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शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

परिवर्तन

यह एक कहानी लिख रहा हूँ, जिसमें समाज पुरषों को घर के खर्चो के लिए कमाने वाला और स्त्री को घर चलाने वाला समझता है, सदियों से शास्वत नियम चला आ रहा है, हाँ आजकल अपवाद स्वरुप स्त्री कमाने लगी है,या स्त्री,पुरष दोनों कमाने लगें हैं, परन्तु अगर किसी कारणवश मर्द जीविका चलाने के उप्पयुक्त नहीं रह जाता,शारीरिक विकलांगता या किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होने के कारण तो अपवाद हैं, परन्तु यदि पुरष हष्ट,पुष्ट है,और जीविका नहीं ला पाता तो उसको समाज और उसका परिवार हेय दृष्टि से देखता है, किंचित इसी सामाजिक परिवेश का यह परिणाम है,अगर मर्द जीविका लाता है,उसका सम्मान रहता है, और कोई परिवार में उंच,नीच हो भी जाये,जिसमे मर्द को दोषी बनाया जाये,तो वोह कोई शिकायत नहीं करता परन्तु अगर स्त्री कमाने वाली हो जाती है,और मर्द अकर्मण्य तो मर्द का अपमान तो प्रारंभ तो हो ही जाता है,और हर प्रकार की हानि पर उस पर दोशार्पण प्रारंभ हो जाता है |
इस कहानी को आरंभ करने से पहले, इस प्रकार के पुरष के बचपन से होकर युवावस्था, विवाहित अवस्था, प्रोड़ अवस्था का विवरण देना किंचित उचित होगा, क्योंकि वोह योग्य तो था,परन्तु उसका जीवन इस प्रकार से व्यतीत हुआ था, बहुत सारी मानसिक यातनाओं के कारण, उसमें मनोवेग्यानिक कमियां हो गयीं थी,जिसके कारण वोह जीविका अधेरावस्था के बाद नहीं कमा पाया और हो गया उसके अपमान का सिलसिला प्रारम्भ हो गया  |
  बचपन से प्रारंभ कर रहा हूँ,एक परिवार में दो भाई थे,नरेश और सुरेश, नरेश सुरेश से दो वर्ष बड़ा था, उनके पिता का नरेश और सुरेश के साथ,सामान व्यवहार था, एक ही परिवेश में रहते हुए दोनों भाइयों का स्वाभाव भिन्न था, हर किसी पर एक ही व्यवहार का भिन्न,भिन्न प्रभाव पड़ता है, नरेश बहुत ही संवेदनशील था,और सुरेश इसके विपरीत, पिता का व्यवहार दोनों भाइयों को हतौत्साहित करने वाला, उनके मित्रों के सामने उनका अपमान करने वाला था, और माँ का स्वाभाव  दोनों भाइयों में भेद भाव करने वाला था, माँ तो  सुरेश को नरेश से अधिक महत्व देती थी, वैसे तो कहा जाता है,माँ के लिए तो यह दो ऑंखें होतीं हैं,जिनमे कोई भेद भाव नहीं होता,परन्तु उनकी माँ नरेश से अधिक सुरेश को  महत्व देती थी, नरेश संवेदन शील तो था ही,पिता के इस प्रकार के व्यवहार के कारण नरेश अपने को अपने मित्रों से हेय समझने लगा, और पिता  के व्यवहार के कारण  सुरेश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था सुरेश तो तो जैसे चिकना घड़ा था,और माँ तो सुरेश को नरेश से  अधिक महत्व देती थी,और इसलिए नरेश में हीन भावना भी पनपने लगी |
 समय बीतता गया,और दोनों भाई किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकें थें, नरेश में कुछ शारीरक कमियां भी थी, और एक बार उसके  दसवीं कक्षा के अंग्रेजी के अध्यापक अचानक समूची क्लास के सामने उसकी शारीरक कमियों के बारें में पूछ लिया, तो और विद्यार्थिओं को क्या चाहिए था बस उपहास करने का बहाना मात्र ,वोह उसकी उस  शारीरिक कमियों को लेकर उपहास करतें थे, और बेचारा नरेश खून के घूँट पी कर रह जाता था,बेचारा कर भी क्या सकता था?
 एक बार नरेश परीक्षा में,फेल हो गया तो उसकी माँ ने उसको बिना कारण जाने,उसका अपमान प्रारंभ कर दिया, जबकि नरेश ने बहुत परिश्रम किया था,परन्तु उसके भाग्य ने साथ नहीं दिया, और बेचारा नरेश अवसाद में रहने लगा,और उसके अवसाद को बिना समझें उसके पिता ने उसकी पिटाई कर दी |
क्रमश:

6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

भाई जी, बुरा न मानें तो जरा ध्यान से एक बार फिर से पढ़कर सुधार करिये:

एक बार आप कह रहे हैं कि:

उनके पिता का नरेश और सुरेश के साथ,सामान व्यवहार था


फिर आप कहते हैं कि:

माँ का स्वाभाव भी दोनों भाइयों में भेद भाव करने वाला था,

यहाँ ’भी’ का अर्थ हुआ पिता का भी..जबकि आपका कहना है उनके पिता का नरेश और सुरेश के साथ,सामान व्यवहार था...


आगे आपने कहा कि, उनकी माँ नरेश से अधिक महत्व देती थी.....

फिर आप कहते हैं:

माँ के व्यवहार के कारण उपेक्षित,सुरेश तो जैसे चिकना घड़ा था.उस पर पिता के व्यवहार को कोई असर नहीं पड़ता था,और माँ तो उसको अधिक महत्व देती थी |

जबकि आप कह रहे है ’माँ के व्यवहार के कारण उपेक्षित”


---कृप्या एक बार ध्यान से देखें कथा आगे बढ़ाने के पहले यह सब विसंगतियाँ दूर कर लिजिये.


मित्रवत सलाह मात्र है. न पसंद आये, तो आप इस टिप्पणी को डिलिट करने के लिए स्वतंत्र हैं, मुझे बुरा नहीं लगेगा.


शुभकामनाएँ..

राजेश स्वार्थी ने कहा…

यह देख सुखद आश्चर्य हुआ कि समीर लाल जी ’उड़न तश्तरी’ इतना ध्यान से आलेख पढ़ते हैं। हम तो सोचते थे कि वो बिना ज्यादा देखे उत्साह बढ़ाने के लिये कमेंट करते हैं।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

समीरजी का कहना सही है. कहानी की विसंगतियां इसके प्रवाह को बाधित करती हैं.

रामराम.

vinay ने कहा…

धन्यवाद उड़न तशतरी जी मेरी कहानी परिवर्तन की विसंगतियों की ओर ध्यानाआकर्शन के लिये,बुरा मानने की तो कोई बात ही नहीं है,और अच्छा लगा कि आपने एक सच्चे आलोचक के समान मेरी कहानी पड़ी,और इस कहानी की विसंगतियों की ओर मेरा ध्यान आक्रष्ट किया ।

vinay ने कहा…

ताऊ रामपुरिया जी मेने अपनी कहानी की विसंगतियां दूर कर लीं हैं,अगर अब भी मेरी किसी विसंगति पर आपकी द्रष्टि जाये तो मेरा उस ओर ध्यान आक्रष्ट करियेगा,मेरा मानना है,बहुत से पाठक इन विसंगतीयों के कारण कहानी में रूची नहीं लेते,और एक बात में कहना चाहुँगा,सदा में अपने लेखों को एडिट करने के बाद प्रकाशित करता हूँ,परन्तु इस बार पहली बार एडिट नहीं किया,और मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया,इतना भी अधिक अपने पर आत्मविशवास होना बाछिंत नहीं ।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत आभार आपका विनय जी.