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बुधवार, जनवरी 27, 2010

क्यों हो रहा है, क्रिकेट का व्य्वासिकरण मतलब (आई.पी.एल )

आज के युग में देखा जाये,हर वस्तु का व्य्वासिकरण हो रहा है, जैसे कला का व्यवसायीकरण कला भी व्यवसायीकरण की शिकार हो रही है, जिस वस्तु का कोई मापदंड नहीं होना चाहिए, उसको दूरदर्शन पर दिखाया जाता है,और और उसको पॉइंट्स दिए जाते हैं, मेरा मतलब कला से है,और अगर खेल जगत में आयें तो बहुत से हमारे देश में होने वाले खेल हैं, जो की क्रिकेट के खेल के आगे गोण हैं, और बहुत से खेल तो दुर्दशा की कगार पर हैं, जैसे हमारा राष्ट्रीय खेल होकी,जिसका पूर्व में विश्व में डंका बजा करता था, वोह तो इस कगार पर पहुँच चुका है, होकी इंडिया को होकी के खिलाडियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं,जैसे तैसे पुरुष होकी खिलाडियों की दशा में सूधार हुआ, परन्तु अ़ब होकी इंडिया को उन होकी की महिला खिलाडियों के लिए पैसे नहीं हैं,जिन्होंने हाल में ही बहुत से कीर्तिमान स्थापित किये हैं, और इन महिला खिलाडियों ने अपना बैंक अकाउंट खोल कर जनता से पैसों की अपील करके,होकी इंडिया को एक एक गहरा आघात दिया है,और जनता ने भी इन महिला खिलाडियों का बखूबी बहुत साथ दिया है |
  यह तो रही होकी की दुर्दशा, और भी बहुत से खेल हैं, जिनमें खिलाडी परसिद्ध हो जाते हैं,लोग उन खिलाडियों की पहचान तो बना लेते हैं, पर खेलो की नहीं, टेनिस की खिलाडी सानिया मिर्जा को लोग पहचानते हैं,परन्तु टेनिस का उतना महत्व नहीं, इसी प्रकार बेडमिन्टन की खिलाडी साईंना नेहवाल जैसी शीर्ष खिलाडी को तो पहचानते हैं, परन्तु बेडमिन्टन का कितना महत्व है,सर्वविदित है, इसी प्रकार मुक्केबाजी के खिलाडी विजेंदर या शूटिंग के खिलाडी अभिनव बिंद्रा को लोग पहचानते हैं,पर यह खेल कितने लोकप्रिय सब जानते हैं |
  और हमारे देश में क्रिकेट की तो जैसे पूजा सी होती है, सबसे अधिक लोकप्रिय खेल है तो यही क्रिकेट है, लोग अपने देश क्या विदेशों के क्रिकेट के खिलाडियों तक को पहचानते हैं, और इस खेल के आगे होकी,फूटबाल,वोल्लीवोल इत्यादि सब खेल तो जैसे बोने हो जातें हैं, और जब यह खेल क्रिकेट खेला जाता है,तो सारे के सारे कार्यकलाप स्थगित से हो जाते हैं, लोग दूरदर्शन से चिपट कर बैठ जातें हैं,और जब दूरदर्शन नहीं था, तब लोग सारे के सारे काम काज छोड़ कर रेडियो,ट्रांसिस्टर से कान लगा कर बैठ जाते थे, इसकी दीवानगी इस हद तक थी,कि ओफ्फिसों में एक सन्नाटा सा पसर जाता था, प्रारंभ में तो पॉँच दिनों का क्रिकेट होता था, उस समय जो भी अपने देश और विदेश की क्रिकेट की टीमें आपस में भिड़ती थी तो एक रोमांच सा पैदा होता था, फिर आया एक दिन का क्रिकेट वोह भी रोमनचित करने वाला होता था, फिर आया रात दिन खेलने वाला क्रिकेट वोह भी रोमांचक अनुभूति करता था, फिर जमाना आया 50,50 ओवर का क्रिकेट तब तक भी गनीमत थी, इन सब प्रकार के क्रिकेट में तो खिलाडियों की क्षमता का आकलन होता था, और इसके बाद आया 20,20 ओवर का क्रिकेट,अब यह क्रिकेट कहाँ रह गया था,बस एक प्रकार का जुआ ही तो है, जिस टीम का तुक्का अधिक रन बनाने का लग गया वोह टीम जीत गयी,खिलाडियों की क्षमता का प्रश्न तो उठता ही नहीं,उनका आकलन इस प्रकार के क्रिकेट में किस प्रकार हो ?
