राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी से मेरा उनके लेख "काली चिड़िया का रहस्य",पर मेरे द्वारा दी गयी टिप्पणी " वैसे तो आपने डोली की भलाई के लिए ठीक ही किया, लेकिन भैरो और माँ काली के सामने अच्छे,अच्छे रोगी ठीक हो जातें हैं",और इसके साथ यह भी लिखने पर आपके लेख मेरी रुचि के अनुकूल है,उनका अनुसरण करता बन गया, इस प्रकार मेरा उनसे परिचय का सूत्रपात हुआ, मैंने किंचित एक दो या इससे अधिक विवादित लेख लिखें हैं, उनमें से एक ऐसा लेख भी था,जिसको लोग खुले चक्षुओं से अनुभव कर सकतें हैं, जिसमें भूत,प्रेत का किसी के भी शरीर में प्रवेश हो जातें है,और उसका निवारण स्वयं ही राजस्थान के महेंद्रगढ़ के बाला जी (हनुमान जी ) के मंदिर में हो जाता हैं,और उस लेख पर मुझे टिप्पणी मिलती है,"इंजीनियर साहब इस भोली जनता को भूत प्रेत से अलग रखो ", पुर्बाग्रह से ग्रसित हो कर दी हुई टिप्पणी,"सत्यम किम प्रमाणं",मतलब की बिना खोज,बिना उस स्थान पर जाये और अपनी सोच,सोच और केवल सोच के आधार पर दी गयी टिप्पणी,और उसके बाद मैंने हतौत्त्साहित हो कर विवादित लेख लिखना छोड़ दिया था, लोग दोनों ही प्रकार के होते ही है,पुर्बाग्रह से ग्रसित और दिमाग की खुली खिड़की रखने वाले,कभी मैंने लेख लिखा था "भृगु सहिंता के बारे में मेरी अल्प जानकारी", उस लेख पर किसी ने जो भ्रिगुसहिंता वाले स्थान पर गये थे,उन्होंने मेरी बात का पुष्टिकरण किया था,और उस स्थान के बारे में,पर्याप्त जानकारी भी दी थी,इस लेख श्रृंखला में,बहुत प्रकार के विवादित लेख आयेंगे, लेकिन सोच अपनी,अपनी,मैंने राजीव जी को संक्षिप्त में मेल में लिखा था,और कहा था यह सब सार्वजानिक नहीं होना चाहिए,बाद में राजीव जी ने कहा आप एडिट कर के लिख दीजिये, लेकिन अब मेरे को, किसी प्रकार से बुरी लगने वाली टिप्पणी का कोई प्रभाव नहीं होता, इसलिए में स्पष्ट रूप से बिना एडिट किये यह लेख माला लिख रहा हूँ |
जैसा जिसका व्यक्तिव और सोच वैसी ही टिप्पणी