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मंगलवार, अक्तूबर 27, 2009

मुँह से निकले हुए शब्द कभी तीर होते हैं कभी मलहम |

बहुधा सोचता हूँ, यह मुँह से निकले हुए शब्द कभी तीर होते हैं,कभी मलहम, अगर मुँह से कटु शब्द निकलते हैं तो यह हिर्दय में तीर की तरह अघात करते हैं,और कभी यही शब्द मलहम का काम करते हैं, इसी लिए कहा गया है, ईश्वर ने दो ऑंखें और एक जवान दि है,जो भी मुँह से शब्द निकाले तो इन दोनों आँखों से देखभाल के यह शब्द जब मुँह से निकल जाते हैं,तो उनको उसी प्रकार वापिस नहीं लिया जा सकता है,जैसे तरकश से निकला हुआ तीर, यही शब्द अगर कटु होते हैं,तो जोड़ने के पश्चात ऐसे ही जुडते है,जैसे धागा टूटने के बाद उन टूटे हुए धागों से जोड़ने पर गांठ पड़ जाती है, और अगर यही शब्द अगर शीतलता लिए होते हैं तो,ऐसा लगता है जैसे सूखे हुए मरुस्थल में वर्षा कि फुआरे पड़ रही हूँ, अगर गांठ पड़ गयी और अनेकों बार शमा या सॉरी कहने पर यह टूटे हुए धागे पूर्वत: तो जुड़ नहीं पाते परन्तु गांठ पड़ना तो स्वाभाविक ही है |
   इसीलिए किसी ने कहा है, ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये |
                                     औरों को भी शीतल करे और खुद भी शीतल होए ||
  लिखे हुए शब्दों का इतना प्रभाव नहीं पड़ता, जितना कि बोले हुए शब्दों का, और अगर वचन कटु सत्य है,तो उनको भी इस प्रकार बोलना चाहिए जिससे सुनने वाले का मन शीतल हो, और उस समय कटु सत्य वचन का सुनने वाले पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा,और सुनने वाला मनन की दिशा में जायेगा, और अगर अच्छे वचनों को कटु या व्यंग्य के रूप में कहा जायेगा,तो सुनने वाला ध्यान ही नहीं देगा,हाँ अगर व्यंग्य लिखित है,तो पड़ने वाला मनन करेगा |
  अब सवाल यह उठता है,सुनने वाला किस प्रकार से किसी कि कही हुई बात को लेता है, उसी प्रकार से सुनने वाला पर्तिक्रिया करेगा,इसलिए स्नेह से स्पष्टीकरण देते हुए बात करेंगे तो वोह सुनने वाले के लिए मलहम होंगे,और अगर शब्द में स्नेह नहीं है,तो वोह तीर की तरह चुभेंगे|
 बस इस लेख में इतना ही
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये |
 औरोन को भी शीतलता दे और खुद भी शीतल होए ||

मनोचिक्त्सक और मानसिक चिकत्सक में अंतर |

मनोविज्ञान को ही आगे बढाते हुए, अगला लेख लिख रहा हूँ, मनुष्य का मस्तिष्क तीन भागो में बिभक्त होता है, चेतन,अर्ध चेतन और सुप्त, कोई भी घटना होती है, इसका प्रभाव सबसे पहले मस्तिष्क के चेतन भाग पर होती है,और यह प्रभाव भी दो भागो में विभक्त होता है, किसी भी घटना का प्रभाव मस्तिष्क  कितनी तीव्रता से लेता है, इस सृष्टि में मनुष्य का व्यक्तित्व अलग,अलग प्रकार को होता है, कोई संवेदन शील है,कोई अति सवेंदन शील है,और किसी में संवेदना का बहुत अभाव है, जितना अधिक मस्तिष्क संवेदन शील है, उतनी ही अधिकता से मस्तिष्क पर प्रभाव होता है, दूसरा किस प्रकार की घटना है, ख़ुशी कि या दुःख कि, फिर उस घटना द्वारा अस्थाई हानि या लाभ है,या स्थाई, और यही घटना समय के अन्तराल के साथ अर्ध चेतन भाग में चली जाती है, और अनुकूल या पर्तिकूल स्थिति,वातावरण में शरीर को मस्तिष्क का  यही भाग पर्तिक्रिया करने को कहता है, यह तो रहा  घटना का मस्तिष्क पर प्रभाव, परन्तु मुँह से निकले हुए कटु शब्द तो बहुत ही तीव्र गति से मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालते हैं,और अच्छे निकले हुए शब्द भी उतनी ही तीव्र गति से मस्तिष्क परअच्छा  प्रभाव डालते है, मस्तिष्क को घटना तो इस प्रकार प्रभाव डालती है, कि मस्तिष्क के न्यूरोन में हलचल होती है,और फिर मस्तिष्क सोचने लगता है, पर मुँह से निकले हुए शब्द तो न्यूरोन को उसी क्षण प्रभावित करते हैं,और शरीर उसी क्षण पर्तिक्रिया करता है,इसलिए तो मस्तिष्क तुंरत  बोले हुए शब्दों के अनुसार शरीर को पर्तीक्रिया करने को कहता है, और यह शब्द कभी तीर और कभी मल्हम्म का काम करते है |
  मनोचिक्त्सक का यही काम है,कि मानव की परतेक क्रिया का अति सूक्ष्मता से अध्यन करना और शब्दों के द्वारा उसको परामर्श देना,परन्तु हमारे देश में मनोचिक्त्सक का बहुत अभाव है, इस काम में में मनोचिक्त्सक को सहानभूति  से नहीं बल्कि इस प्रकार से मनोरोगी से बात करनी होती है,जैसे यह घटना मनोचिक्त्सक के साथ हो रही है, और दूसरे होते हैं मानसिक चिकत्सक,वोह मनुष्य के शरीर में होने वाली  क्रिया का अधयन्न करते हैं, पहले तो यह अपने औजारों से देखते हैं,मनुष्य के अंग उनके औजारों के परति कितने संवेदनशील है,आँख कि पुतली पर बहुत ही बारीक टॉर्च की रौशनी डाल कर देखते है,आँख की पुतली कितनी सिकुड़ती है, मतलब कि शरीर में क्रिया की परति क्रिया का अधयन्न करते हैं, फिर E.E.G मशीन से दिमाग से निकलने वाली तरंगो का अध्यन करते हैं,और देखते हैं वोह तरंगे कितनी विचलित हैं,और शरीर में होने वाली क्रिया और पर्तिक्रिया के साथ दिमाग से निकलने वाली तरंगो का अध्यन करके दवाई देते हैं |
  दिल्ली में एक संस्था थी संजीवनी ,जिसमे यह दोनों प्रकार के चिकत्सक मनोचिक्त्सक और मानसिक चिकत्सक थे, और यह संस्था मानसिक रोगियों की निशुल्क चिकत्सा करती थी, इस संस्था को इसलिए कह रहा हूँ थी,इस संस्था को गूगल पर खोजा पर नहीं मिली |
 
  अगले लेख में इस संजीवनी संस्था के बारे में लिखूंगा |
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रविवार, अक्तूबर 25, 2009

