<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169</id><updated>2012-02-16T11:23:38.979-08:00</updated><category term='केवल शेर क्यों इन जीव'/><category term='मत करो बदनाम  इस माँ पारवती और शिव के जोड़े को |'/><category term='२५ जुलाई को है मेरी पत्नी का जन्मदिन'/><category term='हंसते रहो'/><category term='ऐसी थी मेरी विदेश यात्रा वोह भी हवाई |'/><category term='नाना'/><category term='बुराई  बुरी होती है'/><category term='तमसो माँ ज्योतिर्गमय      असतो माँ सद्गमय'/><category term='क्यों बदनाम है जानवर?'/><category term='असफल इन्सान अंधकार से निकल कर सफलता का उजाला दें |'/><category term='नववर्ष की शुभकामनायें |'/><category term='एक सच्ची कहानी'/><category term='कल ५ सितम्बर को शिक्षक दिवस है'/><category term='यह सब सोच कर'/><category term='स्योंगो से प्रवाहवित व्यक्तिव'/><category term='कुछ मनोवाज्ञानिक कारण प्राचीन परम्परा के बारे में |'/><category term='अ़ब अगले शनिवार या रविवार तक के लिए अलविदा'/><category term='सिगरेट'/><category term='हमारा नाती'/><category term='Diffrence betweeen fair vs black andbrown skin'/><category term='ना की  बुरे लोग'/><category term='क्यों थी वर्णव्यवस्था दूषित'/><category term='अच्छा लगा ऐसा सच का सामना'/><category term='ऐसा नासूर ना दो जो घाव बन जाये'/><category term='जैसा जिसका व्यक्तिव और सोच वैसी ही टिप्पणी'/><category term='टी.आर.पी बढाने की होड़ में कब बंद होगा बच्चों के साथ इस प्रकार का  खिलवाड़'/><category term='मेरे काव्य'/><category term='बड़ती आयु एक संख्या है'/><category term='मेरी जीवनी का अन्तिम चरण'/><category term='में अपना योगदान दीजिये |'/><category term='क्या आपने इसीलिए सृष्टि की रचना की नीली छत्री वाले'/><category term='अगले जनम मैं मुझे बेटी देना(भाग २)'/><category term='पाश्च्यात्वाद'/><category term='विद्याओं को विज्ञान की सीमा में ना बांधो'/><category term='नम्स्त्सय नमो: नम:'/><category term='जय माता की |'/><category term='कभी इस प्रकार से सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं'/><category term='धन्यवाद ब्लोगवाणी का नया स्वरुप हमारीवाणी'/><category term='http://blogonprint.blogspot.com/2009/08/blog-post_25.html'/><category term='या कुछ और |'/><category term='इस बारे में आपकी राय चाहिए'/><category term='संबाद के साथ सदभावना बनी रहनी चाहिए |'/><category term='अपनी समीक्षा देकर मुझे समृद्ध करें |'/><category term='धन्यवाद |'/><category term='जय'/><category term='यूनिवरसिटी कालेज ऑफ़ लन्दन का नया शोध |'/><category term='साईं इतना दीजिये जिसमे कुटुंब समाय |     में भी भूखा ना रहूँ और भी भूखा ना जाये ||'/><category term='जानने के बाद तर्क देना ही अच्छा लगता है |'/><category term='मेरा अनुरोध राष्ट्रीय ध्वज का मान रखिये'/><category term='गाड़ी चलाना परिवार के सब व्यस्क सदस्यों को आनी चाहिए'/><category term='मेरी जीवनी मेरठ'/><category term='माता रानी से प्रार्थना'/><category term='एक नोटिस |'/><category term='ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये |'/><category term='मेरी जीवनी भिवानी'/><category term='विवाद समाप्त करकेअपने इस देश को उसी प्राचीन गौरव से सम्मानित करना चाहिए'/><category term='कब छुटेंगे स्त्री'/><category term='प्रक्रति माँ का मत करो उपहास'/><category term='बहुत शुभकानाएं'/><category term='आई.पी.एल का क्या औचित्य है ?'/><category term='जय श्री गुरुदेव  |'/><category term='अपनी खोई विद्याओ को खोजे'/><category term='पूजा का अर्थ समझो |'/><category term='गृहस्थ जीवन सबसे बड़ा तप या तपस्या है |'/><category term='माँ मेरे सभी अपराध क्षमा करना'/><category term='मानो या ना मानो'/><category term='हमारी ख़ुशी का दूसरा स्रोत'/><category term='पश्चिमी और भारतीय संस्कृति का अच्छा मिला जुला स्वरुप बनाये'/><category term='मुझे इन्सान के रूप में अनेकों हीरे मिले'/><category term='मेरी जीवनी आगरा'/><category term='हर किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयत्न करें |'/><category term='नानी बनने के बाद लगता 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और आपस का अत्मिक रिश्ते में सामंजस्य रखें |'/><category term='पाठकों की प्रतिक्रियाएं सर आँखों पर धन्यबाद'/><category term='क्या करुँ मेरे ऊपर मेरे मस्तिष्क से अधिक मेरा हिर्दय राज करता है |'/><category term='छुड़वाने का सरकार की ओर से  प्रवाधान क्यों नहीं?'/><category term='चिकत्सा शास्त्र का नया शोध'/><category term='गुटखा'/><category term='अगले जनम मै मुझे बिटिया देना भाग १'/><category term='मेरी जीवनी गाजिआबाद'/><category term='प्राक्रतिक आपदाओं का परिणाम'/><category term='बहनों जागो कुछ अपने में भी तो सामाजिक चेतना लाओ'/><category term='मेरी जीवनी फरुखाबाद'/><category term='नया सीखने की कोई आयु सीमा नहीं होती |'/><category term='हम सिक्के के दो पहलु में से अच्छा पहलु क्यों नहीं देखें ?'/><category term='अपने देश के बारे में सजग हो |'/><category term='नारी का उथान अति अवाश्यक'/><category term='जब अधिकतर सहयोग नहीं |'/><category term='मेरी जीवनी कानपुर'/><category term='अविश्वास क्योँ'/><category term='इतिहास अपने को दोहरा रहा है |'/><category term='किसी से आत्मीयता बढाने के लिए 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पहेले तो समय अधिक होता था, और लिखने पड़ने मैं रूचि होने के कारण कुछ ना कुछ इस कम्प्यूटर के श्वेत पटल पर अक्सर इसी प्रकार की,आड़ी तिरछी सी रेखाएं उकेरे कर अपनी भावनाओं को पर्दर्शित करने का असफल प्रयत्न करता था, बहुत प्रकार से अपनी भावनाओं को पर्दर्शित किया,कभी चित्रकारी के माध्यम से और कभी,काव्य और गद्य के रूप मैं |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;इन पक्न्तियों को लिखते,लिखते एक फ़िल्म का गीत मानस पटल पर उभर रहा है, मैं पल दो पल का शायर हूँ,पल,दो पल मेरी जिंदगी है,पल दो पल मेरी रवानी है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;कल आयेंगे मुझ से बेहतर कहने वाले और तुमसे बेहतर सुनने वाले, यह गीत सन 75 के दशक का है, जिसको आज कल रेट्रो,रेट्रो कह कर पुकारा जाता है, और उसकी पुनाविरती करने का प्रयत्न किया जाता है, और क्या विचित्र बात है, रेट्रो के ज़माने के इन्सान के लेखक के लेखों को उपेक्षित ही समझा जाता है,जैसा कि मुझे अपने लेखों पर प्राप्त दो या अधिक से अधिक तीन टिप्पणियों से विदित होता है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;भाई आज कल मैंने मेक्स न्यू योर्क लाईफ इंशोरेंस का काम पकड़ लिया है, और कहतें हैं ना, बहुत सारे सुख के समय के मित्रों से एक अच्छा मित्र वोही है, जो आवश्यकता के समय काम आतें हैं, तो इस काम ने परिचय करा ही दिया कौन,कौन &amp;nbsp;मेरे सच्चे&amp;nbsp;मित्र है,और यह परख तो निरंतर जारी है, मैं इंशोरेंस के लिए किसी पर दवाब नहीं डालता फिर भी लोग और परिचय देने मैं हिचकतें हैं, वोह मित्र जो कहते थे,हम आपके मित्र हैं,लेकिन वोह आवश्यकता के समय पर बहुत ही सफाई से झूठ बोलते हैं,जबकि जीवन बीमा का उद्दश्य किसी के पैसे को खर्च कराना नहीं,बल्कि उसकी बचत कराना और मानव को उसके परिवार की &amp;nbsp;सुरक्षा,बच्चों की पदाई,और सेवानिवर्ती की योजना बनाने मैं सहायता देना है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;आज गुरु जी की एक बात याद आ रही,लोग तुमको तुम्हारे सोचने से पहले भूल जायेंगे |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;यह है विकसित व्यक्तिव वाले लोगों का व्यवहार,इससे तो बच्चे लाख गुना बेहतर हैं, आज लड़े कल भूल गएँ, सब मैं एक काम करने के लिए मिली,जुली भावना और एक दुसरे के सहयोग करने की भावना |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;इस अत्मव्भिव्यक्ति को जगजीत सिंह की इस गजल को समाप्त करता हूँ |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;"यह दौलत भी ले लो&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;यह शोहरत भी ले लो&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;चाहे ले लो मेरी जवानी&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;लौटा दो मेरा वोह बचपन&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;वोह कागज की कश्ती&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;वोह बारिश का पानी "&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;b&gt;क्या लेना मुझे प्रंशसा से,जब अधिकतर सहयोग नहीं |&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-6349468114498084075?