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गुरुवार, नवंबर 12, 2009

मुझे तो लगने लगा है, ऐसे लेख लिखूं जिसमें कोई भी विवाद ही ना हो |

अब उम्र के इस पड़ाव में आ कर सोचने लगा हूँ,ऐसे लेख लिखूं जिसमें कोई विवाद ना हो, बहुत सारी पुस्तक लगभग हर विषय पर पड़ी, बहुत स्थानों पर भ्रमण किया,देश विदेश में,अनेकों स्थानों की सभ्यता देखी, अनेकों स्थानों की संस्कृति देखी,अपने अनुभव बाटने का प्रयास किया, और आज पंडित डी.के शर्मा जी का लेख पड़ा "विज्ञान किन चीजों को निषेध करता है ?" और उसपर कुछ तार्किक और कुछ तर्कहीन टिप्पणी देखी, तर्कहीन टिप्पणी जिसमें पंडित जी पर बिना तर्क के सीधा,सीधा आक्षेप था, लेकिन कोई प्रमाण नहीं था,और मुझे ताऊ रामपुरिया की टिप्पणी ने प्रभावित किया,जिसमें उन्होंने गलेलियो के द्वारा पृथ्वी के बारे में बतया था,और तत्कालीन समाज मानने गलेलियो की बात मानने को तयार ही नहीं था,और मेरे मस्तिष्क में एक साथ तीन विचार उभरे,पहला एडिसन के बारे में था,जिसने प्रकाश करने के लिए बल्ब का आविष्कार किया था, उस समय एडिसन ने कहा कि में,धातु के तारों में बिजली प्रबाहित करके प्रकाश उत्पन करूंगा, तत्कालीन लोगों को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ,और एडिसन ने धातु के तारों में बिजली प्रबाहित करके प्रकाश उत्पन्न किया, वोह बल्ब आधे घंटे तक जला और फिर उसके तार जल गये, और एडिसन उस समय हो गया हंसी का पात्र, बस उसने उस बल्ब से हवा निकाल कर उसमें वेकउम नहीं किया था, और वोह धातु के तार ओक्सीडाइस हो कर जल गये थे, फिर एडिसन ने उस बल्ब में से हवा निकाल कर उस बल्ब में वेकउम बनाया, तब हुआ बल्ब का अविष्कार जो निरंतर जलता रहता है |
दूसरा विचार जो मेरे मन में आया वोह था,इटली के महान दार्शनिक सुकरात का,वोह यही तो कहता था,किसी चीज को अपनाने से पहले अपने मन में तर्क करो,यह बात ठीक है कि नहीं,तत्कालीन लोगों को उसका यह तर्क पसन्द नहीं आया,और उसको उस समय जहर का प्याला पी कर अपना जीवन गंवाना पड़ा |
 तीसरा विचार आया महान वेग्य्यानिक जगदीश चन्द्र बोस का,जिनोहोने उस समय के अंग्रेजो को कहा,में विना तार के एक कमरे से दूसरे कमरे में घंटी बजा दूंगा,उस समय के अंग्रेजो ने इस बात को माना नहीं,और उन्होंने ने एक कमरे से दूसरे कमरे में घंटी बजा कर आश्चर्य चकित कर दिया,और इस प्रकार हो गया बेतार के तार यानि आज के टेलीग्राफ का आविष्कार जिस पर अब मोर्स कोड के द्वारा सन्देश पहुंचाए जाते हैं |
  मैंने अपने लेख सीमित " विज्ञान कैसे जानेगा असीमित विद्याएँ ",अपनी विद्याओं के वोह उदहारण दिए थे, जिन विद्याओं के कारण विदेशों में हमारी साख थी, कुछ ऋषि मुनिओं के द्वारा दी गयी अमूल्य धरोहर के बारे में लिखा था, जो हमारे यहाँ विवादित हैं, परन्तु जिसका लाभ विदेशियों ने उठाया है, कुछ,कुछ याद आता है,हमरे यहाँ जो वेद निरर्थक पड़े हुए थे,उसको जर्मन  ले गये थे,और उन लोंगों ने अपने घर में तकनिकी विकास किया, अनेकों प्रकार की विद्याएँ जैसे आयुर्वेद,योग और भी विद्याएँ कहाँ उस सीमा तक रह गये हैं,जैसे पहले थीं?