संभवत: प्राचीन काल में चार आश्रम की व्यवस्था का मनोवाज्ञानिक आधार रहा होगा |

प्राचीन काल में, मानव जीवन की व्यवस्था को चार भागो में, विभक्त किया था , व्रह्म्चार्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास,  जब शिशु जन्म लेता है, कुछ वर्ष तक तो उसका प्रयास अपने शरीर को संभालना होता है, और उसके बाद उसमें अपने आसपास की वस्तुओं को जानने कि जिज्ञासा होती है, और १३,१४ वर्ष की अवस्था तक पहुँचते, पहुंचते वोह अपने आस पास की जानकारी ले चुका होता है और  शरीर में शक्ति का संचार हो चुका होता है, और यह अवस्था ऐसी होती है, वोह अपने आस पास के वातावरण से तो परिचित हो ही जाता है,और वोह अपनी सोच के अनुसार प्रयोग करना चाहता है, यही वोह अवस्था होती हैं, जिसमें उसके शरीर और मस्तिष्क में परिवर्तन होने लगता हैं, इस अवस्था में होने वाले शारीरिक परिवर्तन होने के साथ, उसके मस्तिष्क में भी हार्मोनल परिवर्तन होने लगते है, aderdinal gland से निकलने वाले हारमोन,और शारीरिक परिवर्तन के कारण उसके मस्तिस्क में ऐसे प्रश्न उठने लगते हैं, जो वोह संकोच वश अपने माँ,बाप से पूछ नहीं सकता और अगर माँ बाप से पूछ भी लिया तो माँ बाप उसको संकोचवश ठीक से उत्तर दे नहीं पाते, यह अवस्था १३ वर्ष से लेकर १९ वर्ष की अवस्था तक रहती है,और इसको टीनएज और मुश्किल एज कहा जाता है, इस एज में लड़के,लड़की के कदम बहकने की बहुत सम्भावना रहती है, लड़के और लड़की में आकर्षण होने लगता है, जिसको यह लोग प्यार की संज्ञा दे देते हैं |
  संभवत: इसी लिए किशोरों के लिए व्रह्म्चार्य आश्रम की व्यवस्था की गयी थी, १३,१४ वर्ष की आयु में,इन किशोरों को गुरु के पास भेजा जाता था,शक्ति तो इन लोगों में भरपूर होती थी, मस्तिष्क भी उन बातों को जानने का इछुक होता था, जिसका इन किशोरों और इनके माँ वाप के बीच में ठीक से संवाद नहीं हो सकता था, उस समय के गुरु हर प्रकार की विद्या से सपन्न होते थे,और यह गुरुजन किशोरों की शारीरिक और मानसिक शक्ति को सही दिशा देते थे |
   उस समय की किशोरियों के लिए इस प्रकार कि व्यवस्था क्यों नहीं थी यह समझ नहीं आता ,और इन किशोरियों के लिए गुरु क्यों नहीं थे, प्राचीन ग्रंथो में पुरुष गुरु और किशोर शिष्य का वर्णन तो मिलता है, परन्तु किशोरियों के लिए नहीं,संभवत: पुरुष प्रधान देश होने के कारण |
    किशोर गुरुओं से २५ वर्ष की अवस्था तक रहते थे, अनेकों प्रकार कि विद्याओं में और अपने मस्तिष्क में उठने वाले पर्श्नों के उत्तर अपने गुरुओं से प्राप्त कर चुके होते थे , और इन विद्याओं में पारंगत, और अपने मस्तिष्क में उठने वाले पर्श्नों का उत्तर प्राप्त कर के पूर्ण रूप से गृहस्त आश्रम में प्रवेश के लिए उपयुक्त हो जाते थे ,और उस समय की स्वयंबर प्रथा के लिए तय्यारहो जाते थे , और अपने बल  और बुद्धि कौशल पर वधु के गले में वरमाला डाल पाते थे , उसके बाद प्रारंभ हो जाता था गृहस्थ आश्रम में प्रवेश, इस गृहस्थ आश्रम को तब से आज तक  से सब से बड़ी तपस्या कहा जाता है , संतानुत्पत्ति करना,संतान को सही दिशा देना, उनका लालन पालन करना, माँ को रातों की नींद का त्याग करना, स्वयं का गीले बिस्तर पर सोना और संतान को सूखे बिस्तर पर सुलाना,पिता के लिए अपनी पत्नी और संतान के लिए जीविका कमाना, कभी संतान वीमार हुई तो जीविका कमाना तो है ही और संतान के उपचार का प्रबंध करना ना जाने माँ बाप को कितने पापड़ बेलने पड़ते थे,आज का परिवेश बादल गया है, आज के समय में तो स्त्री पुरुष एक  दूसरे के साथ कंधे से कन्धा मिला  कर आजीविका कमा रहें हैं, यह गृहस्थ आश्रम २५ से ५० वर्ष की आयु तक रहता था, फिर आता था वानप्रस्थ आश्रम, संतान अब तक गृहस्थ  आश्रम में प्रवेश कर  चुकी होती थी |
  अब इस गृहस्थ आश्रम में प्रवेश की हुई संतान को केवल कभी,कभी परामर्श की आवयश्कता पड़ती थी, हस्तकशेप करना उस समय भी नहीं पसंद होता होगा,जैसे आज भी नहीं पसंद है, आज तो एक पीडी के अंतर को genration gap कहा जाता है, और यह वानप्रस्थ ऐसा होता था, वानप्रस्थ में प्रवेश करने वाले लोग अपनी गृहस्थ में प्रवेश करने वाली संतान से अलग रहते थे,बस सम्बन्ध बनाये रहते थे |
  ५० से ७५ वर्ष की आयु तक तो वानप्रस्थ आश्रम रहता था,और इसके बाद प्रारंभ हो जाता था सन्यास जो कि ७५ वर्ष की आयु से १०० वर्ष की आयु तक बताया जाता है, हो सकता उस समय कि सम आयु १०० वर्ष तक होती होगी, यह समय वोह होता था,जब सुब कुछ त्याग कर प्रभु भक्ति में लगने का परामर्श दिया जाता है, उतरोतर आयु में शक्ति तो रहती नहीं,और कब देहावसान हो जाये इसके बारे में कुछ ज्ञात नहीं होता, संभवत: इसीलिए सन्यास आश्रम के लिए उपरोक्त समय बताया होगा |
   यह सब हुए मनोवाज्ञानिक कारण, अगले लेख में लिखूंगा मनोचिक्त्सक और मानसिक चिकत्सक में अंतर |
 

बुधवार, अक्तूबर 21, 2009

क्या आज के युग केवल भौतिकता का ही सम्मान है ?

बहुधा में सोचता हूँ,अगर कोई भी स्त्री,पुरष,युवक अगर प्रसिद्ध नहीं हैं, तो उसको सम्मान की दृष्टि से तभी देखा जाता है, जब तक वोह सुख सुविधा  से संपन्न ना हो और जितना अधिक सुविधा संपन्न उतना ही अधिक सम्मान, अगर किसी ने कीमती वस्त्र पहने हुए हो तो वोह सम्मान का अधिकारी है,अगर उसके पासअपनी साथ  साधारण कार है तो ओर सम्मान,अगर कीमती कार तो ओर सम्मान,अगर विदेशी कार हो तो ओर सम्मान,  की दृष्टि में उसका सम्मान बड़ जाता है,और अगर अपना घर है तो उसको और सम्मानित दृष्टि से देखा जाता है |
  जितनी अधिक धन को पर्दर्शित करना उतना ही सम्मान, लक्ष्मी के बारे में कहा जाता है,यह सदा स्थिर नहीं रहती है, हर समय यह चलायमान रहती है,कभी यहाँ तो कभी वहाँ, अगर किसी के पास किसी भी कारणवश सुख,सुविधा के साधन नष्ट होते जातें हैं, और जितने नष्ट होते जाते हैं तो,उसी अनुपात में उसका लोगों की दृष्टि में  सम्मान गिरता जाता है, क्या सुख सुविधा ही सम्मान सूचक है ? क्या निर्धन होने पर सम्मानित व्यक्ति हेय हो जाता है,अभी तक तो वोह सम्मानित था कि उसके पास धन दोलत थी,और धन दोलत के नष्ट होते हि उसका सम्मान गिर गया,यह तो व्यक्ति का सम्मान ना होकर के लक्ष्मी का सम्मान हो गया |
   अगर कोई बॉय फ्रेंड अपनी गर्ल फ्रेंड को कीमती उपहार देता है, तो गर्ल फ्रेंड की दृष्टि में उसका सम्मान बड जाता है, इस सन्दर्भ में समाचार पत्रों में अधिंकाश समय यह आता है, अच्छे घरो के लड़को ने महिलाओं अथवा लड़कियों के गले से चेन खींच ली, अगर कारण जानने का प्रयत्न करो तो यह सामने आता है कि, यह लड़के सुख संपन्न घर से हैं और, अपनी गर्ल फ्रेंड को कीमती उपहार देकर सम्मानित होना चाहते हैं, कहाँ गया वोह महात्मा गाँधी जी का वचन "सादा जीवन उच्च विचार" |
मान लीजिये   अगर कोई परसिद्ध  बुद्धि जीवी जैसे कि लेखक, वैज्ञानिक और कोई भी पर्तिभाशाली व्यक्ति जो आम जनता की दृष्टि में नहीं है,वोह अगर बिना शान शौकत के जन संपर्क में आता है, तो क्या उसका सम्मान नहीं है, क्योंकि वोह अपनी सम्पन्नता को पर्दर्शित नहीं कर रहा है (ऐसा कम ही होता है,इन लोगों का चित्र समाचार पत्रों में इनके वर्णन का साथ निकल ही जाता है )
  किसी भी समारोह में, उपहार देने में भी अपने को परितिष्ठ दिखाने के लिए कीमती उपहार देने का प्रचलन है,तो यह गरीब लोग जो कीमती उपहार नहीं दे सकते उनका सम्मान नहीं हैं, यह भी सच है अगर आपके सुख,समृधि है तो अनेकों रिश्तेदार बन जाते हैं, और अगर सुख समृधि छुट जाती है,तो यही रिश्तेदार आपको छोड़ कर चले जाते हैं, तो क्या सम्मान उनका है,जिनके पास सम्पन्नता है,या लक्ष्मी का सम्मान है ? इसी सन्दर्भ में जो बात मेरे मस्तिष्क में आ रही है, जो इस लेख से थोड़ा हट कर है,सच्चा मित्र वोही है,जो आपका संकट के समय साथ दे, अगर कोई भी  धनी,सुख सम्पन्नता से शने:शने: दूर होकर निर्धन हो जाता है, और अगर कोई उसका साथ उस संकट में दे तो वही आपका सच्चा मित्र है |
  यह धन सम्पदा और एकत्रित हो,और एकत्रित हो यह तो मिरगतृष्णा है, जिसका अंत कभी नहींहोता , सिकंदर ने सब कुछ जीत लिया,और उसके बाद उसने यही कहा था, मेरे ताबूत में से मेरे खुले हाथ बहार रखना, जिससे लोगों को यह संकेत मिले में खाली हाथ आया था और खाली हाथ जा रहा हूँ |
  बस इतना ही बहुत है,जिससे परिवार को रोटी मिल जाए किसी के आगे हाथ ना फेलाना पड़े,और जो अथिति घर में आये वोह भी भूखा ना जाये |
बस इस लेख का अंत साईं नाथ से की जाने वाली प्रार्थना से कर रहा हूँ |
  साईं इतना दीजिये जिसमे कुटुंब समाय |
   में भी भूखा ना रहूँ और भी भूखा ना जाये ||