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/6349468114498084075/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=6349468114498084075&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6349468114498084075'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6349468114498084075'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='जीवन की व्यस्तताओं ने नेट से सम्बन्ध  विच्छेद सा ही कर दिया |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1922241673429072012</id><published>2011-02-27T06:46:00.000-08:00</published><updated>2011-02-27T06:51:19.931-08:00</updated><title type='text'>कलम की निर्झरता बनी रहे,तो लेखन के विषय मैं विचार आतें हैं |</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;u&gt;&lt;strong&gt;कलम की&amp;nbsp;निर्झरता&amp;nbsp;बनी&amp;nbsp;रहे,तो&amp;nbsp;लेखन&amp;nbsp;के&amp;nbsp;विषय&amp;nbsp;मैं&amp;nbsp;विचार&amp;nbsp;आतें&amp;nbsp;हैं |&lt;/strong&gt;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बहुत दिनों कुछ तो व्यस्तता के कारण और,अन्य और भी अनेकों कारणों से कुछ नहीं लिख पाया, एक तो हमारे सर्विस प्रोविडर मैं,अनेकों प्रकार की &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बाधायें आती रहीं,और बिजली रानी का तो क्या कहना,बिना कोई नोटिस दिए इसका आना जाना लगा रहता था, जबसे मुख्य मंत्री मायावती जी का हमारे क्षेत्र मैं दौरा होने वाला था, तबसे प्रशासन&amp;nbsp;मायावती जी के आने के डर&amp;nbsp;से&amp;nbsp;जिले की&amp;nbsp;व्यवस्था&amp;nbsp;सुधारने&amp;nbsp;मैं लग गया,भाई &amp;nbsp; तुलसीदास जी ने अपने काव्य ग्रन्थ मैं सही ही लिखा है,"भये बिना ना होती प्रीति", सागर ने जब रामचन्द्र जी के मांगने पर उनको लंका जाने का मार्ग नहीं दिया,तो लक्ष्मण जी के कहने पर,रामचंद्र जी ने सागर सुखाने के लिए अपना बाण साधा ,तब सागर ने अपनी मर्यादा की दुहाई देकर,दूसरा उपाय नल,नील द्वारा सागर पर सेतु बनाने को सुझाव दिया, अब इन प्रशासन के अधिकारीयों को जनता की सुबिधा से क्या लेना,देना,जनता तो इनको डरा नहीं सकती,इसीलिए तो व्यवस्था चरमरायी सी रहती है, और सुश्री मायावती जी के आने से बिजली व्यवस्था तो बिलकुल सुधर गयी है, पहले बिजली वालों से पूछो &amp;nbsp;क्या हुआ तो&amp;nbsp;उत्तर मिलता था,यहाँ&amp;nbsp;&amp;nbsp;तार&amp;nbsp;टूट&amp;nbsp;गया,वहाँ तार टूट गया,और मायावती जी के आने के बाद तो जर्जर तार तो बदले ही गए,और पुराने बिजली के खम्बे&amp;nbsp;भी बदले गए मायावती जी के आने से पहले,और जब वोह आयीं तो बही कुछ कमियां देख कर उन्होंने अपने तेवर दिखा ही दिए, लिखने का मन तो था,पर मस्तिष्क&amp;nbsp;अनिश्चता की स्थिति मैं था,और मन मैं&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;था,कितने&amp;nbsp;लोग&amp;nbsp;पड़ेगें,&amp;nbsp;हो&amp;nbsp;सकता&amp;nbsp;है,अवस्था&amp;nbsp;कुछ&amp;nbsp;अधिक&amp;nbsp;हो जाने के&amp;nbsp;कारण&amp;nbsp;यह&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;लगता&amp;nbsp;है,पता&amp;nbsp;नहींमैं&amp;nbsp;जो&amp;nbsp;भी&amp;nbsp;लिखता&amp;nbsp;हूँ, वोह&amp;nbsp;आज&amp;nbsp;के&amp;nbsp;समय&amp;nbsp;के&amp;nbsp;अनुसार&amp;nbsp;है,&amp;nbsp;कि नहीं,पाठको&amp;nbsp;मैं&amp;nbsp;संभवत:&amp;nbsp;मेरे&amp;nbsp;लेखन मैं&amp;nbsp;रूचि&amp;nbsp;बहुत&amp;nbsp;कम&amp;nbsp;है,जिसका&amp;nbsp;आभास&amp;nbsp;मुझे,गिनी,चुनी&amp;nbsp;टिप्पणियों&amp;nbsp;से&amp;nbsp;होता&amp;nbsp;है,&amp;nbsp;लेकिन&amp;nbsp;मझे&amp;nbsp;गुरु जी&amp;nbsp;परमहंस&amp;nbsp;योगानंद जी ने&amp;nbsp;मुझे "स्वयं आभास&amp;nbsp;करा&amp;nbsp;दिया है",&amp;nbsp;"अज्ञान&amp;nbsp;से&amp;nbsp;ज्ञान&amp;nbsp;की&amp;nbsp; और ले जाने ","अशांति से शांति की ओर ले जाने को","इच्छाओं से संतुष्टि की ओर ले जाने को",तो मुझे कम टिप्पणियों के मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता,बस यह अवश्य सोचता हूँ,पाठकों मेरे विषयों को आत्मसात करते हैं,की नहीं,&amp;nbsp;ना तो मेरे पास सामायिक विषय हैं,ना राजनितिक, इनके लेखन मैं मुझे रूचि नहीं है,इस ब्लॉग मैं तो अधिकतर ऐसे हीं विषय हैं,जो सार्थक&amp;nbsp; नहीं मेरे दुसरे ब्लॉग स्नेह्परिवार मैं,मेरे अनुसार सार्थक&amp;nbsp;विषयें हैं,परन्तु उसका भी यही हाल है |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;बहुत&amp;nbsp;सारे लेख पड़ने का&amp;nbsp; समय मेरे&amp;nbsp;&amp;nbsp;पास नहीं हैं, हाँ&amp;nbsp;ब्लोग्वानी मैं लिखे लेख पड़ &amp;nbsp;लेता था, मैं यह नहीं करता की &amp;nbsp;मेरा&amp;nbsp;अमुक,लेख पड़ कर&amp;nbsp;टिप्पणी&amp;nbsp;दें,जैसा&amp;nbsp;मेरे&amp;nbsp;साथ&amp;nbsp;होता है,और&amp;nbsp;अंत&amp;nbsp;मैं अपने&amp;nbsp;मित्र&amp;nbsp;राजीव&amp;nbsp;कुलश्रेष्ठ जी को धन्यवाद देता हूँ,जिनोहने मेरे दोनों ब्लॉग सजा दियें हैं,अब समय मिलेगा तो उनके अग्रीगाटर "wordblog" मैं लिखीं हुईं पोस्ट पडूंगा |&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;राजीव जी मैं भटक गया था,जो मेरे पास "योगदा सत्संग सोसाइटी",के गुरु जी की&amp;nbsp;शिक्षा के होते हुए कुछ कहा था, हाँ आपकी &amp;nbsp;धरोहर&amp;nbsp; &amp;nbsp;से बहुत सहारा मिला है |&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;b&gt;धन्यवाद राजीव जी &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1922241673429072012?