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रविवार, फ़रवरी 01, 2009

मेरी जीवनी कानपुर

अब हमरी बदली कानपुर के लिए हो गई थी,मुझे अब याद है,की हम लोग रेल गाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे मैं, बैठ कर के कानपुर के लिए जा रहे थे। मेरठ मैं लोगो ने हमे फरेवेल्ल दिया था,हम लोगो को खाने पर बुलाया था।
पापा का प्रतेयक तीसरे साल तबादला हो जाता था।
अब हम कानपुर पहुँच चुके थे,किस समय और कब हम लोग कानपुर पहुंचे थे,मुझे कुछ याद नहीं।
जहाँ से मुझे याद है, वोह लिख रहा हूँ, हम लोगो ने ८० फीट रोड पर घर लिया था, जो की पहेली मंजिल पर था,चारो तरफ़ से घर की दीवारों से घिरा हुआ नीचे एक स्कूल था, हमारे घर के पड़ोस मैं मिस्टर शेरी का घर था, जहाँ पर मेरी माँ की अक्सर मिसेस शेरी से लडाई हुआ करती थी,एक बार मेरी मम्मी की मिसेस शेरी से लडाई हो गई थी,तो मिसेस शेरी मुँह बना के कुछ बोली तो मेरी माँ बोली,"मुँह टूट गया,मुँह टूट गया",शायद मेरी माँ का लड़ने का स्वाभाव है, अक्सर ट्रेन मैं मेरी माँ का सहयात्रियों से झगड़ा होता रहता था।
घर की दूसरी मंजिल पर मिस्टर चोबे रहते थे,उनके दो बच्चे थे, शरद और एक लड़की जिसका नाम मुझे याद नहीं,और एक घर और था, जिसमे ललू रहता था,उसकी एक बहेन थी रानी। हमारे घर के दूसरी तरफ़ मिस्टर गुप्ता रहते थे। घर के नीचे अक्सर गाय बैठा करती थी, जिनका दूध कभी कभी मेरा भाई निकाल लेता था,घर के नीचे किसी पारसी की सीमेंट की दुकान थी,घर के दूसरी तरफ़ नीचे की ओर मेरे पापा के मामा जी घर था,जहाँ पर पापा का अधिकतर समय व्यतित होता था,मेरे पापा के मामा जी के पाँच बच्चे थे,मोपी,छोटे,अमला,बेबी और गुड्डी।
मेरे पापा के मामाजी के यहाँ एक दादी थी,और उन लोगो ने एक कुत्ता पाल रखा था। पापा के मामा जी के घर से बहार निकलते ही, खटिक लोगो का घर था,वहाँ एक आदमी था,जोकि सूर्य के सामने खड़ा हो करके घंटो पूजा किया करता था,और एक औरत थी जो की गंदे,गंदे शब्दों का उपयोग करती थी,हमारे घर के नीचे दूसरी तरफ़ हमारे दोस्त अशोक का घर पहली मंजिल पर था, उसका एक भाई था अश्वनी जिसके अजीब से बाल थे,उसको हम मुर्गकेश कहेते थे,वोह परय्तेक मंगल वार को पनकी मैं जोकि बहुत दूर था,अक्सर पैदल चल कर के वहाँ के हनुमान जी के मन्दिर जाया करता था,वोह मन्दिर बहुत विख्यात था,अशोक की एक बहिन भी थी,हमारे घर के पीछे लड़किओयों का एक कॉलेज था आचार्य नरेन्द्र देव,जहाँ हम लोग अक्सर खेलने जाया करते थे,और एक दूध की डेरी होती थी जहाँ से हम लोग दूध लाया करते थे,मोपी भी हमारे साथ होता था,घर से थोड़ी दूर पर ब्रह्म नगर के चोर्हाये पर मुंशी जी बैठा करते थे,पापा हम लोगो को उनके पास जाने से मना करते थे,पापा बहुत ही घमंडी थे,वोह छोटे लोगो से हमारा मिलना पसंद नहीं करते थे, और मुंशी जी के घर के पास मोपी के दोस्त गोविन्द का घर था,गोविन्द बहुत ही होशियार था, वोह .बी.