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रविवार, अक्तूबर 25, 2009

संभवत: प्राचीन काल में चार आश्रम की व्यवस्था का मनोवाज्ञानिक आधार रहा होगा |

प्राचीन काल में, मानव जीवन की व्यवस्था को चार भागो में, विभक्त किया था , व्रह्म्चार्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास,  जब शिशु जन्म लेता है, कुछ वर्ष तक तो उसका प्रयास अपने शरीर को संभालना होता है, और उसके बाद उसमें अपने आसपास की वस्तुओं को जानने कि जिज्ञासा होती है, और १३,१४ वर्ष की अवस्था तक पहुँचते, पहुंचते वोह अपने आस पास की जानकारी ले चुका होता है और  शरीर में शक्ति का संचार हो चुका होता है, और यह अवस्था ऐसी होती है, वोह अपने आस पास के वातावरण से तो परिचित हो ही जाता है,और वोह अपनी सोच के अनुसार प्रयोग करना चाहता है, यही वोह अवस्था होती हैं, जिसमें उसके शरीर और मस्तिष्क में परिवर्तन होने लगता हैं, इस अवस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तन होने के साथ, उसके मस्तिष्क में भी हार्मोनल परिवर्तन होने लगते है, aderdinal gland से निकलने वाले हारमोन,और शारीरिक परिवर्तन के कारण उसके मस्तिस्क में ऐसे प्रश्न उठने लगते हैं, जो वोह संकोच वश अपने माँ,बाप से पूछ नहीं सकता और अगर माँ बाप से पूछ भी लिया तो माँ बाप उसको संकोचवश ठीक से उत्तर दे नहीं पाते, यह अवस्था १३ वर्ष से लेकर १९ वर्ष की अवस्था तक रहती है,और इसको टीनएज और मुश्किल एज कहा जाता है, इस एज में लड़के,लड़की के कदम बहकने की बहुत सम्भावना रहती है, लड़के और लड़की में आकर्षण होने लगता है, जिसको यह लोग प्यार की संज्ञा दे देते हैं |
  संभवत: इसी लिए किशोरों के लिए व्रह्म्चार्य आश्रम की व्यवस्था की गयी थी, १३,१४ वर्ष की आयु में,इन किशोरों को गुरु के पास भेजा जाता था,शक्ति तो इन लोगों में भरपूर होती थी, मस्तिष्क भी उन बातों को जानने का इछुक होता था, जिसका इन किशोरों और इनके माँ वाप के बीच में ठीक से संवाद नहीं हो सकता था, उस समय के गुरु हर प्रकार की विद्या से सपन्न होते थे,और यह गुरुजन किशोरों की शारीरिक और मानसिक शक्ति को सही दिशा देते थे |
   उस समय की किशोरियों के लिए इस प्रकार कि व्यवस्था क्यों नहीं थी यह समझ नहीं आता ,और इन किशोरियों के लिए गुरु क्यों नहीं थे, प्राचीन ग्रंथो में पुरुष गुरु और किशोर शिष्य का वर्णन तो मिलता है, परन्तु किशोरियों के लिए नहीं,संभवत: पुरुष प्रधान देश होने के कारण |
    किशोर गुरुओं से २५ वर्ष की अवस्था तक रहते थे, अनेकों प्रकार कि विद्याओं में और अपने मस्तिष्क में उठने वाले पर्श्नों के उत्तर अपने गुरुओं से प्राप्त कर चुके होते थे , और इन विद्याओं में पारंगत, और अपने मस्तिष्क में उठने वाले पर्श्नों का उत्तर प्राप्त कर के पूर्ण रूप से गृहस्त आश्रम में प्रवेश के लिए उपयुक्त हो जाते थे ,और उस समय की स्वयंबर प्रथा के लिए तय्यारहो जाते थे , और अपने बल  और बुद्धि कौशल पर वधु के गले में वरमाला डाल पाते थे , उसके बाद प्रारंभ हो जाता था गृहस्थ आश्रम में प्रवेश, इस गृहस्थ आश्रम को तब से आज तक  से सब से बड़ी तपस्या कहा जाता है , संतानुत्पत्ति करना,संतान को सही दिशा देना, उनका लालन पालन करना, माँ को रातों की नींद का त्याग करना, स्वयं का गीले बिस्तर पर सोना और संतान को सूखे बिस्तर पर सुलाना,पिता के लिए अपनी पत्नी और संतान के लिए जीविका कमाना, कभी संतान वीमार हुई तो जीविका कमाना तो है ही और संतान के उपचार का प्रबंध करना ना जाने माँ बाप को कितने पापड़ बेलने पड़ते थे,आज का परिवेश बादल गया है, आज के समय में तो स्त्री पुरुष एक  दूसरे के साथ कंधे से कन्धा मिला  कर आजीविका कमा रहें हैं, यह गृहस्थ आश्रम २५ से ५० वर्ष की आयु तक रहता था, फिर आता था वानप्रस्थ आश्रम, संतान अब तक गृहस्थ  आश्रम में प्रवेश कर  चुकी होती थी |
  अब इस गृहस्थ आश्रम में प्रवेश की हुई संतान को केवल कभी,कभी परामर्श की आवयश्कता पड़ती थी, हस्तकशेप करना उस समय भी नहीं पसंद होता होगा,जैसे आज भी नहीं पसंद है, आज तो एक पीडी के अंतर को genration gap कहा जाता है, और यह वानप्रस्थ ऐसा होता था, वानप्रस्थ में प्रवेश करने वाले लोग अपनी गृहस्थ में प्रवेश करने वाली संतान से अलग रहते थे,बस सम्बन्ध बनाये रहते थे |
  ५० से ७५ वर्ष की आयु तक तो वानप्रस्थ आश्रम रहता था,और इसके बाद प्रारंभ हो जाता था सन्यास जो कि ७५ वर्ष की आयु से १०० वर्ष की आयु तक बताया जाता है, हो सकता उस समय कि सम आयु १०० वर्ष तक होती होगी, यह समय वोह होता था,जब सुब कुछ त्याग कर प्रभु भक्ति में लगने का परामर्श दिया जाता है, उतरोतर आयु में शक्ति तो रहती नहीं,और कब देहावसान हो जाये इसके बारे में कुछ ज्ञात नहीं होता, संभवत: इसीलिए सन्यास आश्रम के लिए उपरोक्त समय बताया होगा |
   यह सब हुए मनोवाज्ञानिक कारण, अगले लेख में लिखूंगा मनोचिक्त्सक और मानसिक चिकत्सक में अंतर |
 

4 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

एक बहुत ही स्वस्थ जानकारी देती हुई ब्लोग .....पहली बार आया आकर अच्छा लगा.......आभार!

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

बहुत सटीक बात लिखी है...

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

वर्ण व्यवस्था का मनोवैज्ञानिक कारण जो भी रहे हो पर कर्मो के आधार पर वर्ण व्यवस्था बनाई गई होगी ...

vinay ने कहा…

महेन्द्र मिश्र जी, मैने वर्ण व्यवस्था पर नहीं,चार आश्रम के बारे में लिखा है ।