुत थे,परन्तु मेरे व्यक्तित्व दो विशेष बातें भी थीं,एक तो अपने आप कभी भी कहीं पर ध्यान लग जाना,और दूसरी बात केवल दो भाई और कोई बहिन ना होने के कारण,बहिन का स्नेह पाने की तीव्र उठ्कंथ्ता,कभी कभी में अपने मामा जी के यहाँ चला जाता था,पर जाता कम ही था, मेरे मामा जी की लड़की को मेरा कम आना अच्छा नहीं लगता था,वोह चाहती थी में अधिक जाऊं और कुछ दिनों के बाद कोई भी समय हो दिन या रात कैसा ही मौसम हो बरसात हो या शीत लहर या अत्यधिक गर्मीं में मामा जी के यहाँ पहुँच जाता था,बाद में हमारे जानकार जिनको ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था और उसके साथ भगवद कृपा भी थी,उन्होंने बताया था,यह मेरे व्यवहार बदलने का कारण मेरे मामा जी की लड़की द्वारा कोई जड़ी चाय में मिला कर पिलाने के कारण था |
समय बीतता गया और में नौकरी करने लगा था,में मामा जी की लड़की को सगी बहिन की दृष्टि से देखता था,लेकिन मामा जी की आर्थिक स्थति अच्छी नहीं थी,और मेरी बहिन को  मुझ से पैसे की आपेक्षा थी जो कि में पूरी नहीं करता था,इसलिए उसने मुझ से दूर,दूर रहना प्रारंभ कर दिया था |
या देवी क्षमा रूपेण संस्थिता नम्स्त्सय,नम्स्त्सय नमो: नम:

मंगलवार, अगस्त 17, 2010

यह लेखों की श्रृंखला राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी कहने पर लिख रहां हूँ | प्रथम भाग

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी से मेरा उनके लेख "काली चिड़िया का रहस्य",पर मेरे द्वारा दी गयी टिप्पणी " वैसे  तो आपने डोली की भलाई के लिए ठीक ही किया, लेकिन भैरो और माँ काली के सामने अच्छे,अच्छे रोगी ठीक हो जातें हैं",और इसके साथ यह भी लिखने पर आपके लेख मेरी रुचि के अनुकूल है,उनका अनुसरण करता बन गया, इस प्रकार मेरा उनसे परिचय का सूत्रपात हुआ, मैंने  किंचित एक दो या इससे अधिक विवादित लेख लिखें हैं, उनमें से एक ऐसा लेख भी था,जिसको लोग खुले चक्षुओं से अनुभव कर सकतें हैं, जिसमें भूत,प्रेत का किसी के भी  शरीर में प्रवेश हो जातें  है,और उसका निवारण स्वयं ही राजस्थान के महेंद्रगढ़ के बाला जी (हनुमान जी ) के मंदिर में हो जाता हैं,और उस लेख पर मुझे टिप्पणी मिलती है,"इंजीनियर साहब इस भोली जनता को भूत प्रेत से अलग रखो ", पुर्बाग्रह से ग्रसित हो कर दी हुई टिप्पणी,"सत्यम किम प्रमाणं",मतलब की बिना खोज,बिना उस स्थान पर जाये और अपनी सोच,सोच और केवल सोच के आधार पर दी गयी टिप्पणी,और उसके बाद मैंने हतौत्त्साहित हो कर विवादित लेख लिखना छोड़ दिया था, लोग दोनों ही प्रकार के होते ही है,पुर्बाग्रह से ग्रसित और दिमाग की खुली खिड़की रखने वाले,कभी मैंने लेख लिखा था "भृगु सहिंता के बारे में मेरी अल्प जानकारी", उस लेख पर किसी ने जो भ्रिगुसहिंता वाले स्थान पर गये थे,उन्होंने मेरी बात का पुष्टिकरण किया था,और उस स्थान के बारे में,पर्याप्त जानकारी भी दी थी,इस लेख श्रृंखला में,बहुत प्रकार के विवादित लेख आयेंगे, लेकिन सोच अपनी,अपनी,मैंने राजीव जी को संक्षिप्त में मेल में लिखा था,और कहा था यह सब सार्वजानिक नहीं होना चाहिए,बाद में राजीव जी ने कहा आप एडिट कर के लिख दीजिये, लेकिन अब मेरे को, किसी प्रकार से बुरी लगने वाली टिप्पणी का कोई प्रभाव नहीं होता, इसलिए में स्पष्ट रूप से बिना एडिट किये यह लेख माला लिख रहा हूँ |
जैसा जिसका व्यक्तिव और सोच वैसी ही टिप्पणी 

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनाई ?

"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई
काहे तूने दुनिया बनाई
काहे बनाये तुने यह पुतले
क्यों उनको दे दी खुदाई "
यह राजकपूर द्वारा "तीसरी कसम फ़िल्म में गाया हुआ यह गीत मझे भी यदा,कदा विचलित करता है, मेरा भी उस ईश्वर,खुदा,
गोड, परमपिता परमेश्वर से यही प्रश्न है,क्यों तूने इस सृष्टि का निर्माण किया?आप को बहुत से  नामों से पुकारा जाता है, हिन्दू धर्म में परमात्मा,ईश्वर, भगवान,आदि,आदि,मुस्लिम धर्म में,खुदा और अल्लाह,और इसाई धर्म में गोड,जिसके बेटे इसा मसीह थे,और मुस्लिम समुदाय के पेगेम्बेर थे मोहम्मद साहब, प्रभु इंसान ने जन्म लिया था,उस समय तो उसका कोई धर्म नहीं था,पर आपके बन्दों ने तो आते ही  जाती,धर्म में बटवारा कर दिया,और अलग,अलग जाती और धर्म वाले अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ बताने लगे,है परमपिता यह आपने इंसानों को इस प्रकार की बुद्धि देकर कौन सा खेल रचा था?  और है ईश्वर इसी से इंसान का मन नहीं भरा तो,एक ही जाती और धर्म मानने वाले भी तो अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ बताने लगे हैं, हिन्दू धर्म में सगुण,और निर्गुण मर्गियों में आपस में मतभेद,सगुण कहते हैं,सगुण श्रेष्ठ और निर्गुण कहते हैं,निर्गुण श्रेष्ठ,फिर द्वैतवाद और अद्वैतवाद का यही आपस में तर्क है ईश्वर ? मुस्लिम सम्प्रदाय में शिया और सुन्नी में भी यही तर्क, इसाईओं में भी यही कथोलिक,प्रोटेसटेंट इत्यादि में यही तर्क ऐसा क्यों प्रभु?
और तो और है ईश्वर हिन्दू धर्म के चार और उपजातियां बन गयीं,ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र, इंसानों ने तेरी इस दुनिया में
है मालिक,यह हिन्दू धर्म में उपजातियां बना कर,ब्राहमण को सर्वश्रेष्ठ,फिर क्षत्रिय,वैश्य को क्रमतर श्रेष्ठता के आधार पर वरिनिकृत किया है  और शुद्रो को निकृष्ट, और कहीं,कहीं तो शूद्रों से ऐसा व्यवहार कि नित्य परतिदिन की आवश्यकता जैसे कुँए का पानी सार्वजानिक कुओं से नहीं ले सकतें,उनसे छूना दोष है, ऐसा क्यों प्रभु,जब सब की आत्मा एक हैं,सब आपकी संतान है,तो यह भेदभाव कैसा है ईश्वर?
इस सृष्टि में,आपने प्राकर्तिक आपदाएं क्यों बनाई,जिसमें नीरीह,भोले,भाले जीवों की मृत्यु हो जाती है,और उनके संगी,साथी कुछ नहीं कर पातें हैं , सिवाय रोने बिलखने के, ऐसा क्यों है परमात्मा ?
और तो और सबके हिर्दय में,मृत्यु का ऐसा भय इस कारण बैठा दिया है, मृत्यु के ऐसी अनजानी मंजिल बना दी जहाँ से कभी कोई लौट के नहीं आता है, और यह भय सबमें व्याप्त कर दिया ऐसा क्यों है परमात्मा ?
क्या आपने इसीलिए सृष्टि की रचना की नीली छत्री वाले ?

बुधवार, जुलाई 21, 2010

धन्यवाद हमारीवाणी |

जब से आपका अस्थायी संकलक बंद हुआ था,और ज्ञात ही नहीं था,कब दुबारा अपने सवरूप में आएगा,में तो अपने को अपाहिज सा अनुभव कर रहा था, यह तो अच्छा हुआ कि चर्चा मंच को मैंने जोड़ रक्खा है,और उसमें रूप चन्द्र शास्त्री के द्वारा सूचित करने पर मैंने तुरंत आपके नए स्वरुप "हमारीवाणी.कोम  में,अपना खाता,तथा प्रोफाइल और अपने ब्लोगों को जोड़ा,और अनामिका की सदायें को धन्यावाद देता हूँ,जिन्होंने मेरे ब्लॉग को चर्चा मंच में जोड़ा,और में इस हमारीवाणी को उनके कारण देख सका |
और मेरे पास कहने को शब्द नहीं हैं |

"धन्यवाद ब्लोगवाणी का नया स्वरुप हमारीवाणी"

शनिवार, जुलाई 17, 2010

महिलओं के नामो से परेशान हुआ

पत्नी ने पूछा क्या कर रहे हो ?
मैंने कहा अपनी कविता के साथ हूँ 
तमतमा के बोली पत्नी यह कविता कौन है ?
उत्तर था मेरा यह तो मेरी रचना है |
अब वोह बोली अभी तो कविता के साथ थे ||
यह रचना कहाँ से आ गयी |
में बोला अरे में प्रगति की ओर जा रहा हूँ |
फिर तो वोह बोली अभी तो कविता,रचना कर रहे थे?
क्या इनसे मन नहीं भरा जो चल दिए प्रगति की ओर ||
अब मेरा उत्तर था अरे में काव्य की बात कर रहा हूँ |
गुस्से में तो थीं ही श्रीमती जी काव्य को काव्या सुना |
बोली फूटी किस्मत मेरी अब यह काव्या कहाँ से आ गयी ||
जब मैंने अंग्रेजी में कहा पोइट्री तो श्रीमती शांत हुईं|
 
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शुक्रवार, जुलाई 16, 2010

वर्णव्यवस्था दूषित क्यों हो गयी थी ?

कहा जाता है,जब इस पृथ्वी पर प्रलय हो चुकी थी,और उस प्रलय के बाद केवल  स्वयंभू  मनु और श्रधा इस संसार में जीवित बचे थे, पृथक,पृथक धर्मो में,एक कथा तो लगभग सभी धर्मो में एक सी ही है, जब इस पृथ्वी पर प्रलय हुई थी,तो सर्वत्र जल का समराज्य था,हमरे देश में, विष्णु भगवान ने मतस्य अवतार लेकर,एक नौका को अपने से बांध कर मतस्य अवतार लेकर उस जल में से खींच कर के सुरक्षित स्थान पर ले गये थे,और उस नौका में वोह लोग वैठे हुए थे,जिनको पता चल गया था,प्रलय के समय सर्वत्र जल का सम्राज्य होगा,और वोह लोग बच गये थे,परन्तु अधिकतर वर्णन आता है,श्रधा और मनु का ,और उसके पश्चात मानव ने इस धरा पर जन्म लिया,इसी प्रकार मुस्लिम और इसाई धर्म में भी,नूह और नोहा का वर्णन आता है, इन लोगों ने भी जब जल सर्वत्र था,परमेश्वर के द्वारा बताने के बाद,उसी प्रकार सुरुक्षित स्थान पहुँच गये थे, जैसे  विष्णु भगवान के मतस्य अवतार लेने के बाद,वोह लोग पहुँच गये थे, जो लोग उस नौका में बैठे थे,जिसको विष्णु भगवान ने मतस्य रूप में खींचा था, बाकि धर्मो को छोड़ कर हिन्दू धर्म को लेतें हैं,जो कि भारतवर्ष में हैं,और जिसमें मनु और श्रधा हुए थे, और जो मनु और श्रधा के बाद और मानव,मानवी इस हिंदुस्तान की धरा पर आये,और उसके पश्चात बनी वर्णव्यवस्था,ब्राहमण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र,सब के अलग,अलग कर्तव्य निर्धारित कर दिए गये,ब्राह्मणों का कार्य पठन, पाठन क्षत्रियों का काम सुरक्षा,वैश्य का कार्य धनोउपार्जन,और शूद्रों का कार्य सबकी सेवा करना, यह बात पृथक है,जब देश की सुरक्षा का सवाल आया तो, सबसे पहले देश और शास्त्रों की रक्षा करने के लिए,ब्राह्मणों ने क्षत्रियों  के प्रकार शस्त्र भी उठा लिए थे, और तत्कालीन राजाओं ने ब्रहामणों के लिए एक शाही दिन इनके लिए निर्धारित कर दिया था, कुम्भ पर होने वाला शाही स्नान इसी बात का प्रतीक है, ब्राहमण,क्षत्रियों,वैश्यों के साथ तो सम भाव रहा,परन्तु शुद्रो के साथ उपेक्षित व्यवहार क्यों था, अगर शुद्रो वेद सुन लें तो उनके कानो में पिघला हुआ सीसा डालने का कानून था,उनसे छूना वर्जित था, बहुत से रुर्डीवादी तो आज कल भी यह छुआ छूत की परम्परा निबाह रहें हैं, जब कालांतर में सब मनु और श्रधा की संतान बने तो आपस में इस प्रकार की मानसिकता क्यों थी,एक ही प्रकार की संतान में वैर क्यों था ?क्या माँ बाप अपनी संतानों को सिखाते हैं आपस में वैर भाव रखो?  कहा जाता है,"आत्मा अंश जीव अविनाशी ",और आत्मा को परमात्मा का अंश कहा गया है,शुद्रो को मंदिर में जाने की आज्ञा नहीं थी,यह कैसा विरोधाभास था, एक ओर तो कहा जाता था,आत्मा परमात्मा का अंश है,क्या शूद्रों की आत्मा परमात्मा का अंश नहीं थी?आत्मा अगर परमात्मा का अंश है, तो परमात्मा का परमात्मा से वैर कैसा ?
 शूद्रों को उच्च जाती के लोगों के साथ बैठना, उनके कुओं से पानी लेना सर्वथा वर्जित था,यह किस प्रकार की वर्णव्यवस्था थी ?
यह भी कहा जाता है,ब्राह्मणों की उत्पत्ति,ब्रह्मा जी के मुख से, क्षत्रियों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी की भुजाओं से, वैश्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के उदर से,और शूद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी की टांगो से हुई थी, फिर एक ही शरीर से उतपन्न लोगों का आपस में वैर? समझ नहीं आता |
अंत मे कहना चाहूँगा, शरीर के अलग,अलग भागो को भी इस प्रकार से विभक्त क्या गया है, सिर को ब्राहमण, भुजाओं को क्षत्रिय,उदर को वैश्य कहा गया और पैरो को शुद्र कहा गया है, तो इस शरीर के भागो का आपस में वैर कैसा ?
क्यों थी वर्णव्यवस्था दूषित?

