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रविवार, फ़रवरी 01, 2009

आत्मविश्लेषण

आत्म विश्लेषण स्वयं को स्वयं से अलग रख कर के,अपना ईमानदारी के साथ अपना विश्लेषण करना
मन्युष के भीतर मैं समाहित, अनेको भावः होते है, कहते हैं, परिवर्तन ही विश्व का नियम है, इसी प्रकार से मन्युष के मस्तिष्क मे तो क्षण,परती क्षण तो विचारो का उद्देलन होता रहता है, और भावः भी करवट लेते रहते हैं, कभी किसी भावः की अधिकता, और किसी भावः की न्यूनता, भावो की बदलती परिस्थितिया तो आत्म विश्लेषण कैसे हो?
सम्भवता शांत मन से अपना विश्लेषण करे, ज्योतिशाचारयो के हिसाब से जब मन्युष जन्म लेता है, तो ग्रेहयों की सिथितिया उसके आने वाले जीवन को प्रवाव्हित करती हैं, अब प्रश्न उठता हैं, कौन से ज्योतिष शास्त्र से दूरगामी जीवन अधिक प्रव्हावित होता है, हिन्दी ज्योतिष जो की चंद्रमा पर आधारित है, या अंग्रेजी ज्योतिष पर आधारित जो कि सूर्य पर आधारित है, या इन दोनों पद्तियों मैं समान्जयास कैसे करे,और भी भविश्यवाणी की पद्तिया प्रचलित हैं, जैसे टेरो कार्ड इत्यादी पर इन सब का केन्द्र बिन्दु एक कैसे हो?
यह भी कहा जाता है, कि प्राणियों पर पूर्ब जन्म का प्रभाव होता है, परन्तु विरले हीं ऐसे हैं जिनको अपना पूर्ब जन्म ज्ञात हैं, उस पर भी मालूम नहीं कि उनके व्यक्तित्व पर पूर्व जन्म का प्रभाव है कि नहीं, स्वामी योगानंद परमहंस ने कहीं लिखा था, मैं पूर्ब जन्म मैं अंग्रेज था क्योंकि मेरा जन्म बंगाल मैं हुआ था, परन्तु मुझे छुरी,कांटे से खाने की आदत थी, उन्होने तो विश्वास से लिखा था, परन्तु एक साधारण मन्युष मैं ऐसी क्षमता कहाँ।
बदलता सामाजिक परिवेश भी तो इन्सान के व्यक्तिव पर प्रभाव डालता है, जैसे की गौतम बुद्ध,तुलसी दास जी इत्यादी। महात्मा गौतम बुद्ध ने रोगी,वृद्ध मन्युष और मृत्यु को देखा तो वोह मनन करते रहे, और बोध धर्मं के संस्थापक हुए, उनका व्यक्तित्व ही बदल गया, और कभी कभी मन पर आघात होने पर व्यक्तित्व बदल जाता है, जैसे तुलसी दास जी अपनी पत्नी के प्रेम मैं अत्यधिक पड़े थे, तो उनकी पत्नी ने कहा हाड़,चरम से इतना प्यार है,अगर भगवान से इतना प्यार होता तो भगवान मिल जाते, तुलसीदास जी रसिक व्यक्तित्व को छोड़ के भक्ति मैं लग गए, और एक पूर्ब रसिक,प्रेमी ने हिंदू धरम के धार्मिक काव्यग्रंथ की रचना कर डाली, उसी मैं एक पंक्ति है, "उपदेश कुशल बहुतेरे", कितने लोग अपना आत्मविश्लेषण कर पाते हैं, पर दूसरो को उपदेश तो देते हैं,पर अपना आत्मविश्लेषण कर पाते हैं, कबीर दास जी ने तो यहाँ तक कहा है, "निंदक नियरे रखिये आँगन कुटी बनाये", परन्तु किस मैं इतनी सामर्थ्य है कि अपनी निंदा सुने और उस पर आधारित अपना विश्लेषण करे।


जीवन अपने मैं वय्सत
मौत से वोह परस्त
आँचल मैं चिराग जलाये
चलता जा रहा है
जलता जा रहा है
कोई दीपशिखा की तरह
कोई शमा की तरह
अनजाने कितने वादे
अनजानी कितनी यादे
जीवन अपने मैं व्यस्त
मौत से वोह परस्त











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