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रविवार, सितंबर 06, 2009

पश्चिम और भारतीय संस्कृति का अच्छा सम्मिश्रण बनाये

पशचमी और भारतीय सभ्याता का अच्छा
समिश्रण बनाये
बहुत दिनो पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी, पाशच्यादवाद और उस पोस्ट मे लिखा था, हम क्यो पश्चमी सभ्यता का क्यो अन्धाअनुकरण कर रहे है, जैसे बेलनाटाईन डे,फ़ादर्स डे,मदर्स डे इत्यादि, और इसी सन्दर्भ मे लिखा था कि, यह डेस तो हमारी भारतीय सन्सक्रिती मे तो प्रतिदिन सम्मिलित है, और यह भी लिखा था माँ बाप का आदर करना तो हमारी सन्सक्रिती में प्रतिदिन सम्ममिलित है, तो हम इन दिनो को विशेष रूप से केवल एक दिन के लिये क्यों मनाये, और वेलेन्टाईन डे का सन्दर्भ देते हुए कालीदास की महान कृति मेघदूत का वर्णन किया था कि किस प्रकार कालीदास ने मेघो को दूत बना के अपना सन्देश अपनी प्रेयसी को पहुचाया था।
अब मै अपनी इस भारतिय सभ्यता के बारे मे नही लिखता, इसका वर्णन मै अपने लेख पाशच्यादवाद मे कर चुका हूँ, अब आता हूँ पश्चमी सभ्यता पर, मुझे अपने काम के लिये इंग्लैंड जाने का अवसर मिला, और अब मन मे आ रहा है, हम लोग अपने आचारण मै, उन वस्तुओं को तो उतार लेते है, जिनका वर्णन मै उपर कर चुका हू, इसके साथ मे कुछ लोग प्रगतिशीलता के नाम पर पश्चिम के लोगो की तरह जैसा कि स्त्री,पुरुष का आपस मे उन्मुक्त sa समबन्ध बनाना, जो कि हमारी सन्सक्रिती के विपरीत है, ऐसे ही लड़कियों के द्वारा अंग प्रदर्शति करने वाले वस्त्र पहनना, जो कि हमारी सन्सक्रिती के विपरीत है।
जब मे इन्गलेड गया तो तब मैने अनुभब किया जो हमे लेने आये थे, वोह उसी कम्पनी के कर्मचारी थे, जिस कम्प्नी मे हमे जाना था, यानि की कोइ ड्राइवर नही, और जब हम हीथ्रो हवाई अड्डे से कार मे बैठ कर जा रहे थे, तो हमने देखा, अलग,अलग वाहनो के लिये निरधारित गति सीमा थी,ना कोई ओवरटेक ना कोइ होर्न की आवाज और वहाँ होर्न बजाने का मतलब कोइ गंभीर समस्या है, ना कोइ पीछे से डिपर देना इत्यादी, इसको हम अपने आचरण मे क्या नही उतारते, हाईवे पर ना कोई जानवर ना कोइ पैदल चलने वाला था, मै यह मानता हूँ कि यह हमारे देश मे सम्भब नही
है, परन्तु सावधानी तो रक्खी जा सकती है,अशिक्षित वर्ग तो कही से सडक पार कर लेगा क्योकी उनको सड़क के नियमो का ज्ञान नही है, परन्तु शिक्षित वर्ग तो जेबरा क्रोसिग का उपयोग कर सकता है, हाँ अभी एक और बात मेरे को याद आ रही है, वहा पर सड़क के नियम तोड़ने वाला, अधिक ऊचा ओहदा रखता है, उस पर अधिक जुरमाना होता है, वनिस्पत कम ओह्दे वाले के, ऊचे ओह्दे वाले को कहते तुमने ही तो कानून बनाया है, यह हमारे यहाँ क्यो नहीं होता, फिर हम लोग आगे बड़े तो कुछ भूख लग गयी थी, तब सड़क के किनारे एक छोटे से होटल मे गये या वहाँ का ढाबा कह लीजीये,वहा कोइ वेटर नही, कोइ बैरा नही, अपना खाने का समान अपनी वहाँ पड़ी हुई प्लेट मे रक्खा और खाने के बाद इमानदारी से अपने,अपने बिल अदा किये, मै बात कर रहा हू, एक छोटे से होटल की जिसमे कोइ सी०सी० टीवी की व्यब्स्था नही थी, हम यह इमानदारी क्यो नही अपनाते, अब अपनी यात्रा करते, करते उसी कम्प्नी के कर्मचारी ने अपनी कार जिसमे हम यात्रा कर रहे थे, स्वयं पेट्रोल भरा और दूर बैठे एक व्य्कती को पैसे दिये,और हम लोग चल पड़े, वहाँ व्यकती अपने छोटे,छोटे अपने आप करताहै, किसी पर निर्भर नही रहता, यह हम क्यो नही अपने आचरण मे लाते, यह तो मे मानता हूँ, की हम अपने यहाँ नौकर रख कर गरीब की रोज़ी रोटी का सहारा बनते है, परन्तु यह किया, अपने छोटे,छोटे काम जैसे पानी का गिलास मांगना, जूते चप्पल ढूढनेको कहना,जबकि अस्वस्थ्य, अपाहिज जैसी समस्या ना होते हुए भी,अपने छोटे,छोटे काम के लिए भी नौकरों पर निर्भर रहना, मेरी छोटी साली कनाडा वहीँ के लड़के से शादी कर के बस गयी है, उन लोगो ने बच्चो की देखभाल के लिये एक नौकरानी रखी हुई है, वोह तब तक ही बच्चो की देखभाल करती है, जब तक माता और पिता मै से कोइ घर नही आ जाता, ऐसी आत्मनिर्भता हम अपने आचरण मे क्यो नही लाते, मैनेवहाँ लोगो को मदिरापान करते हुए तो देखा पर किसी को नशे मे धुत नही देखा,हम लोग यह क्यो नही लाते अपने आचरण मे।
मेरे एक मित्र है, जिन्होने अपने जीवन के ३५ वर्ष अमरीका मे बिताये हैं वह मुझे बता रहे थे, की चिक्त्सालय से कोइ ब्यक्ती सवस्थय हो कर लोटता है, तो उसका चिक्त्सालय मे ख्याल रखाही जाता, और कुछ दिनो के बाद उसके घर पर फोन करके उसका हाल भी पूछा जाता है, ऐसी व्यव्स्था हमारे यहा क्यो नहीं है, मेरे एक परिचित की पत्नी ने अमरीका मे बेटी को जन्म दिया, और वोह मानसिक रूप से जन्म लेते ही, ठीक नही थी, कारण था,उनकी पत्नी को माँ बनने के समय डाक्टर ने तेज दवाईया दी थी, जिसके कारण वोह उनकी बेटी जन्म से ही मानसिक रूप से ठीक नही थी, तो उनहोने उस डाक्टर पर केस कर दिया, और वोह बता रहे थे, वहा वकील वोही केस लेते है, जिसमे उनको १०% सच्चाई नज़र आती है,हम अपने आचरण मे यह क्यो नही लाते।
बहुत दिन पहले मे अमरीका देश की एक घटना,दूरदर्शन मे देख रहा था, एक विकलांग व्यक्ति बस से उतर रहा था, उस बस का द्वार इतना नीचे हुआ कि,वह सड़क से छू गया, और उस बस के ड्राईवर, कन्डक्टर उसव्यक्ति की सहायता के लिये बस से उतर के नीचे खड़े थे,इस प्रकार का आचरण हम लोग अपने जीवन मे क्यों नही उतारते।
अमरीका देश के लिए कोई अच्छा काम करता है, तो उसे उस देश की नागरिकता मिल जाती है, इस प्रकार से वोह कोई भी हो सकता है, अमरीका मे बस जाता है, और अमरीका को उन्निती की ओर अग्रसित करता है, इसका उदाहरण हैं D.N. A मे जीन की खोज करने वाले डोकटर हरविंद सिंह खुराना जो कि हमारे देश के थे, विडम्बना तो यही, उनको अपने देश ने कोई भी सम्मान नहीं दिया, अमरीका ने उनको अपनी राष्ट्रीयता दे दी, और अपने यहाँ रख लिया, हमारे यहाँ इस प्रकार का सम्मान क्यों नहीं मिलता।
इंग्लैंड में हम लोग लन्दन में टूरिस्ट बस से शहर को देख रहे तब एक किसी यात्री ने गाइड से कुछ कहा कुछ गलत्फेमी होने के कारण उसने समझा कि वोह शख्स बीच में टूर को रोक देने के लिए कह रहा है, वोह तो क्रोध से लाल हो गई और बोली।
I am paid for this.
इंग्लैंड वाले कहते हैं "This is duty for your country"