गुरुवार, जुलाई 08, 2010

हमारे देश में सामाजिक चेतना का अभाब क्यों है ?

हमारे देश भारत में सामाजिक चेतना का अभाव क्यों है, समझ नहीं आता क्या यह अशिक्षा का प्रभाव है ?, या स्वार्थ की भावना
है ? या इन दोनों का मिला,जुला प्रभाव है ?
इस सामाजिक चेतना का लाभ उठातीं हैं,राजनीतिक पार्टियाँ और हानि किसकी होती हैं,जनता की, विरोधी पार्टियों को कोई मुद्दा मिला नहीं,और उतर आतीं हैं,अन्दोलोनो पर, आन्दोलन करना तो ठीक है, परन्तु  निजी,सरकारी संपत्तियों को हानि पहुँचाना कहाँ तक उचित है, कुछ राजनीतिक शरारती तत्व भोली जनता तो उकसाते हैं,और यह भोली जनता उनके बहकावे में,आकर के तोड़,फोड़,आगजनी,रेलगाड़ियों तथा बसों को रोकना प्रारम्भ कर देते हैं, इससे हानि किसे होती है,जरा सोचिये,अगर रेलगाड़ियों को रोका जाये तो कोई अपने विशेष प्रयोजन के लिए या आवश्यक काम के लिए जा रहा हो,जैसे किसी का व्यवसाय के लिए साक्षात्कार हो और वोह रेलगाड़ी रुकने के कारण वोह साक्षात्कार के लिए उपस्थित ना हो पाए,गया ना उस समय आजीविका कमाने का साधन वोह वंचित रह जाये ,वोह आपका भी तो बही,बंधू हो सकता है,|
बसों को जलाने या बसों को तोड़,फोड़ करने से क्या लाभ,कोई रोगी बस में बैठ कर अस्पताल के लिए जा रहा हो,और बस के चलने में बाधा पड़ने के कारण वोह अस्पताल ना पहुँच पाए और दम तोड़ दे, वोह हम लोगों में से कोई भी हो सकता है,आप लोग यह क्यों नहीं सोचते ? अभी कुछ दिनों पहले विरोधी पार्टियों ने महंगाई के विरोध में  बंध का एलान किया और बाजार बंद करवाए,यह तो सही है,परन्तु सोचिये निजी,सार्वजानिक संपत्तियों को हानि पहुँचाने से किसी हानि होगी ? सन 1984 में हमारी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी,और उस समय  एसी दंगो की आग भड़की की,अधिकतर सिक्खों की जान पर बन आई, वोही आगजनी,वोही तोड़,फोड़ और उस हानि की भरपाई आज तक नहीं हो पायीं है,अगर सरकारी संपत्तियों को हानि  पहुंचाई जाएगी तो सरकार उस हानि को किसके द्वारा क्षतिपूर्ति करेगी,जाहिर है,जनता से कर के रूप में, इन्टरनेट से तो यह सन्देश अधिक लोगों को नहीं पहुँच पायेगा,क्योंकि हमारी अधिकतर जनता में शीक्षा का आभाव है,मत आओ भाई,बहनों इन बहकावों में |
जब कोई धार्मिक कार्यक्रम जैसे जागरण इत्यादि इस प्रकार के कार्यक्रम होतें हैं,तो अक्सर शामियाने इस प्रकार लगाय जाते हैं की सड़क के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक यह शामियाने स्थान ले लेतें हैं, इससे सड़क पर निकलने में कठिनाई होती है, जैसे ऊपर लिखा गया है, अगर कोई किसी आवशयक काम के लिए जा रहा हो और उसको वोही रास्ता ज्ञात हो तो पड़ गयी ना उसके काम में बाधा,और इस प्रकार के धार्मिक अयोजोनो में,लाउडस्पीकर लगा कर जोर,जोर से  भजन इत्यादि गाए जाते हैं,अगर कोई आसपास में रोगी हो या कोई परीक्षा की तय्यारी कर रहा हो,यह कृत्य बाधक बनेगा की नहीं ? अरे भगवान का तो कार्य कर रहे हो,और भगवान के बन्दों को दुखी कर रहे हो,ये कैसी पूजा है ?
और तो और जागरण में नाम ले लेकर पुकारा जाता है, इसकी इतने रूपये की अरदास,क्या भगवान गरीबों का नहीं हैं,इसको व्यापर क्यों बनाते हो?
रामायण की इस चोपाई पर तनिक ध्यान दो "छल कपट मोहे नहीं भावा",इसका अर्थ समझो भगवान को प्राप्त करना है तो
छोड़ो यह आडम्बर भगवान प्रसन्न होतें हैं,निर्मल भक्ति से,अगर कोई धार्मिक आयोजन करना है,तो पार्क इत्यादि सार्वजानिक व्यवस्था करो,आप भी खुश,जनता भी खुश और ईश्वर भी प्रसन्न |
आज कल सड़को पर देखो तो कैसे अव्यवस्था नजर आयगी,हर किसी को जल्दी है,आगे निकालने का स्थान नहीं हैं,पीछे से भोपुओं के शोर अगर रात्रि काल हो तो पीछे से कार के दिप्पर,यह लोगों के अपने बनाये हुए नियम जो की,वाहन चलाने के लिखित नियोमो में तो नहीं हैं |
बहुत बार यह भी होता है,कोई बच्चा खेलता,खेलता बोरवेल या मन्होल में गिर जाता है,जो कि ठेकेदार या सरकारी कर्मचारियों का काम है,इनको सुरक्षित तरीके से ढक कार रखें,हो सकता है,अगला बच्चे का गिरने का नम्बर ठेकेदार या सरकारी कर्मचारी में से किसी का हो |
जागो बही,बहनों जागो कुछ अपने में भी तो सामाजिक चेतना लाओ |

मंगलवार, जून 15, 2010

और सोशल साईट से जुड़ने में असमर्थ हूँ |

आज कल सोशल साईट की बाड़ सी आ गयी है,नित नए,नए सोशल साईट का निमंत्रण मिलता है,आखिर कितने सोशल साईट का निमंत्रण स्वीकार करुँ? सबसे पहले ऑरकुट पर अपना खाता खोला था, फिर याहू मेसेंजर पर अमरीका की  पेटरिका से चैट कर रहा था, और उन्होंने पूछा "क्या कर रहे हो "? मैंने उत्तर दिया" कुछ नही", तो वोह बोलीं मैंने फेसबुक पर अपने पारिवारिक फोटो लगाये हैं, और इस प्रकार मेरा खाता फेसबुक में भी खुल गया, किसी मेरे पुराने मित्र ने मुझे hi 5 पर निमन्त्रन मिला और इस प्रकार इस साइट में मेरा खाता खुल गया, इसी प्रकार से मेरा खाता नेटलोग और झूस में भी खुल चुकें हैं, इन सब में, मिला कर बहुत सारे  इन्टरनेट पर मित्र हो गएँ हैं, और याहू मेसेंजर, जी मेल और हॉट मेल पर भीबहुत सारे मित्र हैं, इन सब को मेनेज करना बहुत कठिन है,और उसके साथ याहू,रेडिफ,जी मेल,हॉट मेल पर आने वाले सन्देश और उनका उत्तर भी देना होता है, में इस कारण से बहुत से लोगों के निमंत्रण को सवीकार नहीं करता हूँ, बहुत से लोगों को यह मेरा रूखापन लगता होगा,यह मेरी विवशता है,इसके अतिरिक्त में परिवार वाला हूँ, परिवार के बहुत से कर्तव्य भी निभाने होते हैं,और बहुत से काम घर गृहस्ती चलाने के लिए करने होतें हैं |
में और सोशल साईट में खाता खोलने में असमर्थ हूँ,जिस,जिसने मुझे अपना सोशल साईट पर मित्र बनाना चाह,उनको हार्दिक धन्यवाद |

गुरुवार, जून 10, 2010

ज्योतिष,तंत्र,मन्त्र,यंत्र या इस प्रकार की विद्याओं का अध्यन सार्थक या निरर्थक |

आज कल वैज्ञानिक युग है,और विज्ञान के बहुत से पृथक,पृथक विषय हैं,भोतिक विज्ञान,रासायनिक विज्ञान,जीव विज्ञान इत्यादि अगर  सारे विज्ञानिक विषयओं के बारे लिखे जाये तो यह वेगयानिक विषयों की सूची बहुत लम्बी हो जाएगी,और इस प्रकार के विज्ञानिक विषयों पर शोध ही आजकल प्रचलन में हैं, इन्ही विज्ञानिक विषयों पर निरंतर शोध होने के करण मानव की बहुत सी आवश्यकताएं पूरी हो रही हैं, नयी,नयी बस्तुओं का अविष्कार हो रहा है, आज इन शोध के करण बहुत प्रकार के क्लोन बन चुके हैं  ,और अब तो विज्ञान के करण रासायनिक क्रियाओं के द्वारा जीता जगता सेल बनाने में वैज्ञानिकों को सफलता मिल गयी हैं,अगर विज्ञानिक सिद्ध हुए प्रयोगों को जितनी बार दोहराया जाये तो परिणाम सदा एक रहेगा,विज्ञानिक सदा जिज्ञासु परवर्ती के होते हैं,और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए तार्किक प्रयोग करते रहते हैं | जब आईसक न्यूटन ने पेड़ से सेव को गिरते देखा तो न्यूटन का पहला गुरुत्वाकर्षण का नियम बना,फिर इसी प्रकार न्यूटन  का दूसरा नियम बना "जो वस्तु चल रही है चलती रहेगी" और इसी श्रृंखला में न्यूटन का तीसरा  नियम बना," परतेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है" |
 कालांतर में जब महान नोबल पुरुस्कार प्राप्त  वैज्ञानिक  ईनसटीईन  का समय आया तो उनकी जिज्ञासा के करण न्यूटन के नियोमों पर  ईनसटीईन  ने कुछ संशोधन किये जैसे न्यूटन के दूसरे नियम "जो वस्तु चल रही है,चलती ही रहेगी,या जो वस्तु रुकी है रुकी रहेगी", पर ईनसटीन ने कहा जब तक उस पर वाहिये बल ना लगाया जाये, इसी प्रकार न्यूटन के तीसरे नियम "परतेक क्रिया की पर्तिक्रिया होती है", पर उन्होंने संशोधन किया उसके "विपरीत और बराबर", विवाद तो हमेशा बने रहे हैं हैं,गलेलियो ने अपने समय में कहा था कि " पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है",जो आज के युग में सत्य है,पर उस युग में सत्य नहीं था,क्योंकि धर्मग्रन्थ में लिखा हुआ था," सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है", इस कारण गलेलियो को बहुत अधिक विरोध सहना पड़ा था , इसी प्रकार इटली में,"सुकरात लोगों को कहता था,किसी बात को ऐसे ही नहीं अपनाओ,अपनी बुद्धि से सोचो फिर अपनाओ ", तो उसको विष का प्याला पीना पड़ा,जो आज के युग में सत्य है |,आर्किमिडिज़ ने जब सनान के लिए टब में प्रवेश किया तो,कुछ जल बहार निकला और आर्किमिडिज़ "यूरेका,उरेका चिल्लाते हुए निवस्त्र ही भाग निकले, मतलब कि पता चल गया,और आर्किमिडिज़ का सिधांत बन गया,"जो भी वस्तु द्रव में जाती है,वोह अपने भार के बराबर द्रव को विस्थापित करती है", इस तर्क को मान लिया गया,मतलब कि कभी विरोधाभास और कभी अपना लेना तो सदा ही चलता रहा है |
  यह तो केवल अनुसन्धान की ही बात है,परन्तु अब बात करते हैं अविष्कारों की,जैसे के ऊपर लिखा आज तो विज्ञान ने प्राणयुक्त सेल निर्मित कर लिया है,और आगे चल कर क्या,क्या वैज्ञानिक अविष्कार हो जाएँ,कुछ कहा नहीं जा सकता है,निरन्तर वैज्ञानिक विषयों पर शोध होते रहते हैं,और नए,नए अविष्कार होते हैं, इसी सन्दर्भ में अगर बात करें थोमस अल्वा
एडिसन ने जब बल्ब के अविष्कार के बारे में कहा तो लोग हंसने लगे,परन्तु उन्होंने बल्ब का अविष्कार कर लिया,और जब उसको विद्युत् उर्जा के द्वारा प्रकशित किया गया,तो प्रकाश तो हुआ और आधे घंटे के बाद,उस बल्ब के अन्दर के धातु के तार जल गये,फिर एडिसन की उस समय किरकरी हुई,क्योंकि वोह धातु के तार ओक्सजीन के कारण ओक्ससीडाइज होने के कारण जल गये थे,फिर एडिसन ने उस बल्ब में सारी वायु नीकाल कर वेकुयम बना दिया,और इसी प्रकार हो गया बल्ब का अविष्कार,और आज तो ट्यूबलाइट,सी.ऍफ़.एल इत्यादि हैं |
 यह तो रहा विज्ञान के बारे में,अब आतें हैं मूल विषय पर ज्योतिष,तंत्र,मन्त्र,यंत्र या इस प्रकार की विद्याओं का अध्यन सार्थक या निरर्थक, विज्ञान से अधिकतर लोग परिचित है,पर इन विवादित विषयों से बहुत कम लोग परिचित है, में भी विज्ञान का शिष्य रहा हूँ, इन विवादित विषयों से अधिक परिचित नहीं हूँ,ज्योतिष के बारे में इतना ही जानता हूँ, ग्रह इत्यादि की गणना की जाती है,और भविष्यवाणी करना कला है,फिर ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों का प्रभाव कम या अधिक करने के लिए रत्न धारण किये जाते हैं, और जिस प्रकार की रश्मियों की शरीर की आवशयकता है,यह रत्न उस प्रकार की रश्मियों को वातावरण से लेकर शरीर को पहुंचाते हैं|
अब आता हूँ,जड़ी,बूटियों के द्वारा रोग निवारण, हमारे पूर्वज इसके बारे में जानते थे,परन्तु जैसे,जैसे समय बीतता गया इस विद्या का ज्ञान कम होता रहा, परन्तु चिकत्सा क्षेत्र में,दूसरी पद्दतिया की चिक्त्साए जीवित हैं,जैसे एलोपेथी,होमोपेथी, यूनानी इत्यादि,लेकिन जड़ी,बूटियों से चिकत्सा के बारे में शोध नहीं होता,इसी प्रकार आता हूँ तंत्र,मंत्र यंत्र पर यह विद्याएँ जीवित तो हैं, परन्तु इन विद्याओं के साधक नहीं मिल पाते,अगर मिल भी जाएँ तो इस क्षेत्र में इतना पाखंड हैं,कि कौन सही और कौन गलत इस पर सहज विश्वास नहीं हो पाता,इन्सान इनके चंगुल में फँस सकता ना ही इन विषयों पर शोध नहीं होता है, अब इस बात को पाठकों के ऊपर छोड़ता हूँ,यह विद्याएँ सार्थक हैं या  निरर्थक,मेरी ओर से इस विषय पर  कोई प्रतिक्रिया नहीं हैं, बस पाठको कि क्या राए अच्छी या बुरी जानने की उत्सुकता है,सबका स्वागत है |
पाठकों की प्रतिक्रियाएं सर आँखों पर धन्यबाद