रविवार, अक्तूबर 18, 2009

बुराई से गृहणा करो बुरे से नहीं |

कल भैयादूज का पावन अवसर है, यानि कि बहिन द्वारा भाई की सुख कामना करने का, और भाई के द्वारा बहिन की रक्षा का बचन देना, वैसे तो यह पर्व हर वर्ष आता है, और परतेक वर्ष बहिन पूजा की थाली सजा कर भाई की सुख कामना करती है, पूजा की थाली में होता है, रोली,चावल,नारियल,दीप और मिठाई, बहिन का थाली में नारियल रखने का अभिप्राय होता है,अगर भाई पर संकट आये तो यह संकट नारियल पर आये और भाई सुरक्षित रहे,और भाई हर परिस्थिति में बहिन की रक्षा करे, भाई का इस पर्व पर विवाहित बहिन के घर जाने का कारण है, भाई को बहिन की स्थिति का आभास हो जाये |
  आप लोग सोचने लगे होंगे की शीर्षक तो है, बुराई से गृहणा करो बुराई से नहीं, परन्तु लिखना प्रारंभ कर दिया भाईदूज के बारे में, इसका कारण यह है, हमारी बेटी हमारी एकलौती संतान है, वैसे तो उसके रिश्तेदारी में सात भाई है, पर हर समय तो वोह उसके साथ नहीं रह सकते हैं, उसके मन में भाई के लिए कसक सदा बनी रहती थी |
  उसका हमारी कोलोनी में रहने वाला वोह लड़का जो कि मार पिटाई और हर समय उधम करने वाला, किस प्रकार उसका भाई बनावोह बता रहा हूँ , थी तो वोह गलतफेमी,हमारी बेटी हमारी कोलोनी से सड़क की ओर जा रही थी, और वोह लड़का बोल उठा "वाह", हमारी बेटी ने समझा वोह उसको कह रहा था, परन्तु वोह अपने भतीजे को कह रहा था,जो दही नहीं खाता उसके उस भतीजे ने उस दिन दही खाया था,इसलिए वोह अपने भतीजे को वाह कह रहा था, वैसे तो मुझे क्रोध नहीं आता और में स्थिति को समझने की कोशिश करता हूँ,फिर उसके बाद ही पर्तिक्रिया देता हूँ,पर हूँ तो इंसान ही  कोई भगवान नहीं, और साथ में पिता भी तो इंसान होने के नाते में आवेशित हो गया, और खड़ा हो गया सड़क के कोने पर उससे बात करने के लिए,किसी ने उसको यह खबर दे दी कि में उसकी पर्तीक्षा कर रहा हूँ,वोह भय के कारण घर से ही नहीं निकला, और संध्या समय वोह अपनी कोलोनी में रहने वाली रिश्तेदारी में लगनी वाली बहिन के साथ हमारे घर आया,और मेरी पत्नी ने उसके सामने हमारी बेटी से  उसके सामने राखी बंधवा  कर बहिन बनाने की पेशकश की,और वोह सहर्ष मान गया, और उसने हमारे पुत्र और हमारी बेटीके भाई का  स्थान ले लिया, और उसने हमारे पुत्र और उसका भाई बन कर अपनी बहिन की रक्षा का प्रमाण भी दिया, हमारी बेटी युवा अवस्था को प्राप्त कर चुकी थी, एक हमारी कोलोनी का दूसरा लड़का उसको परेशान करता था, और हमारे मूह्बोले पुत्र और हमारी बेटी के मूह्बोले भाई ने यह सब देखा,था तो वोह उदंडथा ही,  और उसके पुलिस के इंसपेक्टर इत्यादी से अच्छे सम्बन्ध थे, उसने उस परेशान करने वाले के लड़के के सामने पुलिस इंसपेक्टर को ला  खड़ा कर दिया,और उस परेशान करने वाले लड़के ने उसके बाद हमारी बेटी को कभी तंग नहीं किया, अब तो हमारे मूह्बोले पुत्र का विवाह हो चुका है,और उसके दो पुत्र भी हैं, और हम लोगों को उस हमारे पुत्र और उसकी बहु के कारण सदा  उसके माँ,बाप होने का एहसास होता है, और हमारी बेटी का उसके साथ राखी और भाईदूज का पावन त्यौहार मनाती है |
  क्योंकि हमारा पुत्र शरारती तत्व था, तो उसके मित्र भी शरारती होंगे यह तो जाहिर सी बात है, उसका एक मित्र था जिस का काम दिन रात आवारागर्दी में जाता था, मैंने उसको समझाया कि "तुम दिन,रात आवारागर्दी करते हो कोई काम क्यों नहीं करते,"
 बेचारा पड़ा लिखा तो कम था,कभी दिल्ली में बस ड्राईवर था, उसने बस ड्राईवर की नौकरी क्यों छोड़ी वोह तो मुझे ज्ञात नहीं, परन्तु उस पर मेरी बात का प्रभाव पड़ा और मैंने एक दिन देखा वोह डेयरी से बहुत अधिक मात्रा में,दूध खरीद रहा है, मुझे कुछ समझ में नहीं आया, जब मैंने  हमारे घर से बहार निकलने वाली सड़क पर हलवाई की दूकान के नीचे कड़ाही पर रखा गरम होता दूध देखा और बहुत से कुल्हर, छुआरे देखे  तो समझ में आया,कि इसने ग्राहकों को गरम दूध पिलाने का कार्य प्रारंभ कर दिया  था, उसने यह नेक काम प्रारंभ कर दिया था,परन्तु एक दिन मुझे खबर मिली कि उसको किसी ने गोली मार दी,और मुझे दुःख हुआ जब यह लड़का अच्छा काम करने लगा, उसके बाद हो गया गोली का शिकार |
  इन घटनाओ के बाद दिमाग में यही आता है, बुराई से घृणा करो बुराई से नहीं, और इस कड़ी की अंतिम घटना बता रहा हूँ ,
हमारी कामवाली की बेटी कभी,कभी अपनी माँ की अनुप्स्थ्ती में हमारे घर काम करने आ जाती है, वोह उन दिनों नवीं कक्षा में पड़ती थी,और उसको में गणित पड़ा दिया करता था, परन्तु उसे चोरी की गन्दी आदत थी,और एक दो बार मैंने उसे रंगे हाथो भी पकड़ा था, एक दिन जब मैंने उसे चोरी करते हुए पकड़ा तो मैंने उसे कहा,"अगर तुम्हारा काम कम पैसों के कारण नहीं चलता तो तुम कोई ऐसा कोर्स क्यों नहीं कर लेती,जिससे तुम्हे कुछ आमदनी हो जाए",और मेरी बात का उस पर ऐसा प्रभाव पड़ा, उसने सिलाई का कोर्स कर लिया,आज किसी दूसरे घर में काम कर रही है,और आवयश्कता पड़ने पर हमारे घर भी काम करने आ जाती है,और अपनी आवयश्कता के अनुसार लेडीज कपड़े सिल कर अपना खर्चा निकाल रही है |
         बुराई  बुरी होती है,ना की  बुरे लोग  को अवसर तो दीजिये बुराई को समाप्त करने का |
सब भाई,बहिनों को इस पवित्र उत्सव पर बहुत,बहुत शुभकानाएं |

शनिवार, अक्तूबर 17, 2009

मौसम,,सामाजिकता की अनेकता में एकता के प्रतीक हमारे भारत में झगड़े क्यों ?

