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शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

विनाश काले बुद्धि विप्रेते (पंचम भाग )अंतिम कड़ी

मोदीनगर में, उस रहस्यमय व्यक्ति से संपर्क समाप्त कर चुका था,और फिर मैंने हनुमान जी की साधना प्रारंभ कर दी थी, दिनचर्या यह रहती थी, नित्य क्रम से निब्रित होकर ,हनुमान जी की साधना फिर कुछ योगासन और उसके बाद अपनी जीविका कमाने के लिए,फेक्टरी जाना,और लौट के आने के बाद,कुछ अल्पाहार करके,बेडमिन्टन या बिल्यर्ड खेलना,और बाकि समय अपने परिवार में व्यतीत करना, मंगल बार को हनुमान जी का ब्रत रखना और कुछ मीठा,खाकर के व्रत का समापन करना, मोदीपोन छोड़ कर सूरत कार्य के लिए चला गया था,और मेरी दिनचर्या वैसी ही रही, तीन वर्ष सूरत में व्यतीत करने के बाद, हापूड़ और बुलंदशहर के मध्य में पड़ने वाले गुलावठी नाम के कसबे में,कार्य के कारण आ गया था,दिनचर्या वैसी ही थी,और हापूड़ में मेरा संपर्क एक सन्यासी से हुई,जो अपने जीवन के कुछ वर्ष थलसेना में व्यतीत कर चुके थे,और जिनकी आयु उस समय 95 वर्ष की थी,और इस आयु में भी उनमे ऐसी फुर्ती किसी नौजवान में क्या होगी, बस अपनी दोनों आँखों की दृष्टि खो चुके थे, और गजब का हर प्रकार का ज्ञान था उनको,चाहे,विज्ञान हो,ज्योतिष हो,अध्यातम हो,मनोविज्ञान होआयुर्वेद हो कोई भी विषय हो ,हर प्रकार का ज्ञान था उनको, मेरी व्यस्तता मेरे जनरल मेनेजर होने के कारण मेरी व्यस्तता बहुत बड़ी हुई थी,संसथान के हित में सब प्रकार के कार्य देखने पड़ते थे, चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी, उन सन्यासी के पास जाना कुछ कम हो गया था, एक बार उनसे मैंने पूछा, "मुझे हनुमान जी के दर्शन की इच्छा है",उन्होंने पूछा "किस रूप में",मैंने कहा "साक्षात्".वोह  वोले गुरु पूर्णिमा को मेरे पास आना,और वोह दिन कभी नहीं आ पाया,क्योंकि उनका देहावसान हो चुका था | 
अब में अपने परिवार के साथ गाजियाबाद आ चुका था,हनुमान जी के प्रति आस्था तो थी ही,परन्तु मेरा एक मित्र जो कि गुलावठी में मेरे साथ ही था,उसने गाजियाबाद में ही रहने वाली एक माँ शेरा वालीं की भक्त से परिचय करवया था, उन पर माँ का आवेश भी आता है, और वोह स्वयं ही माँ की कृपा से प्रश्न करता के प्रश्न से पहले ही यह कहतीं हैं,"यह है ना प्रश्न हैं
आपका ?",और उसके बारें में जानकारी देतीं हैं, उस माँ के दरबार की विशेष बात यह है,वहाँ कोई दान,दक्षिणा चड़ावे की बात नहीं हैं,और अपने पास से ही माँ का जल देतीं हैं, मैंने वहाँ जाना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि वहाँ अभूतपूर्व शांति का अनुभव होता है,और एक बार उन्होंने मेरे गले में माँ के नाम का कलावा बांध दिया था |