अमरीका के पूर्ब राष्ट्रपति जोन ऍफ़ केनेडी के शब्दों में।
What have you done for country?

पश्चिम कि अनेतिकता का अनुसरण करने वालों, अपनी नैतिकता छोड़े बिना उनकी नैतिकता भी तो अपनाओ

3 टिप्‍पणियां:

विजय प्रकाश सिंह ने कहा…

एकदम सच्ची बात लिखी आपने, हमारी दो तीन मुश्किलें हैं, जो संस्कार से जुडी है । पहली वर्ण व्यवस्था जिसका परिणाम है वी आई पी कल्चर, दूसरी भविष्य के लिये धन सचंय का रोग और तीसरी सब चलता है का व्यवहार । इन सबने पूरे देश को अव्यवस्थित कर रखा है ।
http://www.mireechika.blogspot.com

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बिना विचारे पश्चिमी अंधानुकरण के चलते आज हमारी हालत इस प्रकार की हो चुकी है कि अब हम न तो घोडों में शामिल होने लायक रहे हैं और न ही गधों में बल्कि खच्चर बन चुके हैं!!!!!

संगीता पुरी ने कहा…

आपने बहुत सही लिखा है .. अच्‍छे अच्‍छे मुद्दे पर लिख रहे हैं आप आजकल !!