आज दिवाली का पर्व है,और इस दीपावली के पावन अवसर में,मुझे लग रहा है, कि अभी दिवाली का पर्व समाप्त होगा तो कुछ समय के अन्तराल पर आ जायेगा, इसाईओं का क्रिसमस का त्यौहार, अभी,अभी तो नवरात्रे और ईद, और विजयदशमी के  त्यौहार समाप्त हुए हैं, और फिर आएगा नव वर्ष| हिन्दुओं के त्यौहार होली,दिवाली,विजयदशमी, इत्यादि के साथ अनेकता में एकता समेटे हुए,यहाँ पर अनेकों  संप्रदाय,हिन्दू, मुसलमान,सिख और इसाई हैं,सब मिल जुल कर हर्षौल्लास और उत्साह के साथ त्यौहार मानते हैं, फिर बाद में आपस वैमन्यस्य क्यों बड़ता है?
 सन १९८४ में जब हमारी पुर्ब प्रधानमंत्री श्रीमती इन्द्रा गाँधी को, उनके सिख गार्डों ने गोलियों से भून दिया, और प्रारंभ हो गया हिन्दू,सिखों के बीच में कत्ले आम, क्यों हम भूल गये थे, सिखों तो हिन्दुओं से ही बने हैं,  गुरु गोविन्दसिंह ने उस समय के बर्बर मुस्लिम शासको से लोहा लेने के लिए ही तो सिख बनाये थे, उन्ही के कारण ही तो बने थे पंज प्यारे, गुरु गोविन्दसिंह जी ने, अपना शिष्य बनाने के लिए, द्रीर प्र्त्य्ग लोगों का चुनाव करने के लिए , एक इन्सान कोबंद कमरे में  बुलाया और एक बकरा काट दिया, बहार लोगों ने देखा खून बह रहा है, इस प्रकार गुरु गोविन्दसिंह जी ने एक,एक कर के चार और लोगों को बुलाया और यही बकरा काटने का क्रम करते रहे, और उस समय के क्रूर शासक ओरोंग्जेब के विरूद्व उन पंज प्यरो को, सिखों के पॉँच ककारों,कछ,केश,कड़ा,कृपाण और पग से सुशोभित किया था, और इनका कारण था अगर तलवार या किसी अस्त्र के साथ, सर पर प्रहार किया जाये तो पग और केश उस अस्त्र के कारण सुरक्षा प्रदान हो,अगर लड़ने के लिए कोई हथियार ना हो,तो कड़े के द्वारा प्रहार हो सके, गुरुगोविंदसिंह जी ने, निडर और साहसी लोगों का चुनाव किया और उनको धारण कराई यह सैनिक वेश्वूषा,  और इस प्रकार गुरुगोविंदसिंह जी के और भी  अनुयायी बने और हुआ सिख धर्म,परन्तु सन १९८४ में कुछ राजनीती की रोटी सेकने के कारण हुआ,सिख हिन्दुओं के बीच कत्ले आम, इन लोगों ने भोली,भाले नासमझ लोगों को बरगला लिया,और यह भोले,भाले लोग यह नासमझी करने लगे |
 यही हमारा देश भारत ही तो है, जिसमे हिन्दुओं के मंदिरों के घंटों के साथ आरती, मस्जिद में कुरान की अजान और एक साथ सुनाई देते हैं, लेकिन विदेशी ताकते अपने ही देश की भोली,भाली जनता के नौजवानों को जिहाद के नाम बरगला कर आतंकवाद को जन्म देती हैं, कहाँ लिखा है कुरान में कि धर्म के नाम पर आतंकवाद फेलाया जाये, और मुंबई के आतंकवाद जैसी घटना हो ?, ईद के दिन तो हिन्दू,मुस्लमान गले मिलते हुए देखे जाते हैं,फिर  धर्म के नाम पर आतंकवाद क्यों? धरती का स्वर्ग कहलाने वाली कश्मीर की धरती आतंकवाद का नरक क्यों बन गया था?
  अभी कुछ दिनों के बाद संध्या के समय क्रिसमस के समय हमारे ही देश में,क्रिसमस करोल गूंजने लगेंगे, बिभीन्न संप्रदाय की अनेकता में एकता तो हमारे ही देश में मिलती है |
  दिवाली का अवसर गुजरातियों के लिए नया साल लेकर आता है, और हमारे देश भारत में, अनेकों प्रान्त हैं, परतेक प्रान्त की अलग,अलग परम्परा अलग,अलग बोली,अलग,अलग बेश्बूषा है, नवरातों में,गुजरात का गरबा, गणपति का महाराष्ट्र का प्रसिद्ध गणपति का त्यौहार, केरल का ओणम, पंजाब की लोहरी, बिहार का छट अनेकता में एकता लिए हुए इस हमारे देश में ही तो है, फिर आपस में सदभावना के स्थान पर यह प्रानतीय झगड़े क्यों? यह प्रान्त हमारा है,या वोह प्रान्त हमारा है |
  हमारा यह भारतवर्ष,मस्तक पर हिमालय पर्वत का मुकुट लिए और तीन और से जिसके सागर चरण धोता है, एक ही मौसम में अलग,अलग प्रकार के मौसम प्रदान करता है, गर्मी में अगर सर्दी का आनद लेना हो तो चले जाइये पहाडो में,सर्दी में गर्मी का आनद लेना हो तो चले जायिए, इस देश के दक्षिणो शेत्रो में,सम मौसम का आनद लेना चाहते हैं,तो चले जाईए समुद्रवर्ती शेत्रो में, और वर्षा का अनद लेना चाहते हैं,तो चले जाइये असम के चिरापुंजी शेत्र में |
 जब हमारा देश, सांस्कृतिक,सामाजिक, और मौसम की अनेकता में एकता है, तो हम सब लोग इन वस्तुओं से अनेकता में एकता का सबक क्यों नहीं लेते ?
 में इस प्रार्थना के साथ अपने इस लेख को विराम देता हूँ, सब के घरों में,धन लक्ष्मी,ज्ञान लक्ष्मी,वैभव लक्ष्मी का वास हो, दीपावली के दीयों से सब के घर में तिमिर का नाश हों, दीयों से परम्परानुसार दिए जलते रहे, इस दिन श्री रामचंद्र जी, असुरों का संघार कर के अयोध्या वापिस लौटे थे,और लोगों ने दीपो को परज्वालित करके उनका स्वागत किया था,और रामराज्य की स्थापना का प्रारंभ हुआ था, जब आपस में कोई वैमनस्य नहीं था, ना कोई संप्रादियक झगड़े, ना कोई आतंकवाद, ऐसे ही समाज की स्थापना हो, लोगों के हिर्दय में अंधकार के स्थान पर प्रकाश हो |
   तमसो माँ ज्योतिर्गमय 
   असतो माँ सद्गमय
    

सोमवार, अक्तूबर 12, 2009

नए गेजेट्स से दूरियां तो कम हुई हैं,परन्तु आत्मिक बड दूरियां गयें

बहुत बार मन में विचार आता है, कि आव्यशकतायों के कारण नए,नए गेजेट्स का आविष्कार हुआ, और इन्सान को बहुत प्रकार की सुविधाएँ मिल गयीं, आज मोबाइल हैं, कंप्यूटर, है, लेप टॉप है, इन्टरनेट हैं, और भी अनेकों प्रकार के उपकरण है, परन्तु वोह वसुधेव कुटुम्बकम कहाँ है? जीवन की गति इतनी बड़ गई है, हर इंसान भागता हुआ सा प्रतीत होता है, बहुत से महानगरों जैसे मुंबई मैं तो आजीविका कमाने के लिए, बहुत,बहुत दूर जाना पड़ता है, इस कारण वहाँ के आम लोगों का आपस मैं मेल,मिलाप तो यदा कदा ही हो पाता हैं,जैसे कोई सामाजिक समारोह हो या सार्वजानिक अवकाश हो, वहाँ तो एक प्रकार की विवशता सी हो गई है, मैं इन उपकरणों के विरूद्व नहीं हूँ, बस यह कहना चाहता हूँ, इन उपकरणों का प्रयोग करते हुए अगर विवशता ना हो, उपकरणों के प्रयोगके साथ अत्मिक दूरी मैं सामंज्यस्ता स्थापित करने का प्र्यतन करे,तो कितना सुंदर हो |
मेरे मस्तिष्क मैं,बचपन की वोह यादें,अभी ताजा हैं, उन दिनों विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे, हम बच्चो का प्रिय होता था,वोह बाइस्कोप वाला,जिसके ऊपर रिकॉर्ड बजता रहता था,और बहुत से झरोखे होते थे,जिनमे शीशे लगे होते थे,और उन शीशो के अन्दर झांक कर विभिन्न चित्र देखते थे, समय बिताने के लिए कभी अंतराक्षरी, कभी ताश का खेल,कितने आत्मीयता से भरे दिन होते थे,वोही रूठना,मानना, फिर मद्रियों द्वारा बन्दर,भालू इत्यादि का नाच, कहीं सर्कस,तो कहीं जादूगर द्वारा जादू के खेल दिखाना, हम सब बच्चे मिल जुल कर वोह देखते थे, किसी के जन्मदिन इत्यादि पर अपने हाथो द्वारा, ग्रीटिंग कार्ड बनाना,अगला कितनी खुशी से उस कार्ड को स्वीकार करता था|
फिर आया दूरदर्शन का युग, उस समय तो केवल राष्ट्रीय प्रसारण होता था,वोह भी सुबह,शाम सीमित समय में, तब तक तो मिलने,जुलने का सिलसिला चलता रहा, अब आया रामायण का प्रसारण सब लोग रामायण को देखने में व्यस्त रहते थे,दूरियां बड़ने का सिलसिला बड़ने लगा,और उसके बाद महाभारत, अब सुबह का समय तो दूरदर्शन को ही समर्पित हो गया, सुबह के समय यह कार्यकर्म तो चलते रहे,अब आए हमलोग, बुनियाद जैसे धारावाहिक शाम को, यह शाम के समय का मिलना,जुलना लील गया, और उसके बाद का स्थान लिया केबल दूरदर्शन का,उसमे सुबह,शाम अनेको प्रकार के कार्यक्रम इन्सान तो दूरदर्शन से चिपट कर ही रह गया, इसी कारण पश्चिम में इसको इडयट बॉक्स कहने लगे,और उन लोगों ने मिलना,जुलना और दूसरे कार्यक्रम में भाग लेना,प्रारम्भ किया |
उसके बाद आया मोबाइल का युग, सुभीधा तो हो गयी,कहीं से भी किसी को संदेश देने की, परन्तु उसके बाद तो यह हर समय कान से चिपट कर रहने लगा,और यांत्रिकता आ गयी,और बड़ गयी आत्मिक दूरी, फिर आया इस पर S.M.S करने की सुविधा, अब तो इंसान बात करने और S.M.S करने का कायल हो गया,विषेत: युवा वर्ग, और अ़ब है इन्टरनेट भी,यह तो अपने में दुनिया ही समेटे हुए हैं,और युवा वर्ग कई,कई घंटे इस पर व्यतीत कर देते हैं |
मेरा कहना यह है, सब उपकरणों को, अपनी रुचि के और आवश्यकता के अनुसार समय दें,पर उसके आदि ना होकर के, आपस में भी अत्मिक रिश्ता,बनायें और इस प्रकार से इन उपकरणों के उपयोग करने के साथ,आपस में समय दे कर अत्मिक रिश्तों और इन उपकरणों मे सामंजस्य रखें |

रविवार, अक्तूबर 11, 2009

मेरा सच का सामना |


सच का सामना धारावाहिक तो समाप्त हो चुका है,परन्तु मैं भी सच का सामना करना चाहता हूँ |

१) सच बोलने का साहस ना कर पाना, बहुत वर्षो पहले मैं, गुटके का सेवन करता था, जो कि मेरी पत्नी को पसंद नहीं था, गुटका खाता था,तो मुँह से गुटके की गंध तो आती थी, जिससे पत्नी को पता चल जाता था,की मैंने गुटके का सेवन किया है, पर जब मुझसे वोह कहती थी,गुटका खाया है,तो मैं झगड़े से बचने के कारण कह देता था,नहीं खाया, जब गुटके कारण मेरे दो दांत टूट गये तब से मैंने गुटका छोड़ दिया |
२) वैसे तो मैं किसी भी इन्सान जिसको मेरी सहायता की आवयश्कता है,तो अपने को कष्ट दे कर के उसकी सहायता करने को बड़े मनोयोग से तत्पर रहता हूँ, परन्तु अगर मुझे शारीरिक रूप से किसी की सहायता करने की आवश्यकता पड़े, जैसे किसी का सर दवाना,या पैर दवाना,पर उतने मनोयोग से सहायता नहीं कर पता, उस समय मुझे भी किसी भी चीज का सहारा लेना पड़ता है,जैसे पैर दवाते हुए या सर दवाते हुए दूरदर्शन देख्नना, अगर यह सम्भव नहीं होता है, उस समय शारीरिक रूप से सहयता तो करता हूँ,पर उतने मनोयोग से नहीं |

