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गुरुवार, अगस्त 19, 2010

सृष्टि के काम में बाधक बनना हानिकारक ही होता है (चतुर्थ भाग )

किसी प्रकार का लालच या लोभ, हानि ही पहुँचाता है, और में भी अपने लोभ बश सृष्टि के काम में बाधक बन ही गया,और इस प्रकार हमारी भारी हानि हुई, यह बात उस समय कि है,जब में मोदीनगर की मोदीपोन संस्था में कार्यरत था, घटना क्रम का प्रारंभ हुआ हमारे घर में, मेरी पत्नी के आभूषण चोरी होने से, हम लोग मोदीपोन की पोश कालोनी आलोक पार्क में रहते थे, और यह तो स्पष्ट सी बात है,इस प्रकार की कालोनियों की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही सुरक्षित होती है, अगर कोई काम वाली को कुछ देता है,तो कालोनी के गेट पर इंटरकोम  द्वारा सूचना देनी होती है,और गेट पर उपस्थित सुरक्षा कर्मी उनकी जांच करके संतुष्ट होने पर ही जाने देते हैं,बाकि और संसाधन जैसे क्लब इत्यादि,तीज त्यौहार सांस्कृतिक रूप से मनाये जाते थे, नव वर्ष आगमन पर पार्टी का आयोजन होता था,होली,दिवाली को क्लब में,शाम के खाने का आयोजन होता था, और सब लोग एक दूसरे को जानते थे, और ऐसे वातावरण में मेरी पत्नी के कुछ आभूषण चोरी हो गये थे, मेरी पत्नी के अलमारी खोलने से पहले,अलमारी के पास एक कान का बुन्दा गिरा हुआ दिखाई दिया,और जब उसने अलमारी खोली तो उसके साथ का बुन्दा नहीं दिखाई दिया,और जब उसने और आभूषणओं को खोजने का प्रयत्न किया तो बहुत से आभूषण चोरी हो गये थे, इस प्रकार के वातावरण में आभूषणओं  की चोरी हो जाना एक असमंजस बना हुआ था |
उसके अगले दिन हमारी काम वाली ने बताया, मोदीपोन कालोनी जो कि आलोक पार्क से निकलते ही थी,वहाँ एक आदमी रहता है,और वोह बता देता है कि,किसने चोरी की,में उस व्यक्ति के पास में चला गया, उसने बताया कि में पड़ कर चावल दूंगा,जिसने चोरी की है,उसके मुख से खून निकलने लगेगा, लेकिन उसके लिए में सहमत नहीं हुआ, परन्तु उस रहस्यमय में व्यक्ति से मेरा परिचय हो गया था , वोह व्यक्ति बहुत सी और विद्यायें जानता था, कौन उसके गुरु,इष्ट इत्यादि थे,में नहीं जानता था |
 मेरी एक बेटी तो थी ही,और मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी थी,वैसे तो मेरे मन में,बेटी,बेटे के बीच में कभी बेहद,भाव नहीं था, परन्तु कुछ सोच कर मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि हमारे बेटी  होगी कि बेटा और उसने बताया पत्नी के गर्भ में कन्या है, यह सोच कर कि अगर हमारे बेटा हो जायेगा तो हमारी बिटिया को भाई मिल जायेगा, मैंने उससे पूछा बेटा हो सकता है,तो वोह बोला अपने गुरु से पूछ कर बताऊंगा,उस दिन में उसके पास से चला आया,और अगले दिन जब में उसके पास गया तो वोह बोला मेरे गुरु जी ने लड़की के पिंड को लड़के के पिंड में बदल दिया है, हुआ तो बेटा ही पर जन्म जात ऐसी बीमारी से ग्रसित जिसको डाक्टर बताते थे,करोड़ों में कभी ऐसी संतान उत्पन्न होती है,और वोह हमारा बेटा तो डाक्टरों के लिए शोध का कारण बन गया था,और अपने जन्म के ढाई महीने बाद वोह हमारा बेटा चल बसा |
एक बार उस रहस्यमय व्यक्ति ने मुझे कुछ दिया था,और कहा इसके नीचे जितना धन रखोगे वोह दुगुना हो जायेगा, जैसा में समझता हूँ,उसने भूत,प्रेत सिद्ध कर रखे थे,और उनसे ही वोह यह काम लेता था,कभी हवा में से उसकी हथेली पर नारियल आ जाता था, उस व्यक्ति से मैंने स्वार्थवश उस परमपिता परमेश्वर की सृष्टि के नियमों को बदलवाने का प्रयत्न किया,और स्वयं ही नुकसान उठाया, यह परमपिता परमेश्वर का अपमान हैं |
 कभी इस प्रकार से सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं |

2 टिप्‍पणियां:

आलोक मोहन ने कहा…

अक्सर मै सोचता हू मै कौन हू ?
मेरा क्या वजूद है ?
क्या मै शरीर हू ?
यह पेट मेरा है ,
यह मेरा पैर है ,
यह मेरी गर्दन है ,
यह मेरा मस्तक है आदि आदि ....

पर ये शरीर तो मिला है और मिली हुई चीज कभी अपनी नही होती .....

अपनी चीज तो अपनी होती है |वह कभी नही खोती ..सुरु से लेकर अंत तक रहती है

पर मिली चीज हमेशा साथ नही रहती ,बिछुड़ जाती है ........
जब कुछ भी नही था और जब कुछ भी नही होगा तब भी मै रहुगा ..शरीर तो बीच में मिला है तो ये मेरा कैसे हो गया

जैसे मेरा मकान(घर) ....मै मकान में जाता हू ..पर मेरे साथ मकान नही जाता ..मै और मेरा घर अलग अलग है

जब छोटा था तब ये कुछ अलग था अब कुछ और ..ये शरीर पल पल बदलता रहता है

और हा ..इस शरीर पर अपना कोई बस भी नही ..बस चलता तो हमेशा जवान रहते ..कभी कोई बीमारी नही लगती ......

ये शरीर संसार के काम आता है और यही मिट जाता है...

ये नाम, पहचान, जाति, कर्म सब इस शरीर और संसार तक सीमित है ..इस संसार से जाने बाद सब ख़तम हो जाता है

फिर मै कौन हू?

संगीता पुरी ने कहा…

सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं .. मैं सहमत हूं आपकी इस बात से !!