गुरुवार, मई 27, 2010

हमारे देश के सत्ता पक्ष और विपक्ष क्या मिल कर देश की प्रगति के लिए आम सहमती नहीं बना सकते ?

जब भी समाचार पत्रों को उठा के देखो तो कोई भी मुद्दा हो, जैसे आज कल जातिगत जनगणना को मुद्दा,या नक्सल बाद का मुद्दा तो विपक्ष अक्सर सत्ता पक्ष पर आक्षेप ही लगाता ही दिखाई देता है, सत्ता पक्ष से उस मुद्दे का उत्तर माँगा जाता है,परन्तु अपनी और से कोई भी सुझाव देता नहीं देता   है, आज कल विपक्ष आसमान छूती महंगाई के विरोध में प्रदर्शन कर रहा है,परन्तु यह सुझाव नहीं दे रहा है,कि इस बड़ती हुई महंगाई कि रोकथाम कैसे हो, क्या विपक्ष का यही काम है सत्ता पक्ष के विरुद्ध आवाज उठाना, अगर इस समय का चुनाव के बाद विपक्ष का स्थान ले लेता है, जैसा होता आया है तो यह भी बस बदले हुए सत्ता पक्ष पर आरोप ही लगता नजर आयेगा
अगर विपक्ष आक्षेप लगाये और उसके साथ सुझाव भी दे और सत्ता पक्ष उन सुझावों वों को कार्यान्वित करे तो देश की प्रगति के आसार अधिक हो जायेंगे, देश की प्रगति के लिए स्वस्थ बहस तो अच्छी है, प्रतेक कार्य में गुण दोष तो होते ही हैं, अगर विपक्ष दोष तो बताये और उसके साथ उसका निवारण भी बताये और सत्ता पक्ष उन दोषों को सुन कर उनका निवारण करे तो देश उन्नति की ओर अग्रसर होगा |
 कोई भी राजनितिक पार्टी सत्ता पक्ष में आती है, उसकी अपनी उपलब्धियां तो होतीं ही हैं,जैसे इस समय के सत्ता पक्ष के द्वारा मेट्रो ट्रेन लाना और उसका विस्तार करना, लेकिन दोष भी होतें हैं, जैसे सदन पर हमला करने वाले अफजल गुरु का कोई फैसला नहीं हो पा रहा हैं, उसकी फाइल एक विभाग से दूसरे विभाग में सरका दी जाती है,परन्तु कुछ निष्कर्ष ही नहीं निकल पा रहा, यह तो सरकार के गले की फाँस बना हुआ है |
 आखिर यह लोग जनता के द्वारा चुने होतें हैं, और जनता इन से आशाएं रखतीं हैं,जब इन नेताओ के द्वारा जनता की आशाएं पूरीं नहीं हो पाती तो लोग यह समझ नहीं पातें किसको वोट दे कर अपना पर्तिनिधि  चुना जाये,और चुनाव के समय यह प्रचार होता कि हर नागरिक को वोट देना चाहिए,अगर कोई भी पार्टी सकारात्मक कार्य करेगी तो जनता का उस पार्टी पर विश्वास बढेगा और जनता उस पार्टी को स्वत: ही वोट देगी,इस प्रकार के प्रचार की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी |
 आखिर यह लोग लोकतान्त्रिक देश के राजनेता हैं,और जनता की आवश्यकताओं को पूरा करना इनका कर्त्यव्य है,जनता का आत्मविश्वास तो इनके हाथ में |
 अगर प्राक्रतिक आपदाओं के कारण, यह नेता संभावित कार्य नहीं कर पाते तो यह तो इनकी विवशता हो सकती है, जैसे गत वर्ष में वरिश ना होने के कारण फसल की हानि,और इस कारण महंगाई बड़ने का तो कारण था, लेकिन अगर प्राक्रतिक आपदाएं ना हो,और जनता की आशाओं पर तुषारापात हो तो,राजनेता कहलाने वालों से क्या आशा की जा सकती है |
 जब कोई पार्टी चुनाव में हार जाती है, तो उस पार्टी के लोगों में पार्टी के हार का कारण ढूँढा जाता है, कि वोह पार्टी क्यों हारी
 है, परन्तु यह नहीं ढूँढा जाता देश के विकास में क्या अवरोध आयें हैं,जिसके कारण पार्टी हारी है ?
 यह सदन में गरमा,गर्मी वाक आउट के स्थान पर अगर विपक्ष सत्ता पक्ष के दोष बता कर उनका निवारणका हल भी बताये  तो देश प्रगति कर सकता है |
 जनता को यह अधिकार ही नहीं है,कि इन लोगों से प्रश्न पूछ सके,तो यह आम जनता क्या करे? बस कभी,कभी प्रेस कोंफ्रेंस हो जाती है,और इन नेताओं से मीडिया ही अधिकतर प्रश्न पूछता है ?
  जब जनता त्रस्त हो जाती है,तो आन्दोलन पर उतर आती है, तब सत्ता पक्ष समाधान की बात करता है, अगर अकारण ही मूल भूत सुविधा ना मिले तो जनता में रोष तो होगा ही |
पक्ष हो या विपक्ष कभी विपक्ष सत्ता पक्ष में आयेगा और सत्ता पक्ष विपक्ष में आएगा अगर आम जनता का विश्वास प्राप्त कर सकेगा तो जनता स्वत: ही वोट देगी |
 देश हित में सत्ता पक्ष में निजी मतभेद मिटा कर देश हित में एकमत तो होना ही पड़ेगा |
  






रविवार, मई 09, 2010

कल 10 मई हम दोनों पाती,पत्नी के लिए विशेष है |

आज सुबह मेरी पत्नी ने कहा कि उसके स्कूल में कल 10 मई को सब लोग उससे मिठाई मांगेगे, मुझे उस क्षण तो कुछ याद नहीं आया परन्तु दूसरे ही पल याद आ गया कि हम दोनों को विवाह बंधन में बंधे हुए 32 वर्ष हो जायेंगे, आज से 32 वर्ष से १ दिन कम में हमारा विवाह हुआ था,और जैसे ही मुझे दूसरे क्षण स्मरण हो आया कि कल हमारी ३२ वीं वर्षगांठ है, तो 32 साल पहले की विवाह बंधन में बंधने की घटना आँखों के सामने आने लगी, मुझे अपने काम के कारण अलग,अलग शहरों में जाना पड़ता था, इसलिए उस समय की फोटो रील द्वारा खिंची हुई फोटो जो कि हमारी शादी का प्रमाण थीं,ना जाने कहाँ गम हो गयीं,बस जो रह गयीं हैं,मानस पटल पर खिंची हुईं सम्रतियाँ |
आज से 33 साल पहले जब किंचित मुझे कार्य करते हुए एक साल व्यतीत हो चुका था, तब मेरी माँ ने समाचार पत्रों में मेरे लिए बधु खोजना प्रारंभ कर दिया था, उस समय तो यही एक उपाय था,बर बधु खोजने का,और मेरे माँ और पिता जी कभी इस शहर में या कभी उस शहर में मुझे लेकर जाते थे,वधु की तलाश में,और कभी लड़की वाले आते थे हमारे घर में,इस प्रकार एक वर्ष बीत गया था,मेरी माँ ने समाचार पत्र में, मेरी पत्नी के घर का पता और दूरभाष नंबर देखा और मिला दिया मेरी पत्नी के घर पर फ़ोन और इस प्रकार हमारे विवाह का सूत्रपात हुआ था |
 उसके पश्चात विवाह की प्रारम्भिक रस्मों गोद भराई सगाई इत्यादि रस्मों का सिलसला आरंभ हो गया था, और क्षणे,क्षणे खिसकता हुआ आ गया 10 मई का वोह दिन जब हम दोनों प्रणय बंधन में,बंध गए |

शनिवार, अप्रैल 17, 2010

प्राक्रतिक आपदाओं का परिणाम |

अभी हाल ही में, हैती में आये भूकंप ने हाहाकार उत्पन्न कर दिया था, अत्यधिक जान माल की हानि हुई थी, सब ओर इस प्रकार से अस्त,व्यस्ता की सुरक्षा का कोई रास्ता ही नहीं बचा था, सड़के क्षतिग्रस्त हो गयी थीं, सडको का मार्ग अवरुद्ध, हवाई अड्डे तहस,नहस सडकों की ओर से सहयता पहुचना दुर्लभ हो गया था, हवाई सहायता भी पहुचना भी दुर्लभ हो गया था, इमारते तहस नहस होने के कारण हजारो लाखो लोग मलबे के नीचे दब गए थे |
 और इसी वर्ष में चीन में भी ऐसा ही भूकंप आया है,और वोही दृश्य जैसा कि हैती में हुआ था,लोग जब तक संभले इससे पहले इस भूकंप ने लोगों को अपनी चपेट में लिया था, यह तो थी भूकंप की त्रासदी |
 और अभी हाल ही में आइसलैंड के ग्लेशिअर में जवालामुखी ऐसा भड़का की उससे कई किलोमीटर तक धुआ उठा और इस धुंए ने बहुत से देश अपनी चपेट में ले लिए , हवाई सेवाएँ युरोप के बहुत से देशो अवरुद्ध हो गयीं हैं, इस धुए के कारण लोगों को साँस की समस्या हो सकती हैं, इस धुंए में सल्फर की अधिक मात्रा होने के कारण बारिश होने पर यह सल्फर यह पानी के साथ मिल कर तेजाब बनाएगा (सल्फुरिक असिड ) जो कि त्वचा को हानि पहुंचाएगा,और यही बारिश का पानी धरतीऔर लावा में निकले कांच धरती पर पड़ कर उसको बंजर बनायेंगे  जो फसलो को उत्पन्न होने में कठिनाई पैदा करेगा, इस प्रकार की प्राक्रतिक आपदाए सुनने और पड़ने में ऐसा लगता है,जैसे कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय पर हिरोशिमा नागासाकी पर परमाणु बम गिरा था,और अनेको वर्षो तक इस परमाणु बम ने रेडशीयन के कारण लोगों को हानि पहुंचाई थी, यह  रेडशीयन उसी प्रकार से हानि पहुँचाता है,जैसे कि दिल्ली के  स्थान पर कोबाल्ट-60 ने कुछ लोगों को हानि पहुचाई है, इसकी किरणे विकरण के कारण त्वचा को भेदता हुआ हड्डियो और खून को क्षतिग्रस्त करता है |
 अपने ही देश की बात लो गत वर्ष सुनामी ने हजारो लोगों को अपनी चपेट में लिया था, सुनामी के कारण कितने ही लोग बह गए कितनो के ही घर उजड़ गये थे, और मानसून के दिनों में एल नेनो मानसूनी हवाओ को क्षीण कर दिया था, और परिणाम वर्षा भी नाममात्र की हुई थी, फसल कम हुई थी और इस कारण फल सब्जिओ के दाम आसमान छुने लगे हैं, वैसे तो यह अर्थशास्त्र को नियम है,अगर किसी वस्तु की मांग अधिक होती है, और उपलब्धता कम तो उस वस्तु के दाम बड़ने लगते हैं, और ऊपर से यह सटोरिये जो अपने पास फल सब्जियों का अपने पास भंडार रख लेते हैं, और कमी होने के कारण यह सटोरिये अपना लाभ सोच कर ऊँची,ऊँची कीमतों में बेचते है, इन सटोरियों को आम जनता से कोई मतलब नहीं इनको तो अपने लाभ से मतलब |
 आज कल विश्व उतरोतर बडते हुए तापमान से ग्रसित हो रहा है, इसका कारण तो में अपने एक लेख में लिख चुका हूँ, अब ऐसी एसी प्राकर्तिक आपदाए आ रही हैं,जो पहले सुनने और पड़ने में बहुत कम आती थीं |
 क्या प्रक्रति की विनाश लीला प्रारंभ हो गयी है |