शनिवार, अक्तूबर 10, 2009

बच्चो आज तुम्हे तीन प्रकार के आविष्कार बताता हूँ |

१) पहले वोह आविष्कार जिसके वारे मैं बस सोचा गया और हो गया अविष्कार |
इस श्रेणी मैं सबसे पहले नाम लूँगा यूनान के वैज्ञानिक, आर्कमेंडिस का,वोह नहाने के लिए टब मैं घुसे,और उनके घुसने के साथ पानी निकला और वोह बिना वस्त्र पहने, यूनान की सड़कों पर यूरेका,यूरेका कहते हुए भागने लगे, मतलब की मुझे मिल गया |
इससे ज्ञात हुआ, कोई भी द्रव, उतने ही आयतन का द्रव विस्थापित करता है, जो भी वस्तु उसमे डाली गयी है |

दूसरा नाम है न्यूटन का जिनके सर पर सेव गिरा तो वोह सोचने लगे सेव ऊपर क्यो नहीं गया,और नीचे क्यों गिरा
हो गया न्यूटन के पहला गुरुत्वआकर्षण के नियम का आविष्कार प्रतेक वस्तु, धरती के गुरत्व आकर्षण का आविष्कार |
इसी प्रकार उन्होंने चलती हुई और रुकी हुई वस्तुओं को देखा,तो हो गया न्यूटन के दूसरे नियम का आविष्कार जो वस्तु चलती है तो चलती रहती है,और जो वस्तु रुकी है रुकी रहती है |
और इसी प्रकार न्यूटन के तीसरे नियम का आविष्कार हुआ, प्रतेक वस्तु क्रिया करने पर पर्तिक्रिया करती है |
२) दूसरे प्रकार के वोह आविष्कार जो की सयोंग से हो गये |
पता है,बेनजिन के फार्मूले का रिंग कैसे बना,एक वेगानिक थे,उन्होंने बेनजीन का आविष्कार तो कर लिया और वोह उसका फार्मूला नहीं दे पा रहे थे , और वोह सो गए उन्होंने सपने मैं एक सांप को अपनी पूँछ मुँह मैं दवाए देखा तो उन्होंने बेनजीन के रिंग का आविष्कार कर लिया |
अब बताता हूँ दूरबीन का आविष्कार कैसे हुआ, एक चश्मेबनाने वाले एक लेंस के आगे दूसरा लेंस आ गया,और उनको दूर का गिरजाघर पास मैं दिखाई देने लगा हो गया दूरबीन का आविष्कार |

अब बताता हूँ एक्स रे का आविष्कार कैसे हुआ, एक वेगय्निक फिसिक्स का प्रयोग कर रहे थे, उनकी शरीर के अन्दर के भाग का दूर रखी प्लेट पर आ गई,
उनको उन किरणों का नाम कुछ नहीं सुझाई दिया बस उन किरणों का नाम उन्होंने, एक्स रे रख दिया |

३) अब बताता हूँ,कुछ पहले आविष्कार जिन पर दूसरे लोगो ने प्रतिबन्ध लगा दिए |

इस शेत्र मैं सबसे पहले नाम आता है,इन्सटीन का उन्होंने, न्यूटन के दूसरे नियम पर पर्तिबंध लगया,जो वस्तु चल रही है, वोह चलती रहेगी,या जो वस्तु रुकी हुई है,रुकी रहेगी जब तक इन पर बल ना लगाया
जाए
|

इन्सटीन ने ही, न्यूटन के तीसरे नियम,पर प्रतिबन्ध लगाया, हर क्रिया की बराबर और विपरीत दिशा मैं,पर्तिक्रिया होती है |