इसी बीच मेरे पिता जी मुझे दिल्ली स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की गोल डाकखाने के पास है,वहाँ ले गये,और वहाँ से मुझे एक फार्म भरवा दिया,जिसमें कुछ प्रश्न थे,जिनका मैंने उत्तर दे दिया था,वोह फार्म रांची स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की मुख्य शाखा है,वहाँ पहुँच गया और मेरे पास हर माह एक योगदा का एक अध्याय जिसमें स्वामी परमहंस योगानंद द्वारा स्वयं अपने को जानने के बारे में थे,आने लगे |
इन्ही दिनों मैंने प्राणिक हीलिंग भी सीखी थी, जिससे अपना स्वयं का,अपने पास बैठे व्यक्ति का और कितनी भी दूर बैठे व्यक्ति की चिकत्सा संभव है |
दिन अच्छे प्रकार से सुचारू रूप से चल रहे थे, हमारी गाजियाबाद की कोलोनी में,एक मंदिर है,वहाँ हर रविवार को भेरो के साधक आते थे,जो कि मंगलवार को हनुमान जी को चोला चडाते थे,और उस मंदिर में में भी माँ के दर्शन के लिए चला जाता था, जब वोह भेरो के साधक दरवार भेरो का दरबार लगाते थे, उपलों की अग्नि धुनें में जलाते थे, एक बार में जिज्ञासावश वहाँ देख रहा था,वोह बोले"यहाँ आना चाहते हो", मेरे हाँ कहने पर वोह बोले 2.5 रुपए का समान ले कर आ जाओ,जो में ले आया था,और उसको जैसे और लोग अपने पर से उतार रहे थे,वैसे ही में उतार कर बैठ गया, पहले बार वहाँ कुछ पूछने का नियम नहीं था,जब में अगले रविवार को में वहाँ पहुंचा,क्योंकि मेरी नौकरी छूट चुकी थी,मैंने उनसे अपनी नौकरी लगवाने का प्रस्ताव रखा,वोह मेरे गले में बंधा हुआ लाल धागा देख कर उन्होंने पूछा,"यह धागा किसका है ?",मैंने कहा माँ का,फिर वोह बोले काला धागा ले आओ,और उसके अगले रविवार को में काला धागा ले आया,जो उन्होंने मेरे गले में बांध दिया, दो तीन रविवार और बीत गये,और क्योंकि मेरी नौकरी नहीं लगी थी, उसका कारण मैंने उनसे पूछा,तो वोह वोले तुम्हारे घर आ कर देखता हूँ, और एक दिन वोह मेरे घर आये तो मैंने पूछा देख लिया,वोह बोले हाँ,तुम्हारा संकट माँ ही काटेगी, और इस प्रकार फिर मुझे माँ की लगन लग गयी थी,एक रविवार को जब मैंने उनको माँ के दर्शन की बात बताई तो उन्होंने सारा वृतांत माँ के द्वारा मुझे दर्शन दिए वाला बता दिया, मैंने उनसे कहा माँ के दर्शन मुझे पुन: प्राप्त करने है,तो वोह बोले कोई गुरु बनाओ,मेरे यह कहने पर आप ही मेरे गुरु बन जाओ,तो वोह बोले मंगलवार को मंदिर में आना |
