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मंगलवार, नवंबर 10, 2009

संवाद की कला |

मेरी जवानी के दिनों में, हमारे देश में हिप्पी लोग आये थे,फटे हुए कपड़े बड़े हुए बाल,बड़ी हुई दाड़ी,और युवा लोगों में,वोही फटे हुए कपड़े पहनना फैशन बन चुका था, अधिकतर हिप्पी लोग चिप्पी लगी हुई फटी हुई नीले रंग की  जीन और नीले रंग का ही टॉप पहनते थे, और जीन भी एसी जिसका रंग अनेकों स्थान से फीका पड़ गया होता था, उन्ही दिनों दिल्ली में इसी प्रकार की जीन पहनना और टॉप पहनना फैशन बन चुका था, और इसी कारण मैंने भी उसी प्रकार की जीन और टॉप मैंने भी पहन लिया,और जा पहुंचा अपने पिता जी के कार्यालय में,पिता जी तो मुझे अच्छे कपड़ो में देखना चाहते थे, और उन्होने मेरी ओर इस प्रकार की दृष्टि डाली जैसे वोह मुझे पहचानते ही ना हों और उन्होंने अपने सहकर्मियों से परिचय भी नहीं करवाया , यह हुआ एक मूक संवाद जिसमें कोई बोल के संवाद हुआ ही नहीं,यह संवाद अनेकों प्रकार की भाव भंगिमा द्वारा हो सकता है, जैसे आँखों,आँखों में इशारा हो सकता है, किसी प्रकार का मुँह बनाना हो सकता है, अनेकों प्रकार के संवाद बिना बोलें हो सकतें हैं,और इस प्रकार के संवाद में  तो केवल सोचा जा  सकता है,किस बात का इशारा हो रहा है, लेकिन स्पष्ट कुछ भी नहीं पता चलता,मूक संवाद की यही कमी है |            
दूसरे प्रकार का संबाद तो आपस में बोल कर होता है, और इस प्रकार के संवाद में इन्सान एक दूसरे के साथ,भाव भंगिमा के साथ बोलता है, लेकिन इसमें भी,एक इंसान का संबाद दूसरा कैसे लेता है, यह उसकी सोच के ऊपर होता है, और बहुत बार ऐसा होता है,बिना जानकारी के इस संवाद पर विराम लग जाता है, में अपने काम के सिलसिले में अमरीका के फिलाफेल्डिया शहर में गया हुआ था, फिल्फेडेलिया की उस फैक्ट्री में,एक महिला थी,उसने मुझे डिनर पर अपने घर बुलाया था, और बातों,बातों में उससे बात हुई कि वोह पुराने धर्मों के बारे में पड़ रही है, उसने मुझसे हमारे हिन्दू धर्म के बारे में,पहला प्रश्न पुछा कि, यह
 ट्रीयूनोन क्या है,मुझे उसकी बात समझ ही नहीं आई,मैंने कहा क्या तो वोह बोली ब्रह्मा,विष्णु,महेश, तब में समझा यह त्रिदेवों के बारें में पूछ रही है,तो मैंने उसे बताया,ब्रह्मा,वीष्णु,महेश पैदा करने वाले,पलने वाले और संघार करने वाले देवता हैं,और यह भी बताया ब्रह्मा जी के साथ विद्या की देवी सरस्वती,विष्णु जी के साथ धन की देवी लक्ष्मी जी,और महेश के साथ शक्ति पारवती हैं, अब उसने पूछा शरीर में स्थित चक्रों के बारें में,वोह भी मैंने उसको बता दिया,मूलाधार चक्र से लेकर सहस्त्रधार चक्र के बारे में,और दोमूही सर्प यानि कि कुण्डलनी  का मूलाधार चक्र से जागृत होकर,सब चक्र को भेदन करते हुए सहस्त्रधार चक्र तक पहुचने के बारे में,और में सोचने लगा इसको हिन्दू धर्म के बारे में,इतना सब कुछ पता है, अगर इसने कोई ऐसा प्रश्न पूछ लिया जो में नहीं जानता तो संवाद पर विराम लग सकता है,इसको तो बहका भी  नहीं सकता, इसी में एक दूसरे की बात ना समझने के कारण मतभेद हो सकते है, इस प्रकार के संबाद में सुनने की भी कला आनी चाहिए, पहले किसी की बात शांत रह कर सुनें और मनन करें फिर बोलें |
  इसके बाद करता हूँ,लिखित संबाद और इस प्रकार के संबाद में लिखे हुए शब्दों को भी इंसान, अपने सोचने के प्रकार या बहुत बार  जिस प्रकार की पड़ने वाले का मस्तिष्क ढला होता है,उसी प्रकार से पाठक उसको ले लेता है, इसका एक दो दिन पहले मैंने एक लेख लिखा था "बिना जाने और बिना खोजे लोग अपना तर्क क्यों दे देते हैं ?" यह लेख विवादस्पद था, और इसमें मुझे मिली,जुली पर्तिक्रिया मिली, मूल विषय से सम्बंधित टिप्पणी के साथ, उसमें दिए हुए उदहारण से सम्भ्न्धित टिप्पणियाँ मिली जो कि मेरे लिए अप्रत्याशित थीं,और जिसने मुझे सोचने पर विवश कर दिया मूल विषय तो यह नहीं था,इस प्रकार की टिप्पणियाँ क्यों?, यह मेरे लिए बिलकुल नया अनुभव था,और मुझे कुछ अच्छा नहीं  लगा और सोचने लगा  मैंने इस प्रकार के उदहारण क्यों दे दिए?
  आखिर में उस संबाद की कला के बारे में लिखता हूँ, जो कि चित्रों के द्वारा पर्दर्शित होती है,किसी के सामने किसी चीज का चित्र रख दो उसका मस्तिष्क,उस चित्र की कल्पना में खो जाता है ,किसी इंसान का चित्र,किसी सीनेरी का चित्र हो सकता है |
  बस आखिर में इस बात से इस विषय को समाप्त करता हूँ, मुख्यत: संवाद चार प्रकार के होतें हैं,मूक संबाद,बोल कर संवाद,लिखित संबाद और चित्र संबाद , और सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करता हूँ,मेरे किसी संबाद से किसी का मन ना आहात हो |

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