शुक्रवार, अक्तूबर 09, 2009

मेरी पहेली हवाई यात्रा वोह भी विदेश की |

वैसे तो अब तक तो में,अपने काम के संदर्भ में, बहुत सी देशी,विदेशी हवाई यात्राएं कर चुका हूँ, जैसे अमरीका,कनाडा,जर्मनी इत्यादि,परन्तु पहली यात्रा थी,इंग्लैंड की और वोह भी ,हवाई यात्रा, इसके शुभारम्भ भी हमारे पिता जी के द्वारा ही होता है,
में उन दिनों मोदीनगर के मोदीपोन फैक्ट्री में,कार्यरत था, पिता जी के कस्टम और सेंट्रल एक्ससाइज़ में होने के कारण, उनका संपर्क पासपोर्ट अधिकारीयों से भी था, परिणाम स्वरुप उन्होंने मेरा पासपोर्ट,और मेरी पत्नी का पासपोर्ट मय हमारी बेटी का बनवाने की सोची,उन दिनों हमारी बेटी संभवत: दो,तीन साल की होगी,मैंने पिताजी से कहा "मेरा पासपोर्ट क्यों बनवा रहें हैं,मुझे कहीं जाना,आना तो कहीं नहीं है",परन्तु उन्होंने मेरी सुनी नहीं और ले आये पासपोर्ट बनाने के लिए फॉर्म, अब फॉर्म तो भरना ही था, और उसमें भी एक रोचक किस्सा हुआ, मैंने पिताजी से पुछा की, व्यवसाय वाले प्रश्न में क्या भरूं, उनका उत्तर था निल लिख दो,औरउसके बाद उन्होंने हम लोगों के पासपोर्ट के फॉर्म जमा करवा दिए गए |
कुछ दिनों के बाद पासपोर्ट के लिए पूछ ताछ के लिए अधिकारी आया,में तो बहुत असमंजस में,मैंने ना कोई चोरी की,ना डाका डाला या और कोई गुनाह नहीं किया तो यह पूछ ताछ क्यों? और उस समय वोह अधिकारी मेरा पासपोर्ट भी लेकर आया था और पूछने "लगा कहाँ काम करते हो?" मैंने तो बताना ही था कि,मोदीपोन में,फिर उसने मेरा पासपोर्ट सामने रख दिया,और उसमें व्यवसाय की स्थान पर निल लिखा हुआ था,कहने लगा इसमें तो व्यवसाय निल लिखा हुआ है, अब तो में पुन: शंका में की हुआ मेरा पासपोर्ट रद्द पर ऐसा नहीं हुआ,वोह अधिकारी मेरा पासपोर्ट मुझे दे कर के चला गया |
खैर समय बीतता गया, हम इंजिनियर लोगों को लालच तो होता ही है,जहाँ पर पैसे और अच्छी सुवधाएँ मिलेगीं हम लोग वहीँ चल देते हैं, अब तो जीवन का उतरार्ध आ गया,परन्तु उस समय तो जवान था, और ऐसे में, अच्छे पैसे और सुविधा का आकर्षण अधिक तो होता ही है, समय ने तो अपनी गति से चलना ही था, उस समय कनाडा की एक कम्पनी में तो नौकरी मिल गयी थी, और उसके साथ गुजरात की हीरा नगरी सूरत में,मोदीपोन से अच्छे पैसे और अच्छी सुविधा के साथ नौकरी मिल गयी थी, और में अपनी पत्नी,और पुत्री के साथ सूरत के लिए आजीविका कमाने के लिए चल पड़ा, और मेरे पासपोर्ट बनने के कुछ समय अन्तराल पर मेरी पत्नी का पासपोर्ट मय मेरी पुत्री के साथ भी बन कर आ चुका था |
सूरत में काम करते समय मेरा निजी व्यवसाइयों से भी समपर्क हो गया था, अब किसी व्यवसाई को अपने कारखाने के लिए मशीन खरीदनी थी, और मेरी कम्पनी मुझे अवकाश नहीं दे रही थी, आखिरकार मुझे तीन दिन का अवकाश मिल गया, अब मुझे करनी थी विदेश यात्रा और वोह भी हवाई,अभी तक तो में हवाई अड्डे से लोगों को लेने और छोड़ने ही गया था, और बचपन में तो हवाई जहाज को पास से देखा था, पर जब से पूरा होश सम्भाल चुका,तो हवाई अड्डे का प्रवेश,और निकास द्वार ही देखा था, सूरत से चला मुंबई की ओर साहर हवाई अड्डे की ओर रेलगाड़ी से, क्योंकि वोह पहली यात्रा थी इंग्लॅण्ड की,उसके बाद तो अनेकों बार जा चुका हूँ, वहाँ के कुछ अंग्रेज परिवार मेरे मित्र भी बन चुके हैं |
अब आप लोग हसेंगे मैंने सोचा इंग्लॅण्ड में तो सर्दी पड़ती है,इसलिए मैंने अपने लिए कम्बल ले लिया, जाना हैं,इंग्लॅण्ड और वोह भी ठंडा स्थान तो अपनी सुरक्षा करना तो उचित ही था ना?
वहाँ मुंबई में मुझे वोह व्यवसाई बही मिल गये, और मुझे हैरानी से देखते हुए बोले "कोई विदेश भी कम्बल ले जाता है?", और उस समय तो किसी से विदेश जाने के लिए किसी से राए लेना तो हमारी शान के विरूद्व था ना, चलो यहाँ तक तो सही अब उन्ही व्यवसाई से सुना वीसा के लिए इंग्लिश एम्बेसी में इंटरव्यू होगा,में मन में सोचने लगा भई विनय शर्मा यह कौन सी नयी मुसीबत, विदेश जाने के लिए बही इंटरव्यू, जैसे तैसे ब्रिटिश एम्बेसी के इंटरव्यू का समय आ गया, पासपोर्ट तो इंटरव्यू से पहेले वहीं जमा हो जाता है,खैर अब हमको इंटरव्यू तो देना ही था, उस ब्रिटिश अधिकारी ने बहुत से प्रश्न पूछे,परन्तु एक प्रश्न पुछा "आपने अपना यह पासपोर्ट सन १९८५ में क्यों बनवाया?" उसी समय मेरे मस्तिष्क की बत्ती जली,चूंकि मुझे कनाडा में नौकरी मिल तो गयी थी,बस किन्ही कारणों से वहाँ ज्वाइन नहीं किया था, सो हमने उत्तर दे दिया, "मुझे कनाडा में नौकरी मिल गयी थी,इसलिए मैंने उपरोक्त सन में पासपोर्ट बनवाया", अब उनको तो यह संदेह हो गया की यह तो इंग्लैंड में बस जायगा,मुझे क्या मालूम था इस उत्तर से लेने के देने पड़ जायेंगे,परिणामस्वरूप उन लोगों ने मेरे पासपोर्ट पर लिख दिया "Applied for", वोह व्यवसाई तो बहुत सी विदेश यात्राएं कर चुके थे, वोह पासपोर्ट के पुन: आवेदन के लिएकोई पीला फॉर्म लाये, उसको मैंने भरा फिर उस अंग्रेज अफसर ने मेरे पासपोर्ट पर इंग्लैंड के वीसा की मोहर लगाते हुए कहा,हम आपको छे महीने के लिए वीसा दे रहें हैं, पीला फॉर्म जमा करने के बाद इंटरव्यू में दिए गये उत्तर तो मुझे याद नहीं हैं,ऐसे प्रारंभ हुई मेरी विदेश यात्रा |
विदेश यात्रा का श्री गणेश तो हो ही चुका था, और उसके बाद मुझे भेजा गया अमरीकन एक्सप्रेस बैंक पैसा लेने के लिए,में फिर सोचने लगा की मेरा अमरीकन एक्सप्रेस बैंक में खाता तो है नहीं,फिर यह मुझे पैसा क्यों मिल रहा है, वहाँ से मैंने पैसा तो लिया और एक चीज नयी देख कर फिर असमंजस में, पैसा लेने के लिए मैंने जो फार्म भरा,उसके नीचे दूसरा फार्म लगा हुआ था,उस पर बही मेरे लिखे की कॉपी बिना कार्बन पेपर के बन गयी, उस समय मुझे कार्बन लेस पेपर के बारे में नहीं पता था,खैर अब में तीन हजार डॉलर लेकर निकला बैंक के बहार,और अब हमें जाना था इम्मीग्रेशन के लिए,वोह मेरे लिए नयी चीज, अब इम्मीग्रेशन के बाद आ ही गया नंबर हवाई जहाज में बैठने का, लेकिन उससे पहले अपना सामान तो रखना ही था,कन्वेर बेल्ट पर मैंने अपना सामान उस बेल्ट पर रखा और देखने लगा की मेरा सामान वापिस आयगा तो उठा लूँगा,पर यह क्या मेरा सामान तो वापिस आया ही नहीं, तब मेरे साथ जाने वाले वोह शख्स शायद मेरी मनोस्थिति को भांप गये थे,वोह वोले पहुँच गया सामान हवाई जहाज में, अब तो हवाई जहाज में प्रवेश करने का नंबर था, अब तो सिक्यूरिटी चेक का नम्बर था उस समय मेरी जेब में कुछ भारतीय सिक्के थे,सो वोह सिक्यूरिटी चेक करने वाला यन्त्र बोलने लगा,मैंने सोचा मर गये विनय भई अब तो यह लोग पकड़ के जेल में बंद करेंगे, परन्तु ऐसा नहीं हुआ,आखिरकार हम लोगों ने हवाई जहाज में प्रवेश कर लिया, वड़ा हवाई जहाज था, और में सोच रहा था, कि उड़ते हुए नीचे देखूँगा कि आकाश से धरती और धरती की वस्तुएं केसी दिखाई देती हैं, पर यह क्या मेरे को जो सीट मिली वोह बीच वाली कतार में थी, कुछ देर तो नीचे की वस्तुएं दिखाई दीं, फिर तो नीचे दिखाई दे रहे थे, बादल, मन तो कर रहा था,उचक,उचक के नीचे देखूं, पर यह ना कर सका,जब कुछ ना मिला तो सीट में लगे हुए बटन के बारे में जानकारी लेने लगा,एक बटन दबाया तो परिचालिका आ गयी अ़ब उससे पूछूँ तो क्या?
आखिर दस घंटे बाद पहुँच गए हम लोग इंगलैंड के हिथ्रो हवाई अड्डे, और वहाँ हवाई जहाज से उतर कर निकल कर बिना किसी बस में सवार हो कर निकल चुके, हवाई अड्डे के निकास द्वार से लन्दन शहर के लिए, वहाँ तो सामान्य जीवन ही गुजारा और तीसरे दिन निकल पड़े अपने भारत देश के लिए, आये तो थे भारत सेतो चले थे रात के समय में, और इंगलैंड से प्रस्थान किया भारत के लिए सुबह के समय,पहले हवाई जहाज बहुत ही धीरे,धीरे चल रहा था,मैंने सोचा हवाई जहाज ख़राब हो गया,फिर तो धीरे,धीरे चलते हुए,हवाई जहाज ने रफ्तार पकड़ और उड़ने लगा, नीचे बिल्डिंग इत्यादि दिख रहे थे,और उसके बाद हो गयाहवाई जहाज बादलों के ऊपर, अब परिचालिका आई और उसने ने पुछा लाल वाइन या सफ़ेद वाइन,मुझे वाइन के बारे में कुछ नहीं पता था, पहले लाल वाइन के लिए कहा, फिर उसने वोही प्रशन किया तब मैंने कहा,सफ़ेद वाइन और सिगरेट तो पीता था इसलिए बैठाया गया नॉन स्मोकिंग जोन मैं , कभी,कभी पार्टी इत्यादि में शराब का भी सेवन कर लेता था, शराब की तो आदत नहीं थी,अब तो सिगरेट भी छोड़ चुका हूँ, और निर्धारित समय पर हमारे हवाई जहाज ने जबभारत की धरती को छुआ,तो केवल एक बार जोर का झटका लगा, में सोचने लगा कि यह क्या हुआ?,कोई क्रेश लैंडिंग है क्या? अब तो विदेश यात्रा और हवाई यात्रा का अनुभव भी हो चुका है, ऐसी थी मेरी विदेश यात्रा वोह भी हवाई |
उसके बाद ही मैंने अपने देश में हवाई यात्रायें की हैं |

मंगलवार, अक्तूबर 06, 2009

लक्ष्मी माता यह कैसी दिवाली आने को है |

लक्ष्मी माता यह कैसी दिवाली आने को है |
 इस वर्ष वर्षा ऋतू के मौसम में,वर्षा भी बहुत कम हुई, किसानों की फसल को सूखे की मार मार गयी, उन किसानों के परिवार रोते बिलखते रहे, जिन किसानों ने किस,किस जतन से, लोन इत्यादि लेकर अपनी खेती की,और आसमान की ओर वर्षा ऋतू में,टकटकी लगा कर देखते रहे,परन्तु वर्षा तो आई ही नहीं, और उन किसानों की फसल सुख गयी, दिवाली आने से पहले यह कैसा तुषारापात? और निकल गया दिवाली से पहेले इन किसानों के परिवार का दिवाला |
 परिणाम क्या हुआ, बाजारों में साग,सब्जी अनाज,फल के दाम आसमान छुने लगे,और इन बिचारे किसानों की तो जान गयी,और जमाखोरों,कालाबाजारी करने वालों ने इसका लाभ उठाया, इन लोगों की आत्मा तो मर ही चुकी है, और इन लोगों के साथ कुछ वर्षो से मिलावट करने वाले भी अपना लाभ उठा रहे हैं,खोये में मिलावट,घी में मिलावट,दिवाली तो मन रही है, इन पथभ्रष्ट लोगों की, परन्तु सीधे,भोले,इमानदार लोगों का तो दिवाला ही निकल रहा है |
  दिवाली आने को कुछ ही दिन हैं,और  बाड़ ने बहुत से प्रदेशों में कहर ढा दिया है, आंध्र परदेश,और कर्णाटक में लोग बेघर हो गये, वोह लोग क्या दिवाली मना पाएंगे ?
 एक बात तो समझ में नहीं आती,इस दिन शगुन के नाम पर बहुत से लोग जुआ,खेलते हैं, दिवाली तो मनाई जाती है,श्री राम के बन से अयोध्या लौटने के कारण, और यहाँ से प्रारंभ हुआ था,रामराज्य अर्थार्त,सब बराबर ना कोई,अधिक अमीर ना कोई अधिक गरीब,परन्तु इस जुए से एक ही दिन में,हजारो लाखों के बारे,न्यारे,क्या यही दिवाली का प्रब्व्हाव है,कोई एक ही दिन में अधिक अमीर,और कोई एक ही दिन में अधिक गरीब, क्या यही अर्थ है रामराज्य का?
 हाँ दीपोउत्सव का दिन है, मिठाई खाने और खिलाने का उत्सव है,सर्वोपरि लक्ष्मी माता,और विघ्न विनाशक गणेश जी की पूजा का उत्सव है, लक्ष्मी गणेश जी सब पर अपनी कृपा दिरष्टि करो |
गणेश जी उन लोगों को सद्बुद्धि दो जो अनेकों पटाखे चला कर पर्दूषण से वातावरण दूषित कर रहें है, और इसके साथ ही, कर्णफोडू पटाखे चला कर ध्वनि पर्दूषण वातावरण में व्याप्त कर रहें हैं,उनको सद्बुद्धि दो |
  लक्ष्मी माता सब को अधिक नहीं,इतना तो धन,संपन्न करो, हम भी भूखे ना रहें,और जो हमारे घर आये वोह भी भूखा ना जाए |
  अंत में मेरी तो सब लोगों से विनती है, अपने घरो से एक एक दीप उन घरो में,प्रज्जुवालित करें,जिनके घर में दीप तेल की व्यवस्था ना हों, उनके घरों में दीप,तेल की व्यवस्था करके उन के होंठो पर मुस्कान लाने का प्र्यतन करें|
सभी पाठको का घर दिवाली के दिए जगमगाते रहे, लक्ष्मी,गणेश जी सब की आशाएं जगमगाती रहें |

रविवार, अक्तूबर 04, 2009

सिगरेट,गुटखा छोड़ना चाहते हैं ?