शनिवार, मार्च 20, 2010

मेरी मेरे ब्लॉग की यह शतकीय पोस्ट है |

|मेरी मेरे ब्लॉग की  यह शतकीय पोस्ट है |
यह तो मुझे याद नहीं कब मैंने ब्लॉग लिखने प्रारम्भ किये थे, हाँ बस लिखता चला गया, दो निजी ब्लॉग बनाये थे,www.vinay-mereblog.blogspot.com और दूसरा www.snehparivar.com , शेष दो ब्लॉग में से एक ब्लॉग पिता जी अविनाश जी ने मेरे डेशबोर्ड पर पहुँचाया था,और एक और ब्लॉग कबीरा खड़ा बाजार में किसी और ने मेरे डेशबोर्ड पर पहुँचाया था, मैंने तो युहीं अपनी पहली पोस्ट मेरी जीवनी से www.vinay-mereblog.blogspot.कॉम में  लिखी थी,मुझे ज्ञात ही नहीं था,मेरी पोस्ट पड़ी जाएँगी और उन पर टिप्पणियाँ भी आयंगी, उससे पहले भी एक ब्लॉग बनाया था,और उस ब्लॉग का पता ही नहीं चला,ब्लॉगर के अपडेट होने के बाद वोह ब्लॉग कहीं खो गया, हो सकता है, ब्लॉगर के मुख्य सर्वर पर भी ना हो |
  मेरा ना ब्लोगवाणी से कोई परिचय था,ना चिटठा जगत का, एक बार अविनाश जी से दूरभाष पर बात हो रही थी, मैंने यह उनसे पूछा कि " आप लोग किसी नए लिखने को कैसे जान लेते हैं ?" , तब अविनाश जी ने मेरा परिचय ब्लोगवाणी और चिट्ठाजगत से करवाया था |
 यहाँ ब्लॉगर पर आकर के बहुत से लोगों से पहचान हुई, और भिन्न,भिन्न विषयों का ज्ञान मिला, बस एक बात की कसक रह गयी, मेरी रिहायश के आस पास दो स्थान पर ब्लागरों का सम्मलेन हुआ, लेकिन कुछ निजी कारणों से ना वहाँ जा सका, इसलिए आमने,सामने किसी से मुलाकात नहीं हुई, एक बार तो कुछ पेमेंट करनी थी, और दूसरी बार पत्नी को मलेरिया हो गया था, अविनाश जी तो गाजिआबाद के पास दिल्ली में ही रहते हैं, उनका दो बार हमारे घर आने को प्रोग्राम भी बना, एक बार तो वोह हमारे घर आने वाले थे, परन्तु उनका बीच में ही उनका प्रोग्राम बदल कर नोयडा जाने का बन गया, दूसरी बार उनका किसी शादी में फिर गाजियाबाद आने का था,और बहुत देर रात्रि में आने के कारण वोह, दोबारा हमारे घर नहीं आ पाए थे, पाबला जी भी एक ब्लॉगर सम्मलेन में गाजिआबाद आये थे, पाबला जी ने तो मेरी दो ब्लॉगर की दो तकनिकी समस्या का भी समाधान किया था, सब ब्लोग्गरो के जन्मदिन,वैवाहिक वर्षगांठ और ब्लोग्गरो की समाचार पत्रों में, ब्लोग्गोरो द्वारा लिखी हुई पोस्ट को स्मरण करा कर ख़ुशी देने वाली इस शख्सियत से मिलने की बहुत हसरत थी, लेकिन एन मौके पर पत्नी को मलेरिया बुखार हो गया, उनसे तो दूरभाष पर इस सम्बन्ध में बात भी हो चुकी थी, होना तो वोही होता है,जो ऊपर वाले को मंजूर होता है |
 ब्लॉग बनाने से यह भी लाभ हुआ, ज्योतिष का ज्ञान मिला जिसमे संगीता जी, पंडित डी.के वत्स जी अग्रणी हैं, अलका जी के द्वारा लिखे हुए लेखो से ज्ञात हुआ कैसे फल,सब्जियों से रोगों की चिकत्सा संभव है, लवली जी के लिखे हुए मनोवेग्यानिक लेख से मनोविज्ञान की जानकारी मिली, आशीष जी के कारण में में हिंदी में टिप्पणी दे पाता हूँ, उनका तकनिकी ज्ञान भी मिलता है| आप सब लोगों को तहदिल से धन्यबाद  में तो यह भी नहीं जानता था, इसमें अनुसरण करता बन जाते हैं, उन सब अनुसरण कर्ताओं को धन्यबाद, जब पहला ब्लॉग स्नेह परिवार बनाया था,तब सबसे पहली अनुसरण करता थीं ,शमा जी जो की बहुत सी कला की धनी हैं |
  उड़न तश्तरी जी को कौन भूल सकता है, उनकी टिप्पणियाँ तो, लगभग सारे ब्लोगों में मिल जातीं हैं, और अपनी कहानी परिवर्तन के समय में लिखे हुए पहले भाग से मुझे लगा,वोह लेखों को बहुत ध्यान से पड़ते हैं, क्योंकि मेरी कहानी परिवर्तन के पहले भाग में मेरी त्रुटी की ओर ध्यान दिलाया था, और वोह जो त्रुटी थी बहुत ही सूक्ष्म थी, उड़न तश्तरी जी आपको बहुत,बहुत धन्यवाद |
 समय,समय पर मनु जी,अविनाश जी,संगीता जी,शमा जी,अनीता जी,पावला जी,अलका जी,पूर्णिमा जी  से चैटिंग होती रहती है,और मुझे अपना परिवार सा ही लगता है,ब्लॉग की एक पोस्ट जिसमे गणेश उत्सव के समय मैंने गणपति जी से प्रार्थना करी थी,वोह समाचार पत्र हरिभूमि में छप गया था, जिसकी सूचना मुझे अविनाश जी ने एक टिप्पणी देकर करी थी,में तो आश्चर्य चकित था|
में कोई साहित्यकार तो नहीं,बस एक लिखने का शौक है, साहित्यक त्रुटी तो होतीं हैं ही, एक बार पूर्णिमा जी को होली की शुभकामनाये दे रहा था,और अधिकतर चैत्तिंग में पूर्णिमा लिख रहा था,तब पूर्णिमा जी ने मजाक में  कहा जब आप पूर्णिमा लिखेंगे,तब शुभकामनाये लूंगी,लेकिन फिर मैंने पूर्णिमा लिखा तब वोह बोली फिर गलत,उसके बाद मैंने अपनी त्रुटी सूधार के पूर्णिमा लिखा तो वोह बोलीं, "यही हुई ना बात" |





शुक्रवार, मार्च 19, 2010

गतांक से आगे (गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है )

गतांक से आगे गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है
यह शेष लेख तुलसीदास जी की इन पंक्तियों से आरम्भ कर रहा हूँ,
  नारी मुई,धन संपत्ति नासी |
  मूड,मुड़ाये भये सन्यासी || 
  मतलब कि स्त्री का देहावसन हो गया,संपत्ति का नाश हो गया,बस मुंडन करा के सनाय्सी हो गये, इस प्रकार सन्यासी होना तो कायरता है, अब आगे की बात कहता हूँ, जब मनुष्य गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है, तो पुरष के सिर पर सेहरा रखा जाता है,मतलब यह कि अब गृहस्थ जीवन के कठिन तप के लिए,अपनी जिम्मेदारियों को उठाने के लिए अपना जीवन प्रारंभ करो और अग्नि को साक्षी मान कर सात बचनो में बंध कर स्त्री,पुरष का गठबंधन हो जाता है, अब उन सात वचनों के हिसाब से स्त्री पुरष एक दूसरे के दुख सुख के भागीदार  होते है, प्रारम्भ हो गया ना गृहस्थ जीवन का तप,अगर स्त्री कोई कष्ट हो तो पुरुष उसका साथ दे,अगर पुरुष को कोई कष्ट हो तो स्त्री उसका साथ दे, दोनों में से कोई बीमार हो जाये तो दोनों को ही  कष्ट सहना ही पड़ता है, अब जब परिवार का प्रारंभ हुआ है,तो ऐसी आय का साधन रखना पड़ता है जो बंद ना हो,यह भी तो तप ही है, आजकल तो एकाकी परिवार हो गए हैं,परन्तु सयुंक्त परिवार में उस स्त्री को जो नयी,नवेली दुल्हन बन कर अपने परिवार को छोड़ कर आई है,उसको  वर के माता,पिता भाई,बहनो से सामंजस्य रखना पड़ता है, और वर तथा वधु के मित्रो, करीबी और दूर के रिश्तेय्दारो का भी दायरा बड़ जाता है,और इस समय वर तथा वधु के लिए एक दूसरे के मित्रो, करीबी और दूर के रिश्तेदारों के सुख,दुःख अपने सुख दुःख की ओर अधिक ध्यान देकर के  में भागी होना पड़ता है, यह भी तो  तप ही है |
  इसके बाद अगला चरण आता है,संतान उत्पत्ति का, साथ में रहता है,वर और वधु पक्षों के परिवार का संतान उत्पत्ति का दवाब, आज तो युग बदल गया है, परन्तु पुराने समय में अगर वधु संतान नहीं कर पाती थी,तो उसको बाँझ जैसे   शब्द से अलंकृत किया जाता था, चाहे दोष वर में हो, लेकिन अब तो समय बदल गया है, लोग समझदार हो गए हैं,और अब वर तथा बधू दोनों का इस सन्दर्भ में डाक्टरी परिक्षण होता है, और इसका इलाज भी हो जाता है, कोई भी विवाहित स्त्री मातृत्व सुख प्राप्त करना चाहती है, और संतान उत्पन्न होते ही, माँ और पिता को अनेको कष्ट सहेने पड़ते हैं, माँ को अनेको रात जाग कर गुजारनी पड़ती है,और बच्चे को सूखे में सुला कर गीले में सोना पड़ता है,एक नन्ही जान के लिए ना जाने कौन, कौन से कष्ट सहने पड़ते है, संतान बीमार पड़ती है,चाहे दिन हो या रात पिता को  डाक्टर का प्रबंध करना पड़ता है,यह तप नहीं तो और क्या है ?
 अब संतान जैसे,जैसे बड़ी होती है,उसका पहले स्कूल की शिक्षा का प्रबंध और उसके बाद कोलेज की शिक्षा और उच्च शिक्षा का प्रबंध तो पिता को करना ही  पड़ता है, और माँ को घर में बच्चे को अच्छे संस्कार देना, उसकी घर में  पड़ाइ की देखभाल तो माँ को करनी पड़ती है, और पती,पत्नी दोनों ही काम काजी हों तो यह कार्य और भी कठिन हो जाता है,यह भी तो तपस्या नहीं तो और क्या है ?
 संतान जैसे,जसे बड़ी होती है,उसके मित्र भी बनते जाते हैं, माँ बाप की यह भी जिम्मेदारी बन जाती है,बच्चा बुरी सांगत में ना पड़ जाये और अपने मित्रो से मधुर सम्बन्ध रखे,यह तप नहीं तो और क्या है, यह क्रम संतान के विवाह तक चलता रहता है,और उसके पश्चात अपनी संतानों की संतानों को उचित मार्गदर्शन देना पड़ता है,यह भी तो तपस्या ही है |
 इसी लिए तो कहा गया है, गृहस्थ जीवन सबसे बड़ा तप या तपस्या है |
  अब इस विषय को हल्का फुल्का कर देते हैं,इस आलेख के पहले भाग में स्त्रियों यानि की गर्लफ्रेंड के बारे में लिखा था,अब पुरषों के लिए कबीर दास जी का दोहा संशोधित करके लिखता हूँ |
 रूखी,सूखी कहा कर ठंडा पानी पी
 देख के परायी नार मत ललचावे जी
समाप्त  ||