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1922241673429072012/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1922241673429072012&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1922241673429072012'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1922241673429072012'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='कलम की निर्झरता बनी रहे,तो लेखन के विषय मैं विचार आतें हैं |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-5270432001285555245</id><published>2010-11-28T00:37:00.000-08:00</published><updated>2010-11-28T00:39:09.829-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धन्यवाद'/><title type='text'>क्या मुझे कोई फेसबुक पर पिशिंग की समस्या का हल दे सकता है |</title><content type='html'>&amp;nbsp;बहुत दिनों से मेरा फेसबुक पर पिशिंग की समस्या आ गयी है, मुझे तो नहीं पता था,यह पिशिंग क्या होता है,फेसबुक में जब अपना यूसर आई डि और पासवर्ड डालता हूँ,तो फेसबुक की ओर से सन्देश,आता है,आपका खाता अस्थाई रूप से स्थगित कर दिया गया है,और फेसबुक यह बताता है,फिशिंग का अर्थ होता है &amp;nbsp;बिलकुल फेसबुक लगने वाला साईट,फिर फेसबुक की ओर से आगे जारी करने का सन्देश आता है और दो शब्दों को वेरीफाई करने को कहता है,उसके बाद मेरेको मेरा&amp;nbsp; इ मेल दिखाता है,और नीचे सीकुरेटि कोड को वेरीफाई करने को कहता है,और फेसबुक यह कहता है आपको मेल भेज दिया गया है,और मेरे मेल में फेसबुक द्वारा भेजा हुआ&amp;nbsp; सेकुरिटी कोड होता है,जब में उस सेकुरिटी कोड को कोपी करके फेसबुक में उसके द्वारा पूछे हुए सेकुरिटी कोड को&amp;nbsp; &amp;nbsp;पेस्ट करता हूँ,तो वोह फेसबुक का पासवर्ड बदलने को &amp;nbsp;कहता है,जब में फेसबुक का पासवर्ड बदलता हूँ,फिर मुझे सन्देश मिलता है,आपको मेल भेज दिया गया है,और जब में अपने खाते को खोलता हूँ,तो वहां फेसबुक द्वाराएक लिंक भेज कर&amp;nbsp; सन्देश मिलता है,अपने फेसबुक पर नियंत्रण कर लें,जब में उस लिंक पर चटका लगाता हूँ,तो फेसबुक खुल जाता है,और यही सन्देश मिलता है,आपका खाता फिशिंग के कारण अस्थायी&amp;nbsp;रूप से &amp;nbsp;स्थगित कर दिया गया है,फेसबुक की सहायता में मुझे इस समस्या का कोई समाधान नहीं मिला,बस जैसे मैंने विवरण दिया है,यह प्रक्रिया 10-15 से दोहरा रहा हूँ,मुझे कोई मेरी इस समस्या का निदान दे सकता है कोई ?&lt;br /&gt;मेरे पी.सी में एंटीवायरस भी है,पर मुझे नहीं लगता इस समस्या का निदान&amp;nbsp;एंटीवायरस है,फेसबुक मेरे बहुत सारे मित्र हैं,जो भी कोई मुझे इस समस्या से बचा सकता है,उसके लिए बहुत,बहुत धन्यवाद |&lt;br /&gt;धन्यवाद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-5270432001285555245?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/5270432001285555245/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=5270432001285555245&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5270432001285555245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5270432001285555245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/11/blog-post_28.html' title='क्या मुझे कोई फेसबुक पर पिशिंग की समस्या का हल दे सकता है |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2431776915983001336</id><published>2010-11-14T08:23:00.000-08:00</published><updated>2010-11-14T08:23:11.147-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गाड़ी चलाना परिवार के सब व्यस्क सदस्यों को आनी चाहिए'/><title type='text'>कार रखने वाले परिवार में परिवार के सभी व्यस्क लोगों को कार चलाना आना चाहिए |</title><content type='html'>कल संगीता जी का एक आलेख पड़ रहा था, अब कम्पूयुटर ही पूरा करेगा मेरा शौक, यह तो सत्य है,अगर कोई शौक पूरा नहीं हो पाता तो इन्सान उसका विकल्प खोज ही लेता है, जैसे संगीता जी ने लिखा था,कि वोह गाड़ी चलाना नहीं सीख पायीं तो उन्होंने उसका विकल्प कम्पूयुटर पर कार चलाने वाला नए,नए खेल इंस्टाल करके अपना गाड़ी चलाने का शौक पूरा करतीं हैं, और कोई भी सीखी हुई चीज व्यर्थ नहीं जाती, उनके इस आलेख से मुझे एक दुर्घटना&amp;nbsp; स्मरण हो आयी जो कि,जो हमारी बेटी के जेठ कि पत्नी की बहिन के साथ घटी थी |&lt;br /&gt;वोह दोनों बहने गंगा तट पर बसी धार्मिक नगरी गंगा तट पर बसी हरिद्वार की हैं,हमारी बेटी के जेठ की पत्नी का प्रेम विवाह हुआ था,उसका पति जो अब इस लोक में ना होकर परलोक का हो गया है, वोह भी हरिद्वार का ही है, और उंनका एक बेटा भी है,उस मासूम बालक की आयु उस समय मात्र तीन वर्ष का था, जब उस पति का एक दुर्घटना में अंत हो गया था, किसी एक्सीडेंट वाली दुर्घटना नहीं, दोनों पति पत्नी की नौकरी दिल्ली में थी, तो इसलिए वोह परिवार के तीनो सदयस्य दिल्ली में ही रहते थे, चूंकि दोनों का घर हरिद्वार में होने के कारण उनका दिल्ली से हरिद्वार आना जाता रहता ही था, बहुत दिनों से उनका आवागमन बस या रेलगाड़ी से दिल्ली से हरिद्वार और हरिद्वार से दिल्ली के लिए होता रहता ही&amp;nbsp;था,परन्तु उन लोगों ने एक नई&amp;nbsp;मारुती गाड़ी खरीद ली,और अब उनका हरिद्वार से दिल्ली और दिल्ली से हरिद्वार उसी गाड़ी से होने लगा,सब कुछ बहुत दिनों से ठीक ठाक चलता रहा, परन्तु एक दिन ऐसा आया,उस परिवार में मेरी बेटी के जेठ की बहिन का पति,इस लोक को छोड़ कर अपनी पत्नी को रोता,बिलखता और उस मासूम बच्चे को छोड़ कर इस दुनिया से चला गया,और उसी समय मेरे मस्तिष्क में यह विचार आया,अगर हमारी बेटी के जेठ की पत्नी को गाड़ी चलाना आती तो उसका सुहाग बच जाता |&lt;br /&gt;उस मनहूस दिन को मेरे मोबाइल की घंटी बजी,और मुझे हमारी बेटी के पति के द्वारा&amp;nbsp; सन्देश दिया गया,गाजियाबाद&amp;nbsp; के यशोदा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अस्पताल में तुरन्त पहुँचिये,सन्देश में यह भी कहा गया,हमारी बेटी के जेठ की पत्नी जिसका नाम सुषमा(काल्पनिक नाम) है,उसके पति का देहांत हो गया है,और आप को मोदीनगर से गाड़ी लानी है,(मोदीनगर दिल्ली से हरिद्वार के रास्ते में पड़ता है, जब में और मेरी पत्नी यशोदा अस्पताल पहुंचे रोती बिलखती सुषमा को कोई,उसके पति के ऑफिस का सहकर्मी उसी गाड़ी में लेकर आ गया |&lt;br /&gt;बाद में मुझे पता चला हरिद्वार से ही सुषमा के पति को उल्टियाँ हो रही थी,और मोदीनगर आ कर वोह बेहोश हो गया, कुयोंकी मोदीनगर में बहुत अच्छा अस्पताल तो है,नहीं वहां के अस्पताल के डाक्टर ने उसकी जाँच परख कर कहा,वक्त बहुत कम है,इनको गाजियाबाद ले जाओ, चूंकि सुषमा को गाड़ी चलाना नहीं आता है,वोह बेचारी बेबस फ़ोन ही करती रही,और जब वोह गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल अपने पति को लेकर पहुंची,तब वहाँ के डाक्टरों ने,उसके पति को मृत घोषित कर दिया,तब में&amp;nbsp; में सोचता रहा अगर सुषमा को गाड़ी चलानी आती,तो संभवत: उसके पति की जीवन लीला समाप्त नहीं होती&amp;nbsp; |&lt;br /&gt;अब सुषमा का दूसरा विवाह हो चुका है |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;परन्तु यह घटना मुझे भुलाये नहीं बनती |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;गाड़ी चलाना परिवार के सब व्यस्क सदस्यों को आनी चाहिए |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2431776915983001336?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2431776915983001336/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2431776915983001336&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2431776915983001336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2431776915983001336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='कार रखने वाले परिवार में परिवार के सभी व्यस्क लोगों को कार चलाना आना चाहिए |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2845395573163994454</id><published>2010-10-26T02:49:00.000-07:00</published><updated>2010-10-26T02:49:45.108-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एक नोटिस |'/><title type='text'>हो सकता है,में किसी समय के बाद नेट पर ना दिखूं |</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;हो सकता है, किसी समय के बाद में नेट पर ना दिखूं , एक तो &amp;nbsp;वायरस का कभी भी, किसी भी साईट पर अप्रतायाषित आक्रमण,और दूसरा मेरे कोम्पयुटर के सी.पी.यु की मरानासाण अवस्था, यह संघनक महाशय का&amp;nbsp;सी.पी.यु,अपनी दो बार चिकित्सा करवाने के बाद,इस अवस्था में पहुँच चुका है,अब यह खराब होगा तो इसकी मृत्यु निश्चित ही&amp;nbsp;है, पहली बार जब सी.पी.