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सोमवार, सितंबर 28, 2009

सीमित विज्ञान कैसे ज्ञात करेगा असीमित विद्याएँ ?

 लगभग एक सप्ताह से कंप्यूटर खराब पड़ा था, इस कारण कोई पोस्ट नहीं लिख पाया,बस एक पोस्ट लिखी थी वोह भी माइक्रोसॉफ्ट वर्ड में,और उस पोस्ट को साइबर कैफे में,जा कर ब्लॉगर में  पेस्ट कर दिया,अब पता नहीं कब तक यह कमपुयटर काम करेगा उसके उपरांत इस पर कुछ काम भी कर सकूँगा कि नहीं |
  विज्ञान का काम है किसी भी विषय पर शोध करना जब तो शोध में साक्ष्य मिलते रहते है, विज्ञान की सार्थकता बनी रहती है, परन्तु बहुत सी विद्याएँ  जिसमे विज्ञान को शोध में कुछ नहीं मिलता या बहुत सी विद्याएँ, जिस पर शोध हुआ ही नहीं अर्थार्त उन विद्याओं की सार्थकता विज्ञान ने सिद्ध ही नहीं करी, उसको कुछ विज्ञान के समझने वाले निरर्थक कह देते हैं, ना हीं उन विद्याओं की जानकारी लेने का प्रयास करते हैं, और व्यर्थ में उन विद्याओं को निरर्थक कह देते हैं |
  वैसे तो विज्ञान किसी भी जिज्ञासा की जानकारी प्राप्त करने के लिए शोध करता है, और उसको प्रमाणित करता है, फिर एक सीमा पर आकर रुक जाता है, में मानता हूँ विज्ञान ने इस संसार को बहुत सी उपलब्धियां दी हैं, परन्तु कुछ विषय जो कि हम लोगों के जीवन में नित प्रतिदिन होती हैं, जैसे कि पुर्बआभास किसी होने वाली घटना का पहले ही हो मालूम हो जाना  है,एक दुसरे से बिना किसी संचार माध्यम से बात होना अर्थार्त telepathy और मस्तिष्क के सुप्त भाग में क्या होता है,पुर्बजन्म के रहस्य  ? और  भी अनेक विषय विज्ञान के लिए अबूझ पहेली है, यह ऐसे विषय जिनको अभी तक तो विज्ञान सिद्ध नहीं कर पाया परन्तु भविष्य में इनको विज्ञान पता नहीं सिद्ध कर पायगा की नहीं |
  वैसे तो में वज्ञानिक तो नहीं परन्तु एक अभियंता होने के कारण मैंने विज्ञान के भोतिक शास्त्र,रसायन शास्त्र का तो गहन अध्यन किया है,और कुछ हद तक जीव विज्ञान और वनस्पति शास्त्र का भी अध्यन किया है |
  भौतिक शास्त्र में उर्जा के बारे में प्रयोगों के द्वारा सिद्ध किया गया है,एक उर्जा को दूसरी उर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है, मतलब प्रकाश को ताप में या ताप को प्रकाश में, या इसी प्रकार ताप या प्रकाश को बिजली में या और भी उर्जाओ को परिवर्तित ,परन्तु क्या विज्ञान उर्जा को स्वतन्त्र रूप में उत्पन्न कर सका है?
 इसी प्रकार रसायन शास्त्र में अणुओं का विघटन करके न्यूटरोंन,प्रोटोन और एलेक्ट्रोन तक पहुँच गये हैं,पर क्या इसके आगे विघटन हो पाया है क्या?, यहाँ तक तो ज्ञात हो गया है एलेक्ट्रोन पर रिनात्मक विदुत और प्रोटोन पर धनात्मक विदुत है, आइसटॉपस(एक ही सरंचना वाली धातु परन्तु गुण में अलग) के बारे में भी ज्ञात हो चुका है, परन्तु विगयान क्या कोई नई धातु दे पाया? इसी सन्दर्भ में मुझे याद आया,ज्वाला जी में बादशाह अकबर द्वारा चडाये हुए छत्र की धातु को विज्ञान अब तक नहीं ज्ञात कर सका जो सदियों पहले चडाया गया छत्र  था,कण के बारे में कणाद ऋषि ने बरसो पुरने समय में ज्ञात कर लिया था |
  इसी जीव शास्त्र  प्रकार D.N.A में उपस्थित जींस और उसके आगे क्रोमोसोम तक पहुँच गया है,और यहाँ तक भी पहुँच गया है कि  x,x  कोरोमोसोम के आपस के सयोंग से कन्या भ्रूण बनता है, और x, y कोर्मोसोम के सयोंजन से पुरुष भ्रूण का निर्माण होता है, और यहाँ तक की एक जीव को दूसरा परतीरूप क्लोन के रूप जीव शास्त्र ने बना दिया,परन्तु किसी मृत जीव को जीवन दे पायें क्या परन्तु यह मृत जीव को जीवन देनी वाली विद्याओं का प्रमाण हमें अपने पौराणिक ग्रंथो में मिलता है रामायण में लक्ष्मण जी को वैद्य सुषेण द्वारा जीवन दान का प्रमाण मिलता है और असुरों के गुरु शुक्राचार्य जी को भी इस मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान था ,विज्ञान  कोई भी किसी भी प्रकार का जीव उत्पन्न कर पाया है? मेडिकल साइंस ने बहुत उपलब्धिया हासिल कर ली जटिल से जटिल रोगों की दवाइयाँ खोज ली है,जटिल से जटिल ऑपरेशन करना संभव हो गया है,मानव के खराब अंगो का प्रत्यापर्ण संभव हो गया है,और कृत्रिम अंग भी बन चुके हैं,परन्तु क्या अभी तक बिलकुल उसी प्रकार के अंग का निर्माण हो सका है? विज्ञान ने रोबोट का निर्माण किसी कार्य को विशेष को करने के लिए तो कर लिया है,परन्तु मानव द्वारा सभी कार्य करने वाला रोबोट अभी तक बन सका है क्या? या बिलकुल मानव का परतिरूप बनाना विज्ञान के लिए संभव हो सका है क्या?
  इसी सन्दर्भ में मुझे याद आ गया ऋषि विशामित्र ने अपने तप बल से एक नयी सृष्टि बनाने की शक्ति प्राप्त कर ली थी, और बनाना भी प्रारंभ कर दी थी, देवी देवताओ पर अर्पित करने वाला नारियल इन्ही विश्वामित्र की देन है, परन्तु यह बात विज्ञान के लिए निरर्थक होगी,क्योंकि यह बात विज्ञान के नियमो नहीं बंधती है, इसी प्रकार रोगों के इलाज के लिए एलॉपथी के अतिरिक्त बहुत सी दूसरी इलाज की पदितिया है,जैसे आयुर्वेदिक,होमेओपथिक इत्यादि, आयुरवैदिक पर तो अब एलॉपथी का कुछ,कुछ विश्वास होने लगा है, परन्तु होमेओपथिक पदिती एलॉपथी के नियमो नहीं बंधती,परन्तु इससे भी रोगों का समाधान होता है,पर यह भी विज्ञान के नियोमो सेकोसो  दूर है, इसलिए बहुत से लोग इस विद्या को निरर्थक कह देते हैं, आयुर्वेद से प्राप्त होने वाला च्यवनप्राश च्यवन ऋषि की देन है, वोह च्यवन ऋषि जो दोनों नेत्रों से दृष्टिविहीन हो चुके थे,और बुड्ढे हो चुके थे,जिनको यह प्राश देवताओं के पुत्रो अश्वनी कुमारो द्वारा प्रदान किया गया था,और उनके दोनों नेत्रों की ज्योति और उनकी जवानी लौट आई थी, परन्तु इस च्यवनप्राश का कोई भी दीर्घायु के लिए कोई भी विज्ञान द्वारा तर्कसंगत नियम नहीं है,बस इस प्राश के लाभ केवल अनुभव पर आधारित हैं |
  अब में आता हूँ स्वयं किये हुएअनुभवों  पर,पहेले बताता हूँ  स्पर्श चिकत्सा के बारे में ,दिल्ली में एक प्रदर्शनी होती थी, मीस्टिक इंडिया  जो कि हमारे भारत के दुर्लभ ज्ञान पर आधारित होती थी, जिज्ञासा वश में भी उस पर्दर्शनी में जाता था, उन दिनों मेरी कनपटियों में भयंकर पीडा होती थी,और किसी भी चिकत्सा से ठीक नहीं हो रही थी, वहाँ पर मुझे तपस्वी जनक शाही मिले जो लोगों का स्पर्श चिकत्सा के द्वारा इलाज कर रहे थे, कनपटियों में दर्द तो हो ही रहा था, में भी तपस्वी जनक शाही के पास गया उन्होने मेरी एक कनपटी पर अपना अंगूठा रखा,और दूसरी कनपटी पर अपनी शेष अंगुलियाँ और यह प्रक्रिया पॉँच मिनट तक करी,वोह कनपटियों का दर्द जो किसी भी चिकत्सा के कारण ठीक नहीं हो पा रहा था,वोह पॉँच मिनट में ठीक हो गया और उनको मैंने अनेको प्रकार के असाध्य रोगों का स्पर्श चिकत्सा द्वारा  इलाज करते और रोगी को ठीक होते देखा है ,अब विज्ञान इसे क्या कहेगा,यह परक्रिया विज्ञान के किसी नियम में बंधती ही नहीं, कुछ समय पुर्ब विनय बिहारी सिंह जी ने अपने एक ब्लॉग "ऐसे हुआ चमत्कार में" लिखा था कि उनकी पीठ में बहुत दर्द होता था, और उस पीठ के दर्द के कारण वोह चलने से भी लाचार थे, और एक योगदा सत्संग सोसाइटी के सन्यासी के परामर्श पर वोह ओर्थोपदिक डाक्टर को दिखाना चाहते थे, और बाद में उसी सन्यासी के एक बताये हुए योगासन से उनका वोह कमर का दर्द ठीक हो गया,और उनको ओर्थोपदिक डाक्टर को दिखाने की अवय्श्कता ही नहीं पड़ी,अब इसको विज्ञान क्या कहेगा? योगदा सत्संग सोसाइटी के संस्थापक पूज्य श्री परमहंस योगानंद जी द्वारा लिखित पुस्तक ऑटोवायोग्राफी ऑफ़ ऑफ़ ए योगी में विज्ञान को चुनोती देते हुए अनेकों चमत्कार हैं |