टी. मैं पड़ता था,उसका एक भाई था रामचंद्र,गोविन्द हम लोगो की अक्सर पढाई की सम्साये हल करता था, अक्सर गुड्डी उसको अपनी पडाई की सम्साये हल कराने के लिए बुलाती थी, गुड्डी ने इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग पिलानी से कर ली थी,बेबी कानपुर के मेडिकल कॉलेज मैं पड़ती थी,मेरे पापा के मामा जी की कहीं बदली हो गई थी, तब बेबी को हमारे घर मैं रहना पड़ा था, उसको कॉलेज से कर के मेरी माँ की छुआ छूत के कारण सारे कपड़े बदलने पड़ते थे,मेरी माँ बहुत ही छुआ छूत करती हैं अगर कोई निम्न जाती का इन्सान नल को छु दे, तो वोह नल पर बहुत से कागज बाँध कर आग लगा देती है, अगर हमारा कपड़े पर पैर पड़ जाए तो हमे नहाना पड़ता है, अमला मुझे बहुत प्यार करती थी, उस समय अमला कानपुर के क्रिस्ट चर्च कॉलेज मैं पड़ती थी, वोह मुझे अपने साथ कभी कभी अपने अध्यापको के पास ले जाती थी, बेबी की मेडिकल करने के बाद किसी .., के.के शर्मा से शादी हो गई है,और वोह इंग्लैंड मैं रहती है, अमला ने प्रेम विवाह कर लिया और वोह मिसेस गाँधी हो गई है,वोह दिल्ली के मैत्रेय कॉलेज मैं पढाती हैं, मोपी ने चडीगढ़ से केमिकल इंजीनियरिंग करके .बी. कर लिया था, और कुछ समय बलारपुर पेपर इंडस्ट्री मैं काम करके आपना काम कर लिया है, छोटे की बैंक मैं नौकरी लगवा दी गई थी।
अब शायद मैं जवानी के नाजुक कहे जाने वाले पड़ाव मैं पहुँच चुका था, हम लोगो का दाखिला संत फ्रांसिस जैवेर्स स्कूल मैं करवाया गया था, चूंकि मेरे दाखिला दसवीं मैं होना था तो कुछ कठिनाई रही थी, एक बार मैं रामायण पड़ रहा था,अगले दिन मेरा भी दाखिला हो गया था,तब पापा बोले की तुमने रामायण पड़ी थी इस्लिएय दाखिला हो गया।
अब मेरी बदकिस्मती के दिन शरू हो गए थे, क्योंकि मेरे साँस लेने के कारण मेरा मुँह खुला रहता है, तो मेरे एक अध्यापक मिस्टर दीक्षित ने पुछा की तुम मुँह खुला क्यों रखते हो, तब से मेरे सहपाठी मुझे,"मुँह खोलू,मुँह खोलू कहने लगे, मेरे कोमल मन पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता था,और तो और मेरी चाल कुछ ख़राब है, मैं थोड़ा उच्हल उच्हल कर चलता हूँ, मेरी माँ पापा के मामा जी के बच्चो के सामने बजाय मेरी चाल ठीक करने के पंजाबी गाना गाती थी, "मेनू ले दे स्लीपर काले जे मेरी चाल देखनी",मेरा कोमल मन और मुरझाने लगा था।
मेरे पापा ने मुझे कभी अपना निर्णय नहीं लेने दिया, जिसके कारण मेरी अपने निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो गई, जिसके कारण मुझे अब तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, पापा ने मुझे हिन्दी,अंगेरजी,साइंस और गणित की टूशन लगवा दी थी, मुझे हिन्दी अंग्रेजी की टूशन की आवश्यकता नहीं थी, मेरी हिन्दी अंग्रेजी अच्छी थी, कालांतर मैं तो भावुक होने के कारण हिन्दी मैं कविता लिखता था। मुझे अमिन साहिब गणित और साइंस पढाते थे, मेरा भाई बहुत शैतान था, वोह अमिन साहिब की साइकिल की हवा निकाल देता था। हम लोगो के हिन्दी के हिसाब से मेरी माँ हमारे जन्मदिन पर सताय्नारैन भगवान की कथा कराया करती थी, एक बार जब पंडित जी हमारे यहाँ कथा,करने के लिए आए तो जैसे ही पंडित जी कुर्सी पे बैठने लगे तो उसने कुर्सी खींच ली,पंडित जी तो चारो खाने चित, वोह बोले की अब मैं आपके यहाँ कभी कथा नहीं करूँगा।
पापा के दो सिपाही थे, प्रकाश और सिख्वासी राम, प्रकाश कथा के लिए प्रसाद लाया था, तो पंडित जी बोले की मैं इसका लाया हुआ प्रसाद नहीं खाऊँगा, मेरी माँ तो चारो खाने चित, बाद मैं पता चला प्रकाश निम्न जाती का था।

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