यु महाशय जब अपनी चिकित्सा करवाने के लिए, चिकित्सालय में पहुंचे थे, तो कुछ समय बाद आ गये थे,लेकिन इस बार यह दूसरी बार चिकित्सालय में दिल्ली पहुंचे थे,तो कोमनवेल्थ के कारण &amp;nbsp; गाजियाबाद से चार पहियों के वाहन का दिल्ली आना जाना कठिन था, इस कारण&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह लम्बे अन्तराल के बाद आये हैं,पता नहीं कब इनको आई.सी.यु की आवश्यकता पड़ जाये |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;दूसरा कारण वायरस का इतना तो विस्तृत नहीं है, और भाई हमने तो एंटी वायरस अपने कोम्प्यूटर में डाल रखा है,जब वायरस का आकर्मण&amp;nbsp;&amp;nbsp;अमीरका के &amp;nbsp;गुप्त संचार ठिकानों&amp;nbsp; पर हो सकता है,तो हम नाचीज की क्या औकात ? एंटीवायरस बनाने वालों का अथक परिश्रम &amp;nbsp;वायरस नाम के रोग&amp;nbsp;को दूर करने का प्रयत्न&amp;nbsp; और वायरस बनाने वालों की नए,नए वायरस के अस्त्र शस्त्र बनाने का प्रत्यंन&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;,पता नहीं कब हमला हो जाये,और आपका ऑपरेटिंग सिस्टम जो भी हो,वोह धुल,धूसरित हो जाये,वैसे तो हमारे यहाँ,विंडो ही सबसे अधिक प्रचलित है, पता नहीं कब यह वायरस विंडो को मृत्यु प्राप्त करा दे, और नई विंडो का जन्म हो |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;तीसरा कारण तो बहुत संक्षिप्त है,वोह है,विजली रानी की बिना सूचना के आवाजाही,जिसने मेरे बहुत से विदेशी मित्रों को संशय के घेरे में डाल&amp;nbsp;दिया है, बहुधा नेट पर बात करते,करते अचानक बिजली रानी चली जाती है,जैसे विदेशों में,बाय,सी यू इत्यादि कहने के बाद सम्बन्ध विच्छेद किया जाता है,नहीं तो असभ्यता &amp;nbsp;समझी जाती है,लेकिन यह बिजली रानी तो अचानक बिना सोचे ही सम्बन्ध विच्छेद करा कर नाक कटवा देती हैं, अगर वोह लोग भारत भ्रमण के लिए,कभी आयें हों,तो विवशता समझ जातें हैं,नहीं तो अत्यधिक कठिनाई होती है |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;नेट पर कुछ समय बाद मेरा दृष्टिगोचर ना होना की सम्भावना ना होने का तो प्रमुख कारण तो पहला ही है,और दूसरा कारण तो कुछ समय के अन्तराल पर मेरा आना संभावित है,तीसरा कारण तो ऐसा ही,भाई आना जाना तो लगा ही रहता है |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2845395573163994454?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2845395573163994454/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2845395573163994454&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2845395573163994454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2845395573163994454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='हो सकता है,में किसी समय के बाद नेट पर ना दिखूं |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-3476752739607789155</id><published>2010-09-24T05:52:00.000-07:00</published><updated>2010-09-24T08:16:06.753-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ऐसा नासूर ना दो जो घाव बन जाये'/><title type='text'>कोमनवेल्थ गेम्स की क्यों की तय्यारी की क्यों दुर्दशा कर दी |</title><content type='html'>3 अक्टोबर&amp;nbsp; से कोमन वेल्थ गेम्स को उद्द घाटन होना है, और अभी तक एक प्रातिशिष्ट समारहो,जिसमें देश विदेश से आने वाले खिलाड़ी हैं,अपने भारत की क्या छबी लेकर जायेंगे?,बहुत से देशो ने तो अपने खिलाड़ियों की रवानगी,कुछ समय के लिए टाल दी, में समाचार पत्रों &amp;nbsp;में,प्रकशित खबरों के बारें में,ना के बराबर लिखता हूँ, परन्तु नित,नित कोमनवेल्थ के समाचारों से आहात हो गया हूँ, एक बार मैंने अपने इसी ब्लॉग में,एक लेख लिखा था, जिसका आशय यही था,क्या विरोधी पार्टियाँ एक दूसरे पर,आरोप प्रत्यारोप लगाने की बजाये,मिल कर काम नहीं कर सकतीं, और यही कोमनवेल्थ गेम्स की तय्यारी में दृष्टिगोचर हुआ है, अगर देश की प्रतिष्ठा को लेकर,यह लोग मिल जुल कर काम करतें,तो विदेशी आने वाले मेहमानों की छेट्टाकशी सुनने को ना मिलती, जैसा किसी खेल सयोंजक ने कहा है,की कोरिया में वोह गएँ थे,और सब कोरिया की पार्टियों ने,आपसी मतभेद भुला कर मिल जुल कर खेल का प्रबंध किया था, जब कश्मीर की जवलन्त समस्या,उग्रबाद के लिए,सब पार्टी के लोग मिल जुल कर गये थे, जब यह लोग देश के आन्तरिक मसले को मिल,जुल कर सुलझाने का प्र्यतन कर सकते हैं, तो देश के सम्मान का इनके लिए कोई,मूल्य नहीं हैं ? कुछ समय पहले भी मैंने,अपने एक लेख में यह सवाल उठाया था,कोमन वेल्थ गेम,इस प्रकार की अव्यवस्था में कैसे होंगे?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अगर प्रश्न यह है,अत्यधिक वर्षा के कारण प्रबंध नहीं हो पाया,तो चीन ने इसी वर्षा ऋतू में,एशिया में होने वाले खेल जो नवम्बर में होने हैं,उसके लिए कैसे उचित प्रबंध कर लियें हैं ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;जब कोई विदेशी कहता हैं, कि गंदगी के कारण खेल गाँव रहने के लिए,उचित नहीं हैं,तो कहा जाता हैं,पश्चिम और हमारे देश की सफाई के मापदंड अलग है, अगर कुछ भी गेरेत हैं,तो उन विदेशियों के मापदंड के हिसाब से बनाते खेलगाँव&amp;nbsp;, यह कितना बड़ा अपमान हैं,इंग्लॅण्ड की टीम,खेलगांव में ना रह कर होटल में रह रही है, भारतवर्ष तो अतिथतियों के स्वागत के लिए परसिद्ध है, यह कैसा स्वागत है ?&lt;br /&gt;जामा मस्जिद के पास कोई,अंधाधुन्द गोलियां चला कर चला जाता है, और ना ही सी.सी.टी.वी केमरे हैं,और ना ही मेटल डिटेक्टर काम कर रहें हैं, ताइवान के दो पर्यटक गोलियों के शिकार हो जातें हैं,और कुछ पता नहीं चलता,जब देश में विदेशिओं का समूह,आ कर रूकने को है,तब यह परिस्थति है,इन लोगों से बेहतर तो वोह ऑटो वाला है,जिसने अपनी जान की परवाह ना &amp;nbsp;करते हुए, उन आतंकवादियों को पत्थर से मारने का प्र्यतन किया,सीखों आम नागरिक से,और वोह आतंकवादी भाग गये&amp;nbsp; |&lt;br /&gt;जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम के सामने बना,फूट ओवर ब्रिज, इस समारोह के कुछ दिन पहले ही,गिर जाता है,अरे सबक लो मेट्रो ट्रेन का जाल बिछाने वाले अधिकारीयों से,दिल्ली के अधिकांश भागों में,जिनोहने मेट्रो का जाल विछा दिया,और कुछ ही छुट,पुट घटना हुई थी, और जिस पर मेट्रो के मुख्य अधिकारी ने उसकी जिम्मेवारी लेने के कारण,अपना त्याग पत्र दे दिया था,यह होता नेतिक मूल्य ,सीखों इन अधिकारीयों से&amp;nbsp;|&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ऐसा नासूर ना दो जो घाव बन जाये&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-3476752739607789155?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/3476752739607789155/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=3476752739607789155&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3476752739607789155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3476752739607789155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/09/blog-post_24.html' title='कोमनवेल्थ गेम्स की क्यों की तय्यारी की क्यों दुर्दशा कर दी |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-707388752977738031</id><published>2010-09-14T06:41:00.000-07:00</published><updated>2010-09-14T06:41:45.254-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पूजा का अर्थ समझो |'/><title type='text'>प्रभु की अर्चना,पूजा,ध्यान सार्थक या समय की बर्बादी |</title><content type='html'>हर्निया के ऑपेरशन के बाद, असहेज होने के कारण,लिख नहीं पाया,अब कुछ सहज हुआ हूँ,और ऑपेरशन के बाद यह पहला लेख लिख रहा हूँ, इस लेख को लिखने से पहले,स्वामी परमहंस योगानन्द द्वारा लिखी हुई,एक कहानी लिख रहा हूँ |&lt;br /&gt;एक बार भगवान विष्णु से ब्रह्मऋषि नारद जी से, प्रश्न किया,"भगवन यह बताइए आप का सब बड़ा भक्त&amp;nbsp;मृत्यु लोक में कौन है?"