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रविवार, फ़रवरी 01, 2009

अविश्वास क्यों

श्री गणेश आये नम:
यह मन बहुत बेचनहै
लेने नही देता चेन है
कभी मरकट की तरह उछलता है यहाँ
कभी जाता यह वहाँ
समझ नहीं आता क्या करू
दिमाग की आवाज सुनूँ
या मन को वश मैं करू
समझ नहीं आता क्या करू
लेने देता नही चेन है

उक्त पंक्तिया मैंने इस कारणवश लिखी है, क्योंकि मैंने लेख पड़ा था, क्या मेरी भविष्य वाणिया महज सयोंग है और उस पर टिप्पणियों मैं मतभेद देखा था, लोग बिना जानकारी के ज्योतिष को कोरी कल्पना समझते हैं, और कह देते यह सयोंग हो सकता है, लोग विदेशियों का सतही अनुकरण तो करते है, जैसा कि मैंने अपने ब्लॉग http://pashchayatvadblogspot.com/
इस ब्लॉग की विडम्बना यह है,कभी यह इन्टरनेट पर खुल जाता है और कभी नहीं, परन्तु अगर इसे पेस्ट कर दो तो यह खुल जाता है, अब आता हूँ विषेय पर विदेशियों के लिए तो अनुसन्धान का विषेय हो जाता परन्तु विडम्बना यह है हमारे लिए नही, जिनको ज्योतिष पर अविश्वास हैं वोह होशियारपुर मैं जा करके भृगु ऋषि द्वारा रचित भृगु सहिंता देख सकते हैं, और अपने जीवन के अन्तिम समय तक का भविष्य देख सकते हैं, यह तो हुआ स्वयं के बारे मैं जानकारी लेना, परन्तु इस प्रकृति मैं होने वाली परतेयक घटना की भविष वाणी ज्योतिष द्वारा की जा सकती है, ज्योतिष वास्तव मैं विगयान और कला का संगम है, ग्रहों की चाल की गणना तो हुआ विज्ञानं और उनके प्रभाव की भविष्य वाणी करना कला
असल मैं भारत वर्ष की प्राचीन धरोहर लुप्तप्राय सी होती जा रही हैं, बस बिना शोध के अविश्वास, यहाँ पर विदेशियों की सारहना करूँगा,वोह लोग शोध करते हैं और फिर निष्कर्ष पर जाते हैं
कणाद ऋषि ने कण की रचना बताई थी, हम तो भूल गए परन्तु विदेश से ही कण अर्थार्त ऎटम आया, ब्र्हम्ब्हत द्वारा विश्व को शुन्य दिया गया था, दशमलव से पहले लगा तो संख्या का मूल्य कम, और बाद मैं लगा दो तो मूल्य अधिक, यह सब हमरे वेदों से ही तो निकले हैं, चार वेद सामवेद,अथर्ववेद,ऋग्वेद,यजुर्वेद, जिनसे कोई विषये अछुता नहीं है, पड़ा हुआ था हमारे देश मैं धरोहर की तरह, परन्तु विदेशी आए और ले गये वेद और उन्निती की और अग्रसर हो गये, वेदव्यास द्वारा रचित और गणेश जी के द्वारा लिखित,यह भी प्रमाणित है, कुछ समय पहले दूरदर्शन पर ईण७ चैनल देख रहा था, वोह उस स्वर्ग की सीडी की खोज मैं जा रहे थे, जिस पर पांचो पांडव और उनकी पत्नी द्रौपदी जाने के इछुक थे, तो रास्ते मैं व्यास गुफा पड़ी जहाँ से वेदव्यास जी बोलते जाते थे और गणेश जी लिखते जाते थे, हो गई वेदों की रचना, जिसमे इश्वर की स्तुतियों के अतिरिक्त अर्थशास्त्र, आयुर्वेद, विज्ञानं इत्यादी भरा पड़ा है
