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रविवार, जनवरी 17, 2010

परिवर्तन (भाग 3)

अब नरेश इंजिनियर बन चुका था, लेकिन उसके व्यक्तित्व में प्रालंबन,अपने को औरो से हीन समझना और घबराहट भी समां चुके थे, इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के समय में,कम्पोनियों के वरिष्ठ अधिकारी अपनी कम्पोनियों में  नए बने हुए इंजिनियर को नौकरी देने के लिए चयन करने के परक्रिया आरम्भ कर देते हैं, वोही परक्रिया नरेश के कोलेज में भी प्रारंभ हो गयी थी, और चयन के लिए कोलेज के प्राध्यापक लडको का नाम उन से पूछ कर उन कम्पोनियों के अधिकारीयों को देते हैं, क्योंकि नरेश में घबराहट थी,इसलिए वोह अपना नाम, किसी भी कम्पनी के लिए प्राध्यपक को नहीं दे पाया, लेकिन एक दिन उस कम्पनी के अधिकारी जो नरेश के शहर से आये थे, वोह अपने शहर की कम्पनी में काम करने का इछुक था, उस कम्पनी की चयन प्रक्रिया के लिए  अपनी घबराहट के कारण,अपने किसी प्राध्यापक को अपना  नाम नहीं दे पाया था, परन्तु और लडको का साक्षात्कार देखता रहा, और जब सब लड़कों का साक्षात्कार हो गया,तो वोह साहस कर के उन अधिकारीयों के पास साक्षात्कार के लिए पहुंचा,और उन अधिकारीयों ने नरेश का चयन कर लिया था, कम्पनी के अधिकारी चुने हुए लड़कों का नाम,कोलेज के प्राध्यपकों को दे देते थे ,और प्राध्यापक चुने हुए लडको को उनके चयन के बारे में सूचित कर देते थे,परन्तु नरेश के बारे में तो उन प्राध्यापको को कुछ पता ही नहीं था, इसलिए वोह नरेश को कुछ भी सूचित नहीं कर पायें, हो सकता हो कोई प्रक्रिया हो जिसके कारण कमपनी के अधिकारी चयनित लड़कों का नाम, कम्पनी के अधिकारी कोलेज के प्राध्यापकों को बता देते हों,शायद उस प्रक्रिया में कुछ चूंक रह गयी हो,जिसके कारण कोलेज के प्राध्यापक नरेश को उसके चयन के बारे में ना सूचित कर पायें हों |
  खैर नरेश अपने शहर में लौट चुका था,और उसका एक सिनीयर इसी शहर में रहता था,और उसी कम्पनी में कार्यरत था,जिस कम्पनी में नरेश का चयन हो गया था, कुछ समय ने ऐसी करवट ली कि नरेश उसी सीनियर जिसका नाम अश्वनी था,उसके पास बैठा हुआ था, और बातों,बातों में अश्वनी ने नरेश से कहा,"कल तो तेरा कम्पनी के चीफ एक्सीकुटिव के साथ साक्षात्कार  है", इसी कारण नरेश को जानकारी प्राप्त हुई कि उसका अब चयन परक्रिया का आखरी साक्षात्कार है, कल तो आ ही गया था,और देखते,देखते उसका चीफ एक्ससीकुटिव  के साथ साक्षात्कार का नंबर आ गया था, और बेचारा नरेश साक्षात्कार के लिए पहुंचा, और सामने चीफ एक्सीकुटिव और दूसरे वरिष्ठ अधिकारीयों को देख कर, घबराहट के कारण उसके माथे,और हांथों में पसीना आ रहा था,और साक्षात्कार के समय नरेश घबराहट के कारण,उन लोगों को उनके उन प्रश्नों का उत्तर भी ठीक से नहीं दे पाया जिनका वोह उत्तर बहुत ही सरलता से दे सकता था,और नरेश का उस कम्पनी में चयन नहीं हो पाया था, अब नरेश के पिता जी ने,अपना सरकार के वरिष्ठ अधिकारी होने के कारण,उस कम्पनी पर दवाब डाला और उस कम्पनी ने दवाब में आकर नरेश को अपने यहाँ रख तो लिया, परन्तु उस विभाग में जिसका महत्व सबसे कम था, रमेश युवक तो हो ही चुका था,और इस आयु में युवकों में मेह्तावाकान्षा तो होती हैं,वोह तो इस कम्पनी के सबसे महतवपूर्ण विभाग में जाना चाहता था, परन्तु हमारे देश में विडंबना तो यही है,कर्मचारियों का कोई मनोवेग्यानिक विश्लेषण तो होता ही नहीं,अगर होता तो युवकों की मनोवेग्यानिक कमियों को दूर करके कम्पनी उनको तराश के लिए,अपने लिए हीरे बना सकतें हैं, नरेश प्रखर बुद्धि का मालिक तो था,बस मनोवेग्यानिक कमियों के कारण उसकी प्रतिभा उभर कर सामने नहीं आ पा रही थी |
  अ़ब चूँकि नरेश की नौकरी लग चुकी थी, और जैसा होता है, कि हमारे देश में बच्चे की नौकरी लगी नहीं,और उसके माँ बाप उसका विवाह करा देना चाहते हैं, यही नरेश के साथ भी हो रहा था, और नरेश में तो पर्तिरोध करने की शमता भी नहीं थी, हाँ माँ,बाप के व्यवहार के कारण वोह बहार सहानभूति ढूँढता था, सो उसने सोचा कि शादी कर लेतें हैं शायद कुछ सुकून मिल जाएँ और परिणय सूत्र में बंध गया था, लेकिन यहाँ तो उसकी परेशानी और बड़ गयी थी, नरेश की माँ ने तो नरेश की पत्नी सुषमा  के साथ दुर्व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया था,अगर नरेश इस बात का विरोध करता तो उसकी माँ उसको,"जोरू के गुलाम की उपाधि से नवाजती", और चूंकि पत्नी अभी नयी,नवेली थी, तो नरेश अपनी नयी,नवेली पत्नी पर अत्यचार नहीं सेहन कर पाया था, और उसके ससुर जिनको नरेश की भावनाओं से कोई मतलब नहीं था, बस अपनी बेटी को दुखी देख कर किसी और कम्पनी में भेजने का यतन किया,और नरेश का उस कम्पनी में चयन भी हो गया था, परन्तु उस कम्पनी में उसके साथ दुर्व्यवहार होता था,तो नरेश ने दुखी हो कर उस कम्पनी को छोड़ने को सोचा,इसी बीच में नरेश के पिता जी अवकाश प्राप्त हो चुके थे,और एक कम्पनी में कार्यरत थे, और नरेश का दुर्भाग्य की नरेश भी उसी कम्पनी में आ गया था,जहाँ पर उसके पिता जी कार्यरत थे,और फिर नरेश और उसकी पत्नी सुषमा को नरेश के माँ,बाप के साथ रहने को परिस्थितयों ने विवश कर दिया था, और यहाँ पर फिर वोही परिस्थति उसके साथ,उसके सहकर्मी उसको निशाना बना कर उसका उपहास करते थे, इन परिस्थतियों से विवश हो कर वोह दूसरे स्थान पर नौकरी करने के अवसर खोज रहा था |
क्रमश :

1 टिप्पणी:

श्रद्धा जैन ने कहा…

विडम्बना है कैसे जिए इंसान क्या करे
पत्नी का साथ की माँ का
आपकी लेखनी में दिल को छूने की क्षमता है