 कुछ वर्ष पहले मैंने प्राणिक हीलिंग का कोरस किया था, वोह चिकत्सा शारीर में स्थित विभिन्न चक्रो को ठीक करके की जाती है, और रोगों का पता शारीर के चारो ओर एक आवरण होता है, जिसको औरा कहते है,उसकी स्थिति का पता लगा कर किया जाता है,और इस औरा से यह भी ज्ञात हो जाता है,शरीर को कौन सी बीमारी घेरने वाली है? इस प्राणिक हीलिंग के द्वारा बिना स्पर्श के बिना दवाईओं के रोगी का इलाज होता है, और इस विद्या के द्वारा अपने से सेक्रों,हजारो मील बैठे हुए रोगी का इलाज भी संभव है,औरा का  तो एक विशेष कैमरा द्वारा चित्र भी  लिया जा सकता है |
  अभी तक तो विज्ञान चंद्रमा,और सूर्य की किरणों का इस पृथ्वी पर प्रभाव पड़ने के बारे में ज्ञात कर सका है,परन्तु क्या अभी तक विज्ञान सूर्य की प्रावेग्नी और इन्फ्रारेड किरणों के आगे पहुँच पाया है क्या?,या चंद्रमा की किरणों का समुन्द्र पे पड़ने वाले ज्वार,भाते को ही ज्ञात कर पाया है,और हमारे पुर्बजो ने तो सभी ग्रहोंकी किरणों का  पृथ्वी और मानव पर पड़ने वाले प्रभाव को ज्ञात कर लिया था, इसी से हमारे भृगु ऋषि ने भृगु सहिंता की रचना की थी,जो भूत,भविष्य और वर्तमान का ज्ञान करा देती है, और यहाँ तक बता देती है, अमुक व्यक्ति किस दिन अपने बारे में जानकारी लेने आयेगा, और इसको प्रमणित किया पंडित डी.के शर्मा जी ने मेरे लेख भ्रिगुसहिंता के बारे में मेरी अल्प जानकारी में टिप्पणी दे के, और संगीता जी जिनकी गत्यात्मक ज्योतिष द्वारा अधिकतर भविष्य वानिया ठीक निकलती हैं, उसको बहुत से लोग नकार देते हैं, जबकि संगीता जी ग्रहों के पड़ने वाले प्रबाभव को ज्योतिष की गणना के द्वारा बतातीं हैं और उन्होंने अपने लेख में भृगु सहिंता को आज के परिवेश के अनुरूप लिखने के बारे में भी बताया था , चाहें विज्ञान के ख्गोल्शास्त्रियो ने कई प्रकाश पुर्ब ग्रहों की खोज कर लीं है, परन्तु मानव शरीर पर रत्नों का प्रभाव नहीं जान पाए  है, इस विषय में भी अपना अनुभव बताता हूँ, दिल्ली में एक व्यक्ति ऐसे थे,जो बिभिन प्रकार के रोगों की चिकत्सा रत्नों द्वारा करते थे, और मुझे भी अपने कुछ रोगों में लाभ हुआ था, वैसे यह रत्न या पत्थर ही कह लीजिए ज्योतिषी लोग अनेको प्रकार की समस्याओं का इन पथरों द्वारा उपाय बताते हैं,अब विज्ञान की जानकारी रखने वालेंइस विद्या को  निरर्थक  ही बताते हैं |
  अंत में में यही कहूँगा महान विज्ञानिक इनसटीन ने कहा था, "There is something which is controlling the universe."
और कहा जाता है,जहाँ विज्ञान का अंत होता है,वहीं से अध्यात्म प्रारंभ होता है,और यह अध्यात्म हमारे ऋषि,मुनियों ने भगवद कृपा से प्राप्त की थी, साइंस मैंने भी पड़ी है,और में इन विद्याओं को कभी निरर्थक नहीं कहता, साइंस जिज्ञासा और जिज्ञासा का समाधान का प्रारूप है,और साइंस ने हमें बहुत उपलब्धियां दी हैं,और भविष्य में भी देती रहेगी,अभी तो मैंने मंत्र,यन्त्र और तंत्र की बात नहीं की, नाही मैंने भगवान से साक्षात्कार की बात नहीं की, लेकिन जो तथ्य आज भी उबलब्ध हैं,साइंस उसको निरर्थक ना कह कर  साक्ष्य उबलब्ध कराये,हो सकता है भविष्य में विज्ञान इसमें सफल भी हो जाये,परन्तु आज के तथ्य जो मैंने पौराणिक ग्रंथो को छोड़ के लिखे हैं, क्या कुछ लोग जो विगयान की जानकारी रखते हैं,इनका गलत होने का प्रमाण दे सकते हैं?
  अब तो रामायण काल के चरित्रों की खोज श्री लंका में हो चुकी है,और उस काल के अवशेष भी मिल चुके हैं,क्या यह भी कोरी गप है, विदेशिओं ने इन ग्रथों उनके चरित्रों को मिथ कह दिया,तो हम भी उसको मिथ अथवा गप मानने लगे, विदेशी तो परतेक विषय पर शोध करते हैं,और हम लोगों के पास अनन्त भंडार होने के बाद बिना उसको बिना जाने तर्क करते हैं,और जब विदेश में उन विषयों पर शोध होने के बाद प्रमाणित होतें हैं,तो हम मान लेते हैं,हमारे यहाँ बहुत से विषयों को जानने के विज्ञान के अतिरिक्त दुसरे रास्ते भी,पर पता नहीं हम लोग उन रास्तों पर अग्रसर क्यों नहीं होते?


