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शुक्रवार, अगस्त 20, 2010

विनाश काले बुद्धि विप्रेते (पंचम भाग )अंतिम कड़ी

मोदीनगर में, उस रहस्यमय व्यक्ति से संपर्क समाप्त कर चुका था,और फिर मैंने हनुमान जी की साधना प्रारंभ कर दी थी, दिनचर्या यह रहती थी, नित्य क्रम से निब्रित होकर ,हनुमान जी की साधना फिर कुछ योगासन और उसके बाद अपनी जीविका कमाने के लिए,फेक्टरी जाना,और लौट के आने के बाद,कुछ अल्पाहार करके,बेडमिन्टन या बिल्यर्ड खेलना,और बाकि समय अपने परिवार में व्यतीत करना, मंगल बार को हनुमान जी का ब्रत रखना और कुछ मीठा,खाकर के व्रत का समापन करना, मोदीपोन छोड़ कर सूरत कार्य के लिए चला गया था,और मेरी दिनचर्या वैसी ही रही, तीन वर्ष सूरत में व्यतीत करने के बाद, हापूड़ और बुलंदशहर के मध्य में पड़ने वाले गुलावठी नाम के कसबे में,कार्य के कारण आ गया था,दिनचर्या वैसी ही थी,और हापूड़ में मेरा संपर्क एक सन्यासी से हुई,जो अपने जीवन के कुछ वर्ष थलसेना में व्यतीत कर चुके थे,और जिनकी आयु उस समय 95 वर्ष की थी,और इस आयु में भी उनमे ऐसी फुर्ती किसी नौजवान में क्या होगी, बस अपनी दोनों आँखों की दृष्टि खो चुके थे, और गजब का हर प्रकार का ज्ञान था उनको,चाहे,विज्ञान हो,ज्योतिष हो,अध्यातम हो,मनोविज्ञान होआयुर्वेद हो कोई भी विषय हो ,हर प्रकार का ज्ञान था उनको, मेरी व्यस्तता मेरे जनरल मेनेजर होने के कारण मेरी व्यस्तता बहुत बड़ी हुई थी,संसथान के हित में सब प्रकार के कार्य देखने पड़ते थे, चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी, उन सन्यासी के पास जाना कुछ कम हो गया था, एक बार उनसे मैंने पूछा, "मुझे हनुमान जी के दर्शन की इच्छा है",उन्होंने पूछा "किस रूप में",मैंने कहा "साक्षात्".वोह  वोले गुरु पूर्णिमा को मेरे पास आना,और वोह दिन कभी नहीं आ पाया,क्योंकि उनका देहावसान हो चुका था | 
अब में अपने परिवार के साथ गाजियाबाद आ चुका था,हनुमान जी के प्रति आस्था तो थी ही,परन्तु मेरा एक मित्र जो कि गुलावठी में मेरे साथ ही था,उसने गाजियाबाद में ही रहने वाली एक माँ शेरा वालीं की भक्त से परिचय करवया था, उन पर माँ का आवेश भी आता है, और वोह स्वयं ही माँ की कृपा से प्रश्न करता के प्रश्न से पहले ही यह कहतीं हैं,"यह है ना प्रश्न हैं
आपका ?",और उसके बारें में जानकारी देतीं हैं, उस माँ के दरबार की विशेष बात यह है,वहाँ कोई दान,दक्षिणा चड़ावे की बात नहीं हैं,और अपने पास से ही माँ का जल देतीं हैं, मैंने वहाँ जाना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि वहाँ अभूतपूर्व शांति का अनुभव होता है,और एक बार उन्होंने मेरे गले में माँ के नाम का कलावा बांध दिया था |
इसी बीच मेरे पिता जी मुझे दिल्ली स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की गोल डाकखाने के पास है,वहाँ ले गये,और वहाँ से मुझे एक फार्म भरवा दिया,जिसमें कुछ प्रश्न थे,जिनका मैंने उत्तर दे दिया था,वोह फार्म रांची स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की मुख्य शाखा है,वहाँ पहुँच गया और मेरे पास हर माह एक योगदा का एक अध्याय जिसमें स्वामी परमहंस योगानंद द्वारा स्वयं अपने को जानने के बारे में थे,आने लगे |
इन्ही दिनों मैंने प्राणिक हीलिंग भी सीखी थी, जिससे अपना स्वयं का,अपने पास बैठे व्यक्ति का और कितनी भी दूर बैठे व्यक्ति की चिकत्सा संभव है |
दिन अच्छे प्रकार से सुचारू रूप से चल रहे थे, हमारी गाजियाबाद की कोलोनी में,एक मंदिर है,वहाँ हर रविवार को भेरो के साधक आते थे,जो कि मंगलवार को हनुमान जी को चोला चडाते थे,और उस मंदिर में में भी माँ के दर्शन के लिए चला जाता था, जब वोह भेरो के साधक दरवार भेरो का दरबार लगाते थे, उपलों की अग्नि धुनें में जलाते थे, एक बार में जिज्ञासावश वहाँ देख रहा था,वोह बोले"यहाँ आना चाहते हो", मेरे हाँ कहने पर वोह बोले 2.5 रुपए का समान ले कर आ जाओ,जो में ले आया था,और उसको जैसे और लोग अपने पर से उतार रहे थे,वैसे ही में उतार कर बैठ गया, पहले बार वहाँ कुछ पूछने का नियम नहीं था,जब में अगले रविवार को में वहाँ पहुंचा,क्योंकि मेरी नौकरी छूट चुकी थी,मैंने उनसे अपनी नौकरी लगवाने का प्रस्ताव रखा,वोह मेरे गले में बंधा हुआ लाल धागा देख कर उन्होंने पूछा,"यह