&lt;br /&gt;भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा," नारद तुम्ही जा कर पृथ्वी लोक पर जा कर देख लो", यह सुन कर नारद जी पृथ्वी लोक में आये, और विचरण करते हुए उन्होंने पहले जो देखा,एक व्यक्ति मदिरा के नशे में चूर,पृथ्वी में खुदे हुए गड्ढो में,कुछ बांस गाड़ने का प्रयत्न कर रहा था,परन्तु मदिरा के नशे में,चूर उस व्यक्ति से गड्ढो में,बांस नहीं जा रहे थे,नारद जी ने उससे,पूछा,"तुम्हरी इच्छा क्या है?", उसने उत्तर दिया विष्णु भगवान से साक्षात्कार की", नारद जी असमंजस में पड़ गये,और आगे चल पड़े,और उन्होंने देखा, "एक व्यक्ति नदी के किनारे एक पैर पर खड़ा होकर के,शीत ऋतू हो, बर्षा ऋतू हो या ग्रीष्म,बिना वस्त्रों के वर्षों से तपस्या कर रहा था, नारद जी ने उससे भी यही प्रश्न किया,"भाई यह सब तुम क्यों कर रहे हो?", उसने भी वोही उत्तर दिया विष्णु भगवान से साक्षात्कार के लिए ",अब नारद जी बैकुंठ लोक में पहुंचे,तो विष्णु भगवान ने,नारद जी से पूछा देख लिया?",नारद जी ने हाँ कहा,तब विष्णु भगवान ने ने पूछा "क्या देखा?" नारद जी ने पहले उस व्यक्ति के बारे में बताया,जो नदी किनारे एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या कर रहा था,नारद जी के बताने पर विष्णु &amp;nbsp;भगवान ने कोई रूचि नहीं दिखाई,विष्णु भगवान ने कहा "उस व्यक्ति को देखा था,जो पृथ्वी के गड्ढों में बांस गाड़ने का प्रयत्न कर रहा था?",नारद जी ने असमंजस में पड़ते हुए हाँ कहा, और पूछा,"है लक्ष्मीपति जी उस में क्या विशेष बात है?",विष्णु भगवान ने कहा वोह ही,"मेरा सबसे बड़ा भक्त है", नारद जी ने कहा,"वोह कैसे प्रभु?", विष्णु भगवान बोले,पुन: "पृथ्वी लोक पर,जाओ और",उसव्यक्ति को जो मदिरा के नशे में चूर था,उसको कहना तुम से विष्णु जी मिलने आयेंगे,और उस व्यक्ति को जो एक पैर पर खड़ा हो कर तपस्या कर रहा है, उसको मेरा यह सन्देश देना,"तुम से मिलने विष्णु भगवान नहीं आयेंगे", नारद जी मृत्यु लोक में पुन: पधारे और जैसा विष्णु भगवान ने सन्देश दिया था,वोही अलग,अलग सन्देश दोनों व्यक्ति को दिया, जो व्यक्ति नशे में था,वोह तो बांस छोड़ कर नाचने लगा,और नाच,नाच कर कहने लगा,"विष्णु भगवान आयेंगे",और दूसरे व्यक्ति को जो तपस्या कर रहा था,उसको जब नारद जी ने कहा,"तुम से मिलने विष्णु भगवान नहीं आयेंगे",तो वोह तपस्या छोड़ कर दोनों पैरो पर खड़ा हो गया,और बोला "में तो यह तपस्या व्यर्थ ही कर रहा हूँ |",और उसने तपस्या छोड़ दी,थोड़े अन्तराल के बाद,विष्णु भगवान आये और उस व्यक्ति के साथ में नाचने लगे जो,मदिरा के नशे में चूर था,और नारद जी भी वीणा बजाते हुए,उस नृत्य में सम्मलित हो गये |&lt;br /&gt;प्रभु कोई आडम्बर के भूखे हैं,उनको केवल भाव से किसी भी रूप में,किसी भी विधि से पूजा,अर्चना,ध्यान से,वंदना की आवश्यकता है |&lt;br /&gt;जैसे संत कबीर ने कहा है,"मन मैला और तन को धोये",आपमें ,लाख व्यसन हैं",अगर सच्चे मन से प्रेम भाव से प्रभु का स्मरण करोगे तो प्रभु को अवश्य पाओगे, इसी सन्दर्भ में मुझे एक भजन की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं |&lt;br /&gt;"तेरे को काहे की चड़ाऊं पूजा |&lt;br /&gt;जल चड़ाऊं &amp;nbsp;पूजा,मछली ने कर दिया झूठा ||&lt;br /&gt;फूल चड़ाऊं तो भँवरे ने कर दिया जूठा|&lt;br /&gt;दूध चड़ाऊं तो बछड़े ने कर दिया झूठा ||&lt;br /&gt;तुझे चड़ाऊं प्रेम की पूजा |&lt;br /&gt;भाई इस ढाई अक्षर के शब्द में,बहुत शक्ति है, इस ढाई अक्षर के शब्द ने ही तो प्रभु राम ने शबरी के झूठे बैर खाए थे,कुछ लोगों को मेरे इस वाक्य से असुबिधा हो सकती है,"आप में लाख व्यसन हों....."&lt;br /&gt;अब इन व्यसनों और दुर्गुणों से दूर रखने वाला तो सदगुरु होता है, गुरु शब्द का अर्थ है,"अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला",और इसी से प्रचलित है,"असतो मा सदगमय,तमसो मा ज्योतिर्गमय",अर्थार्त हमें&amp;nbsp; &amp;nbsp;अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ",सदगुरु का तो ईश्वर का सामीप्य होता है,और सदगुरु अपने शिष्य के सब,व्यसन और दुर्गुण दूर करके,भगवद प्राप्ति करवा देता है |&lt;br /&gt;आजकल जागरण,या किसी भी धार्मिक सम्मलेन में,लाउड स्पीकर पर जोर,जोर से भजन गाये जाते हैं,बिना यह सोचे कोई गंभीर रूप से पीड़ित है,और सड़क के एक किनारे से लेकर दूसरे किनारे तक,लोगों का अवागमन वाधित करके,जब मन में परोपकार की तो बात छोड़ो,इस प्रकार से लोगों को कष्ट दे कर,तो कहाँ से ईश्वर को पाओगे?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अगर झूठे,आडम्बर,से लोगों को कष्ट देकर,बिना श्रद्धा के,बिना प्रेम के तो, भाई पूजा,अर्चना,ध्यान सब व्यर्थ है |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पूजा का अर्थ समझो&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-707388752977738031?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/707388752977738031/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=707388752977738031&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/707388752977738031'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/707388752977738031'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='प्रभु की अर्चना,पूजा,ध्यान सार्थक या समय की बर्बादी |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-5341834204626450987</id><published>2010-08-20T04:37:00.000-07:00</published><updated>2010-08-20T04:41:38.486-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जय श्री गुरुदेव  |'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जय'/><title type='text'>विनाश काले बुद्धि विप्रेते (पंचम भाग )अंतिम कड़ी</title><content type='html'>मोदीनगर में, उस रहस्यमय व्यक्ति से संपर्क समाप्त कर चुका था,और फिर मैंने हनुमान जी की साधना प्रारंभ कर दी थी, दिनचर्या यह रहती थी, नित्य क्रम से निब्रित होकर ,हनुमान जी की साधना फिर कुछ योगासन और उसके बाद अपनी जीविका कमाने के लिए,फेक्टरी जाना,और लौट के आने के बाद,कुछ अल्पाहार करके,बेडमिन्टन या बिल्यर्ड खेलना,और बाकि समय अपने परिवार में व्यतीत करना, मंगल बार को हनुमान जी का ब्रत रखना और कुछ मीठा,खाकर के व्रत का समापन करना, मोदीपोन छोड़ कर सूरत कार्य के लिए चला गया था,और मेरी दिनचर्या वैसी ही रही, तीन वर्ष सूरत में व्यतीत करने के बाद, हापूड़ और बुलंदशहर के मध्य में पड़ने वाले गुलावठी नाम के कसबे में,कार्य के कारण आ गया था,दिनचर्या वैसी ही थी,और हापूड़ में मेरा संपर्क एक सन्यासी से हुई,जो अपने जीवन के कुछ वर्ष थलसेना में व्यतीत कर चुके थे,और जिनकी आयु उस समय 95 वर्ष की थी,और इस आयु में भी उनमे ऐसी फुर्ती किसी नौजवान में क्या होगी, बस अपनी दोनों आँखों की दृष्टि खो चुके थे, और गजब का हर प्रकार का ज्ञान था उनको,चाहे,विज्ञान हो,ज्योतिष हो,अध्यातम हो,मनोविज्ञान होआयुर्वेद हो कोई भी विषय हो ,हर प्रकार का ज्ञान था उनको, मेरी व्यस्तता मेरे जनरल मेनेजर होने के कारण मेरी व्यस्तता बहुत बड़ी हुई थी,संसथान के हित में सब प्रकार के कार्य देखने पड़ते थे, चाहे सरकारी हो या गैर सरकारी, उन सन्यासी के पास जाना कुछ कम हो गया था, एक बार उनसे मैंने पूछा, "मुझे हनुमान जी के दर्शन की इच्छा है",उन्होंने पूछा "किस रूप में",मैंने कहा "साक्षात्".