 एक लेख मैंने और लिखा था "बिना जाने और बिना खोजे लोग तर्क क्यों देते हैं", और  उसमें उदहारण जो दिए थे,जो कि विवादित हैं, मेरा मूल विषय तो था बिना जाने और बिना खोज किये लोग तर्क देते हैं,इस पर एक दो टिप्पणी तो विषय से सम्बंधित थी,वाकी उदहारण को लेकर तर्क था, (लगता है मेरे लिए तीन नंबर ही उपूक्त है,मन में तो आ रहा है,कहूँ अंक ज्योतिष के अनुसार) वैसे तो मुझे अंक ज्योतिष का ज्ञान नहीं है,इसलिए इस बात को यही रोकता हूँ |
  इसी बात से मुझे मनोविज्ञान से सम्बंधित लेख इम्पल्सिव व्यव्हार रिश्ते बिगाड़ सकता है, मैंने तो लिखा था इम्पल्सिव व्यवहार के बारे में,लेकिन एक टिप्पणी मुझे मूल विषय से हट कर मिली कि (यह सब पड़ कर लगता है आप झक्की हैं") में कोई भी टिप्पणी नहीं हटाता,मैंने तो टिप्पणी के लिए शब्द समीक्षा लिखा हुआ है |
  मैंने एक लेख लिखा था,"(संवाद की कला") मैंने उस लेख में वर्णन किया था संबाद चार प्रकार के होते हैं |
मूक संवाद(Body Language),बोल के संवाद(Dialogue Communication),लिखित संवाद(Written Communication),चित्र संबाद(Picture Communication), लेकिन मुझे लगता है,उस लेख को भी बहुत कम लोगों ने पड़ा होगा,मुझे उस पर कोई भी अच्छी,बुरी समीक्षा नहीं मिलीं |
  हमें तो मेनेजमेंट में,बताया गया है कि संवाद ,मूल विषय से सम्बंधित,स्पष्ट,साफ,और सूक्ष्म होना चाहिए(Communication should be to the point,clear,clean and precise.)
 बस अंत में यही कहना चाहता हूँ, किसी भी प्रकार की समीक्षा दें,सब मुझे स्वीकार है,बही मुझे तो बात को मनन करने की दिशा मिलेगी, और लिखा हुआ,बोला हुआ संवाद तो सोच का परतिबिम्ब हैं( Written and Oral Communication is Reflection of Mind).
      अपनी समीक्षा देकर मुझे समृद्ध करें |

          धन्यवाद्

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

ज्ञानदत्‍त पांडेय जी के ब्‍लाग में पढा था कि .. जो अच्‍छे कडक नोट होते हैं .. वो आपके घर में सुरक्षित रखे होते हैं .. और गंदे और मुडे चुडे नोट ही बाहर चलते रहते हैं .. हमारे देश का दुर्भाग्‍य ही है कि आज हमें घिसी पीटी चीजें ही पसंद आती है .. इसलिए विवाद से बचना है तो वैसे ही लेख लिखें .. मौलिक सोंच और चिंतन को आज जगह नहीं मिलती .. सांसारिक सफलता प्राप्‍त करने की इच्‍छा हो तो इतना रटिए .. कि आप लोगों पर अपना प्रभाव छोड सकें .. पर जिस तरह मजबूरी आने पर घर में छुपाए गए अच्‍छे और कडक नोट भी बाहर आ जाते हैं .. शायद आनेवाले समय में किसी विवशता से अच्‍छे और कडक विचारों को सुनना लोग पसंद करें !!

अंशुमाली रस्तोगी ने कहा…

बंधु, वो लेखन ही क्या जिसमें वाद-विवाद-संवाद न हो।