गुरुवार, मार्च 18, 2010

गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है |

इस लेख का प्रारंभ कर रहा हूँ,एक प्राचीन काल की घटना से,आज के युग में नारियों को अभी बराबरी का हिस्सेदार नहीं समझा जाता है, वनिस्पत आज नारियां बहुत से वोह कार्य कर रहीं हैं, जिनपर पुरषों का एकाधिकार था,आज सेना में नारियां हैं,परन्तु उनका सेवा काल केवल चोदह वर्ष है,जबकि पुरषों का सेवाकाल पद के हिसाब से अधिक है, वायु सेना में स्त्रिया हवाई जहाज उड़ा रहीं हैं, लेकिन फाइटर वायुयान के लिए नारियां नहीं हैं,इसी प्रकार इन्फेंटरी वोह सेना जो जंग के समय युद्ध मोर्चे पर आगे रहती  हैं, उसमें स्त्रिया नहीं हैं,कारण यह है,की नारियां कहीं युध्बंदी ना हो जाये, हाँ बोर्डर सिकुयुरीटी में नारियों का समावेश अवश्य  किया गया है ,आज संसद में जब  33  प्रतिशत  महिला आरक्षण का बिल पास किया गया था,तो इसके विरोध में जोरदार प्रदर्शन हुआ था, जो हुआ था वोह तो सर्वविदित है |
 लेकिन हमारे प्राचीन भारतवर्ष में स्त्रियों को उचित सम्मान दिया जाता था और स्त्री पुरष को एक समान समझा जाता था, और उस समय बहुत सी विदुषी स्त्रियाँ भी हुई थीं, उनमे से एक थीं गार्गी शस्त्रों में प्रकांड पंडित,उस समय शस्त्रों की अधिकतर वाद विवाद प्रोतियुगता हुआ करती थी, शास्त्रार्थ करने के लिए लोग दूर,दूर से पुस्तकों लेकर आते थे, जिसके बारें में कबीर दास जी का दोहा भी है |
  पोथी पड पड जग मुआ पंडित भया ना कोय |
  ढाई आखर प्रेम के जो पड़े सो पंडित होय ||
गार्गी के समय एक ऋषि हुए थे,याग्यवाल्य्क्य ऋषि, ऋषि याग्वालाक्य के साथ गार्गी का शास्त्रार्थ होने लगा, जैसे कबीर दास जी ने अपने ऊपर लिखे हुए दोहे में,से पहली पंक्ति में कहा है,उसके अनुसार जो शास्त्रार्थ में विजयी हो जाता था, उसको हारने वाले से उच्च कोटि का पंडित माना जाता था, अब ऋषि याग्यवालाक्य और गार्गी का शास्त्रार्थ होने लगा, दिन बीतते गये पर ना गार्गी हार मान रही थीं ना ऋषि यागाय्वाल्क्य, ऋषि यागयावालाय्क्य को गृहस्थ जीवन का अनुभव नहीं था, परन्तु गार्गी तो गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहीं थीं, और गार्गी ने ऋषि यागावालाक्य से गृहस्थ जीवन के बारे में प्रश्न पूछ लिया, जिसका उत्तर ऋषि यागावाल्य्क्य नहीं दे पाए और शास्त्रार्थ में हार गये,और गार्गी विजयी हो गयीं, तत्पश्चात ऋषि यागावालाक्य ने माँ के गर्भ में प्रवेश कर के गृहस्थ जीवन का अनुभव लिया, वास्तव में तप क्या है, अपने को तपाना, इसका अर्थ यह नहीं है अपने शरीर को बिभिन्न प्रकार के कष्ट दो, इसका अर्थ है दूसरों के लिए विभिन्न प्रकार के कष्ट सहना, और इन कष्टों को सेहन करते हुए,प्रभु को समरण करना, इसी सन्दर्भ में एक और कथा है, सीता जी के पिता राजा जनक और राजा परीक्षत को भगवद्गीता सुनाने वाले शुकदेव जी के बारे में |
 शुकदेव जी को किसी ने कहा राजा जनक को अपना गुरु बनाने को, और शुकदेव जी पुस्तकों का बोझ लादे हुए पहुँच गए राजा जनक के यहाँ,और देखते क्या हैं राजा जनक शानदार महल है,अनेकों रानियाँ हैं, शुकदेव जी सोचने लगे कि इतनी भोग विलासिता वाला मेरा गुरु कैसे हो सकता है, राजा जनक को शुकदेव जी की बात का ज्ञान हुआ,तो राजा जनक के हाथ में एक दिया दिया और राजा जनक शुकदेव जी से बोले,इस दिए को लेकर मेरे महल का चक्कर लगाओ और यह दिया बुझना नहीं चाहिए,शुकदेव जी का ध्यान तो केवल दिए पर ही केन्द्रित था,कहीं यह दिया बुझ ना जाये,और जब शुकदेव जी महल का चक्कर लगा कर राजा जनक के पास पहुंचे,तो राजा जनक ने पूछा महल में क्या देखा, शुकदेव जी का ध्यान तो दिए पर ही केन्द्रित था,तो उन्होंने उत्तर दिया मेरा ध्यान दिए पर ही केन्द्रित था,फिर बाकि में क्या देख पाता ?
  राजा जनक ने फिर शुकदेव जी के हाथ में दिया,दिया और बोले महल की सब वस्तुएं देखना,और ध्यान रखना दिया ना बुझे,अब शुकदेव जी महल की वस्तुएं तो देखते ही थे,और बीच,बीच में दिए को भी देखते थे,और अब जब शुकदेव जी महल का चक्कर लगा कर राजा जनक के पास पहुंचे,तो राजा जनक ने पुन: पूछा महल में क्या देखा ? तो शुकदेव जी ने महल की सारी भव्यता राजा जनक को सुना दी,और दिए की लौ भी जल रही थी, तब राजा जनक ने कहा जिस प्रकार तुमने दिए में भी ध्यान रखा और महल को भी अच्छी प्रकार से देखा,उसी प्रकार में इस भोग विलासिता में रह कर गृहस्थ जीवन के सारे कर्म करता हूँ,और प्रभु को भी हर समय स्मरण करता हूँ, यही गृहस्थ जीवन का तप है,जो कि सबसे बड़ा तप है |
 अपने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को छोड़ कर, तप के लिए,पर्वतों,कंदराओ,जंगलो में भटकना तो पाप है |
  थोड़ा गंभीर हो गया है,यह लेख चलो कुछ हंसी भी हो जाये |
परीक्षा और गर्लफ्रेंड एक समान हैं
दोनों में ही कठिन प्रश्न होते हैं
और उनकी व्याख्या बहुत करनी पड़ती है
हिंदुस्तान टाइमस के देल्ही टाइमस के सोजन्य्स से |  
बस एक हल्का फुल्का चुटकुला
कृपया कोई बुरा ना माने
क्रमश:

माँ की दुर्गा स्तुति पुस्तक का चमत्कार

यह मेरे साथ हुई सत्य घटना है, उन दिनों में इन्जिनीरिंग के तीसरे वर्ष की पड़ाइ कर रहा था, और इन्जिनीरिंग कोलेज के छात्रावास में रह रहा था |
  पहले दो वर्ष यानि की चार सेमेस्टर उतीर्ण कर चुका था, हर छे महीने के बाद सेमस्टर की परीक्षा होती थी, दो सेमेस्टर की परीक्षा उतीर्ण करने के बाद,अगले वर्ष में दाखिला मिलता है, तीसरे वर्ष का पहला सेमेस्टर पास कर चुका था, और तीसरे वर्ष के दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा देकर,परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा था, परीक्षा परिणाम आने पर मैंने अपने को अनूतिर्ण पाया, हर दो सेमेस्टर के बाद अवकाश हो जाता था और हम लोग अपने,अपने घरो को आ जाते थे, अभी परिपक्वता तो आई नहीं थी, इस कारण घर में अपने को अनुतीर्ण बताने पर मेरे साथ क्या व्यवहार होगा,इस डर के कारण में अपने एक सीनियर जो कि नौकरी करता था,उसके घर आ गया था, लेकिन कितने दिन उसके घर में रहता,आना तो लौट के घर में ही था,सो में अपने घर आ गया |
 यहाँ पर एक बात और बता दूं,मेरी लौकिक माँ हमारे किसी नजदीकी रिश्तेदार जो कि ज्योतिष भी थे,उनसे पूछती रहती थी, कि मेरा बेटा नियत समय में ही अपनी इन्जिनीरिंग की पड़ाइ कर के आ जायगा,तो वोह सदा हाँ ही कहा करते थे, इस बात को यहीं छोड़ते हैं |
होता ऐसे था कि, कुल प्राप्त अंक 50 प्रतिशत से ऊपर होने चाहिए थे, मेरे अंक उस समय 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं थे, और मेरे तीन विषय में भी कुल प्राप्तांक में भी 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं थे,और 50  परतिशत से कम अंक किसी भी विषय में पाने पर, उस विषय में भी अनूतिर्ण माना जाता था, और तीन विषय में अनुतीर्ण छात्र को अनूतिर्ण माना जाता था, यही मेरे साथ हुआ था,घर तो आ ही चुका था,और मुझे बताना पड़ा कि में, तीसरे वर्ष में अनूतिर्ण हो गया |
 मेरी माँ तो तब नहा कर के स्वछ वस्त्र पहन कर,दुर्गा स्तुति की पुस्तक हाथ में लेकर मन में मेरे पास होने की कामना लेकर बैठ गयीं |
 अब पाठ करते,करते पंद्रह दिन हो गये थे, और जगजननी माँ की कृपा से यह चमत्कार होता है, कि पंजाब विश्वविद्यालय में, यह नियम बदलने के लिए आन्दोलन हो जाता है, जो भी छात्र 50 प्रतिशत से कम किसी विषय में प्राप्त करे उसको अनूतिर्ण ना समझा जाये, चाहे कुल प्राप्तांक कुछ भी हों |
जब मेरी माँ को पाठ करते,करते इक्कीसवां दिन हो गया,तो एक और चमत्कार हुआ कि, पंजाब विश्विद्यालय का वर्षो से चला आ रहा नियम बदल गया,और में दोबारा परीक्षा दिए हुए उतीर्ण हो गया,अब मेरा भी उत्साह बड़ा मैंने अपनी उत्तर पुस्तिका की दोबारा जाँच करवाई ,जो कि इन्जिनीरिंग कोलेजो में संभव नहीं था, परन्तु जगजननी माँ की कृपा से मेरे प्राप्तांक उन विषयों में 60 प्रतिशत से ऊपर निकले, तो निकले, पर कुल प्राप्तांक भी 60 प्रतिशत से ऊपर थे |
 अब इसको क्या कहा जाये,सयोंग या जगतमाता की कृपा में तो माँ की कृपा ही समझता हूँ,और उस समय अनायास मेरे मुख से श्रद्धावश निकला,जय माता की |

मंगलवार, मार्च 16, 2010

ईश्वर दसों दिशाओं में वर्तमान है, फिर गुनाह क्यों?

                                             ॐ गंग गणपतय: नम :

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                                                   जय माता की



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                                      पहली शैलपुत्री कहलावे |
                                     दूसरी ब्रह्मचारनी मन भावे  ||
                                      तीसरी चंद्रघंटा शुभनाम |  
                                      चौथी कुष्मांडा सुखधाम || 
                                       पांचवी देवी स्कंदमाता | 
                                       छटीकत्यानी विख्याता ||
                                      सातंवी कालरात्रि महामाया |
                                      आठवीं महागौरी जगजाया ||
                                       नौवीं सिद्धि दात्री जगजाने
                           
  माँ  के पवित्र नवरात्रों के दूसरे दिन, श्री गणेश जी और जगजननी  माँ के सभी नौ रूपों और दसों, विद्याओं,को प्रणाम करके,माँ की अनुकम्पा और प्रेरणा से यह लेख लिख रहा हूँ | माँ के प्रमुख नौ रूप हैं,जो मैंने दुर्गा स्तुति के श्लोक में वर्णित किया है, और माँ दुर्गा में यह सब समाये  हुए हैं, इन रूपों का पृथक,पृथक सवरूप और स्वव्हाव है,और माता रानी इन स्वरूपों से,भक्तों की रक्षा और दुष्टों का नाश करती हैं, और यह इतनी भोली हैं, कि इनके दुर्गा सप्तशती के मंत्र इतने सशक्त हैं, कि कोई भी इनका लाभ उठा सकता है, इन मंत्रो का कोई लाभ ना उठा ले, इसलिए महादेव जी को इन मंत्रो को कीलित करना पड़ा | 
  नवरात्रों के आंठ्वे या नौवें दिन को, इन के कंजक स्वरुप में कन्या पूजन का विधान है, कथा इस प्रकार है,पंडित श्री धर जी,माँ के कंजंक स्वरुप को माँ मान कर प्रतिदिन पूजा करते थे, और कालांतर में माँ ने पंडित श्री धर जी ने दर्शन दिए और अपनी पवित्र गुफा,जिसमें माँ वैष्णो देवी, माँ महाकाली,महालक्ष्मी और महासरस्वती के साथ पिंडी रूप में विराजमान है,उसकी खोज करने को कहा |

                                                              http://1.bp.blogspot.com/_ZurSbxUErUI/SpTarlmISxI/AAAAAAAAAIg/dnKMV39ZoNg/s400/vaishno-devi.jpg