वोह&amp;nbsp; वोले गुरु पूर्णिमा को मेरे पास आना,और वोह दिन कभी नहीं आ पाया,क्योंकि उनका देहावसान हो चुका था |&amp;nbsp; &lt;br /&gt;अब में अपने परिवार के साथ गाजियाबाद आ चुका था,हनुमान जी के प्रति आस्था तो थी ही,परन्तु मेरा एक मित्र जो कि गुलावठी में मेरे साथ ही था,उसने गाजियाबाद में ही रहने वाली एक माँ शेरा वालीं की भक्त से परिचय करवया था, उन पर माँ का आवेश भी आता है, और वोह स्वयं ही माँ की कृपा से प्रश्न करता के प्रश्न से पहले ही यह कहतीं हैं,"यह है ना प्रश्न हैं&lt;br /&gt;आपका ?",और उसके बारें में जानकारी देतीं हैं, उस माँ के दरबार की विशेष बात यह है,वहाँ कोई दान,दक्षिणा चड़ावे की बात नहीं हैं,और अपने पास से ही माँ का जल देतीं हैं, मैंने वहाँ जाना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि वहाँ अभूतपूर्व शांति का अनुभव होता है,और एक बार उन्होंने मेरे गले में माँ के नाम का कलावा बांध दिया था |&lt;br /&gt;इसी बीच मेरे पिता जी मुझे दिल्ली स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की गोल डाकखाने के पास है,वहाँ ले गये,और वहाँ से मुझे एक फार्म भरवा दिया,जिसमें कुछ प्रश्न थे,जिनका मैंने उत्तर दे दिया था,वोह फार्म रांची स्थित योगदा सत्संग सोसाइटी जो की मुख्य शाखा है,वहाँ पहुँच गया और मेरे पास हर माह एक योगदा का एक अध्याय जिसमें स्वामी परमहंस योगानंद द्वारा स्वयं अपने को जानने के बारे में थे,आने लगे |&lt;br /&gt;इन्ही दिनों मैंने प्राणिक हीलिंग भी सीखी थी, जिससे अपना स्वयं का,अपने पास बैठे व्यक्ति का और कितनी भी दूर बैठे व्यक्ति की चिकत्सा संभव है |&lt;br /&gt;दिन अच्छे प्रकार से सुचारू रूप से चल रहे थे, हमारी गाजियाबाद की कोलोनी में,एक मंदिर है,वहाँ हर रविवार को भेरो के साधक आते थे,जो कि मंगलवार को हनुमान जी को चोला चडाते थे,और उस मंदिर में में भी माँ के दर्शन के लिए चला जाता था, जब वोह भेरो के साधक दरवार भेरो का दरबार लगाते थे, उपलों की अग्नि धुनें में जलाते थे, एक बार में जिज्ञासावश वहाँ देख रहा था,वोह बोले"यहाँ आना चाहते हो", मेरे हाँ कहने पर वोह बोले 2.5 रुपए का समान ले कर आ जाओ,जो में ले आया था,और उसको जैसे और लोग अपने पर से उतार रहे थे,वैसे ही में उतार कर बैठ गया, पहले बार वहाँ कुछ पूछने का नियम नहीं था,जब में अगले रविवार को में वहाँ पहुंचा,क्योंकि मेरी नौकरी छूट चुकी थी,मैंने उनसे अपनी नौकरी लगवाने का प्रस्ताव रखा,वोह मेरे गले में बंधा हुआ लाल धागा देख कर उन्होंने पूछा,"यह धागा किसका है ?",मैंने कहा माँ का,फिर वोह बोले काला धागा ले आओ,और उसके अगले रविवार को में काला धागा ले आया,जो उन्होंने मेरे गले में बांध दिया, दो तीन रविवार और बीत गये,और क्योंकि मेरी नौकरी नहीं लगी थी, उसका कारण मैंने उनसे पूछा,तो वोह वोले तुम्हारे घर आ कर देखता हूँ, और एक दिन वोह मेरे घर आये तो मैंने पूछा देख लिया,वोह बोले हाँ,तुम्हारा संकट माँ ही काटेगी, और इस प्रकार फिर मुझे माँ की लगन लग गयी थी,एक रविवार को जब मैंने उनको माँ के दर्शन की बात बताई तो उन्होंने सारा वृतांत माँ के द्वारा मुझे दर्शन दिए वाला बता दिया, मैंने उनसे कहा माँ के दर्शन मुझे पुन: प्राप्त करने है,तो वोह बोले कोई गुरु बनाओ,मेरे यह कहने पर आप ही मेरे गुरु बन जाओ,तो वोह बोले मंगलवार को मंदिर में आना |&lt;br /&gt;मंगलवार को जब में,मंदिर पहुंचा तो वोह हनुमान जी का चोला चड़ा कर ध्यान में बैठे थे,जब उनके नेत्र खुले जो बात वोह मुझे भेरो के दरवार के समय बता चुके थे,उसी की पुनरावर्ती की,पहले झंडे वाले मंदिर जाना वहाँ माँ की थाली चडाना फिर कालका मंदिर जाना और फिर भेरो मंदिर,इस प्रकार उनसे संपर्क बड़ता गया,मेरे में एक विशेष बात थी,जब भी माँ के भजन होते तो मेरे शरीर में तरंगे सी उठने लगती थीं, जिस पर मेरा नियंत्रण नहीं था, यह उनको भी पता चल गया था,वोह अपने शरीर पर देवी,देवता को बुलाने में विश्वास करते थे,पर में मन से इसके विरुद्ध था,पर कहता नहीं था,और भी जो बात मुझे नापसंद थी,भेरो को सिगरेट और मदिरा का भोग चडाना,एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया और कुछ लोग उनके घर में उपस्थित थे, उनमें से एक के घर सब लोग मुझे लेकर चल पड़े,और वहाँ पहुँच कर मेरे से वोह भेरो के साधक माँ के आवाहन के लिए कहने लगे,परन्तु इस प्रकार से ना माँ को आना था और वोह नहीं आयीं,में माँ के शांत रूप में आस्था रखता हूँ,जैसे माँ दुर्गा,परन्तु उनकी आसक्ति देवी देवताओं के रोद्र रूप में हैं,जैसे काल भेरव माँ काली इत्यादि ,उनपर भेरो का आवेश आ गया था,वहाँ उपस्थित लोग उनसे प्रश्न पूछ रहें थे, पर में माँ के ना आने के कारण में संकोच कर रहा था,और इसका लाभ उठा कर वोह लोग मेरी बारी आने ही नहीं दे रहें थें, उन दिनों मैंने माँ का मंदिर छत पर बनाया हुआ था,उन्ही लोगों में से एक ने कहा आपने तो यह बहुत गलत कर रखा है,छत पर उलटी सीधी चीजे आ जाती है,और उन भेरो और हनुमान जी के साधक से एक दिन मेरा प्रश्न था,मेरे भेरव के सामने नंबर क्यों नहीं आया ? यह मेरा पूछना था,उन्होंने मुझे बुरी तरह से दुत्कार दिया,और उसके बाद मेरे मस्तिष्क पर उस फटकार का ऐसा प्रभाव पड़ा,मेरे को चार दिन नींद ही नहीं आई और हीलिंग करने में अक्षम हो गया, माँ की जोत सुबह शाम माँ के मंदिर में जलाये बिना मुझे चैन नहीं मिलता था,वोह जलाना छोड़ दिया,माँ मेरी पत्नी के स्वपन में कंजक रूप में आयीं और मेरे लिए बोली,उससे पूछो मेरी जोत जलाना क्यों बंद कर दिया,मेरा बहुत अपमान हो चुका हैं,में इस घर से जा रहीं हूँ,जाते,जाते यह कह गयी,अब तुम दोनों जिन्होंने अपनी बेटी का नाम मेरे नाम पर रखा है,उसके बारें में सोचो और उसका ख्याल रखो, अब तो में संभल चुका हूँ,प्रात: काल पॉँच बजे उठ कर पहले माँ का ध्यान और फिर योगदा के गुरुओं का ध्यान करता हूँ,और राजीव जी के मार्गदर्शन पर चल रहा हूँ,यह सब विवादित लेख जिनको में लिखने में विवादित टिप्पणियों के कारण लिखने में संकोच करता था,अब बिना किसी भय के निर्भीकता से लिखें हैं,और यही पर मेरी इस लेखों की श्रृंखला की इतिश्री होती है |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अब तो कहता हूँ, प्रभु सदा मुझे और सब को उचित पथ दिखाना,हम बालक तेरे ऊँगली पकड़ कर गलत रहा से उचित पथ पर ले जाना |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; राजीव जी मुझे भीरु से निर्भीक बनाने के लिए कोटि,कोटि धन्यबाद,लेकिन अभी शारीरक बिमारियों की शल्य क्रिया से डरता हूँ |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जय,जय श्री गुरुदेव&amp;nbsp;&lt;/b&gt; |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-5341834204626450987?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/5341834204626450987/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=5341834204626450987&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5341834204626450987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5341834204626450987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/08/blog-post_20.html' title='विनाश काले बुद्धि विप्रेते (पंचम भाग )अंतिम कड़ी'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-5508157214199656699</id><published>2010-08-19T08:35:00.000-07:00</published><updated>2010-08-19T08:35:44.638-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कभी इस प्रकार से सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं'/><title type='text'>सृष्टि के काम में बाधक बनना हानिकारक ही होता है (चतुर्थ भाग )</title><content type='html'>किसी प्रकार का लालच या लोभ, हानि ही पहुँचाता है, और में भी अपने लोभ बश सृष्टि के काम में बाधक बन ही गया,और इस प्रकार हमारी भारी हानि हुई, यह बात उस समय कि है,जब में मोदीनगर की मोदीपोन संस्था में कार्यरत था, घटना क्रम का प्रारंभ हुआ हमारे घर में, मेरी पत्नी के आभूषण चोरी होने से, हम लोग मोदीपोन की पोश&amp;nbsp;कालोनी आलोक पार्क में रहते थे, और यह तो स्पष्ट