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मंगलवार, मार्च 16, 2010

ईश्वर दसों दिशाओं में वर्तमान है, फिर गुनाह क्यों?

                                             ॐ गंग गणपतय: नम :

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                                                   जय माता की



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                                      पहली शैलपुत्री कहलावे |
                                     दूसरी ब्रह्मचारनी मन भावे  ||
                                      तीसरी चंद्रघंटा शुभनाम |  
                                      चौथी कुष्मांडा सुखधाम || 
                                       पांचवी देवी स्कंदमाता | 
                                       छटीकत्यानी विख्याता ||
                                      सातंवी कालरात्रि महामाया |
                                      आठवीं महागौरी जगजाया ||
                                       नौवीं सिद्धि दात्री जगजाने
                           
  माँ  के पवित्र नवरात्रों के दूसरे दिन, श्री गणेश जी और जगजननी  माँ के सभी नौ रूपों और दसों, विद्याओं,को प्रणाम करके,माँ की अनुकम्पा और प्रेरणा से यह लेख लिख रहा हूँ | माँ के प्रमुख नौ रूप हैं,जो मैंने दुर्गा स्तुति के श्लोक में वर्णित किया है, और माँ दुर्गा में यह सब समाये  हुए हैं, इन रूपों का पृथक,पृथक सवरूप और स्वव्हाव है,और माता रानी इन स्वरूपों से,भक्तों की रक्षा और दुष्टों का नाश करती हैं, और यह इतनी भोली हैं, कि इनके दुर्गा सप्तशती के मंत्र इतने सशक्त हैं, कि कोई भी इनका लाभ उठा सकता है, इन मंत्रो का कोई लाभ ना उठा ले, इसलिए महादेव जी को इन मंत्रो को कीलित करना पड़ा | 
  नवरात्रों के आंठ्वे या नौवें दिन को, इन के कंजक स्वरुप में कन्या पूजन का विधान है, कथा इस प्रकार है,पंडित श्री धर जी,माँ के कंजंक स्वरुप को माँ मान कर प्रतिदिन पूजा करते थे, और कालांतर में माँ ने पंडित श्री धर जी ने दर्शन दिए और अपनी पवित्र गुफा,जिसमें माँ वैष्णो देवी, माँ महाकाली,महालक्ष्मी और महासरस्वती के साथ पिंडी रूप में विराजमान है,उसकी खोज करने को कहा |