मंगलवार को जब में,मंदिर पहुंचा तो वोह हनुमान जी का चोला चड़ा कर ध्यान में बैठे थे,जब उनके नेत्र खुले जो बात वोह मुझे भेरो के दरवार के समय बता चुके थे,उसी की पुनरावर्ती की,पहले झंडे वाले मंदिर जाना वहाँ माँ की थाली चडाना फिर कालका मंदिर जाना और फिर भेरो मंदिर,इस प्रकार उनसे संपर्क बड़ता गया,मेरे में एक विशेष बात थी,जब भी माँ के भजन होते तो मेरे शरीर में तरंगे सी उठने लगती थीं, जिस पर मेरा नियंत्रण नहीं था, यह उनको भी पता चल गया था,वोह अपने शरीर पर देवी,देवता को बुलाने में विश्वास करते थे,पर में मन से इसके विरुद्ध था,पर कहता नहीं था,और भी जो बात मुझे नापसंद थी,भेरो को सिगरेट और मदिरा का भोग चडाना,एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया और कुछ लोग उनके घर में उपस्थित थे, उनमें से एक के घर सब लोग मुझे लेकर चल पड़े,और वहाँ पहुँच कर मेरे से वोह भेरो के साधक माँ के आवाहन के लिए कहने लगे,परन्तु इस प्रकार से ना माँ को आना था और वोह नहीं आयीं,में माँ के शांत रूप में आस्था रखता हूँ,जैसे माँ दुर्गा,परन्तु उनकी आसक्ति देवी देवताओं के रोद्र रूप में हैं,जैसे काल भेरव माँ काली इत्यादि ,उनपर भेरो का आवेश आ गया था,वहाँ उपस्थित लोग उनसे प्रश्न पूछ रहें थे, पर में माँ के ना आने के कारण में संकोच कर रहा था,और इसका लाभ उठा कर वोह लोग मेरी बारी आने ही नहीं दे रहें थें, उन दिनों मैंने माँ का मंदिर छत पर बनाया हुआ था,उन्ही लोगों में से एक ने कहा आपने तो यह बहुत गलत कर रखा है,छत पर उलटी सीधी चीजे आ जाती है,और उन भेरो और हनुमान जी के साधक से एक दिन मेरा प्रश्न था,मेरे भेरव के सामने नंबर क्यों नहीं आया ? यह मेरा पूछना था,उन्होंने मुझे बुरी तरह से दुत्कार दिया,और उसके बाद मेरे मस्तिष्क पर उस फटकार का ऐसा प्रभाव पड़ा,मेरे को चार दिन नींद ही नहीं आई और हीलिंग करने में अक्षम हो गया, माँ की जोत सुबह शाम माँ के मंदिर में जलाये बिना मुझे चैन नहीं मिलता था,वोह जलाना छोड़ दिया,माँ मेरी पत्नी के स्वपन में कंजक रूप में आयीं और मेरे लिए बोली,उससे पूछो मेरी जोत जलाना क्यों बंद कर दिया,मेरा बहुत अपमान हो चुका हैं,में इस घर से जा रहीं हूँ,जाते,जाते यह कह गयी,अब तुम दोनों जिन्होंने अपनी बेटी का नाम मेरे नाम पर रखा है,उसके बारें में सोचो और उसका ख्याल रखो, अब तो में संभल चुका हूँ,प्रात: काल पॉँच बजे उठ कर पहले माँ का ध्यान और फिर योगदा के गुरुओं का ध्यान करता हूँ,और राजीव जी के मार्गदर्शन पर चल रहा हूँ,यह सब विवादित लेख जिनको में लिखने में विवादित टिप्पणियों के कारण लिखने में संकोच करता था,अब बिना किसी भय के निर्भीकता से लिखें हैं,और यही पर मेरी इस लेखों की श्रृंखला की इतिश्री होती है |
अब तो कहता हूँ, प्रभु सदा मुझे और सब को उचित पथ दिखाना,हम बालक तेरे ऊँगली पकड़ कर गलत रहा से उचित पथ पर ले जाना |
  राजीव जी मुझे भीरु से निर्भीक बनाने के लिए कोटि,कोटि धन्यबाद,लेकिन अभी शारीरक बिमारियों की शल्य क्रिया से डरता हूँ |
जय,जय श्री गुरुदेव  |