अब प्रश्न यह उठता है, जिन कन्यायों को माँ स्वरुप मान कर अष्टमी या नौवीं को पूजा जाता है, पर उनके साथ ही भ्रूण हत्या, बलात्कार और जैसे जघन्य अपराध या छेड़,छाड़ क्यों कि जाती है, अब कोई भी कह सकता है, कन्या पत्नी स्वरुप में भी तो होती है, वोह तो मंत्रो के द्वारा अग्नि को साक्षी मान कर विवाह कराया जाता है,वास्तव में हर पति और पत्नी शिव और शिवा का जोड़ा है, और अब पर स्त्री के साथ कुदृष्टि डालना या कुकृत्य करना अब समझा जा सकता है,यही बात स्त्री के लिए भी है,परपुरष पर कुदृष्टि और समागम करना उनको सोचना चाहिए यह  कर्म किसके साथ हो रहा है,इस प्रकार हर मनुष्य और स्त्री में ईश्वर समाया हुआ है,और यह सर्वत्र फेले हुए हैं, और यही तो सिद्ध करता है,यत्र,तत्र,सर्वत्र  मतलब सब और ईश्वर है, यह तो हुई लौकिक बात और , एक और कथा सिखों के पहले गुरु,गुरु नानक जी के बारें में प्रचलित है, एक बार गुरु नानक देवजी आज के पाकिस्तान में कावा कि ओर चरण रख कर लेट गए, तब किसी मुस्लिम समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले को अच्छा नहीं लगा तो,वोह बोला कावे की ओर पैर रख कर नहीं लेटो, गुरु नानक जी ने कहा,मेरे पैर उस ओर कर दो जहाँ कावा ना हो, जहाँ,जहाँ वोह व्यक्ति श्री गुरु नानक देव जी के चरण करता वहीँ,वहीँ उस व्यक्ति को कावा दिखाई देने लगता, मतलब कि खुदा हर ओर है, मानव बुरे कर्म करते हुए सोचने लगता है,मुझे कोई नहीं देख रहा परन्तु, खुदा कहो,ईश्वर कहो हर ओर विद्यमान है,और वोह सबके अच्छे बुरे कर्म देख रहा है |
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  एक बार किसी गुरु ने अपने दो शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए, दोनों को फल दिए और बोले की, इस फल को उस स्थान पर खाना जहाँ पर कोई देख ना रहा हो, दोनों शिष्य चल पड़े,ऐसे स्थान पर जहाँ कोई नहीं देख रहा हो, दोनों को पृथक,पृथक निर्जन स्थान मिल गया, और एक शिष्य ने तो वोह फल खा लिया, परन्तु दूसरे कहीं पर भी जाता,उसको लगा यहाँ पर पशु,पक्षी,  देख रहें हैं,और कहीं भी जाता तो उसको लगा यहाँ पर पेड़,पौधे देख रहें हैं, उस शिष्य को लगा,प्रभु की इस सरंचना में,हर जड़ और चेतन वस्तु में,ईश्वर विद्यमान है,तो उसने फल नहीं खाया,और दोनों आखिरकार लौट आये गुरु जी के पास,और गुरु जी ने परीक्षा में सफल पाया, उस शिष्य को जिसने फल नहीं खाया था |
  यह अंतरात्मा की आवाज ही तो थी, जिसने दूसरे शिष्य को फल नहीं खाने दिया, यही अंतरात्मा की आवाज हर किसी को गुनाह करने से पहले चेतावनी देती है,और जो इस चेतवानी को सुनते हैं,उनकी अंतरात्मा की आवाज, सदा जीवित रहती है,और जो इस चेतवानी को अनसुना करके,गुनाह, पर गुनाह किये जातें हैं,उनकी यह चेतना या अंतरात्मा या अन्दर की आवाज मृत हो जाती है,यही अंतरात्मा की आवाज ईश्वर की आवाज है,इसका अर्थ तो येही हुआ,घट,घट में ईश्वर विद्यमान |
  पंडित डी.के वत्स जी ने अपने लेख में यही तो सपष्ट किया था, मन्त्र,कर्मकांड,उपासना का लाभ क्यों नहीं मिलता,पहले अपने अन्तकरण को साफ करने के बाद ही तो लाभ मिलेगा,क्योंकि ईश्वर तो अन्तकरण में वास करता है |
  इसीलिए तो कहा गया है,यम नियम,प्रतिहार,यम अर्थार्त अपना व्यवहार,इसके पश्चात आता है नियम,और इसके पश्चात प्रतिहार अर्थात,जप,तप इत्यादी,और यह सब भी होना चाहिए,मनसा वाचा कर्मणा, अर्थार्त मन से बचन से और कर्मों के द्वारा,
 हमारे मन से सूक्ष्म तरेंगे निकलती हैं,और यही वातावरण को प्रभावित करती हैं,और यही तरेंगे ईश्वर तक पहुँचती है, ईश्वर सब ओर विद्यमान है,और हर स्वरुप में है, जो जिस स्वरुप की पूजा,अर्चना करता है,उसको ईश्वर के उसी स्वरुप के दर्शन हो जाते हैं,जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था |
 इसीलिए तो गुनाह करने वाले को कहा जाता है,ईश्वर से डरो,वोह तो हर स्वरुप में दसो दिशाओं में,जड़ चेतन में विद्यमान है |
 माँ सब पर अपनी अनुकम्पा बनाये रखना
आप के शस्त्र धारण का कारण यही तो है,भक्तो कि रक्षा और दुष्टों का नाश |
माँ मेरे सभी अपराध क्षमा करना 



 



















बुधवार, मार्च 10, 2010

परिश्रम करके भी असफल लोगों को सफल होने के लिए प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलता

बहुधा मेरे मन में विचार आता है  जो लोग जीवन में कुछ उपलब्धि पा लेते हैं, उनकी जयजयकार होती हैं, उनके लिए बधाईओं का ताँता सा लग जाता है, और वोह लोग जीवन में सफलता की सीडिया चड़ते जातें हैं,और  उनका उदहारण दिया जाता है, परन्तु जो लोग परिश्रम करके भी असफल हो जातें हैं, वोह हताश हो जातें हैं, और बहुत बार अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ओर अग्रसर हो जातें हैं,जिसका उदहारण विद्यार्थियों में देखा जाता है,किसी ने परीक्षा में परिश्रम करके भी कम अंक प्राप्त किये या कोई परीक्षा में असफल हो गया तो वोह हताश हो कर आत्महत्या की ओर अग्रसर हो गया, हाँ जिसने कोई परिश्रम ही नहीं किया अगर वोह असफल हो गया या हो गयी तो उसको कहाँ हताशा या निराशा ?
  यह तो रहा विद्यार्थिओं के बारे में, अगर नौकरी करने वालों की बात करें तो वोह लोग जो अपनी आजीविका कमाने के लिए बहुत परिश्रम से काम करते रहे और उनका आजीविका का सहारा समाप्त हो गया,कारण कुछ भी रहा हो जैसे नौकरी के वातावरण को ना समझ पाना, झूठा दोशारापन या अपनी रुचि का काम नहीं मिलना, बस आजीविका ना कमाने का कोई भी कारण हो, तो वोह इंसान हताश,निराश हो कर अपनी जीवन लीला समाप्त करने का प्रयास करता है,कभी वोह इसमें सफल हो पाता है कभी नहीं,वयापार में अपनी सारी जमा पूँजी और कर्ज लेकर पैसा लगा दिया,और व्यापर में ऐसा घाटा हुआ और सारी पूँजी समाप्त हो गयी तो फिर यही कदम,और भी बहुत से असफल होने के कारण हैं,  यह तो सच है संघर्ष तो करते रहना चाहिए,इसके लिए आवश्यक है, आत्मविश्वास,मनोबल, और सदा अच्छा होने की आशा रखना, केवल सच्चे मित्र, परिवार के वोह सदस्य जो की उक्त इंसान का अच्छा होने की कामना करते हैं,वोह ही लोग उसको धीरज देतें हैं और कोई नहीं , और दूसरा उपाय है,मनोवेग्यानिक का सहारा लेना, परन्तु मनोवेग्यानिक चिकत्सा के बारे में तो पड़े,लिखे लोग जानते हैं, अब तो  मनोवेगाय्निक के बारे में जन जाग्रति हो रही है, परन्तु अभी भी अधिकतर ग्रामीण लोगों को इसके बारे में समझ नहीं है |
  अब प्रश्न उठता है, तो इस प्रकार के लोगों की सहायता के लिए क्या करना चाहिए, वैसे तो बहुत सी समाजसेवी संस्थाए है, अनाथ बच्चों के लिए, उपेक्षित वृद्धों के लिए और भी अनेक वर्गों के लिए, इस प्रकार के परिश्रम करके भी असफल व्यक्तियों के लिए भी ऐसी संस्थाए होनी चाहिए,जो इस प्रकार के इंसानों को दृरता  आत्मविश्वास,आशा को जीवित रखना जैसे गुणों को इनमे विकसित करे, अगर इस प्रकार इन असफल लोगों को सहारा मिलेगा,तो यह भी सफल लोगों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चलेगा, तो समाज,देश और विश्व का भला होगा |
 असफल लोगों को सफलता की सीडिया चडाने के लिए, स्वयं अपने पर विश्वास और उनकी इस प्रकार सहायता करना नितांत ही आवश्यक है,कि उसको लगे किउनको  ठीक आवलंबन मिल गया |
  असफल इन्सान अंधकार से निकल कर सफलता का उजाला दें |

मंगलवार, मार्च 09, 2010

क्या बड़ती उम्र क्या केवल एक संख्या है या कुछ और

बहुत पहेले दूरदर्शन पर एक च्यवनप्राश एक  विज्ञापन आया करता था,जिसमें एक नौजवान दम्पति में से उसकी पत्नी,ऊँचे पेड़ से कुछ तोड़ने को कहती है,परन्तु ऊंचाई के कारण वोह उतार नहीं पाता, फिर एक प्रोड़ दम्पति में से वोह प्रोड़ उसको तोड़ लेता है |
यह तो रहा दोनों प्रकार के दम्पति में शारीरिक शक्ति की तुलना, जो कि दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला विज्ञापन था, शरीर जब प्रोड़ अवस्था में पहुँचता है,तब मानव के शरीर में अनेक प्रकार के वदलाव होते हैं,जैसे बालों में सफेदी,चेहरे पर धीरे,धीरे झुरियो का आना और उस समय तक अनेकों प्रकार के खट्टे,मीठे अनुभव हो जातें हैं, लेकिन उन प्रोड़ लोगों को कहा जाता है,बुड़ापे में यह बात यावोह  बात शोभा नहीं देती, कम से कम उम्र का लिहाज करो, आखिर दिल तो सभी का होता है,और बहुधा कहा जाता है,बुडे हो गए हैं  तो दिल तो जवान है, यह कैसा विरोधावास है ?
 इस समय मेरे मस्तिष्क में सदी के महानायक अमिताभ वच्चन का विचार आ रहा है, वोह अपनी इस 67 वर्ष की आयु में अब तक काम कर रहें है, और बहुत से एक से एक बड़ कर प्रस्तुति दे रहे हैं, यह बात तो  ठीक है सिने कलाकार निर्माता,निर्देशक के अनुसार काम करता है, अब  उनके समकक्ष कलाकार अब अभिनय नहीं करते, लेकिन अपनी आयु की और ना देख कर वोह एक से बड़ कर चलचित्र को योगदान दे रहें है,  दूसरे निर्माता,अभिनेता मेरे मस्तिष्क में आ रहें है,सदाबहार हीरो देवानंद उन्होंने भी अपनी बड़ती आयु को ना देख कर, बहुत से चलचित्र के निर्माता बने और उसमे अभिनय भी किया,  अब मेरे मस्तिष्क में आ रही हैं सिने अदाकारा रेखा, बहुत आयु तक उन्होंने ने अपनी शारीरिक खूबसूरती का ध्यान रक्खा |
  यह तो रही सिने कलाकारों की बात परन्तु प्रोड़ शिक्षा की बात होती है, यह नहीं कहा जाता,बुड्ढे तोते क्या खाक पड़ेंगे ", अगर प्रोड़ शिक्षा की और देखा जाये तो इसका अभियान चलता रहता है, प्रोड़ शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाता है,हाँ यह अवश्य है की प्रोड़ और नौजवान लोगों की विचारधारा अलग,अलग होती है,जिसको "जनरेशन गेप कहा जाता है", समझ नहीं आता बड़ती आयु एक संख्या है,या कुछ और |

मंगलवार, मार्च 02, 2010

शेर क्यों और भी जीव विलुप्त होते जा रहे हैं |

आज कल दूरदर्शन पर विभिन सेलिब्रिटीयों के द्वारा सन्देश दिया जा रहा है, हमारे देश में केवल 1411 शेर रह गएँ हैं, परन्तु इसके अतिरिक्त और भी वोह जीव साधारनतया बाग,बगीचों और घरों में पाए जाते थे,वोह भी तो लुप्तप्राय: होते जा रहें हैं,
http://www.impactlab.com/wp-content/uploads/2009/12/Bees-5432145.jpg