अपनी पचासवीं पोस्ट लिख रहा हूँ, यह तो कानून बनते हैं,सार्वजानिक स्थानों, बस में रेलगाड़ी में,होटलों इत्यादि में सिगरेट,बीड़ी पीने पर जुरमाना होगा, सिगरेटों के पाकेटों पर हिंदी,अंग्रेजी दोनों में लिखा आता था, सिगरेट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, और अब तो इन पाकेटों पर चित्र के रूप में चेतावनी आने लगी है, परन्तु सिगरेट,गुटका आदि छोड़ने की किसी भी विधि का प्रचार नहीं होता हैं, पहला तरीका तो है,इच्छा शक्ति,परन्तु सिगरेट और गुटके के सेवन करने वाले में,अधिकतर इतनी इच्छा शक्ति नहीं होती की वोह सिगरेट छोड़ सके, पहला तरीका है, stop smoking ucsf .edu site के निर्देशों का पालन करके, जो की nicotine gum, nicotine patch  आदि का प्रयोग करके, परन्तु हमारे देश में तो निकोटीन गम ही उपलब्ध है,जिसका नाम है निकोतेक्स परन्तु यह बहुत महेंगा पड़ेगा, ५० रूपये का एक पैकेट आयगा,और उसके अन्दर ही आपको इसके सेवन के निर्देश मिल जायेंगे, जब,जब आपको सिगरेट पीने की इच्छा करे तो यह एक चुंगुम दातों और गालो के बीच में रख,लें और थोड़ा,थोड़ा चबाये,और फिर उसी प्रकार दांतों और गालों के बीच में,रख लें, और धीरे,धीरे चुइंगगम की मात्रा कम करतें जाएँ, इस प्रकार धीरे,धीरे आपका सिगरेट,और गुटके का सेवन बंद हो जायगा, बाकि और निर्देश इस nicotex में रखे कागज में मिल जायेंगे, यह साईट आप गूगल में,सर्च कर सकतें हैं|
  दूसरा सस्ता तरीका बताता हूँ,किसी आयुर्वेदिक दवाई बेचने वाले से मुलेठी की पॉँच,दस रूपये की खरीद लायें,और जब भी सिगरेट,या गुटके की इच्छा करे,तो इसको चबाये,बहुत ही सस्ता और कारगर तरीका है|
 में २५-३० साल से सिगरेट पीता था, मुझे पता हैं, ऊपर लिखे हुए बंधन तब तक कारगर नहीं होते जब तक आप में द्रीर इच्छाशक्ति ना हो, और मेरे विचार से सरकार द्वारा लगाये हुए बन्धनों के  साथ इसके उपाए भी बताने,चाहिए,यही नहीं और भी व्यसनों को छोड़ने के उपाए बताये,जाने चाहिए,शराब छुड़वाने के भी कारगर उपाए है,परन्तु इस विषय में सरकार जाग्रति ही नहीं देती, इसके लिए भी Annomynus नाम से संस्था है, और उस संस्था द्वारा हमारे एक जानकार शराब छोड़ चुके हैं, वोह रहते तो पूना में हैं,परन्तु उनोहने दिल्ली में ही इस Annomynus संस्था में भाग लेकर शराब बिलकुल छोड़ दी है,कभी वोह इधर मेरे पास आयेंगे तो उनसे पूछ कर इस संस्था,और उसकी कार्यविधि के बारे में लिखूंगा |
  सिनेमाँ में काम करने वाले संजय दत्त  Drugs के आदि थे, उनके पिता सुनील दत्त ने उनका उपचार कराया और वोह,Drugs छोड़ चुकें हैं, सरकार को चाहिए रोक तो लगाये परन्तु उपचार को भी तो,पोलियो,तपेदिक,ऐड्स इत्यादि की तरह सार्वजानिक करें |
 

स्त्री पुरुष को परखने के दोहरे मापदंड

आज से तीन दिन के बाद, विवाहित नारियों द्वारा मनाया जाने वाला करवा चौथ है, और इस दिन विवाहित नारियां,संध्या काल के समय में जब तक चाँद निकल नहीं आता, निर्जल,और बिना कुछ खाए हुए अपने पति की दीर्घायु की कामना  लेकर व्रत रखती हैं, और चाँद को अर्घ्य देकर अपने पति का मुख देख कर ही ,अन्न,जल ग्रहण करतीं हैं, अब तो कुछ पति भी इसमें नारी का साथ देने लगे हैं,परन्तु पुरातन काल में  इसका उद्देश तो यह था, पति कमा कर लाता था,और इसी कारण से नारी की जीविका चलती थी, पर अब तो नारी भी पुरुष के साथ कंधे से कन्धा मिला कल चल रही है, और दोनों हीं,अपना घर संसार चलाने में सक्षम हैं,और कभी,कभी तो घर गृहस्ती की सर्वेसवा ही स्त्री ही है, उसके बाद में भी हमारे समाज में नारी को पुरुष की तुलना में,नीचा स्थान ही प्राप्त है | यह तो समझ आता है, यह व्यवस्था पुरातन काल में,पुरष प्रधान समाज में  पुरुषों द्वारा ही बनाई गयी थी, पर आज के बदलते समाज में भी वोह ही भेदभाद की दोहरी मानसिकता दिखाई देती है |
  लड़के ने कोई गलती की तो उसको कम सजा मिलती है,और किसी लड़की ने भी वोही गलती करी तो उसकी सजा अधिक,अगर लड़के ने सिगरेट  या शराब का सेवन किया तो उसको ,इतनी हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता,जितना लड़की को अगर लड़की के साथ कोई बलात्कार की घटना हो जाती है,तो बिना मौत के वोह जीवन भर के लिए मर जाती है, और अगर किसी पुरुष के द्वारा यही घटना होती है,तो वोह स्वछंद रहता है,हालाँकि अब तो बलात्कार के विषय में कानून सख्त हो चुका है,पर हमारा समाज दोहरी मानसिकता का पीछा नहीं छोड़ता, आज कल वैसे अपवाद स्वरुप लिव इन रिलेशन ने भी जन्म ले लिया है, परन्तु मेरे विचार से हाईप्रोफाइल समाज में , उन पर तो कोई प्रवहाव नहीं होता,और यह तो उनके लिए शान की बात है, परन्तु पिस्ता तो मध्य वर्गीय परिवार |
  इसी प्रकार व्यसन तो निम्न वर्गीय परिवारों में महिलाओं के लिए तो आम बात है, वोह खूब बीड़ी,हुक्के आदि का सेवन करतीं हैं,परन्तु उनको हेय दृष्टि से कोई नहीं देखता,हाँ निम्न वर्गीय परिवारों में पुरषों के द्वारा शराब पी कर के अपनी पत्नियों से  गाली गलौज करना और उनको मारना पीटना तो आम बात है, यहाँ भी दोहरे स्त्री,पुरुष के अवगुण देखने के दोहरे मापदंड |
 में एक परिवार को जानता हूँ,पति,पत्नी और उनके दो बेटे हैं , पत्नी कपडे पहने तो पति,और बेटों की मर्जी के अनुसार,सब्जी बनाये तो अपने पति की रुचि के अनुसार,मतलब की उसकी रुचि बिलकुल गौण ही हो गयी है, एक दिन वोह पत्नी मेरे साथ अपने लिए साडी खरीदने के लिए गयी,तो साडी तो खरीद तो ली जो मैंने दिलवा दी थी  लेकिन वोह बोली की पता नहीं,यह पसंद आएगी की नहीं ?,बाद में उसने कहा कि यह साडी सबको बहुत पसंद आई,उसका इशारा अपने पति और अपने बच्चो कि ओर था, इसी प्रकार एक दिन मैंने उनसे पुछा आप को खाने में क्या पसंद हैं,तो वोह बोली घिया चने की दाल,और उसने वोह घिया चने की दाल अपने घर में शायद ही बनाइ होगी,में उसके लिए अपने घर से घिया चने की दाल उसके लिए बनवा के ले गया, ऐसा तो शायद कम ही होता है, पर मैंने स्त्री पुरष के अलग,अलग मापदंड ऐसे भी देखे हैं|
   इसी संनदर्भ में मुझे केरल प्रान्त की याद आ रही है,जो की स्त्री प्रधान परदेश हैं,वहाँ पर स्त्री,पुरष में समंज्यस्ता है, और वहाँ संतान का नाम माँ के नाम से चलता है, और वहाँ पर स्त्री,पुरष को परखने के लिए दोहरे मापदंड नहीं हैं |