धागा किसका है ?",मैंने कहा माँ का,फिर वोह बोले काला धागा ले आओ,और उसके अगले रविवार को में काला धागा ले आया,जो उन्होंने मेरे गले में बांध दिया, दो तीन रविवार और बीत गये,और क्योंकि मेरी नौकरी नहीं लगी थी, उसका कारण मैंने उनसे पूछा,तो वोह वोले तुम्हारे घर आ कर देखता हूँ, और एक दिन वोह मेरे घर आये तो मैंने पूछा देख लिया,वोह बोले हाँ,तुम्हारा संकट माँ ही काटेगी, और इस प्रकार फिर मुझे माँ की लगन लग गयी थी,एक रविवार को जब मैंने उनको माँ के दर्शन की बात बताई तो उन्होंने सारा वृतांत माँ के द्वारा मुझे दर्शन दिए वाला बता दिया, मैंने उनसे कहा माँ के दर्शन मुझे पुन: प्राप्त करने है,तो वोह बोले कोई गुरु बनाओ,मेरे यह कहने पर आप ही मेरे गुरु बन जाओ,तो वोह बोले मंगलवार को मंदिर में आना |
मंगलवार को जब में,मंदिर पहुंचा तो वोह हनुमान जी का चोला चड़ा कर ध्यान में बैठे थे,जब उनके नेत्र खुले जो बात वोह मुझे भेरो के दरवार के समय बता चुके थे,उसी की पुनरावर्ती की,पहले झंडे वाले मंदिर जाना वहाँ माँ की थाली चडाना फिर कालका मंदिर जाना और फिर भेरो मंदिर,इस प्रकार उनसे संपर्क बड़ता गया,मेरे में एक विशेष बात थी,जब भी माँ के भजन होते तो मेरे शरीर में तरंगे सी उठने लगती थीं, जिस पर मेरा नियंत्रण नहीं था, यह उनको भी पता चल गया था,वोह अपने शरीर पर देवी,देवता को बुलाने में विश्वास करते थे,पर में मन से इसके विरुद्ध था,पर कहता नहीं था,और भी जो बात मुझे नापसंद थी,भेरो को सिगरेट और मदिरा का भोग चडाना,एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया और कुछ लोग उनके घर में उपस्थित थे, उनमें से एक के घर सब लोग मुझे लेकर चल पड़े,और वहाँ पहुँच कर मेरे से वोह भेरो के साधक माँ के आवाहन के लिए कहने लगे,परन्तु इस प्रकार से ना माँ को आना था और वोह नहीं आयीं,में माँ के शांत रूप में आस्था रखता हूँ,जैसे माँ दुर्गा,परन्तु उनकी आसक्ति देवी देवताओं के रोद्र रूप में हैं,जैसे काल भेरव माँ काली इत्यादि ,उनपर भेरो का आवेश आ गया था,वहाँ उपस्थित लोग उनसे प्रश्न पूछ रहें थे, पर में माँ के ना आने के कारण में संकोच कर रहा था,और इसका लाभ उठा कर वोह लोग मेरी बारी आने ही नहीं दे रहें थें, उन दिनों मैंने माँ का मंदिर छत पर बनाया हुआ था,उन्ही लोगों में से एक ने कहा आपने तो यह बहुत गलत कर रखा है,छत पर उलटी सीधी चीजे आ जाती है,और उन भेरो और हनुमान जी के साधक से एक दिन मेरा प्रश्न था,मेरे भेरव के सामने नंबर क्यों नहीं आया ? यह मेरा पूछना था,उन्होंने मुझे बुरी तरह से दुत्कार दिया,और उसके बाद मेरे मस्तिष्क पर उस फटकार का ऐसा प्रभाव पड़ा,मेरे को चार दिन नींद ही नहीं आई और हीलिंग करने में अक्षम हो गया, माँ की जोत सुबह शाम माँ के मंदिर में जलाये बिना मुझे चैन नहीं मिलता था,वोह जलाना छोड़ दिया,माँ मेरी पत्नी के स्वपन में कंजक रूप में आयीं और मेरे लिए बोली,उससे पूछो मेरी जोत जलाना क्यों बंद कर दिया,मेरा बहुत अपमान हो चुका हैं,में इस घर से जा रहीं हूँ,जाते,जाते यह कह गयी,अब तुम दोनों जिन्होंने अपनी बेटी का नाम मेरे नाम पर रखा है,उसके बारें में सोचो और उसका ख्याल रखो, अब तो में संभल चुका हूँ,प्रात: काल पॉँच बजे उठ कर पहले माँ का ध्यान और फिर योगदा के गुरुओं का ध्यान करता हूँ,और राजीव जी के मार्गदर्शन पर चल रहा हूँ,यह सब विवादित लेख जिनको में लिखने में विवादित टिप्पणियों के कारण लिखने में संकोच करता था,अब बिना किसी भय के निर्भीकता से लिखें हैं,और यही पर मेरी इस लेखों की श्रृंखला की इतिश्री होती है |
अब तो कहता हूँ, प्रभु सदा मुझे और सब को उचित पथ दिखाना,हम बालक तेरे ऊँगली पकड़ कर गलत रहा से उचित पथ पर ले जाना |
  राजीव जी मुझे भीरु से निर्भीक बनाने के लिए कोटि,कोटि धन्यबाद,लेकिन अभी शारीरक बिमारियों की शल्य क्रिया से डरता हूँ |
जय,जय श्री गुरुदेव  |

1 टिप्पणी:

Divya ने कहा…

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यह सब विवादित लेख जिनको में लिखने में विवादित टिप्पणियों के कारण लिखने में संकोच करता था,अब बिना किसी भय के निर्भीकता से लिखें हैं,....

May God give you all the courage you require for the betterment of society.
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