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

सृष्टि के काम में बाधक बनना हानिकारक ही होता है (चतुर्थ भाग )

किसी प्रकार का लालच या लोभ, हानि ही पहुँचाता है, और में भी अपने लोभ बश सृष्टि के काम में बाधक बन ही गया,और इस प्रकार हमारी भारी हानि हुई, यह बात उस समय कि है,जब में मोदीनगर की मोदीपोन संस्था में कार्यरत था, घटना क्रम का प्रारंभ हुआ हमारे घर में, मेरी पत्नी के आभूषण चोरी होने से, हम लोग मोदीपोन की पोश कालोनी आलोक पार्क में रहते थे, और यह तो स्पष्ट सी बात है,इस प्रकार की कालोनियों की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही सुरक्षित होती है, अगर कोई काम वाली को कुछ देता है,तो कालोनी के गेट पर इंटरकोम  द्वारा सूचना देनी होती है,और गेट पर उपस्थित सुरक्षा कर्मी उनकी जांच करके संतुष्ट होने पर ही जाने देते हैं,बाकि और संसाधन जैसे क्लब इत्यादि,तीज त्यौहार सांस्कृतिक रूप से मनाये जाते थे, नव वर्ष आगमन पर पार्टी का आयोजन होता था,होली,दिवाली को क्लब में,शाम के खाने का आयोजन होता था, और सब लोग एक दूसरे को जानते थे, और ऐसे वातावरण में मेरी पत्नी के कुछ आभूषण चोरी हो गये थे, मेरी पत्नी के अलमारी खोलने से पहले,अलमारी के पास एक कान का बुन्दा गिरा हुआ दिखाई दिया,और जब उसने अलमारी खोली तो उसके साथ का बुन्दा नहीं दिखाई दिया,और जब उसने और आभूषणओं को खोजने का प्रयत्न किया तो बहुत से आभूषण चोरी हो गये थे, इस प्रकार के वातावरण में आभूषणओं  की चोरी हो जाना एक असमंजस बना हुआ था |
उसके अगले दिन हमारी काम वाली ने बताया, मोदीपोन कालोनी जो कि आलोक पार्क से निकलते ही थी,वहाँ एक आदमी रहता है,और वोह बता देता है कि,किसने चोरी की,में उस व्यक्ति के पास में चला गया, उसने बताया कि में पड़ कर चावल दूंगा,जिसने चोरी की है,उसके मुख से खून निकलने लगेगा, लेकिन उसके लिए में सहमत नहीं हुआ, परन्तु उस रहस्यमय में व्यक्ति से मेरा परिचय हो गया था , वोह व्यक्ति बहुत सी और विद्यायें जानता था, कौन उसके गुरु,इष्ट इत्यादि थे,में नहीं जानता था |
 मेरी एक बेटी तो थी ही,और मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी थी,वैसे तो मेरे मन में,बेटी,बेटे के बीच में कभी बेहद,भाव नहीं था, परन्तु कुछ सोच कर मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि हमारे बेटी  होगी कि बेटा और उसने बताया पत्नी के गर्भ में कन्या है, यह सोच कर कि अगर हमारे बेटा हो जायेगा तो हमारी बिटिया को भाई मिल जायेगा, मैंने उससे पूछा बेटा हो सकता है,तो वोह बोला अपने गुरु से पूछ कर बताऊंगा,उस दिन में उसके पास से चला आया,और अगले दिन जब में उसके पास गया तो वोह बोला मेरे गुरु जी ने लड़की के पिंड को लड़के के पिंड में बदल दिया है, हुआ तो बेटा ही पर जन्म जात ऐसी बीमारी से ग्रसित जिसको डाक्टर बताते थे,करोड़ों में कभी ऐसी संतान उत्पन्न होती है,और वोह हमारा बेटा तो डाक्टरों के लिए शोध का कारण बन गया था,और अपने जन्म के ढाई महीने बाद वोह हमारा बेटा चल बसा |
एक बार उस रहस्यमय व्यक्ति ने मुझे कुछ दिया था,और कहा इसके नीचे जितना धन रखोगे वोह दुगुना हो जायेगा, जैसा में समझता हूँ,उसने भूत,प्रेत सिद्ध कर रखे थे,और उनसे ही वोह यह काम लेता था,कभी हवा में से उसकी हथेली पर नारियल आ जाता था, उस व्यक्ति से मैंने स्वार्थवश उस परमपिता परमेश्वर की सृष्टि के नियमों को बदलवाने का प्रयत्न किया,और स्वयं ही नुकसान उठाया, यह परमपिता परमेश्वर का अपमान हैं |
 कभी इस प्रकार से सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं |

बुधवार, अगस्त 18, 2010

दुर्गा माँ और माँ काली के दर्शन| (त्रितय भाग)