शनिवार, अक्तूबर 03, 2009

नाना नानी बनने के बाद लगता है,इतिहास अपने को दोहरा रहा है



हम दोनों नाना,नानी बन गये, और अब मेरी बेटी ,ने  लगभग  ने चार साल पहेले एक लड़के को जन्म दिया था,जिसकी फोटो ऊपर दी हुई है, अपनी बेटी के जन्म के समय तो रोजी के लिए काम करने के कारण बहुत व्यस्त जीवन था, उस समय तो बेटी के जन्म लेने से लेकर बड़े होने तक और उसकी शादी होने तक,उस को इतने करीब से नहीं देख पाया, परन्तु फिर भी नाना बनने के बाद ऐसा लगने लगा कि, इतिहास कि पुनरावृति हो रही है, परन्तु अब तो अपने नाती को बहुत ही करीब से देख रहा हूँ,और लगने लगा है,इतिहास अपने को दोहरा रहा है, और इसी वर्ष की ८ जून को मेरी बेटी ने एक   बेटी को भी  जन्म दिया है |                                                   पहले हमारे नाती का जन्म लेना,और उसके बाद कुछ समय के बाद उसका अपनी गर्दन उठाना,और फिर उसका एक और से धीरे,धीरे सरकना,बहुत रोमांचित करने लगा, फिर उसका दूसरी और से भी सरकना, और उसका उसके बाद घुटनों चलना,एक अभूतपुर्ब ख़ुशी दे जाता था, उसका पहला प्यारा सा शब्द माँ कहना तो अभी तक कानो में गूंजता है, पहले उसका चलने का प्रयतन करना,और फिर आसपास की वस्तुओं को पकड़,पकड़ कर चलना और फिर चलना और डगमगा के गिर जाना,और फिर धीरे,धीरे चलना,और फिर चाल में गति पकड़ना,और फिर दोड़ लगाना अभी तक मानस पटल पर अंकित है, और इसी विषय में एक घटना याद आ रही है, अपनी आयु के बच्चो में वोह सबसे तेज भागता था,और अब उसको बोलना भी आ चुका था, और उसको माइक पर बोलना बहुत पसंद था, एक बार उसकी माँ यानि की मेरी बेटी ने अपनी कालोनी के किसी फंकशन में,उसका नाम दोड़ पर्तीयोगता में लिखवा दिया, दोड़ में तो सबसे आगे था,परन्तु उसको जजों के पास रखा हुआ माइक दिखाई दे गया,तो फिर क्या था,उसने तो रेस लगा दी माइक की ओर और वोह पहला पुरुस्कार लेने से वंचित रह गया, और थोड़ा बड़ा हुआ तो उसके माँ,बाप ने उसके लिए भी खिलोने ला दिए,जब वोह हमारे पास आता है,तो खिलोने और सोफा,कुर्सियों के कवर सारे अस्त,व्यस्त होते हैं, अब तो लिखना सीख गया है, और लिखने का बहुत शौक है, डायरी,पेन तो यदा,कदा ही छूटते हैं उसके हाथ से, कार्टून पिक्चर भी देखनी होती हैं,कंप्यूटर पर गेम भी खेलना होता है,किसी भी चीज को बंद नहीं करने देता, उसके चले जाने के बाद तो एक सन्नाटा सा पसर  जाता है,अब तो उसका नर्सरी में दाखिला हो चुका है |
  नातिन भी आ चुकी हैं,अभी तो केवल दूध ही पीती है,और करवट लेना जन्म के तीन दिन बाद ही सीख गयी थी, अब तो उल्टा होना भी सीख गयी है, उससे बात करो तो मुस्कराती हैं, चुप हो जाओ तो रोती हैं,थोड़ा सा भी शोर होता है सोते से जाग जाती है, मुझे याद आता है,हमारी बेटी से बात करते रहो तो उसको अच्छा लगता था,ना बात करो तो रोने लगती थी,हम लोग अपनी बेटी के कान के पास ट्रांजिस्टर रख देते थे,उसको लगता था,सचमुच में कोई बात कर रहा है,शायद हमारी नातिन,बड़े हो कर के बेटी की हरकतों की पुरावृति करेगी, एक बार हमारी बेटी ने गुडिया,गुड्डे की शादी रचाई,और हमारी फैक्ट्री की कालोनी में सब को हमारे को बिना बताये निमंत्रण दे डाला,अब सब लोग गिफ्ट ले कर आ गये,पर हम लोगों के पास उनके स्वागत के लिए कुछ नहीं,आनन फानन में,बाजार से गुड्डे,गुड्डी की शादी में निमंत्रित लोगों के लिए खाने का सामान लाया गया, एक बार उसने अपनी सब सहेलियों को एकत्रित कर के घर की छत पर बुलाया और,फ्रिज में रखे हुए सारे,चीकू अपनी सहेलियों को चीकू बाट के समाप्त कर दिए, लगता है,हमारी नातिन भी यह सब करेगी,और इतिहास दोहराया जायेगा |
      हमारे नाती को विडियो गेम खेलना आ गया है,बस यह नहीं पता कैसे हार,जीत होगी लेकिन कंप्यूटर के की बोर्ड से विडियो गेम का संचालन तो आ ही गया है, जब भी में उसी गेम के बारे में और जानकारी लेना चाहता हूँ,वोह मुझे की बोर्ड छुने ही नहीं,देता हमारा दामाद कहता आप समझते हो क्या आप को यह कुछ करने देगा?,परन्तुहमारे लिए  तो उसका गेम खेलना और गेम के कारण किलकारी मारना ही गेम है,और उसी को हम दोनों एन्जॉय करते हैं, नाती,और नातिन की शैतानिया देख कर यही लगता है,की इतिहास अपने को दोहरा रहा है |

शुक्रवार, अक्तूबर 02, 2009

सच के सामने की स्वरोक्ति ने प्रभावित किया

आज २ ओक्टुबर का दिन जो कि, गाँधी जी और लाल बहदुर शास्त्री जी की जन्म तिथि है, और आज के दिन मनीषा जी और खुशदीप सहगल की स्वरोक्तियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया,आज ब्लोगवाणी में लिखे हुए लेख पड़ रहा था, मनीषा जी की सिगरेट छोड़ने और खुशदीप सहगल की ब्लोगवाणी पर आप की पसंद बढाने की स्वरोक्ति सचमुच ही प्रवहावित कर गयी, आप दोनों को मेरा सलाम, आज एक लेख लिखने की सोच रहा था, कहाँ गए गाँधी जी के तीन बन्दर?,वैसे तो समाचार पत्रों में आज कल गाँधी जी की सामग्री की नीलामी के बारे में बहुत कुछ निकल रहा है, परन्तु अब हम  लोग गाँधी जी की तीन बंदरों वाली सीख "बुरा मत कहो,बुरा मत देखो,बुरा मत सुनो" वाली सीख भुला चुके हैं, और शास्त्री जी को हिंदुस्तान,पाकिस्तान के युद्घ के समय का दिया हुआ नारा "जय किसान जय जवान" वाला साहसी नारा भी भूल चुके हैं, ऐसे समय में इन दोनों ने अपने साहस का परिचय अपनी,अपनी स्वरोक्ति द्वारा दिया है, वोह सच का सामना जो की दूरदर्शन पर आ रहा था,वोह तो था अपने विकृत स्वरुप में, जिसमे अपने लोगों के सामने लोगों को अपने अन्तरंग प्रश्नों की झड़ी का सामना करना होता था, जिसके कारण विदेशों में अनेकों परिवार टूटे, और हमारे देश में भी इसका हमारे समाज पर ऐसा असर पड़ा की,दो पतियों ने अपनी पत्नियों की उनके द्वारा अपने पूर्व प्रेमियों से  बारे में बताने पर उनकी हत्या कर दी,और जाते,जाते भी दूरदर्शन पररामायण धारावाहिक  सीता जी की भूमिका निभाने वाली रूपा गांगुली के सच के सामने आने के बाद,आगरा की एक महिला की आत्महत्या करवा गया,क्योंकि उसको लगा कि उसका जीवन भी रूपा गांगुली की तरह है, ऐसे सच के सामने का क्या लाभ? परन्तु उपरोक्त सच का सामना तो मेरी निगाह में तो गर्व का विषय है |
  मेरे विचार से इस प्रकार का इसी प्रकार का सच के सामने का दूरदर्शन पर प्रसारित होना चाहिए, जिससे कुछ सकारात्मक प्रव्हाव तो पड़े|
  विजयदशमी जो की बुराई पर सच्चाई की जीत है, यही तो है, इन लोगों ने अपने छुपे हुए रावण का संहार किया है, रावण तो प्रकांड पंडित वेदों का ज्ञाता, आज तक हुए शिव भक्तो में सबसे अग्रणी था, बस उसमे कुछ बुराईयां समाहित हो गयी थी, इस कारण भगवान राम को उसका संघार करना पड़ा, और बाद में लक्ष्मण जी को उससे शिक्षा लेने भेजा, तब उसने भी प्राण त्यागते,त्यागते तीन सच का सामना ही किया था, पहला "कभी अहंकार ना करो", दूसरा "शत्रु को कम ना समझो",तीसरा " कभी प्राइ नारी पर बुरी दृष्टि ना डालो",और उसको ज्ञात था की उसकी मृत्यु भगवान के द्वारा ही होगी,क्योंकि उसको ब्रह्मा जी का वरदान था, इतने प्रकांड पंडित ने प्राण त्यागते,त्यागते सच का सामना किया |
  सच जो जिसे पांडवों की माँ कुंती ने महाभारत के समय के अंतिम दिनों तक की कर्ण उसका बेटा है, की किसी का अहित ना हो,और बाद में अर्जुन को बतया की कर्ण उसका बड़ा बेटा है, परन्तु  धारावाहिक जो की समाप्त हो चुका है,उसने तो खुले आम अहित किया है, हाँ मेरे सच का सामना यह है,उस धारावहिक को देखने की मेरी भी उत्सुकता होती थी,परन्तु देर में प्रसारित होने के कारण में देख नहीं पाता था|
 आखिर में कहता हूँ दीपावली कुछ दिन में आने वाली हैं,अपने घरो का एक,एक दीप लेकर उन घरो को रोशन करें जो विचारे दीप भी नहीं जला सकते|