आज अमेरिका सबसे शकिशाली देश, और सबसे उन्नत है, पर क्यों? ब्रिटिश साम्राज्य के समय कुछ ब्रिटिश लोग भारत पर होते अत्याचारो को पसंद नहीं करते थे, वोह अमेरिका चले गए,जहाँ पर पहले से ही जर्मन थे जो हमारे वेद ले गए थे, और इस ब्रिटिश और जर्मन की मिलीजुली नसल ने वेदों का अध्यन किया, और उस पर शोध किया और विज्ञानं के परतेयक शेत्र मैं अगर्सर हो गया
अब तो एलियन,उड़न तश्तरी पर शोध मैं भी लगा है, जो की हमारे लिए कोरी कपोल कल्पना हो सकती है, श्री लंका मैं भी रामचरित मानस के पात्रो का ठिकाना मिल गया है, यह सब अनुन्संधन नहीं तो क्या है? जब यह उन्नत देश जंगलो मैं रह रहे थे, हमारी उन्निती चरम अवस्था मैं थी, परन्तु यवनों द्वारा २०० वर्ष राज और २०० वर्ष अंग्रेजी राज्य के कारण खो गई है, और हम अविश्वासी हो गए हैं, हा यह तो मानता हूँ की ढोंग भी व्यापत हो गया है, जिसके कारण हमारी विदयाए कल के गर्त मैं समां गई, मंत्र विद्या,रत्न विद्या, मंत्र शक्ति पर तो मैंने भी अनुसन्धान किया था, सब प्रकार का सहित्य पड़ लेता हूँ, कादम्बनी मैं सूर्य मंत्र लिखा था और यह लिखा था की इस मंत्र से सूर्य रेखा बन जाती है, मैंने किया और मेरी हथेली मैं उन दिनों सूर्य रेखा बन गई, जिसके अवशेष अभी भी मेरी हथेली मैं है, अब आता हूँ रत्ना विद्या पर जिसका भी मुझे अनुभव हैं, दिल्ली मैं कोई रत्नों द्वारा बिमारियों का उपचार करता था, अब तो उन्होंने छोड़ दिया है, यह भी सम्भव हो सकता यह रत्न गृह्यों के प्रभाव का कम या अधिक कर सकते हैं, यह रत्न गृह्यों की उर्जा को आकर्षित कर के शरीर मैं पहुंचा सकते है, अश्वनी कुमारो द्वारा च्यवन ऋषि का दिया हुआ च्यवन प्राश सब लोग जानते हैं, जो की हमारे आयुर्वेद की देन है, कालांतर मैं च्यवन ऋषि ने विश्व को दिया, अब लोग दादी माँ के नुस्खे भूल गए
अंत मैं कहता हूँ योग जो की विदेशो मैं योगा हो जाता है, वोह भी तो भारत की देन है, उसको भी हम भूल गए जब योग से योगा हो जाता है तो अपना लेते है
अब भी क्या हिंद की प्राचीन विद्याओ पर अविश्वास है क्या?
पहेले लोगो की आयु बहुत होती थी, वोह लोग वेदों का अध्यन कर लेते थे, परन्तु बाद मैं उपनिषद गए ता की लोगो को वेदों का सर जानने मैं अधिक समय लगे,परन्तु वोह भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, रूचि का अवहाव है, अगर रूचि होती तो उपलब्ध हो जाते, फिर अपनी प्राचीन विद्याओं को लोग जान पाते
लिखता तो स्वांत सुखाय के लिए, पर प्रोह्त्सान बढता है तो अच्छा लगता है, किसी की भावनाओ को ठेस नही पहुचाना चाहता, परन्तु अपनी धरोहर से अवगत कराना था

