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रविवार, जुलाई 19, 2009

पैसा पैसा और केवल पैसा

अभी,अभी आवेश जी के द्वारा लिखित एक लेख पड़ा, शर्म,शर्म,शर्म जो कि स्टार पलस पर प्रसारित होने वाले नएसीरियल "सच का सामना के बारे मैं था", केवल पैसे के लिए नेतिकता कहाँ तक गिर गयी है, बात इस कार्यक्रम मैंभाग लेने वालो कि हो या इस सीरियल के प्रसारित होने वाले सीरियल की हो, आश्चर्य होता है, पैसा कमाने के लिएइस मैं भाग लेने वाले और दूरदर्शन पर स्टार पलस सीरियल की T.R.P बढ़ाने की हो, इन अश्लील सवाल,जवाब मैंनेतिकता कहाँ तक समाहित है, पता नहीं इस देश के आदर्श कहाँ तक जा रहे हैं, केवल पैसे के लिए, चलचित्र पर तोसेंसर की कैंची है जिसकी संख्या दूरदर्शन पर प्रसारण से कम है, परन्तु दूरदर्शन पर क्यों नहीं।
बहुत दिनों से यह भी विचार रहा था कि बच्चो का रियलिटी शो मैं भाग लेने पर उनके रियलिटी शो मैं से निकलजाने पर इन बच्चो की कोमल भावना पर कैसा विपरीत मनोवेगयानिक प्रभाव पड़ता है, एक बच्चे पर रियलिटीशो के जज के कटु शब्दों का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसको चिकत्सालय मैं दाखिल करना पड़ा, यह भी तो चैनल कीबढ़ाने के लिए बच्चो के कोमल भावनाओ से खिलवाड़ ही नहीं तो और क्या है, बच्चे शो मैं से निकलने केबाद कैसे सिसक,सिसक के रोते हैं,पर चैनल को इसकी सुध कहाँ, बस उनको तो केवल पैसा कमाना है,अब जा करसरकार ने इसकी कुछ सुध ली है,अभी तक तो इसके बारे मैं कोई विधयेक नहीं बना, जिसके बारे मैं प्रारम्भ से हीविचार होना चहिये था, बच्चो की इस कोमल अवस्था पर सब से अधिक मनोवाज्ञानिक प्रवहावपड़ता है, मैं यह नहींकहता की इस प्रकार के कार्यक्रम नहीं होने चहिये,उनके सरवान्गिन विकास के लिए अवशयक हैं, परन्तु इसमेपरतीस्पर्धा बिल्कुल नहीं होनी चहाहिए जिसके कारण उन बच्चो पर मनोवाज्ञानिक दवाब ना बने,शारीरकअक्षमता जब तक असाध्य नही हो ठीक हो जाती है,अगर मनोवाग्यानिक रूप से बच्चा कमजोर हो गया, मनोवागय्निक चिकत्सक से इलाज कराने के बाद भी पूर्ण रूप से भावनात्मक रोग से नहीं निकल पाता, और यहभाव्नाक्त्मक रोग उसके आगे के विकास मैं बाधक हो जाता अब, क्यों यह रियलिटी शो बच्चो के साथ खिलवाड़कर रहे हैं,केवल पैसे के लिए?
अब आता हूँ खेल जगत पर,क्रिकेट इस देश मैं सबसे लोकप्रिय खेल है, और इसकी हालत इस प्रकार है, अब सालके लगभग ३६५ दिन मैं इस खेल को देख लो, जिसमे अधिकतर खिलाड़ी चोटिल हो रहे है, परन्तु क्रिकेट संचालकोके पास पैसा पहुँच रहा है, खिलाडियों के स्वास्थय पर इसका जो परतिकुल प्रवहाव पड़ रहा है, उसकी चिंता किसकोहै, अब तो इस खेल का स्वरुप ही बदल गया है, पहेले तो पॉँच दिन का खेल होता था, और दो दिन के बाद विश्राम केबाद खिलाड़ी नई सफूरती के साथ खेलते थे, फिर इसने ५० ओवर का स्वरुप लिया जो की फिर भी गनीमत थी, अबतो इसने २०-२० का स्वरुप ले लिया है, जानी,मानी हस्तियों ने खिलाडियों को खरीद लिया है, और इसकीलोकप्रियता के कारण तपती गर्मी हो, पर यह क्रिकेट लगभग परतिदिन हो रहा है, खिलाडियों का स्वास्थय ख़राबहो रहा है तो हो, परन्तु इन हस्तियों का पैसा तो बन रहा है, खिलाडियों का स्वास्थय खराब हो तो हो, जो खेललोकप्रिय नहीं हैं उनके स्पांसर नहीं मिलते, और उन खेलो के कारण पैसा नहीं बनता, देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी गर्तमैं चला गया है, क्योकि लोकप्रिय ना होने के कारण उससे कोई अधिक कमाई नहीं होती, इसी प्रकारटेनिस,बदमिन्तों,बोक्सिंग इत्यादि मैं, इतना पैसा नहीं है, जितना क्रिकेट मैं है, क्रिकेट मैं कमाई होने के कारण यहखिलाड़ी लोकप्रिय है, बच्चा,बच्चा इनका नाम जानता हैं, परन्तु और खेलो मैं अगर कोई खिलाड़ी शीर्ष पर पहुँचताहै,तो उसका नाम परसिद्ध हो जाता है, परन्तु इन खेलो मैं क्रिकेट की अपेक्षा मैं पैसे की कमाई ना होने के कारणकुछ ही खिलाड़ी लोकप्रिय हो पाते हैं, जो कि अपने अथा परिशर्म के कारण शीर्ष पर पहुंचते हैं।
अंत मैं येही कहूँगा "ना बाप बड़ा भइया सब से बड़ा रुपैया"






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