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शनिवार, दिसंबर 05, 2009

प्राचीन काल में प्यार की उत्पत्ति

आज कल प्यार का मतलब तो विकृत  वासना से हो गया है, परन्तु सब से पहले प्यार का उदहारण हमारे ऋग्वेद में मिलता है, और उस समय के ऋषि मुनि यह मानते थे, पूरे विश्व को प्यार का सन्देश हमरे देश भारत से मिला था, हमरे ग्रंथो में प्यार के देवता कामदेव का काम का सन्देश पहूचाने के लिए बहुत सुन्दर उदहारण मिलता है, जब कामदेव को किसी के हिर्दय में प्यार जगाना होता है,तो वसंत ऋतू का आगमन हो जाता है,और चारो ओर सुरमय वातावरण हो जाता, सुन्दर,सुन्दर फूल खिल जाते हैं, ना ग्रीष्म ऋतू की गर्मी, ना शरद ऋतू की शीत, आम के पेड़ों पर लगे बोर, और कामदेव के हाथों में, धनुष जिससे फूलों वाला तीर सीधे प्रेमी और प्रेमिका के हिर्दय पर अघात करता है, और प्रेमी और प्रेमिका के मन में प्यार जागृत हो जाता है, यह भी वासना है,परन्तु विकृत ना होकर वासना का सुन्दर स्वरुप |
   कामदेव का पहले शरीर होता था, परन्तु उन्के शरीर ना होने का कारण के पीछे एक कथा है, एक बार किसी राक्षस का वध करना था,जो कि केवल देवों के देव महादेव कर सकतें थे, लेकिन उस समय महादेव जी समाधि में बैठे थे, और राक्षस का वध करने के लिए उनकी समाधी का टूटना आवश्यक था, तो देवताओं ने कामदेव से प्रार्थना की आप भगवान् शिव की समाधी तोड़ें,तब कामदेव ने शिव भगवान् के मन में प्यार का अंकुर जगाने का प्र्यतन किया,और भगवान् शिव का तीसरा नेत्र खुल गया और कामदेव के शरीर का नाश हो गया,कामदेव की पत्नी रति रोती,बिलखती भगवान् शिव के पास गयीं तो महादेव जी ने कहा,कामदेव का शरीर तो नहीं मिल पायेगा परन्तु तुम दोनों मिल कर लोगों के हिर्दय को प्रेम से अंकुरित करोगे |
  हमारे देश में खुजराहो और कोणार्क के मंदिरों को देखने के लिए दूर,दूर से लोग आते हैं, खजुराहो के मंदिरों में बहार की दीवारों पर काम कला को पर्दर्शित करने वाले भित्ति चित्र हैं, परन्तु मंदिरों के अन्दर कुछ नहीं,जिसका आशय है, भित्ति चित्र इंसान के अन्दर की बुराई को पर्दर्शित करते हैं,और जब इंसान मंदिर के अन्दर जाता है,तो उसकी बुराइयाँ बहार रह जातीं हैं|
  इन खजुराहों के मंदिर का इतिहास यह है, उन दिनों चंदेल राजा का राज्य था, और उनकी प्रजा के लोग सन्यास ले रहे थे, तब राजा को लगा की जब सब लोग सन्यास ले लेंगे तो उसके राज्य का अस्तित्व तो कुछ नहीं रह जायेगा,तब उसने प्रजा को इन मंदिरों का निर्माण करके यह सन्देश दिया, सन्यास के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है, और इस प्रकार इन मंदिरों का निर्माण हुआ
  हमारे देश की ही देन है,वात्सायन का कामसूत्र परन्तु लोग भागते हैं, विदेशों के विकृत वासना के साहित्य और विकृत चलचित्रों के ओर |
  आज कल तो लिव इन रिलेशन का स्वरुप देखने को मिल रहा है, परन्तु हमारे प्राचीन ग्रंथों में,शिव पारवती के प्रेम का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है, यह तो सर्विदित है, माता पारवती ने भगवान् शिव को अपने पिता दक्ष के पूजा पर ना बुलाने पर हवन कुंड में अपने तन को स्वहा कर दिया,और महादेव जी माता पारवती का मृत शरीर लिए हुए सब ओर घूमते रहे, ऐसा था महादेव जी का और पारवती जी का प्रेम,और बाद में विष्णु भगवान् ने अपने सुदर्शन चक्र से पारवती के शरीर के ५१ टूकरे कर दिए,और जहाँ,जहाँ माता पारवती के शरीर के टूकरे गिरे वहाँ,वहाँ शक्ति पीठ बन गये |
 कहा जाता है,विवाहित स्त्री पुरुष शिव पारवती का जोड़ा है, मत करो बदनाम  इस माँ पारवती और शिव के जोड़े को |

4 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बदलते दौर में हर रिश्तों के रूप बदल रहे है आज कल हम लोग प्राचीन काल के ग्रंथों से खुद सीख लेने के बजाए अपने बनाए रास्तों पर चलना ज़्यादा पसंद करते है और यही कारण है की और भी दुखी है....बढ़िया बेहद सुंदर बात कही आपने..धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

विचारणीय आलेख.

राजेश बुढाथोकी 'नताम्स' ने कहा…

nice blog!! Nice post. ok keep blogging.
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Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! सच्चाई को बयान करते हुए सुंदर आलेख!