सर्व मंगल मांग्लय शिवे सर्वार्ध साधिके |
नारायणी त्रियअम्बके गौरी नामोस्तेय ||
सबका मंगल चाहने वाली माता,आपके तीन नेत्र हैं,आपको नमस्कार है |
माँ के शस्त्र धारण करने का कारण यही है, दुष्टों का विनाश करना और संतो को अभयदान देना,माँ आपके दुर्गा सप्तशती के मन्त्र इतने सशक्त है, जो तुरन्त फल देते हैं, कहीं यह दुष्टों के हाथ ना पड़ जाये इसलिए देवादि देव महादेव को इनको कीलित करना पड़ा, जिसकी एक हुँकार से दुष्टों का विनाश हो सकता है, आपकी सोच इतनी उत्तम है, मेरे शस्त्रों से जो मारे जाये वोह उत्तम लोको को जाएँ, इसलिए आपने दुष्टों का संघार करने के लिए शस्त्र उठाये |
बस में,शिव,शिवा और गौरी पुत्र गणेश को कर बध नमस्कार करके  कहता हूँ |
माँ की हर बात निराली है, माँ की शान निराली है ||
अपराध मेरे बहुतेरे माँ ध्यान ना धरना माँ
अपराधो समेत तेरी शरण में आया हूँ |
माँ तेरा ही जाया हूँ ||
मन्त्र,तंत्र ना जानू माँ |
कर्म कांड के मंत्र क्या हैं,पहचानू ना माँ ||
है,जाग जननी,है योगमाया आपको नमस्कार करके,आपके सहज दिए हुए दर्शन के बारे में लिख रहा हूँ,
या देवी सर्वभूतेषु मात्र रूपेण,संस्थिता,नम्स्त्सय,नमस्तस्य,नमो: नम :
है ! भोली माता लिखने में,कोई त्रुटी हो तो क्षमा कर देना माँ, इस लेख श्रृंखला के द्वतीय भाग में,मैंने लिखा था,मेरी ममेरी बहिन मुझ से कटने लगी, एक तो मेरा उसकी ओर जाना, और उसका मुझ से दूर,दूर रहना मेरी बुद्धि पर असर करने लगा, मेरी माँ अक्सर दुर्गा स्तुति का पाठ करती है, इसी कारणवश में एक रविवार को अपने मामा जी के यहाँ ना जाकर के, दुर्गा स्तुति का पाठ,माँ की मूर्ति के सामने बैठ कर करने लगा,वोह भी माँ की जोत जलाये बिना, उस दुर्गा स्तुति में,माँ का स्वरुप ढूंढ़ता लेकिन उसमें तो माँ की महिमा का वखान है, दुर्गा स्तुति का पाठ समाप्त करने के बाद में,दिल्ली की जमुना के घाट पर जा पहुंचा, उस  स्थान उससमय चीनी खाने बनते थे, जिसका प्रारंभ ही हुआ था,जो कि तिब्बत के विस्थापित लोगों द्वारा नया,नया ही प्रारम्भ हुआ था,पर वहाँ ना जाकर के जमुना घाट पर बैठ कर दूसरे किनारे की ओर देखता और खुली आँखों से माँ के चिंतन में खोया हुआ था, कुछ समय वहाँ व्यतीत करके घर आ गया,और जब शयन का समय हुआ,तब सो गया, पता नहीं वोह कौन सा रात्रि का प्रहर था,या प्रात: काल का वोह समय होगा जब अंधकार होता है,उस समय दुर्गा माँ और माँ काली मेरे स्वपन में आयीं, पता नहीं में कैसे उठ कर बैठ गया और देखता हूँ, मेरा वोह शयन कक्ष आलोकिक प्रकाश से भरा हुआ था,
माँ अम्बे और माँ काली मेरे समक्ष खड़ी हुईं थीं,और माँ अम्बे ने संकेत से पूछा भी,"क्या चाहिए", लेकिन में तो माँ काली के स्वरुप से भयभीत था,और दूसरे कमरे की ओर जिसमें मेरे माँ और पिता  जी सोये हुए थे वहाँ भागा कोई गुरु तो था नहीं मेरा जो मुझे संभालता और जब लौट कर अपने कमरे में आया,तो माँ दुर्गा और माँ काली वहीँ विद्यमान और माँ अम्बे का वही संकेत तब मेरे मुख से भय और घबराहट से यही निकला,"मुझे कुछ नहीं चाहिए आप जाइए",और दोनों अंतरध्यान हो गयीं,उसके पश्चात बहुत प्रयास किया पर माँ के साक्षात् पुन: दर्शन नहीं हुए,हाँ कभी,कभी अम्बे माँ का आभास हो जाता है, और कंजक रूप में आ कर कुछ ना कुछ गलतियों का एहसास करा जातीं है, माँ का दिल ममता से भरा हुआ है,वोह बार,बार क्षमा करतीं हैं |
में तो येही सोचता था, ऐसी लगी लगन मीरा हुई मगन प्रभु के गुण गाने लगी |
जयकारा शेरा वालीं माँ का |