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अब प्रश्न यह उठता है, जिन कन्यायों को माँ स्वरुप मान कर अष्टमी या नौवीं को पूजा जाता है, पर उनके साथ ही भ्रूण हत्या, बलात्कार और जैसे जघन्य अपराध या छेड़,छाड़ क्यों कि जाती है, अब कोई भी कह सकता है, कन्या पत्नी स्वरुप में भी तो होती है, वोह तो मंत्रो के द्वारा अग्नि को साक्षी मान कर विवाह कराया जाता है,वास्तव में हर पति और पत्नी शिव और शिवा का जोड़ा है, और अब पर स्त्री के साथ कुदृष्टि डालना या कुकृत्य करना अब समझा जा सकता है,यही बात स्त्री के लिए भी है,परपुरष पर कुदृष्टि और समागम करना उनको सोचना चाहिए यह  कर्म किसके साथ हो रहा है,इस प्रकार हर मनुष्य और स्त्री में ईश्वर समाया हुआ है,और यह सर्वत्र फेले हुए हैं, और यही तो सिद्ध करता है,यत्र,तत्र,सर्वत्र  मतलब सब और ईश्वर है, यह तो हुई लौकिक बात और , एक और कथा सिखों के पहले गुरु,गुरु नानक जी के बारें में प्रचलित है, एक बार गुरु नानक देवजी आज के पाकिस्तान में कावा कि ओर चरण रख कर लेट गए, तब किसी मुस्लिम समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले को अच्छा नहीं लगा तो,वोह बोला कावे की ओर पैर रख कर नहीं लेटो, गुरु नानक जी ने कहा,मेरे पैर उस ओर कर दो जहाँ कावा ना हो, जहाँ,जहाँ वोह व्यक्ति श्री गुरु नानक देव जी के चरण करता वहीँ,वहीँ उस व्यक्ति को कावा दिखाई देने लगता, मतलब कि खुदा हर ओर है, मानव बुरे कर्म करते हुए सोचने लगता है,मुझे कोई नहीं देख रहा परन्तु, खुदा कहो,ईश्वर कहो हर ओर विद्यमान है,और वोह सबके अच्छे बुरे कर्म देख रहा है |
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  एक बार किसी गुरु ने अपने दो शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए, दोनों को फल दिए और बोले की, इस फल को उस स्थान पर खाना जहाँ पर कोई देख ना रहा हो, दोनों शिष्य चल पड़े,ऐसे स्थान पर जहाँ कोई नहीं देख रहा हो, दोनों को पृथक,पृथक निर्जन स्थान मिल गया, और एक शिष्य ने तो वोह फल खा लिया, परन्तु दूसरे कहीं पर भी जाता,उसको लगा यहाँ पर पशु,पक्षी,  देख रहें हैं,और कहीं भी जाता तो उसको लगा यहाँ पर पेड़,पौधे देख रहें हैं, उस शिष्य को लगा,प्रभु की इस सरंचना में,हर जड़ और चेतन वस्तु में,ईश्वर विद्यमान है,तो उसने फल नहीं खाया,और दोनों आखिरकार लौट आये गुरु जी के पास,और गुरु जी ने परीक्षा में सफल पाया, उस शिष्य को जिसने फल नहीं खाया था |
  यह अंतरात्मा की आवाज ही तो थी, जिसने दूसरे शिष्य को फल नहीं खाने दिया, यही अंतरात्मा की आवाज हर किसी को गुनाह करने से पहले चेतावनी देती है,और जो इस चेतवानी को सुनते हैं,उनकी अंतरात्मा की आवाज, सदा जीवित रहती है,और जो इस चेतवानी को अनसुना करके,गुनाह, पर गुनाह किये जातें हैं,उनकी यह चेतना या अंतरात्मा या अन्दर की आवाज मृत हो जाती है,यही अंतरात्मा की आवाज ईश्वर की आवाज है,इसका अर्थ तो येही हुआ,घट,घट में ईश्वर विद्यमान |
  पंडित डी.के वत्स जी ने अपने लेख में यही तो सपष्ट किया था, मन्त्र,कर्मकांड,उपासना का लाभ क्यों नहीं मिलता,पहले अपने अन्तकरण को साफ करने के बाद ही तो लाभ मिलेगा,क्योंकि ईश्वर तो अन्तकरण में वास करता है |
  इसीलिए तो कहा गया है,यम नियम,प्रतिहार,यम अर्थार्त अपना व्यवहार,इसके पश्चात आता है नियम,और इसके पश्चात प्रतिहार अर्थात,जप,तप इत्यादी,और यह सब भी होना चाहिए,मनसा वाचा कर्मणा, अर्थार्त मन से बचन से और कर्मों के द्वारा,
 हमारे मन से सूक्ष्म तरेंगे निकलती हैं,और यही वातावरण को प्रभावित करती हैं,और यही तरेंगे ईश्वर तक पहुँचती है, ईश्वर सब ओर विद्यमान है,और हर स्वरुप में है, जो जिस स्वरुप की पूजा,अर्चना करता है,उसको ईश्वर के उसी स्वरुप के दर्शन हो जाते हैं,जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था |
 इसीलिए तो गुनाह करने वाले को कहा जाता है,ईश्वर से डरो,वोह तो हर स्वरुप में दसो दिशाओं में,जड़ चेतन में विद्यमान है |
 माँ सब पर अपनी अनुकम्पा बनाये रखना
आप के शस्त्र धारण का कारण यही तो है,भक्तो कि रक्षा और दुष्टों का नाश |
माँ मेरे सभी अपराध क्षमा करना 



 



















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