पहचाना आपने,जी हाँ फूल से रस चूसती मधुमक्खी, जो फूलों से मकरंद चूस कर,शहद में परिवर्तित करती हैं, इन मधुमक्खियों के छत्ते पेड़ो पर लटकते दिखाई दे जाते थे, और जिन छत्तों पर यह मधुमक्खियाँ पर दिखाईं देतीं थी, अब कहाँ यह शेहद के छत्ते और यह मधुमखियाँ कहाँ दृष्टिगोचर होतीं हैं ?,अब तो यह नजारा देखना दुर्लभ सा हो गया है, धरती पर तेजी से बनते घरों के कारण,इनका आशियाना बाग़,बगीचें छिनते जा रहें हैं,और  यह शेहद की मक्खियाँ लुप्तप्राय: होतीं जा रहीं हैं |


http://freeartisticphotos.com/wp-content/uploads/2009/07/free-close-up-photo-butterfly-and-flowers.jpg
  अब आते हैं,रंगबिरंगी, मनमोहक बागों में,फूलों का रस चूसती हुईं,तितलियों पर, बच्चों को यह रंगबिरंगी  तितलियाँ इतनी भाती थीं, कि इनकों पकड़ने के लिए इनका पीछा करतें थे, और जब यह तितलियाँ पकड़ में आ जातीं थीं तो ,इनके रंगबिरंगे रंग हाथों की उँगलियों पर लग जातें थें, इनका भी आशियाना बाग़,बगीचें ही थे, लोगों के अपना आशियाना बनाने के स्थान,पर इन रंगबिरंगी तितलियों का आशियाना बहुत हद तक छिन लिया हैं |
 यह नन्हे,नन्हे जीव उड़ते हुए, एक फूल पर बैठ कर और फिर दूसरे फूल पर बैठ कर, फूलों के परागन में सहायता करतें हैं,और इस प्रकार से फूलों से लदी हुई बगिया के निर्माण में सहायक होतें हैं,परन्तु यह भी लुप्त होने की ओर अग्रसर हो रहें हैं |

http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/3/32/House_sparrow04.jpg
   इस नन्ही सी चिड़िया से कौन परिचित नहीं होगा, हमारे,आपके घरों में लटकी हुई फोटों के पीछे यह अपना घोंसला बनाती थी, लेकिन अब तो गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण होने लगा हैं, यह चिड़ियाँ तो धारा पर बसे हुए घरों में अधिक स्थान होने के कारण,यह उन घरों में अपना घोसला बनातीं थीं ,परन्तु गगनचुम्बी इमारतों में इनकों घोस्लां बनाना कठिन हैं, इनका भी आशियाना छिनता जा रहा है, यह चिड़िया बारिश के जमीन पर पड़े हुए पानी में नहाते हुयें दिखाई दे जातीं थी,पर अब कहाँ वोह नजारा देखने को मिलता है ?

  आज कल प्रक्रति का सफाई कर्मचारी यानि कि गिद्ध जो मरे हुए जीव,जंतुओं को कहा,कहा करके सफाई को अंजाम देते हैं,वोह भी तो लुप्त होते जा रहें हैं, केवल शेरो की संख्यां तो कम हो गयीं हैं,परन्तु यह जीव जंतु भी तो लुप्त होने के कगार की ओर अग्रसर हो रहें हैं |
 केवल शेर क्यों इन जीव,जंतुओं का सरंक्षण दो

शनिवार, फ़रवरी 27, 2010

जब भगवान से साक्षात्कार की ख़ुशी नहीं,मिलती तो इंसान क्षणिक ख़ुशी खोजता है |

अभी,अभी पंडित दी.के वत्स जी का लेख पड़ा,मन्त्र,कर्मकांड,उपासना से लाभ क्यों नहीं मिलता, में पंडित जी के लेख बहुत मनोयोग से पड़ता हूँ, जिसमें पंडित जी ने जो लिखा है, हमें  इस योग्य होना चाहिए कि, हम इन चीजों का लाभ उठा सकें, मेरे मन में बहुत से अनसुलझे प्रश्न उठते हैं, ईश्वर के एक बार दर्शन करने के बाद यहाँ,वहाँ भटकता रहा कि पुन: दर्शन हो जाएँ, किसी ने कहा कोई गुरु बनाओ, फिर गुरु की खोज में,भटकता रहा, यह भी कहा जाता है,"पानी पियो छान के,गुरु बनाओ जान के", एक गुरु भी बनाये, प्रारंभ में तो वोह गुरु तो मुझे अच्छे लगे, और लगभग तीन साल के बाद मुझे लगा कि उनकी अपने सब शिष्यों पर सम दृष्टि नहीं है, लेकिन यह बात मैंने प्रकट नहीं करी, लेकिन एक दिन मैंने उन गुरु जी से जिज्ञासावश कोई प्रश्न पूछा तो उन्होंने मुझे बहुत बुरी तरह से धुत्कार दिया, और मेरे को चार दिन तक तो रात को नींद ही नहीं आई, और तो और उनके एक और शिष्य हैं, मुझे ज्ञात नहीं वोह मेरे मनोभावों को कैसे पड़ लेते थे, मेरी उनके उन शिष्य से अच्छी मित्रता हो गयी थी,उनके पास मुझे कुछ मानसिक आराम मिलता था,परन्तु वोह तथाकथित गुरु जी,अपने उन शिष्य और मेरे मित्र के पास सुबह,शाम आया करते थे,मेरे पास भी वोही समय होता था, इसलिए मैंने अपने उन मित्र के पास जाना छोड़ दिया |
  मेरी विडंबना यह रही,मैंने श्री परमहंस योगानंद जी को गुरु बनाने के लिए आवेदन किया था, योगानंद जी तो इस दुनिया में नहीं थे, परन्तु उनके अध्याय ही गुरु की तरह प्रेरणा देते थे,वोह केवल एक माह में एक ही प्रति आती थी, और उन अध्यायों का मेरी बहुत मानसिक,शारीरिक और अध्यात्मक उन्नति कर रहे थे, आप विश्वास करें या नहीं करें,में लोगों की चिकत्सा योग से करने लगा,और उक्त घटना के बाद मेरे मन में वोह अध्याय पड़ने की रूचि बिलकुल समाप्त हो गयी थी, और एक और विद्या जो कि संभवत: चीन कि थी,प्राणिक हीलिंग जिसमें दूरस्थ या समीप लोगों की चिकत्सा बिना छुये और बिना दवाइयों के में कर लेता था,और यही काम में योग द्वारा कर लेता था, परन्तु यह विद्याएँ मेरे में उस घटना के बाद समाप्त हो चुकीं हैं |
पंडित जी का वोह लेख भी पड़ा है,जिसमें उन्होंने अंत:कारण को गुरु बताया है, यह बात तो यहीं पर छोड़ता हूँ, जब यह सब समाप्त हो गया तो में तो क्षणिक ख़ुशी की खोज करता हूँ, मुझे मालूम हैं यह क्षणिक खुशियाँ क्षणिक ही हैं, स्थायी नहीं हैं,और यह क्षणिक खुशियाँ नहीं मिल पातीं तो मन बहुत खिन्न हो जाता है,फिर भी मन क्षणिक खुशियों की ओर भागता है, यह सब मेरे मन के उदगार हैं, पंडित जी का वोह लेख पड़ कर में भावुक हो उठा, मैंने एक बार लिखा था कि में विवादित लेख नहीं लिखूंगा,पर क्या करुँ दिल है कि मानता नहीं |
पुन: कहता हूँ,यह मेरे हिर्दय से निकले हुए उदगार हैं,कोई माने या नहीं माने, पंडित जी की इस सार्थक लिखी हुई पोस्ट से भावुक हो गया |
इसी प्रतीक्षा में हूँ, क्षणिक ख़ुशी के स्थान पर वास्तविक और स्थायी ख़ुशी मिल जाये 
स्थायी  ख़ुशी की प्रतीक्षा है

पंडित जी से क्षमायाचना सहित  

सोमवार, फ़रवरी 22, 2010

मनोभावों को बहुत सी कला के माध्यम से पर्दर्शित करने का प्रयत्न किया

मेरा हिर्दय मेरे पर मेरे मस्तिष्क से अधिक राज करता है, और हिर्दय में अनेकों उदगार हिलोरे लेते रहेतें हैं, इसी कारण अपनी दिल की भावनाए को अपनी किशोरावस्था में डायरी में अंकित किया करता था, परतिदिन डायरी में अपनी भावनाओ को लिखने में भी,मेरे हिर्दय को आराम नहीं मिलता था, इंसान में गुण दोष तो दोनों ही होतें हैं, और यह गुण दोष में अपनी डायरी में प्राय: लिखा करता था, और इसी कारण से यह डायरी में लोगों की निगाह से बचा कर,छुपा कर गुप्त स्थान पर रखता था, परन्तु मुझे यह डायरी लिखने पर यह प्रतीत होता था कि,में अपने से ही वार्तालाप कर रहा हूँ, अब डायरी तो नहीं लिखता,परन्तु यदा कदा अपने से वार्तालाप करता ही रहता हूँ, हर प्रकार की वार्तालाप अच्छी,बुरी दोनों ही और इस प्रकार अपने आप से वार्तालाप करने में मुझे सुखद अनुभूति होती है |
  इस प्रकार अपने आप से वार्तालाप करने का कारण यह है, बहुत प्रकार की कला के माध्यम से अपने मनोभावों को पर्दर्शित करने का प्रयत्न किया,परन्तु अपने मनोभावों को औरो तक ना पंहुचा सका, अगर एक दो लोगों से बोल कर बात करता तो मेरे मन के भाव अधिक लोगों तक ना पहुंचते, इसी लिए मैंने कला का सहारा लिया, सब से पहले गाना गाने का सहारा लिया, परन्तु अगर में कोई गीत गुनगुनाता तो लोगों से गायकी की ही प्रशंसा मिलती, जो गीतों में छुपे हुए मनोभावों को कोई नहीं समझता था, गीत गाने के साथ वाद्य यन्त्र बजाने का प्रयत्न किया पर सफल ना हो सका, फिर लिया चित्र बनाने और उनमें रंग भरने की कला का सहारा, चित्र बना के रंग भी भर लेता था परन्तु अपने चित्रों में, हाव भाव के द्वारा अपने हिर्दय की भावनाए ना उकेर सका, रहीं मोडर्न आर्ट की बात, जब तक उसको समझाया नहीं जय तो समझ में नहीं आते, लिहाजा मैंने इस दिशा में कोई प्रयत्न नहीं किया,और अंत में कविता लिखना और बोलना प्रारंभ किया, और काव्य के लिए विशेष प्रकार के श्रोता होने चाहिए,और उन श्रोताओं  से कविता के शब्द और उसकी प्रस्तुति से बस वाहवाही मिलती थी,लेकिन दिल के उदगार समझने वाले मिल नहीं पाते थे |
  अब तो काव्य बन नहीं पाता, कुछ कहानी लिखने का प्रयत्न किया पर सफल नहीं हो पाया, हाँ ब्लॉग का माध्यम मिला नहीं जानता इसमें कहाँ तक सफल हो पाया हूँ, मेरे ब्लॉग किसी निश्चित विषय पर तो होते नहीं,जो दिल में आता है लिख देता हूँ, बस इसीलिए अपने आप से बात करता हूँ |
  क्या करुँ मेरे ऊपर मेरे मस्तिष्क से अधिक मेरा हिर्दय राज करता है |

बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

बच्चो को रियलटी शो में क्यों लाया जा रहा है |

आज कल दूरदर्शन अनेकों प्रकार के चेनल हैं,भक्ति के लिए संस्कार और आस्था जैसे चेनल, ख़बरों के लिए आजतक,इंडिया टी.वी और भी अनेकों प्रकार के चेनल, मनोरंजन के लिए कलर,सोनी,जी टी.वी इत्यादि अनेकों चेनल,अंग्रेजी भाषा के अनेकों चेनल,चलचित्रों के लिए अनेकों चेनल, मनोरंजन वाले चेनलो पर धाराबाहिकों और रियल्टी शो दिखाने वाले अनेकों चेनल हैं, रिअलिटी शो आते,जाते रहतें हैं, जिसमें सभी उम्र के लोगों के लिए मनोरंजन होता है, और इन रियलटी शो में भी भाग लेने वाले भी प्राय: बच्चो से लेकर व्यस्क लोग होतें हैं, धराबहिकों में भी बच्चो से लेकर व्यस्क और प्रोड़ लोग होतें हैं |
  रिअलिटी शो में, परतिस्पर्धा होती तो है ही ,और उनको जज करने वाले जज होतें हैं, और रियल्टी शो में भाग लेने वालों को जजों के द्वारा कमेंट्स दिए जातें हैं,तत्पश्चात मार्क्स दिए जातें हैं |
 यह चेनल टी.आर.पी बढाने के लिए अनेकों प्रयत्न करतें हैं, इन चेनलो में टी.आर.पी बढाने की होड़ सी लगी,रहती है, यह चेनल वाले यह नहीं सोचते कि बच्चों के लिए रियल्टी शो बनाने से उनके कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, बस उनको तो अपनी टी.आर.पी कि चिंता है, धराबहिकों में तो बच्चों के द्वारा किया हुआ अभिनय तो फिर भी एक सीमा तक उचित है, इसमें बच्चो की कई,कई घंटो की रिहर्सल के कारण इन बच्चों की पडाई की हानि तो होती है,परन्तु उस पडाई की हानि को  तो जैसे,तैसे यह बच्चे पूरी कर लेते हैं, परन्तु रियल्टी शो में जो बच्चे भाग लेते हैं, बहुत बारउन बच्चों को  जजों के कठोर शब्द सुनने पडतें हैं,और बच्चों का मन तो फूल सा कोमल होता है,और यह जजों के कठोर शब्द बहुत बार इन बच्चों के मन पर ऐसा प्रभाव डालता है, इनका फूल सा मन मुरझा जाता है, एक रियल्टी शो में एक बच्ची को जज के कठोर शब्द सुन कर पक्षाघात हो गया था,और एक दूसरी बच्ची ने जज के कठोर शब्द सुन कर आत्महत्या को गले लगा लिया था, धरबाहिकों में तो नंबर नहीं मिलते ना ही जजों के कोमेंट्स होतें है,वहाँ तो केवल अभिनय ही होता है,इसमें भी घंटो का रियाज़ करना पड़ता है,परन्तु यहाँ बच्चों के मनोभावों पर वोह प्रभाव नहीं पड़ता जो कि रियल्टी शो में पड़ता है, रियल्टी शो के लिए घंटो का रियाज़ और परिणाम में अंक पाना और जजों के कठोर कोमेंट्स सुनना बच्चो को झकझोर देता है, हाँ कोमेंट्स अच्छे,बुरे सब प्रकार के होतें है, बच्चों में इतनी परिवक्ता नहीं होती कि वोह कठोर स्थितयों का सामना कर पायें, और हरने के बाद या कठोर कोमेंट्स सुनने के बाद यह बच्चे टूट जातें हैं,और घातक कदम उठा लेतें हैं |
  दूसरी ओर इन बच्चों पर स्टारडम का नशा छा जाता है,जिससे इनका बहार निकलना कठिन हो जाता है, इस कारण अपनी पडाई पर यह बच्चे उचित ध्यान नहीं दे पाते, बच्चो के लिए ऐसे कार्यक्रम तो होने चाहिए,जिसमें इन बच्चों की प्रतिभा तो उजागर हो परन्तु उसमें परतिस्पर्धा ना हो, ना अंको का सिलसिला |
  टी.आर.पी बढाने की होड़ में कब बंद होगा बच्चों के साथ इस प्रकार का  खिलवाड़

