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मंगलवार, जून 28, 2011

जीवन की व्यस्तताओं ने नेट से सम्बन्ध विच्छेद सा ही कर दिया |

 जीवन की व्यस्तताएं आज कल कुछ इस प्रकार से बड़ गयीं हैं,नेट से से सम्बन्ध विच्छेद सा हो गया, पहेले तो समय अधिक होता था, और लिखने पड़ने मैं रूचि होने के कारण कुछ ना कुछ इस कम्प्यूटर के श्वेत पटल पर अक्सर इसी प्रकार की,आड़ी तिरछी सी रेखाएं उकेरे कर अपनी भावनाओं को पर्दर्शित करने का असफल प्रयत्न करता था, बहुत प्रकार से अपनी भावनाओं को पर्दर्शित किया,कभी चित्रकारी के माध्यम से और कभी,काव्य और गद्य के रूप मैं |
इन पक्न्तियों को लिखते,लिखते एक फ़िल्म का गीत मानस पटल पर उभर रहा है, मैं पल दो पल का शायर हूँ,पल,दो पल मेरी जिंदगी है,पल दो पल मेरी रवानी है |

कल आयेंगे मुझ से बेहतर कहने वाले और तुमसे बेहतर सुनने वाले, यह गीत सन 75 के दशक का है, जिसको आज कल रेट्रो,रेट्रो कह कर पुकारा जाता है, और उसकी पुनाविरती करने का प्रयत्न किया जाता है, और क्या विचित्र बात है, रेट्रो के ज़माने के इन्सान के लेखक के लेखों को उपेक्षित ही समझा जाता है,जैसा कि मुझे अपने लेखों पर प्राप्त दो या अधिक से अधिक तीन टिप्पणियों से विदित होता है |

भाई आज कल मैंने मेक्स न्यू योर्क लाईफ इंशोरेंस का काम पकड़ लिया है, और कहतें हैं ना, बहुत सारे सुख के समय के मित्रों से एक अच्छा मित्र वोही है, जो आवश्यकता के समय काम आतें हैं, तो इस काम ने परिचय करा ही दिया कौन,कौन  मेरे सच्चे मित्र है,और यह परख तो निरंतर जारी है, मैं इंशोरेंस के लिए किसी पर दवाब नहीं डालता फिर भी लोग और परिचय देने मैं हिचकतें हैं, वोह मित्र जो कहते थे,हम आपके मित्र हैं,लेकिन वोह आवश्यकता के समय पर बहुत ही सफाई से झूठ बोलते हैं,जबकि जीवन बीमा का उद्दश्य किसी के पैसे को खर्च कराना नहीं,बल्कि उसकी बचत कराना और मानव को उसके परिवार की  सुरक्षा,बच्चों की पदाई,और सेवानिवर्ती की योजना बनाने मैं सहायता देना है |
आज गुरु जी की एक बात याद आ रही,लोग तुमको तुम्हारे सोचने से पहले भूल जायेंगे |

यह है विकसित व्यक्तिव वाले लोगों का व्यवहार,इससे तो बच्चे लाख गुना बेहतर हैं, आज लड़े कल भूल गएँ, सब मैं एक काम करने के लिए मिली,जुली भावना और एक दुसरे के सहयोग करने की भावना |

इस अत्मव्भिव्यक्ति को जगजीत सिंह की इस गजल को समाप्त करता हूँ |

"यह दौलत भी ले लो 
यह शोहरत भी ले लो 
चाहे ले लो मेरी जवानी 
लौटा दो मेरा वोह बचपन 
वोह कागज की कश्ती
वोह बारिश का पानी "