अपराध मेरे बहुतेरे | (द्वतीय भाग)

 मैंने राजीव जी से पूछा था,अब इतना प्रयास करने के बाद माँ दुर्गा और माँ काली का दर्शन अब क्यों नहीं होता,जो कि मुझे सहज ही दुर्गा स्तुति का पहली बार में हो गया था, और राजीव जी ने बताया था,यह फल करोड़ो करने के कारण हो गया था, जब ऐसा हो जाता है,तो मानव अपने को करता समझ लेता है,इस बात को मन्युष का अचेतन जानता है |
कहा जाता है,जिसमें सब गुण वोह देवता,जिसमें सब अबगुण वोह  शैतान,और जिसमें सम्मलित गुण और अबगुण दोनों वोह इंसान,लेकिन एक बात और किसी भी वस्तु,घटना,क्रिया इत्यादि को देखने का नजरिया अलग,अलग होता है,जैसे पानी से भरे हुए आधे गिलास को आशावादी व्यक्ति कहता है,गिलास आधा भरा हुआ है,कोई निराशावादी कहता है कि,गिलास आधा खाली है, इसी प्रकार किसी स्त्री के शरीर पर किसी कामुक की दृष्टि पड़ती है,तो वोह स्त्री को काम भावना से देखता है,कोई दार्शनिक देखता है,तो वोह सोचता है,हाड़ मांस का बना हुआ शरीर है,और कोई साधू देखता है तो वोह सोचता है,की आत्मा ने पंचतत्व के शरीर में परवेश किया हुआ,यह शरीर तो आत्मा का वस्त्र है |
अब में बात करने जा रहा हूँ, जब बाल्यावस्था के अगले चरण किशोर अवस्था में पहुँचता है, तब किशोर अथवा किशोरी में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन का सूत्रपात हो जाता है, किशोरों का दाड़ी,मुछ निकलने का प्रारंभ तथा,वाणी में कठोरता आना,और किशोरियों के स्तन के विकास का प्रारंभ होना और वाणी का कोमल होना इत्यादि ,दोनों किशोर अथवा किशोरी इस अवस्था में एक दूसरे के प्रति आकर्षित होतें हैं, किशोरों में काम भावना जागृत होने लगती है, और एक शोध के अनुसार पुरषों में एस्ट्रोजन वाला हारमोन होने के कारण जो कि वासना की ओर प्रेरित करता है,वोह मस्तिष्क वाला भाग जो काम वासना को संचालित करता है,स्त्रियों के ओस्ट्रोजन काम वासना का प्रेरित करने वाले भाग से 2.5 गुना अधिक होता है,इसी कारण अगर पुरुष की दृष्टि निरंकुश हो तो सबसे पहले स्त्रियों के स्तनों पर पड़ती है |
यह सब लिखने का मेरा कारण यही था की में भी किशोर अवस्था में कभी था,और में भी किशोरियों के बारे में सोचता था,और उनके साथ रति क्रिया के सपने बुनता था, और दो बार अलग.अलग किशोरियों ने मुझे निमंत्रण भी दिया था,और हमें अवसर नहीं मिला,मतलब कि यह मेरे में अवगुण था,और भी होंगे.फिर भी अम्बे माँ और माँ काली के दर्शन प्राप्त हुए थे |
अबगुण तो बहुत थे,परन्तु मेरे व्यक्तित्व दो विशेष बातें भी थीं,एक तो अपने आप कभी भी कहीं पर ध्यान लग जाना,और दूसरी बात केवल दो भाई और कोई बहिन ना होने के कारण,बहिन का स्नेह पाने की तीव्र उठ्कंथ्ता,कभी कभी में अपने मामा जी के यहाँ चला जाता था,पर जाता कम ही था, मेरे मामा जी की लड़की को मेरा कम आना अच्छा नहीं लगता था,वोह चाहती थी में अधिक जाऊं और कुछ दिनों के बाद कोई भी समय हो दिन या रात कैसा ही मौसम हो बरसात हो या शीत लहर या अत्यधिक गर्मीं में मामा जी के यहाँ पहुँच जाता था,बाद में हमारे जानकार जिनको ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था और उसके साथ भगवद कृपा भी थी,उन्होंने बताया था,यह मेरे व्यवहार बदलने का कारण मेरे मामा जी की लड़की द्वारा कोई जड़ी चाय में मिला कर पिलाने के कारण था |
समय बीतता गया और में नौकरी करने लगा था,में मामा जी की लड़की को सगी बहिन की दृष्टि से देखता था,लेकिन मामा जी की आर्थिक स्थति अच्छी नहीं थी,और मेरी बहिन को  मुझ से पैसे की आपेक्षा थी जो कि में पूरी नहीं करता था,इसलिए उसने मुझ से दूर,दूर रहना प्रारंभ कर दिया था |
या देवी क्षमा रूपेण संस्थिता नम्स्त्सय,नम्स्त्सय नमो: नम:

मंगलवार, अगस्त 17, 2010

यह लेखों की श्रृंखला राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी कहने पर लिख रहां हूँ | प्रथम भाग

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी से मेरा उनके लेख "काली चिड़िया का रहस्य",पर मेरे द्वारा दी गयी टिप्पणी " वैसे  तो आपने डोली की भलाई के लिए ठीक ही किया, लेकिन भैरो और माँ काली के सामने अच्छे,अच्छे रोगी ठीक हो जातें हैं",और इसके साथ यह भी लिखने पर आपके लेख मेरी रुचि के अनुकूल है,उनका अनुसरण करता बन गया, इस प्रकार मेरा उनसे परिचय का सूत्रपात हुआ, मैंने  किंचित एक दो या इससे अधिक विवादित लेख लिखें हैं, उनमें से एक ऐसा लेख भी था,जिसको लोग खुले चक्षुओं से अनुभव कर सकतें हैं, जिसमें भूत,प्रेत का किसी के भी  शरीर में प्रवेश हो जातें  है,और उसका निवारण स्वयं ही राजस्थान के महेंद्रगढ़ के बाला जी (हनुमान जी ) के मंदिर में हो जाता हैं,और उस लेख पर मुझे टिप्पणी मिलती है,"इंजीनियर साहब इस भोली जनता को भूत प्रेत से अलग रखो ", पुर्बाग्रह से ग्रसित हो कर दी हुई टिप्पणी,"सत्यम किम प्रमाणं",मतलब की बिना खोज,बिना उस स्थान पर जाये और अपनी सोच,सोच और केवल सोच के आधार पर दी गयी टिप्पणी,और उसके बाद मैंने हतौत्त्साहित हो कर विवादित लेख लिखना छोड़ दिया था, लोग दोनों ही प्रकार के होते ही है,पुर्बाग्रह से ग्रसित और दिमाग की खुली खिड़की रखने वाले,कभी मैंने लेख लिखा था "भृगु सहिंता के बारे में मेरी अल्प जानकारी", उस लेख पर किसी ने जो भ्रिगुसहिंता वाले स्थान पर गये थे,उन्होंने मेरी बात का पुष्टिकरण किया था,और उस स्थान के बारे में,पर्याप्त जानकारी भी दी थी,इस लेख श्रृंखला में,बहुत प्रकार के विवादित लेख आयेंगे, लेकिन सोच अपनी,अपनी,मैंने राजीव जी को संक्षिप्त में मेल में लिखा था,और कहा था यह सब सार्वजानिक नहीं होना चाहिए,बाद में राजीव जी ने कहा आप एडिट कर के लिख दीजिये, लेकिन अब मेरे को, किसी प्रकार से बुरी लगने वाली टिप्पणी का कोई प्रभाव नहीं होता, इसलिए में स्पष्ट रूप से बिना एडिट किये यह लेख माला लिख रहा हूँ |
जैसा जिसका व्यक्तिव और सोच वैसी ही टिप्पणी