सी बात है,इस प्रकार की कालोनियों की सुरक्षा व्यवस्था बहुत ही सुरक्षित होती है, अगर कोई काम वाली को कुछ देता है,तो कालोनी के गेट पर इंटरकोम &amp;nbsp;द्वारा सूचना देनी होती है,और गेट पर उपस्थित सुरक्षा कर्मी उनकी जांच करके संतुष्ट होने पर ही जाने देते हैं,बाकि और संसाधन जैसे क्लब इत्यादि,तीज त्यौहार सांस्कृतिक रूप से मनाये जाते थे, नव वर्ष आगमन पर पार्टी का आयोजन होता था,होली,दिवाली को क्लब में,शाम के खाने का आयोजन होता था, और सब लोग एक दूसरे को जानते थे, और ऐसे वातावरण में मेरी पत्नी के कुछ आभूषण चोरी हो गये थे, मेरी पत्नी के अलमारी खोलने से पहले,अलमारी के पास एक कान का बुन्दा गिरा हुआ दिखाई दिया,और जब उसने अलमारी खोली तो उसके साथ का बुन्दा नहीं दिखाई दिया,और जब उसने और आभूषणओं को खोजने का प्रयत्न किया तो बहुत से आभूषण चोरी हो गये थे, इस प्रकार के वातावरण में आभूषणओं &amp;nbsp;की चोरी हो जाना एक असमंजस बना हुआ था |&lt;br /&gt;उसके अगले दिन हमारी काम वाली ने बताया, मोदीपोन कालोनी जो कि आलोक पार्क से निकलते ही थी,वहाँ एक आदमी रहता है,और वोह बता देता है कि,किसने चोरी की,में उस व्यक्ति के पास में चला गया, उसने बताया कि में पड़ कर चावल दूंगा,जिसने चोरी की है,उसके मुख से खून निकलने लगेगा, लेकिन उसके लिए में सहमत नहीं हुआ, परन्तु उस रहस्यमय में व्यक्ति से मेरा परिचय हो गया था , वोह व्यक्ति बहुत सी और विद्यायें जानता था, कौन उसके गुरु,इष्ट इत्यादि थे,में नहीं जानता था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;मेरी एक बेटी तो थी ही,और मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी थी,वैसे तो मेरे मन में,बेटी,बेटे के बीच में कभी बेहद,भाव नहीं था, परन्तु कुछ सोच कर मैंने उस व्यक्ति से पूछा कि हमारे बेटी &amp;nbsp;होगी कि बेटा और उसने बताया पत्नी के गर्भ में कन्या है, यह सोच कर कि अगर हमारे बेटा हो जायेगा तो हमारी बिटिया को भाई मिल जायेगा, मैंने उससे पूछा बेटा हो सकता है,तो वोह बोला अपने गुरु से पूछ कर बताऊंगा,उस दिन में उसके पास से चला आया,और अगले दिन जब में उसके पास गया तो वोह बोला मेरे गुरु जी ने लड़की के पिंड को लड़के के पिंड में बदल दिया है, हुआ तो बेटा ही पर जन्म जात ऐसी बीमारी से ग्रसित जिसको डाक्टर बताते थे,करोड़ों में कभी ऐसी संतान उत्पन्न होती है,और वोह हमारा बेटा तो डाक्टरों के लिए शोध का कारण बन गया था,और अपने जन्म के ढाई महीने बाद वोह हमारा बेटा चल बसा |&lt;br /&gt;एक बार उस रहस्यमय व्यक्ति ने मुझे कुछ दिया था,और कहा इसके नीचे जितना धन रखोगे वोह दुगुना हो जायेगा, जैसा में समझता हूँ,उसने भूत,प्रेत सिद्ध कर रखे थे,और उनसे ही वोह यह काम लेता था,कभी हवा में से उसकी हथेली पर नारियल आ जाता था, उस व्यक्ति से मैंने स्वार्थवश उस परमपिता परमेश्वर की सृष्टि के नियमों को बदलवाने का प्रयत्न किया,और स्वयं ही नुकसान उठाया, यह परमपिता परमेश्वर का अपमान हैं |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;कभी इस प्रकार से सृष्टि के नियमों को बदलवाने के कारण हानिकारक ही होतें हैं &lt;/b&gt;|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-5508157214199656699?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/5508157214199656699/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=5508157214199656699&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5508157214199656699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5508157214199656699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/08/blog-post_19.html' title='सृष्टि के काम में बाधक बनना हानिकारक ही होता है (चतुर्थ भाग )'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-4367322448630472955</id><published>2010-08-18T07:22:00.000-07:00</published><updated>2010-08-18T07:22:25.075-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जयकारा शेरा वालीं माँ का'/><title type='text'>दुर्गा माँ और माँ काली के दर्शन| (त्रितय भाग)</title><content type='html'>&lt;b&gt;सर्व मंगल मांग्लय शिवे सर्वार्ध साधिके |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;नारायणी त्रियअम्बके गौरी नामोस्तेय |&lt;/b&gt;|&lt;br /&gt;सबका मंगल चाहने वाली माता,आपके तीन नेत्र हैं,आपको नमस्कार है |&lt;br /&gt;माँ के शस्त्र धारण करने का कारण यही&amp;nbsp;है, दुष्टों का विनाश करना और संतो को अभयदान देना,माँ आपके दुर्गा सप्तशती के&amp;nbsp;मन्त्र इतने सशक्त है, जो तुरन्त फल देते हैं, कहीं यह दुष्टों के हाथ ना पड़ जाये इसलिए देवादि देव महादेव को इनको कीलित करना पड़ा, जिसकी एक हुँकार से दुष्टों का विनाश हो सकता है, आपकी सोच इतनी उत्तम है, मेरे शस्त्रों से जो मारे जाये वोह उत्तम लोको को जाएँ, इसलिए आपने दुष्टों का संघार करने के लिए शस्त्र उठाये |&lt;br /&gt;बस में,शिव,शिवा और गौरी पुत्र गणेश को कर बध नमस्कार करके&amp;nbsp;&amp;nbsp;कहता हूँ |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;माँ की हर बात निराली है, माँ की शान निराली है ||&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अपराध मेरे बहुतेरे माँ ध्यान ना धरना माँ&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अपराधो समेत तेरी शरण में आया हूँ |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;माँ तेरा ही जाया हूँ ||&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मन्त्र,तंत्र ना जानू माँ |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कर्म कांड के मंत्र क्या हैं,पहचानू ना माँ &lt;/b&gt;||&lt;br /&gt;है,जाग जननी,है योगमाया आपको नमस्कार करके,आपके सहज दिए हुए दर्शन के बारे में लिख रहा हूँ,&lt;br /&gt;&lt;b&gt;या देवी सर्वभूतेषु मात्र रूपेण,संस्थिता,नम्स्त्सय,नमस्तस्य,नमो: नम &lt;/b&gt;:&lt;br /&gt;है ! भोली माता लिखने में,कोई त्रुटी हो तो क्षमा कर देना माँ, इस लेख श्रृंखला के द्वतीय भाग में,मैंने लिखा था,मेरी ममेरी बहिन मुझ से कटने लगी, एक तो मेरा उसकी ओर जाना, और उसका मुझ से दूर,दूर रहना मेरी बुद्धि पर असर करने लगा, मेरी माँ अक्सर दुर्गा स्तुति का पाठ करती है, इसी कारणवश में एक रविवार को अपने मामा जी के यहाँ ना जाकर के, दुर्गा स्तुति का पाठ,माँ की मूर्ति के सामने बैठ कर करने लगा,वोह भी माँ की जोत जलाये बिना, उस दुर्गा स्तुति में,माँ का स्वरुप ढूंढ़ता लेकिन उसमें तो माँ की महिमा का वखान है, दुर्गा स्तुति का पाठ समाप्त करने के बाद में,दिल्ली की जमुना के घाट पर जा पहुंचा, उस&amp;nbsp; स्थान उससमय चीनी खाने बनते थे, जिसका प्रारंभ ही हुआ था,जो कि तिब्बत के विस्थापित लोगों द्वारा नया,नया ही प्रारम्भ हुआ था,पर वहाँ ना जाकर के जमुना घाट पर बैठ कर दूसरे किनारे की ओर देखता और खुली आँखों से माँ के चिंतन में खोया हुआ था, कुछ समय वहाँ व्यतीत करके घर आ गया,और जब शयन का समय हुआ,तब सो गया, पता नहीं वोह कौन सा रात्रि का प्रहर था,या प्रात: काल का वोह समय होगा जब अंधकार होता है,उस समय दुर्गा माँ और माँ काली मेरे स्वपन में आयीं, पता नहीं में कैसे उठ कर बैठ गया और देखता हूँ, मेरा वोह शयन कक्ष आलोकिक प्रकाश से भरा हुआ था,&lt;br /&gt;माँ अम्बे और माँ काली मेरे समक्ष खड़ी हुईं थीं,और माँ अम्बे ने संकेत से पूछा भी,"क्या चाहिए", लेकिन में तो माँ काली के स्वरुप से भयभीत था,और दूसरे कमरे की ओर जिसमें मेरे माँ और पिता &amp;nbsp;जी सोये हुए थे वहाँ भागा कोई गुरु तो था नहीं मेरा जो मुझे संभालता और जब लौट कर अपने कमरे में आया,तो माँ दुर्गा और माँ काली वहीँ विद्यमान और माँ अम्बे का वही संकेत तब मेरे मुख से भय और घबराहट से यही निकला,"मुझे कुछ नहीं चाहिए आप जाइए",और दोनों अंतरध्यान हो गयीं,उसके पश्चात बहुत प्रयास किया पर माँ के साक्षात् पुन: दर्शन नहीं हुए,हाँ कभी,कभी अम्बे माँ का आभास हो जाता है, और कंजक रूप में आ कर कुछ ना कुछ गलतियों का एहसास करा जातीं है, माँ का दिल ममता से भरा हुआ है,वोह बार,बार क्षमा करतीं हैं |&lt;br /&gt;में तो येही सोचता था, ऐसी लगी लगन मीरा हुई मगन प्रभु के गुण गाने लगी |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जयकारा शेरा वालीं माँ का &lt;/b&gt;|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-4367322448630472955?