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बुधवार, अगस्त 18, 2010

अपराध मेरे बहुतेरे | (द्वतीय भाग)

 मैंने राजीव जी से पूछा था,अब इतना प्रयास करने के बाद माँ दुर्गा और माँ काली का दर्शन अब क्यों नहीं होता,जो कि मुझे सहज ही दुर्गा स्तुति का पहली बार में हो गया था, और राजीव जी ने बताया था,यह फल करोड़ो करने के कारण हो गया था, जब ऐसा हो जाता है,तो मानव अपने को करता समझ लेता है,इस बात को मन्युष का अचेतन जानता है |
कहा जाता है,जिसमें सब गुण वोह देवता,जिसमें सब अबगुण वोह  शैतान,और जिसमें सम्मलित गुण और अबगुण दोनों वोह इंसान,लेकिन एक बात और किसी भी वस्तु,घटना,क्रिया इत्यादि को देखने का नजरिया अलग,अलग होता है,जैसे पानी से भरे हुए आधे गिलास को आशावादी व्यक्ति कहता है,गिलास आधा भरा हुआ है,कोई निराशावादी कहता है कि,गिलास आधा खाली है, इसी प्रकार किसी स्त्री के शरीर पर किसी कामुक की दृष्टि पड़ती है,तो वोह स्त्री को काम भावना से देखता है,कोई दार्शनिक देखता है,तो वोह सोचता है,हाड़ मांस का बना हुआ शरीर है,और कोई साधू देखता है तो वोह सोचता है,की आत्मा ने पंचतत्व के शरीर में परवेश किया हुआ,यह शरीर तो आत्मा का वस्त्र है |
अब में बात करने जा रहा हूँ, जब बाल्यावस्था के अगले चरण किशोर अवस्था में पहुँचता है, तब किशोर अथवा किशोरी में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन का सूत्रपात हो जाता है, किशोरों का दाड़ी,मुछ निकलने का प्रारंभ तथा,वाणी में कठोरता आना,और किशोरियों के स्तन के विकास का प्रारंभ होना और वाणी का कोमल होना इत्यादि ,दोनों किशोर अथवा किशोरी इस अवस्था में एक दूसरे के प्रति आकर्षित होतें हैं, किशोरों में काम भावना जागृत होने लगती है, और एक शोध के अनुसार पुरषों में एस्ट्रोजन वाला हारमोन होने के कारण जो कि वासना की ओर प्रेरित करता है,वोह मस्तिष्क वाला भाग जो काम वासना को संचालित करता है,स्त्रियों के ओस्ट्रोजन काम वासना का प्रेरित करने वाले भाग से 2.5 गुना अधिक होता है,इसी कारण अगर पुरुष की दृष्टि निरंकुश हो तो सबसे पहले स्त्रियों के स्तनों पर पड़ती है |
यह सब लिखने का मेरा कारण यही था की में भी किशोर अवस्था में कभी था,और में भी किशोरियों के बारे में सोचता था,और उनके साथ रति क्रिया के सपने बुनता था, और दो बार अलग.अलग किशोरियों ने मुझे निमंत्रण भी दिया था,और हमें अवसर नहीं मिला,मतलब कि यह मेरे में अवगुण था,और भी होंगे.फिर भी अम्बे माँ और माँ काली के दर्शन प्राप्त हुए थे |
अबगुण तो बहुत थे,परन्तु मेरे व्यक्तित्व दो विशेष बातें भी थीं,एक तो अपने आप कभी भी कहीं पर ध्यान लग जाना,और दूसरी बात केवल दो भाई और कोई बहिन ना होने के कारण,बहिन का स्नेह पाने की तीव्र उठ्कंथ्ता,कभी कभी में अपने मामा जी के यहाँ चला जाता था,पर जाता कम ही था, मेरे मामा जी की लड़की को मेरा कम आना अच्छा नहीं लगता था,वोह चाहती थी में अधिक जाऊं और कुछ दिनों के बाद कोई भी समय हो दिन या रात कैसा ही मौसम हो बरसात हो या शीत लहर या अत्यधिक गर्मीं में मामा जी के यहाँ पहुँच जाता था,बाद में हमारे जानकार जिनको ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था और उसके साथ भगवद कृपा भी थी,उन्होंने बताया था,यह मेरे व्यवहार बदलने का कारण मेरे मामा जी की लड़की द्वारा कोई जड़ी चाय में मिला कर पिलाने के कारण था |
समय बीतता गया और में नौकरी करने लगा था,में मामा जी की लड़की को सगी बहिन की दृष्टि से देखता था,लेकिन मामा जी की आर्थिक स्थति अच्छी नहीं थी,और मेरी बहिन को  मुझ से पैसे की आपेक्षा थी जो कि में पूरी नहीं करता था,इसलिए उसने मुझ से दूर,दूर रहना प्रारंभ कर दिया था |
या देवी क्षमा रूपेण संस्थिता नम्स्त्सय,नम्स्त्सय नमो: नम:

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