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सोमवार, जनवरी 18, 2010

परिवर्तन (भाग 4)

समय बीतता गया,और समय के साथ नरेश की पत्नी सुषमा ने एक बच्ची को जन्म दिया, और बच्ची के जन्म के कुछ समय के पश्चात सुषमा ने, उस शहर के एक स्कूल में साक्षात्कार दिया, और स्कूल नरेश के घर के पास था,इसी कारण स्कूल का चपरासी कुछ नर्सरी स्कूल की किताबें लेकर  और इस समाचार के साथ,कि सुषमा का स्कूल की नर्सरी कक्षाकी अध्यापिका  के लिए चयन हो गया है आया , जब यह समाचार सुषमा की सास अर्थार्त नरेश की माँ ने सुना तो वोह बोली,"में बच्ची को अपने साथ नहीं रखूंगी,सुषमा जाने उसका काम जाने", और सुषमा की सास का यह वाक्य सुन कर सुषमा के हिर्दय पर तो जैसे तुषारापात सा हो गया, और भारी मन से सुषमा ने उस स्कूल के चपरासी को लौटा दिया, समय ने तो चलना ही था, और वोह चलता गया,इस अन्तराल में सुषमा की बच्ची तीन साल की हो चुकी थी, सुषमा और नरेश ने उस बच्ची जिसका नाम उन लोगों ने संध्या रखा था,उसी स्कूल में दाखिल करवा दिया,जहाँ पर सुषमा का चयन हो गया था, और कुछ अन्तराल के बाद सुषमा ने उसी स्कूल में अर्जी दी,और उसका दुबारा भी वहाँ नर्सरी की अध्यापिका के लिए  चयन हो गया था, सुषमा की दिनचर्या यह थी,वोह रात को बारह बजे तो सोती थी,और प्रात: चार बजे उठती,अपने ससुर,नरेश,सास के लिए पूरा नाश्ता और खाना बना के स्कूल जाती,और दोपहर में स्कूल से आने के बाद घर का सारा काम संभालती,इसी कारण उसको रात के बारह बज जाते थे, अब संध्या पॉँच साल की हो चुकी थी,और सुषमा ने एक बालक को जन्म दिया, परन्तु विधि को कुछ और ही मंजूर था, और वोह बालक एक माह का होकर बहुत बीमार हो गया था, नरेश ने जो कुछ भी कमाया था, वोह सारी अपनी पूँजी उस बच्चे के इलाज में लगा दी,उसको कहीं से पैसे की ओर से सहायता नहीं थी ,और विडम्बना यह की सुषमा और नरेश के बालक ने दो माह का होकर दम तोड़ दिया, नरेश को तो आजीविका तो कमाने ही थी,वोह बेचारा माँ और पत्नी के बीच में इस प्रकार फंसा हुआ  जीविका अर्जन में लगा हुआ था,और नरेश के ससुर को भी उसकी भावना का कोई ख्याल नहीं था, नरेश तो इस दुविधा में फंसा हुआ था,और इसी बीच नरेश के भाई सुरेश का भी विवाह हो चुका था और सुरेश दूसरे शहर में नौकरी करता था , चूँकि नरेश और सुरेश की माँ,सुरेश को अधिक महत्व देती थी,इस कारण सुरेश और उसकी पत्नीविभा  का महत्व,नरेश और सुषमा से अधिक था, इस कारण  नरेश अपने को और अधिक उपेक्षित समझने लगा था |
  वैसे तो नरेश प्रखर बुद्धि का मालिक था, परन्तु अपनी कम्पनी के जर्नल मेनेजर के जोर से बोलने के कारण घबरा जाता था, हाँ कभी,कभी अपने बोस और अपने बोस के समकक्ष लोगों के सामने उसकी घबराहट समाप्त हो जाती थी, और इसी कारण एक दो बार नरेश ने अपने विभाग की महीने की रिपोर्ट बिना घबराहट के बहुत अच्छी प्रकार से अपने बोस,और अपने बोस के समकक्ष लोगों के सामने मीटिंग में पेश की,और उसकी उस समय की वाक प्रतिभा,और उसके द्वारा पेश किये बहुत से पॉइंट से मीटिंग में उपस्थित लोग प्राभित हो गये थे,लिहाजा अगले माह की मीटिंग में उस कम्पनी के जर्नल मेनेजर को बुलया गया,और गत  माह की मीटिंग में प्रभावित करने के कारण,इस बार फिर नरेश को इस मीटिंग में उसके अपने विभाग की रिपोर्ट पेश करने के लिए बुलाया गया,परन्तु अब जर्नल मेनेजर के सामने घबराहट के कारण बोल निकल ही नहीं पा रहें थे,और नरेश कुछ बोलने का प्रयत्न करता भी तो वोह कुछ का कुछ बोलता, कम्पनी में काम करने वालों की मनोवेगाय्निक कमीं कौन देखता है? सुरेश अपने विवाह के समय तो कुछ समय तो अपनी विवाह के कारण ली हुई छुट्टियों के कारण,उसी घर में रहा जहाँ पर नरेश,सुषमा और उनके दोनों बच्चे और सुरेश और नरेश के माँ बाप रह रहे थे, फिर सुरेश अपनी पत्नी विभा को लेकर उस शहर में चला गया,जहाँ पर वोह नौकरी कर रहा था,परन्तु सुरेश का अपने भाई नरेश और अपने माँ बाप के पास आना तो लगा रहता था, विभा कुछ तेज स्वाभाव की थी, जहाँ पर इस शहर में नरेश तथा सुरेश के पिता जी नौकरी कर रहे थे, उससे पहले वाले शहर में जहाँ,नरेश और सुरेश के माँ,बाप थे वहाँ पर नरेश तथा सुरेश के पिता जी ने एक घर खरीद लिया था, और एक दिन नरेश ने परेशान हो कर कहा,"में उस शहर में उसी खरीदे हुए घर में जा कर रहूँगा, और उसी शहर से इस शहर में नौकरी करने के लिए आता,जाता रहूँगा", और यह बात विभा ने सुन ली,तो वोह बोली,"उस घर में में जा कर दिखतीं  हूँ"
क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

आज मैने चारो कडियों को पढा .. घर घर की कहानी है ये .. आपकी कहानी बहुत सुंदर चल रही है .. अगली कडी का इंतजार रहेगा !!

vinay ने कहा…

ध्न्यवाद संगीता जी ।