पश्च्यात्वाद

आज कल पास्च्याता के अँधा अनुकरण मैं किस कारण हिन्दी संस्कृति विलीन होती जा रही है, मेरे अनुसार हम लोगो को परतयक सभ्यता की अच्छी बातो का अनुसरण करना तो ठीक है, पर अँधा अनुकरण क्यों? आज के हिन्दी समाज की कुछ अवाश्यक्त्याय हैं, जैसे की जीवन मैं अगर्सर होने के लिए अंगेरजी की आवश्यकता है, बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा के लिए आंगल भाषा अवाश्यक है, और इंजीनियरिंग, डॉक्टर और विविध व्यवसाय के लिए अंगेरजी का ज्ञान होना अति आवश्यक है, और यह भी आवशयक है की बोलचाल और लिखने के लिए अंगेरजी का निरंतर अभ्यास भी आवशयक है, परन्तु जब हम लोग इसमे अभ्यस्त हो जाते है, पर आपस मैं बोल चाल के लिए आंग्ल भाषा का उपयोग करते हैं, यह तो ठीक है कि विदेशियों से बात करने के लिए अंगेरजी मैं बात करनी कि आवश्यकता है पर परस्पर क्योँ?
पहेले कभी यह हुआ था कि सरकारी काम राष्ट्रभाषा मैं होगा परन्तु वोह मुद्दा बहीं का बही रह गया, और आंग्ल भाषा ही शान बन गयी, यह तो हुई भाषा कि बात, हमारा प्राचीन भारत संस्क्रित्यों कि खान था, नालंदा जैसे विश्विद्यालयों मैं अनेको देशो के लोग शिक्षा प्राप्त करते थे,परन्तु अब तो उलट भारतीय लोग विदेशो मैं शिक्षा प्राप्त करते हैं,उससे भी पहले तो गुरु शिष्य परम्परा थी, जिसमे शिष्यों का सब प्रकार का विकास होता था, एक ही गुरु के द्वारा सब प्रकार का विकास शाररिक,बोधिक,आत्मिक परन्तु अब तो अलग, अलग विषयों के लिए गुरु है, कितने महान गुरु थे,परतेयक विषयों मैं पारंगत, और इस गुरु शिष्य की परम्परा मैं हमारे भगवान भी सम्मिलित थे, और उन लोगो ने गुरु का मान रखा,आज कल तो विदेशी लोग गुरुयों को और यहाँ की संस्कृतियों के बारे मैं उत्सुकता लिए यहाँ आते हैं, पर अधिंकाश भटक जाते हैं, क्योंकि उनको सही गुरु नहीं मिल पाता क्योंकि अब उस तरह के गुरु हैं ही कितने।

हम लोग क्योँ उनके पर्व जैसे वैलेंटाइन डे, मदर डे, फाथर डे का अँधा अनुसरण कर रहे हैं, बस मात्र एक दिन, हमारी संस्कृति मैं यह तो प्रतेक दिन मैं समिल्लित हैं, यह तो ठीक है हमे इन दिनों के कारणों से हमारे को स्मरण रहता है, परन्तु यहाँ से प्रारम्भ हो कर के परतेयक दिन की दिनचर्या हो तो कितना अच्छा है।
वैलेंटाइन मुझे याद दिला देता है, कालिदास की मेघदूत सरंचना, किस तरह उन्होने मेघ को दूत बना कर उन्होने अपना संदेश प्रेयसी को भेजा था, और मदर डे फाथर डे से याद आता है, मात्रे देवो भव,पित्र देवो भव जैसे सम्मान सूचक शब्द।
अब आता हूँ सेक्स की और जिसका आज कल समाज मैं विकृत रूप दीखता है, येही से ही उत्पति हुई थी वात्सायन के कामसूत्र की, यहीं तो खुजुर्हाओ के मन्दिर,जिसको देखने के लिए विदेशी आते हैं, सेक्स की कला की उत्पति भी येही से हुई थी, खुजराहो के मन्दिर मन्दिरों मैं तो इस कला का सुंदर स्वरुप दिखाई देता है, कोई भी सेक्स का पर्तेअक प्रकार का स्वरूप उबलब्ध है।
ऐसा था स्वरुप हमारे भारत का था, विश्व मैं सोने की चिडिया के नाम से विख्यात, पर अब तो पश्चिम मैं विलीन होता जा रहा है।