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गुरुवार, सितंबर 10, 2009

मझे इंसानों के रूप मे हीरे मिले

इस लेख को संत कबीर दास के इस दोहे के द्वारा आरम्भ करना चाहता हूँ|
             बुरा देखेन मे चला,बुरा ना मिला कोय |
             जो देखा आपने मुझ से बुरा ना कोय | |
मुझे अपने शहर गाजिआबाद में, १५ वर्ष से ऊपर हो चुके हैं, मुझे अपने इस शहर में, मेरी मुलाकात बहुत से लोगो से होती रहती है, और बहुत से अच्छे इंसान मिले, कम पैसा कमाने वालों से लेकर अधिक पैसा कमाने वालो तक, सब से पहेले वर्णन करूँगा एक रिक्शा वाले का जिसका नाम है, सिब्बू , मेरी पत्नी यहाँ के एक परिथिष्ट  स्कूल में अध्यापिका है,और उस स्कूल की छुट्टी २.३० पर होती है, मेरी पत्नी स्कूल से २.४५ तक निकल पाती है,  वोह रिक्शा वाला बिना नागा २.३० बजे मेरी पत्नी को लेने के लिए  सब प्रकार के मौसम में, लेने पहुँच जाता है, भीषण गर्मी हो तो वोह खड़ा हो जाता पेड़ की छा में, परन्तु उस भीषण गर्मी को तो सहता ही है, मूसलाधार बरसात हो तो भीगते हुए वहाँ,पहुँच जाता है, इसी प्रकार अगर ठिठुरती हुई,शीत ऋतू हो तो पहुँच जाता है,ठिठुरते हुए वहाँ पहुँच जाता है , और सवारियों को भी गंतव्य स्थान तक भी  पहुंचाता  है, एक दिन मैंने उससे पुछा तुम क्यों प्रतिदिन मेरी पत्नी को ले जाने के लिए पहुँच जाते हो, तो उसका उत्तर ऐसा था कि जैसे कि किसी बहुत प्यासे को शीतल जल पिला दिया हो,वोह बोला " बच्चो को पढाते हुए मैडम थक जाती होंगी,पता नहीं उनको रिक्शा मिले या नहीं मिले",और  होताहै भीहै  ,कि बहुत ख़राब मौसम में कोई स्कूल से घर के लिए कोई भी रिक्शा नहीं मिलती|
जब मेरे पास किसी कारणवश कोई वाहन नहीं होता,या कोई मेरी कोई मजबूरी होती है, तो वोह  ले जाता है,मेरे को मेरे गंत्याव्य स्थान तक ,औरअगर  उसके पास कोई सवारी नहीं होती तो मुझे लेने भी पहुँच जाता है, कुछ समय पहले  मेरे पेट में असेहनिये पीडा होती थी, और ना तो में अपना स्कूटर चला सकता था,ना गाड़ी वोह रिक्शा वाला डाक्टर के पास ले जाता था, और बहुत देर तक मेरे वापस आने का इंतजार करता था|
 यह पेट की असेहनिये पीडा कभी भी हो जाती थी, एक बार में, केमिस्ट से दवाई लेने गया तो वोह पेट दर्द की पीडा,अचानक उठ गयी,और ऐसे में मुझसे चलना भी दूभर हो जाता था, उस केमिस्ट की दूकान ऐसे स्थान पर है, जहाँ से रिक्शा कठिनाई से ही मिलती है,या यों  कह लीजिये वहाँ रिक्शा मिलती ही नहीं,उस केमिस्ट ने अपनी पत्नी को फ़ोन करके बुला लिया,और चल दिया मेरे लिए रिक्शा लेने,उस के कारण में बिना किसी कठिनाई  के, पेट दर्द की असेहनिये के अतिरिक्त पहुँच गया सकुशल अपने घर पर|
  मेरे को धूम्रपान का व्यसन था,जो कि अब में छोड़ चूका हूँ ,में एक पान,बीड़ी,सिगरेट कि दूकान पर सिगरेट लेने जाता था,और एक बार ऐसा हुआ जिस ब्रांड कि में सिगरेट पीता था,वोह बाजार में मिलनी कठिन हो गयी,तो वोह दूकानदार पुरे शहर में उसी ब्रांड कि सिगरेट खोजता था, और मुझे उपलब्ध करा देता था|
उस पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल भरने वालो  के  बारे में,वर्णन करता हूँ,जहाँ में पेट्रोल भरवाने जाता हूँ, वहाँ तो मुझे कुछ समय पहले जाना पड़ता है,पेट्रोल तो भरते तो हैं,परन्तु मेरे को चाय और पिलाते हैं,पैसे देने का प्रयत्न करता हूँ,तो बुरा मानते हैं,लेकिन में उनकी सहयता किसी ना किसी रूप में कर ही देता हूँ|
 हमारे घर के सामने एक परचून की दूकान है, जिसके पास कोल्ड ड्रिंक,शैंपू, और भी घर की आवयश्कता का सामान मिल जाता है, और अपने और उसके खाली समय पर पहुँच जाता हूँ, उसकी दूकान पर,और वोह मेरी अनेक प्रकार की अध्यात्मिक जिज्ञासा का निवारण कर देता है|
 यह तो हुआ कम पड़े लिखे लोगो के बारे में, उस केमिस्ट के अतिरिक्त,अब आता हूँ,पड़े लिखे लोगो की ओर, जिन डाक्टर साहब के पास हम लोग रोग निवारण के लिए,जाते हैं, उनको अगर ज्ञात होता है,कोई गरीब है,और दवाई नहीं ले पायेगा,उससे यह डाक्टर साहब फीस तो लेते नहीं,और ऊपर से अपनी कमाई से उक्त रोगी को दवाई के लिए पैसे भी दे देते हैं , स्नेह परिवार के बारे में तो लिख ही चुका हूँ, मेरा संपर्क उस स्नेह परिवार की संचालिका से उस स्थान पर ही  हुआ था, जहाँ पर मेरे मित्र अजय भाई ने एक ऐसा कार्यकर्म संपन्न किया था,जिसमे उन लोगो को सम्मानित किया गया था,जो समाज के लिए योगदान देते तो हैं,परन्तु सम्मानित नहीं होना चाहते,उन लोगो का कहना है, ऐसे सम्मानित होने से अभिमान हो जाता है|
   अंत में फिर में यही कहना चाहूँगा
                             बुरा देखेन में चला बुरा ना मिला कोई|
                             जो देखा आपने मुझ से बुरा ना मिला कोय | |

3 टिप्‍पणियां:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

एकदम सही.. अच्छा लिखा है आपने .. हैपी ब्लॉगिंग

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

निरंतर लिखते रहें, शुभकामनाएँ
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Tech Prevue: तकनीक दृष्टा

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा लगा आलेख पढ़कर!