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सोमवार, नवंबर 09, 2009

सीखने की कोई आयु सीमा नहीं होती |

बहुत दिनों पहले किसी ब्लॉगर भाई का लेख देखा था, जिसमें उन्होंने उम्र दराज लोगों को ब्लॉग्गिंग सिखाने के बारे में,बताया था, अब जो लिखने जा रहा हूँ, उसमें मेरी ही स्वयं की अभीव्यक्ति है, मेरी आयु जीवन के उतरार्ध में पहुँच चुकी है,नयी चीजे जानने की ललक अभी भी बनी हुई है, बाल खिचडी हो चुके हैं,आँखों पर लिखने,पड़ने वाला चश्मा लग चुका है, और लोगों से बात करके,नए नए प्रयोग करके, और पड़ कर के अभी भी हर चीज के जानने की जिज्ञासा रहती है, शाररिक क्षमता पहले से कुछ कम हो चुकी है,लेकिन व्यवस्थित जीवन, और खान पान के द्वारा शरीर को स्वस्थ रखता हूँ, कभी,कभी कोई बीमारी घेर लेती है,परन्तु अभी तक कोई ऐसा रोग नहीं हुआ जो असाध्य हो |
   जीवन के ३५ वर्ष की आयु में कार चलाना सीखने की इच्छा होती थी, और दो सप्ताह में, अकेले कार को सड़क पर चलाने में सक्षम हो गया था,४० वर्ष की आयु में हमारी फैक्ट्री में,कंप्युटर आया था, उस समय तो डॉस ही होता था,और हम लोगों का हमारी आवश्यकता के अनुसार लेन के द्वारा प्रोग्राम दिए जाते थे,अब मन में उत्सुकता थी कि यह प्रोग्राम कैसे बनते हैं, वोह प्रोग्राम उस समय फॉक्स बेस में बनते थे,दिल्ली जा कर फॉक्स बेस की प्रोग्रामईंग की किताब ले आया,और स्वयं ही उस किताब के सहारे काफी हद तक प्रोग्रामिंग सीख ली, अभी प्रोग्रामईंग सीखने की बहुत जिज्ञासा थी,५० वर्ष की अवस्था में, N.I.I.T से कोम्पुटर में डिप्लोमा किया, मेरे कोम्पुटर सीखना प्रारंभ करने के समय टाइपिंग वर्ड स्टार में होती थी,लेकिन अब माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के सारे प्रोग्राम मुझे  आतें हैं,उसके अतिरिक्त फोटोशोप,फ्लैश एनीमेशन भी कर लेता था,बस इन दोनों अभाय्स करना छोड़ दिया है, जिसके कारण इन दोनों सॉफ्टवेर मेरा हाथ थोड़ा तंग हो गया है,अभाय्स करुँ तो पहले जैसा हो जायगा |
   जीवन सीमित है,और ज्ञान असीमित हर किसी के लेख पड़ कर अपने ज्ञान में वृद्धि करने की अभी भी,जिज्ञासा है,सब लेखों को पड़ने का प्रयत्न करता हूँ, असीमित ज्ञान को इस सीमित ज्ञान में कैसे समेट पाउँगा? इधर,उधर भ्रमण करता रहता हूँ,अनेकों संस्क्रित्यों को देखता हूँ,उनके बारे में जानने का यतन करता हूँ |
         हाँ हो सकता है कोई अवस्था आ जाये जब मस्तिष्क शिथिल हो जाये,परन्तु अभी तो हर चीज की जानकारी पाने की जिज्ञासा है, मुझे यह नहीं समझ नहीं आता लोग क्यों कहतें हैं, बुदापे में क्या सीखेंगे ? बड़ती आयु के साथ लोग कुछ नया सीखने के लिए हतोउत्साहित क्यों होतें हैं?
  मनुष्य जीवन पर्यंत सीखता है,मुझे तो ऐसा लगता है,हाँ अब मेरा झुकाब अध्यातम की और अधिक  हो गया है,बहुत से प्रश्न मन में उठतें हैं,अगर मनुष्य के छह शत्रु, काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह अहंकार हैं,तो मनुष्य के मित्र कितने हैं,उनका वग्रीकरण क्या है?
  यम्,नियम,प्रतिहार क्या है,और भी बहुत सारे प्रश्न हैं , हाँ विद्याओं,संस्कृति इत्यादि को जानने की जिज्ञसा अभी  भी है|
   भागवद के सप्ताह को पूरा सुनने का बहुत प्रयत्न किया,बस कुछ अंश ही  सुन पाता हूँ, पूरा कभी नहीं सुन पाया, इसमें बहुत कुछ अध्यात्मिक जिज्ञासा शांत हो जाती है, जीवन से जुडे दृष्टान्त इसमें है, जिसके साथ यह अध्यात्मिक जिज्ञासा शांत करती है, गुरु जी श्री परमहंस जी के अध्यायओं से जीवन से जुड़े हुए अध्यात्मिक प्रश्न की जिज्ञासा पूर्ति तो होती है, परन्तु और भी अध्यात्मिक प्रश्न मन में उठते हैं |
 कुल मिला कर सभी चीजों की जानकारी लेने की ललक है |
  अगला लेख प्रबंधन से सम्बंधित संवाद की कला पर  लिखूंगा |
             जय गुरुदेव |
  

      

1 टिप्पणी:

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही प्रेरणादायक लिखा आपने ..मेरे साथ मेरी विधि की कक्षाओं मे बहुत से ..सहपाठी ऐसे थे जो कई वर्ष पहले ही रिटायर हो कर आये थे..उनके साथ पढने का मजा ही और था ...