क्या लेना मुझे प्रंशसा से,जब अधिकतर सहयोग नहीं |



रविवार, फ़रवरी 27, 2011

कलम की निर्झरता बनी रहे,तो लेखन के विषय मैं विचार आतें हैं |

कलम की निर्झरता बनी रहे,तो लेखन के विषय मैं विचार आतें हैं |

बहुत दिनों कुछ तो व्यस्तता के कारण और,अन्य और भी अनेकों कारणों से कुछ नहीं लिख पाया, एक तो हमारे सर्विस प्रोविडर मैं,अनेकों प्रकार की
बाधायें आती रहीं,और बिजली रानी का तो क्या कहना,बिना कोई नोटिस दिए इसका आना जाना लगा रहता था, जबसे मुख्य मंत्री मायावती जी का हमारे क्षेत्र मैं दौरा होने वाला था, तबसे प्रशासन मायावती जी के आने के डर से जिले की व्यवस्था सुधारने मैं लग गया,भाई   तुलसीदास जी ने अपने काव्य ग्रन्थ मैं सही ही लिखा है,"भये बिना ना होती प्रीति", सागर ने जब रामचन्द्र जी के मांगने पर उनको लंका जाने का मार्ग नहीं दिया,तो लक्ष्मण जी के कहने पर,रामचंद्र जी ने सागर सुखाने के लिए अपना बाण साधा ,तब सागर ने अपनी मर्यादा की दुहाई देकर,दूसरा उपाय नल,नील द्वारा सागर पर सेतु बनाने को सुझाव दिया, अब इन प्रशासन के अधिकारीयों को जनता की सुबिधा से क्या लेना,देना,जनता तो इनको डरा नहीं सकती,इसीलिए तो व्यवस्था चरमरायी सी रहती है, और सुश्री मायावती जी के आने से बिजली व्यवस्था तो बिलकुल सुधर गयी है, पहले बिजली वालों से पूछो  क्या हुआ तो उत्तर मिलता था,यहाँ  तार टूट गया,वहाँ तार टूट गया,और मायावती जी के आने के बाद तो जर्जर तार तो बदले ही गए,और पुराने बिजली के खम्बे भी बदले गए मायावती जी के आने से पहले,और जब वोह आयीं तो बही कुछ कमियां देख कर उन्होंने अपने तेवर दिखा ही दिए, लिखने का मन तो था,पर मस्तिष्क अनिश्चता की स्थिति मैं था,और मन मैं यह भी था,कितने लोग पड़ेगें, हो सकता है,अवस्था कुछ अधिक हो जाने के कारण यह भी लगता है,पता नहींमैं जो भी लिखता हूँ, वोह आज के समय के अनुसार है, कि नहीं,पाठको मैं संभवत: मेरे लेखन मैं रूचि बहुत कम है,जिसका आभास मुझे,गिनी,चुनी टिप्पणियों से होता है, लेकिन मझे गुरु जी परमहंस योगानंद जी ने मुझे "स्वयं आभास करा दिया है", "अज्ञान से ज्ञान की  और ले जाने ","अशांति से शांति की ओर ले जाने को","इच्छाओं से संतुष्टि की ओर ले जाने को",तो मुझे कम टिप्पणियों के मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता,बस यह अवश्य सोचता हूँ,पाठकों मेरे विषयों को आत्मसात करते हैं,की नहीं, ना तो मेरे पास सामायिक विषय हैं,ना राजनितिक, इनके लेखन मैं मुझे रूचि नहीं है,इस ब्लॉग मैं तो अधिकतर ऐसे हीं विषय हैं,जो सार्थक  नहीं मेरे दुसरे ब्लॉग स्नेह्परिवार मैं,मेरे अनुसार सार्थक विषयें हैं,परन्तु उसका भी यही हाल है |
बहुत सारे लेख पड़ने का  समय मेरे  पास नहीं हैं, हाँ ब्लोग्वानी मैं लिखे लेख पड़  लेता था, मैं यह नहीं करता की  मेरा अमुक,लेख पड़ कर टिप्पणी दें,जैसा मेरे साथ होता है,और अंत मैं अपने मित्र राजीव कुलश्रेष्ठ जी को धन्यवाद देता हूँ,जिनोहने मेरे दोनों ब्लॉग सजा दियें हैं,अब समय मिलेगा तो उनके अग्रीगाटर "wordblog" मैं लिखीं हुईं पोस्ट पडूंगा |
राजीव जी मैं भटक गया था,जो मेरे पास "योगदा सत्संग सोसाइटी",के गुरु जी की शिक्षा के होते हुए कुछ कहा था, हाँ आपकी  धरोहर   से बहुत सहारा मिला है |


धन्यवाद राजीव जी