  सभी पाठको को विजयदशमी की अनेको शुभकामना

2 टिप्‍पणियां:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

हैपी दशहरा.. हैपी ब्लॉगिंग

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

विनय जी, आपने अपनी बात बहुत ही अच्छे तरीके से प्रस्तुत की...
बात दरअसल ये है कि कुछ लोगों की बुद्धि पर पश्चिम का प्रभाव इतना अधिक पडा हुआ है,ओर वो आजादी के इतने बरस बीत जाने के पश्चात भी गुलाम मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए है। इन लोगों को सिर्फ इतना आता है कि किसी भी पुरातन परम्परा,नियम,विषय इत्यादि को बस गलत सिद्ध करना है....सिर्फ विरोध करने के नाम पर विरोध किया जा रहा है। न तो इन लोगों को किसी विषय की जानकारी है ओर न ही इन्होने अपने आदिग्रन्थों का कभी अध्ययन किया है....बस सीखा है तो सिर्फ मात्र विरोध करना।
मान लीजिए कि विज्ञान किसी विषय को अस्वीकार करता है तो उसे गलत तो सिद्ध करें...ये कैसा विज्ञान है जो कि अपने ही नियमों को ताक पर रखकर "फतवे" जारी कर रहा है।
ये लोग अन्धश्रद्धा उन्मूलन की बात करते हैं,जब कि देखा जाए सबसे बडे अन्धश्रद्धा के शिकार तो ये लोग स्वयं हैं।...बिना किसी विषय की जानकारी के बस विरोध,विरोध और सिर्फ विरोध....
(ब्लाग पर नई पोस्ट:- पुनर्जन्म की वैज्ञानिक संभावना)