  और एक और क्रिकेट का प्रचलन हो गया है, आई.पी.एल, खिलाडियों की नीलामी लगी और इन खिलाडियों को अलग,अलग मालिकों ने खरीद लिया, अब यह खेल खिलाडियों के बीच में कहाँ रह गया, यह खेल तो मालिको के लिए हो गया है, और टीमयें भी कैसी,एक देश के एक टीम के  कुछ खिलाडी एक मालिक के पास और उसी देश के कुछ खिलाडी दूसरे मालिक के पास,और खेल भी कैसा इन दोनों मालिकों के खिलाडियों के बीच में मैच, अब कहाँ रहा उस प्रकार का रोमांच जब एक देश के खिलाडी और दूसरे देश के खिलाडियों के बीच में मैच होता था, जब कोई चीज कभी,कभी देखने को मिलती है,तो अच्छी लगती है, परन्तु जो चीज रोज,रोज होने लगे तो उसमें स्वाभाविक है, रुचि कम होने लगती है,और इस प्रकार के आई.पी.एल के मैच नित,प्रतिदिन होने लगे हैं,तो कहाँ रहेगी वोह रुचि ? और यह भी जाहिर सी बात है ,अगर दिन प्रतिदिन खेल खेला जायेगा तो खिलाडियों को चोटे लगना तो निश्चित ही है, शरीर को अभी आराम भी नहीं मिला,और अपने मालिकों के लिए खेलने को फिर तय्यार तो इस प्रकार के मैच की क्या दशा होगी,सहज अनुमान लगाया जा सकता है, इन्सान को पैसे का लालच तो स्वाभाविक है ही,यह खिलाडी पैसे के लालच में आकर अपने मालिकों के लिए नीलाम हो कर यह खेल क्रिकेट खेलते है,तो इसमें स्वाभाविक आकर्षण कहाँ  से आएगा?
  यह तो सब रहा पुरष क्रिकेट का हाल, लेकिन महिला क्रिकेट को कौन जानता हैं ? कौन जनता भारत की महिला  क्रिकेट की कप्तान झूलन गोस्वामी है,या कौन जनता है अंजुम चोपरा को, वस पुरष क्रिकेट के आगे यह महिला क्रिकेट और अन्य खेल गौण और इसमें भी आई.पी.एल क्रिकेट आज चरम पर है, और इस आई.पी.एल के कारण हमारे पडोसी देश पाकिस्तान के खिलाडियों को आई.पी.एल में ना लेना एक विवाद बन गया है,आगे चल कर पता नहीं क्या,क्या होगा,हो सकता है,इन आई.पी.एल क्रिकेट टीम के स्वामियों में झगड़े,विवाद इत्यादि हों  |
  क्रिकेट बोर्ड के पास तो बेशुमार दौलत है, सरकार ऐसा नियम क्यों नहीं बनाती की सब प्रकार के खेलों के सामान रूप से धन मिले,तो और खेलों को भी प्रोत्साहन मिलेगा,और हमारे राष्ट्रीय खेल होकी की ऐसी दुर्दशा नहीं होगी |
   आई.पी.एल का क्या औचित्य है ?

3 टिप्‍पणियां:

safat alam taimi ने कहा…

gr8 post

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

विनय जी, व्यवसायीकरण के इस अंधे युग में क्रिकेट भी कहाँ अछूता रह सकता था.....

रचना दीक्षित ने कहा…

सर ये तो लोगों की भावनाओं के साथ पैसे का खेल है