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शुक्रवार, नवंबर 06, 2009

कला का सृजन मनोविज्ञान से ही हुआ है |

कला अपनी आवाज जनसाधारण की ओर पहूचाने का एक साधन है, चाहे  इसका माध्यम संगीत,लेखन नाटक और भी अनेकों प्रकार की कला हो सकतीं हैं,लेकिन सबसे पहले कला का सृजन हुआ था, काव्य के रूप में जब किलोल करते हुए क्रोंच पक्षी के जोड़े में सेएक  को शिकारी ने मार डाला और कवी के मुख से अनायास ही निकल पड़ा "वियोगी होगा पहला कवी आह से उपजा होगा गान", कला एक प्रकार की कुंठा है, जिसको कह सकते हैं,सकारात्मक कम्पल्सिव पर्सनालिटी डिसआर्डर,कलाकार व्याकुल हो जाता है,अपनी बात जनसाधारण के पास हर संभव तरीके से पहूचाने के लिए और उसकी पर्तिक्रिया जानने के लिए, इसका उदहारण है,अपनी काव्य रचना को लोगों के पास पहूचाने के लिए,चाहे सुनने वाला सुनना चाहें या नहीं चाहे परन्तु कवी को तो एक प्रकार का ऐसा हिस्टरिया होता है,जो कवी के नियंत्रण में होता है, इसी प्रकार लेखक अपनी बात जनसाधारण के पास पहुँचाने के लेख लिखता है, लेखक को तो लिखने का नशा होता है, बस उसे तो लिखना ही लिखना है, कलाकार असल में बहुत संवेदन शील होता है,और उसकी भावना उजागर होती है कला के रूप में, लिखना तो निरंतर जारी रहता है, या कोई चित्रकार है, तो वोह अपनी कूंची और रंगों के द्वारा केनवस पर चित्र उकेरता हैं, जब तक वोह काम पूरा नहीं कर लेता उसको शांति नहीं मिलती, इसी में कलाकार को सुखद अनुभूति होती है, यह एक प्रकार से कलाकर के वश में रहने वाली मिर्गी नहीं तो और क्या है?
   कलाकार  अपनी अनभूति को कला के रूप में पेश करता है, यह अनुभूति सुखद भी हो सकती है और दुखद भी, कलाकार अपनी अनुभूति को हर स्थिति में उजागर करना चाहता है,यह कलाकार जिस को अपने नियंत्रण में रखता है,एक प्रकार का कम्पल्सिव पेर्सनिलिटी डिसआर्डर नहीं तो और क्या है?
  विंसेट वेन गोग चित्रकार के बारे में लिखा हुआ है,वोह अपनी चित्रकला में इतना खो जाता था, उसको ना भूख की चिंता होती ना और किसी और चीज की, अगर मन खुश हैं तो सुखद गीतों का सृजन होता है,और दुखी हैं तो दुखद गीतों का,अगर किसी को वाद्य यंत्रो में रुचि होती है,तो अपनी अनुभूति के  अनुसार वोह इंसान लगातार अपने वाद्य यंत्रों के तार छेड़ने लगता है, अगर मन अत्यधिक दुखी हैं तो लगातार वाद्य यंत्रो का उपयोग करता है,यह एक प्रकार की नियंत्रण में रहने वाली मिर्गी नहीं तो और क्या है |
यही है कलाकार का मनोविज्ञान जो कि उसके नियंत्रण में रहने वाला कम्पल्सिव पर्सोनालिटी डिसआर्डर,या उसका कोंटरलड हिसटीरीय|

    बस चलते,चलते एक बात बता दूं, वैज्ञानिक तो मनोवेगय्निक समस्या के कारण अपना मानसिक संतुलन भी  खो सकते हैं,और भाभा एटोमिक में तो हर छे माह बाद उनकी मानसिकता की परीक्षा होती है,कहीं किसी ने मानसिक संतुलन तो नहीं खोया?

1 टिप्पणी:

समय ने कहा…

आपने ज्ञान बढ़ाया मित्र,
पहले कहीं पढ़ लिया था कि आदिम मानव, गुफाओ के चित्र...बगैरा-बगैरा। अब पता चला कि यह तो क्रोंच पक्षी के वक्त पहली बार सृजित हुई।

ऐसे ही बताते थे कि वाल्मिकी के मुंह से संस्कृत का श्लोक निकला था, पर आज पता पड़ा कि उन्होंने तो हिंदी बखूबी आती थी।

पता चला कि कला दरअसल एक कुंठा है, इसलिए आपने कविता लिखना छोड़ दिया।

आप एक महती कार्य संपन्न कर रहे हैं।

आपको बधाई और शुभकामनाएं।