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

विगड़ते ज़माने में बच्चो का भविष्य देख कर सिहर जाता हूँ |

यह युग निरंतर कठिन हालातों की ओर अग्रसर होता जा रहा है, आसमन छूती महंगाई,बड़ता भ्रसटाचार,मिलावटी खाद्य पदार्थ, तेजी से होती पेड़ों की कटाई, बच्चों पर स्कूल की किताबों से बड़ते हुए बस्ते का बोझ  और ना जाने क्या,क्या ?
  यह सोच,सोच कर मन सिहर जाता है, की हम बड़े लोगों को इन कष्टों से गुजरना पड़ रहा है, तो हमारी भावी पीड़ी का भविष्य क्या होगा ? सुनते आयें हैं,कि हमारी बुजुर्ग पीड़ी की मासिक आय बहुत कम थी, मतलब कि 100,200 रूपये और उसमें भी उन लोंगो की अच्छी,खासी बचत हो जाती थी, फिर आया हम लोगों का युग, हम लोगों के प्रारंभ के दिनों में हम लोगों की आय में अच्छी खासी बचत हो जाती थी, परन्तु पता ही नहीं चला कि कैसे महंगाई बड़ती गयी,और यह हाल हो गया कि आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया, और बचत की आशा करना व्यर्थ लगने लगा, और पति,पत्नी अपने घर की व्यवस्था के लिए धनोउपार्जन करने लगे, इसी प्रकार महंगाई तेजी से आसमान छूने लगी  और इस महंगाई पर नियत्रण नहीं लगा, तो हमारी भावी पीड़ी किस प्रकार से चलाएगी अपनी घर,गृहस्ती? आज के युग में जब पाती,पत्नी दोनों ही धन कमाने में लगे रहते हैं, इस कारण से बच्चो की ओर अपेछिकित ध्यान नहीं दे पाते हैं, उनकी इस विवशता के कारण बच्चो में उत्पन्न हो जाती है,भावनात्मक शुन्येता,  यह भावनात्मक बच्चों के  सर्वागीण विकास के लिए निहायत ही अवशयक है |
  आज बच्चो के कन्धों पर झूलते बस्तों में कितबों का बड़ता हुआ बोझ तो है ही जो इन नाजुक बच्चों के कंधो को पीडा तो पहुँचाता हैं, और गृहकार्य इन नन्हे,नन्हे बालक,बालिकाओं इतना मिलता है,इन के पास खेलने,कूदने का समय संभवत: मिल ही नहीं पाता तो कैसे हो इन शिशुओं का शारीरिक विकास? और आज कल धरती पर मैदान तो सिमटते जा रहे हैं, इन बच्चों को दोड़ने,भागने का स्थान नहीं मिल पा रहा है, इस दिशा में पता नहीं काम क्यों नहीं होता ? यह तो सच हैं,आज कल इन्टरनेट का विडियो गेम का युग आ गया है,और बच्चे इन चीजों में लग रहें हैं, इसी सन्दर्भ में मेरे मस्तिष्क में उभर रहा है,अमरीका के सर वाल्ट डिस्नी का नाम,जिनोहने बच्चों के लिए डिस्नेलैंड बनाया,जिसमें बच्चों के लिए सब प्रकार के मनोरंजन हैं, डिस्नीलैंड के  मिकी मौस,टॉम ओर जेर्री जैसे कार्टून तो  विश्विखायत है, हमारे यहाँ इस दिशा में काम क्यों नहीं होता?
  और तो और दिल्ली में जो बच्चों के लिए अप्पू घर बना था, उसका अब कहीं नाम ही नहीं है,जब बच्चा किशोरावस्था में पहुँच जाता है,माता,पिता के पास उसको भावनात्मक समय देने का समय नहीं है, और उसको इस उम्र के पड़ाव में हारमोंस के कारण शारीरिक और मानसिक बदलाव के बारे में उठने वाली जिगयासओं का समाधान नहीं मिल पाता, तो इस युग में इन्टरनेट पर उपलब्ध सब प्रकार की सामग्री विशेष कर व्यसक सामग्री के कारण युवक,युवितियाँ भटक जातें  है, और इन युवाओं को भुगतने पड़ते हैं,दुष्परिणाम विशेषकर युवा लड़कियों को, इन लड़कियों के लिए तो असमय माँ बनना,गर्भपात कराना इत्यादि तो बहुत ही असुविधाजनक हैं,और विशेषकरइसके द्वारा होने वाला  मानसिक दवाब,  आज कल तो लिव इन रिलेशनशिप चल पड़ा है,जिसमें यह संभावनाएं बहुत बड़ जाती हैं |
 आजकल जिस खाद्य पदार्थ के बारे में सोचो उसमें मिलावट ही मिलावट है, क्या होगा वड़ते बच्चों का स्वास्थ्य ?

 माँ,बाप का समयअभाव के कारण बच्चों को भावनात्मक प्यार ना दे पाना, सुरसा के मूह की तरह बड़ती महंगाई,बच्चों के खेलने की दिन,परतिदिन स्थान की कमी होते जाना,बस्ते का और पडाई का बड़ता बोझ, पेडो की कटाई के कारण शुद्ध हवा की तेजी से होती हुई कमी,खाद्य पदार्थों में मिलावट पर कोई नियंत्रण नहीं,क्या होगा हमारी भावी पीड़ी का भविष्य ? देश के कर्णाधार क्यों नहीं सोचते इस बारें में ?,बस एक दूसरे पर दोषारोपण के कारण अतिरिक्त कोई काम नहीं इनके पास,में यह नहीं कहता देश का विकास नहीं हुआ,परन्तु अगर एक दूसरे पर दोषअपरण करना छोड़ कर,देश के भावी कर्णाधार पर भी दें तो कितना अच्छा हो |
पहले तो बहुतयात से पेड़ पौधे हुआ करते थें,लोग प्रात भ्रमण के लिए जाते थे तो पेडो से निकलने वाली स्वछ हवा का सेवन करते थे,और आज क्या मिलता है,प्रदूषित वायु, पौधों पर रंग विरंगी तितलियों के पीछे बच्चे भागते,दौड़ते थे, परन्तु अब फूलों पर मंडराती तितलियों के इस प्रदुषण के कारण देखना दुर्लभ हो गया है,यह बच्चों का भोला मनोरंजन भी समय की गर्त में चला गया है |



 मन कांप उठता है,यह सब सोच कर

बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

प्रक्रति भेद भाव नहीं करती पर इन्सान क्यों?

अक्सर मेरे मस्तिष्क में यह प्रश्न उपजता है, साधारणत: प्रकर्ति भेद भाव नहीं करती कुछ अपवादों को छोड़ कर, अपने नियमित और अनुशासन्तक कर्मो में सदा बंधी रहती है, प्रातकाल कीसूर्य की  स्वर्णिम रश्मियाँ इस धरा को आलोकित कर देती हैं, पक्षियों का कलरव वातावरण में गूंजने लगता है, और सूर्य की प्रात: काल की किरने हमारे शरीर को विटामिन डी उपलब्ध करातीं है, इस प्रकार सूर्य मानव के स्वास्थ्य लाभ पहुंचाती हैं,और सूर्य की रश्मियाँ नदी तालाब,पोखर और सागर पड़ पड़ती हैं,तो जल वाष्प के रूप में परिवर्तित हो कर बादलों का स्वरुप ले लेतीं हैं, और जब इस वाष्प की अधिकता हो जाती है,तब पड़ती हैं रिमझिम वर्षा  और यह रिमझिम वर्षा का जल कुछ तो धरती की प्यास बुझाता है,और कुछ अधिकतर चला जाता है, धरती के गर्भ में और जल और यह जल पेड़ सूर्य की किरणों के साथ मिल कर पेड़ पौधों को जीवन प्रदान करता है, वर्षा के कारण इन्सान को झुलसती गर्मी से भी राहत मिलती है, और यह पेड़,पौधे भूमिगत जल को मजबूती से पकड़ कर रखतें हैं, और यही पेड़ पौधे हैं,जो सूर्य की किरणे प्राप्त करके हमारी प्राण वायु ओक्सीजन निष्कासित करतें हैं, और इसी वायुमंडल में नईटरोजन और कार्बोनडाईओक्सीइड इस ओक्सीजन के मिश्रण से हमारें साँस लेने की वायु का निर्माण होता है, और जब हम कार्बोनडाई ओक्सईड साँस के द्वारा निष्कासित करतें हैं, यही कार्बोनडाओक्सइड दिन में पेड़,पौधे ग्रहण करतें है,और ऑक्सीजन निष्कासित करतें हैं, जब वर्षा की अधिकता हो जाती है, तब आती है शीत ऋतू और, पर्वतों की उचाईयों पर वर्फ जमने लगती है,और ग्रीष्म ऋतू आते ही यह हिम पिघल कर नदियों में जाता है,इस कारण नदियों में जल का संतुलन बना रहता है, कभी प्रक्रति को भेद,भाव करते किसी ने भी अनुभव किया है? सूर्य  धरा के प्रतेयक स्थान पर अपनी रश्मियाँ विखेरता है,क्या इसका धरा से भेद भाव है ? क्या वर्षा हर स्थान पर नहीं पड़ती ? क्या इसका धरा से भेद भाव है ? वायु सब जो सारे प्राणियों का जीवन आधार है,कभी उसने किसी को भी इसने अपने से वंचित किया है ? जल ने    कभी किसी को अपने उपयोग से वंचित रखता है ?
  मानव क्यों इस प्रक्रति से नहीं सीखता ? क्यों लोग धर्म,जाती भूमि के लिए एक दूसरे की जान लेने तक पर आतुर हो जातें हैं ?
प्रक्रति ने तो ऐसा कभी नहीं किया, और तो और मानव इस प्रक्रति का ही शत्रु हो गया है,तेजी से पेडो की कटाई जिसके कारण प्रक्रति के द्वारा स्वस्थ और  जल  वायु का अभाव और भूमिगत जल का गिरता स्तर, लोग प्रात: काल में भ्रमण के लिए जाते थे और जाते है,और अब उनको कहाँ वोह स्वस्थ वायु मिल पाती है ? तेजी से बड़ते हुए पेट्रोल अथवा डीजल से चलते हुए वाहन यह वाहन भी प्रक्रति का संतुलन बिगाड़ रहें हैं   ,चलो अब विकसित शहरों में, गैस से चलने वाले वाहन (C.N.G) आ गयें हैं,परन्तु अधिकतर स्थानों पर नहीं, और नाही लोगों में यह समझ की अधिक इन वाहनों के स्थान पर कम वाहनों का उपयोग करें, जब कोई भी इस प्रकार की  प्रक्रिया जब जलने की क्रिया पूर्ण रूप से सक्रिय ना हो,तो कार्बोनमोनोऑक्सआइड गैस निष्कासित होती है,और यह गैस कार्बोनडाईओक्सइड से भी अधिक घातक है,और यह गैस हमारे वायुमंडल की ओजोने की पर्त को और पतला कर देतीं हैं, जिसके कारण सूर्य की हानिकारक किरणों को जो यह ओजोन पर्त रोकती हैं, उनकी सक्षमता कम हो जाती है, और वायुमंडल का तापमान भी बड़ने लगता है, और ग्लोबल वार्मिंग को कोलाहल प्रारम्भ हो जाता है, इंसान प्रक्रति से मिल जुल कर रहना तो सीखता नहीं और इसको हानि पहूचाने पर तुला हुआ है |
  मानव किंचित सीखो प्रक्रति का अनुशाशन और मेल जोल