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/4367322448630472955/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=4367322448630472955&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/4367322448630472955'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/4367322448630472955'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/08/blog-post_7553.html' title='दुर्गा माँ और माँ काली के दर्शन| (त्रितय भाग)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1804049945996069695</id><published>2010-08-18T02:03:00.000-07:00</published><updated>2010-08-18T02:08:44.960-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='या देवी क्षमा रूपेण संस्थिता नम्स्त्सय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नम्स्त्सय नमो: नम:'/><title type='text'>अपराध मेरे बहुतेरे |  (द्वतीय भाग)</title><content type='html'>&amp;nbsp;मैंने राजीव जी से पूछा था,अब इतना प्रयास करने के बाद माँ दुर्गा और माँ काली का दर्शन अब क्यों नहीं होता,जो कि मुझे सहज ही दुर्गा स्तुति का पहली बार में हो गया था, और राजीव जी ने बताया था,यह फल करोड़ो करने के कारण हो गया था, जब ऐसा हो जाता है,तो मानव अपने को करता समझ लेता है,इस बात को मन्युष का अचेतन जानता है |&lt;br /&gt;कहा जाता है,जिसमें सब गुण वोह देवता,जिसमें सब अबगुण वोह &amp;nbsp;शैतान,और जिसमें सम्मलित गुण और अबगुण दोनों&amp;nbsp;वोह इंसान,लेकिन एक बात और किसी भी वस्तु,घटना,क्रिया इत्यादि को देखने का नजरिया अलग,अलग होता है,जैसे पानी से भरे हुए आधे गिलास को आशावादी व्यक्ति कहता है,गिलास आधा भरा हुआ है,कोई निराशावादी कहता है कि,गिलास आधा खाली है, इसी प्रकार किसी स्त्री के शरीर पर किसी कामुक की दृष्टि पड़ती है,तो वोह स्त्री को काम भावना से देखता है,कोई दार्शनिक देखता है,तो वोह सोचता है,हाड़ मांस का बना हुआ शरीर है,और कोई साधू देखता है तो वोह सोचता है,की आत्मा ने पंचतत्व के शरीर में परवेश किया हुआ,यह शरीर तो आत्मा का वस्त्र है |&lt;br /&gt;अब में बात करने जा रहा हूँ, जब बाल्यावस्था के अगले चरण किशोर अवस्था में पहुँचता है, तब किशोर अथवा किशोरी में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन का सूत्रपात हो जाता है, किशोरों का दाड़ी,मुछ निकलने का प्रारंभ तथा,वाणी में कठोरता आना,और किशोरियों के स्तन के विकास का प्रारंभ होना और वाणी का कोमल होना इत्यादि&amp;nbsp;,दोनों किशोर अथवा किशोरी इस अवस्था में एक दूसरे के प्रति आकर्षित होतें हैं, किशोरों में काम भावना जागृत होने लगती है, और एक शोध के अनुसार पुरषों में एस्ट्रोजन वाला हारमोन होने के कारण जो कि वासना की ओर प्रेरित करता है,वोह मस्तिष्क वाला भाग जो काम वासना को संचालित करता है,स्त्रियों के ओस्ट्रोजन काम वासना का प्रेरित करने वाले भाग से 2.5 गुना अधिक होता है,इसी कारण अगर पुरुष की दृष्टि निरंकुश हो तो सबसे पहले स्त्रियों के स्तनों पर पड़ती है |&lt;br /&gt;यह सब लिखने का मेरा कारण यही था की में भी किशोर अवस्था में कभी था,और में भी किशोरियों के बारे में सोचता था,और उनके साथ रति क्रिया के सपने बुनता था, और दो बार अलग.अलग किशोरियों ने मुझे निमंत्रण भी दिया था,और हमें अवसर नहीं मिला,मतलब कि यह मेरे में अवगुण था,और भी होंगे.फिर भी अम्बे माँ और माँ काली के दर्शन प्राप्त हुए थे |&lt;br /&gt;अबगुण तो बहुत थे,परन्तु मेरे व्यक्तित्व दो विशेष बातें भी थीं,एक तो अपने आप कभी भी कहीं पर ध्यान लग जाना,और दूसरी बात केवल दो भाई और कोई बहिन ना होने के कारण,बहिन का स्नेह पाने की तीव्र उठ्कंथ्ता,कभी कभी में अपने मामा जी के यहाँ चला जाता था,पर जाता कम ही था, मेरे मामा जी की लड़की को मेरा कम आना अच्छा नहीं लगता था,वोह चाहती थी में अधिक जाऊं और कुछ दिनों के बाद कोई भी समय हो दिन या रात कैसा ही मौसम हो बरसात हो या शीत लहर या अत्यधिक गर्मीं में मामा जी के यहाँ पहुँच जाता था,बाद में हमारे जानकार जिनको ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था और उसके साथ भगवद कृपा भी थी,उन्होंने बताया था,यह मेरे व्यवहार बदलने का कारण मेरे मामा जी की लड़की द्वारा कोई जड़ी चाय में मिला कर पिलाने के कारण था |&lt;br /&gt;समय बीतता गया और में नौकरी करने लगा था,में मामा जी की लड़की को सगी बहिन की दृष्टि से देखता था,लेकिन मामा जी की आर्थिक स्थति अच्छी नहीं थी,और मेरी बहिन को&amp;nbsp; मुझ से पैसे की आपेक्षा थी जो कि में पूरी नहीं करता था,इसलिए उसने मुझ से दूर,दूर रहना प्रारंभ कर दिया था |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;या देवी क्षमा रूपेण संस्थिता नम्स्त्सय,नम्स्त्सय नमो: नम:&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1804049945996069695?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1804049945996069695/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1804049945996069695&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1804049945996069695'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1804049945996069695'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/08/blog-post_18.html' title='अपराध मेरे बहुतेरे |  (द्वतीय भाग)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-6576667556942444251</id><published>2010-08-17T04:24:00.000-07:00</published><updated>2010-08-17T04:38:14.705-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जैसा जिसका व्यक्तिव और सोच वैसी ही टिप्पणी'/><title type='text'>यह लेखों की श्रृंखला राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी कहने पर लिख रहां हूँ |    प्रथम भाग</title><content type='html'>राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी से मेरा उनके लेख "काली चिड़िया का रहस्य",पर मेरे द्वारा दी गयी टिप्पणी " वैसे&amp;nbsp; तो आपने डोली की भलाई के लिए ठीक ही किया, लेकिन भैरो और माँ काली के सामने अच्छे,अच्छे रोगी ठीक हो जातें हैं",और इसके साथ यह भी लिखने पर आपके लेख मेरी रुचि के अनुकूल है,उनका अनुसरण करता बन गया, इस प्रकार मेरा उनसे परिचय का सूत्रपात हुआ, मैंने &amp;nbsp;किंचित एक दो या इससे अधिक विवादित लेख लिखें हैं, उनमें से एक ऐसा लेख भी था,जिसको लोग खुले चक्षुओं से अनुभव कर सकतें हैं, जिसमें भूत,प्रेत का किसी के भी&amp;nbsp; शरीर में प्रवेश हो जातें&amp;nbsp; है,और उसका निवारण स्वयं ही राजस्थान के महेंद्रगढ़ के बाला जी (हनुमान जी ) के मंदिर में हो जाता हैं,और उस लेख पर मुझे टिप्पणी मिलती है,"इंजीनियर साहब इस भोली जनता को भूत प्रेत से अलग रखो ", पुर्बाग्रह से ग्रसित हो कर दी हुई टिप्पणी,"सत्यम किम प्रमाणं",मतलब की बिना खोज,बिना उस स्थान पर जाये और अपनी सोच,सोच और केवल सोच के आधार पर दी गयी टिप्पणी,और उसके बाद मैंने हतौत्त्साहित हो कर विवादित लेख&amp;nbsp;लिखना छोड़ दिया था, लोग दोनों ही प्रकार के होते ही है,पुर्बाग्रह से ग्रसित और दिमाग की खुली खिड़की रखने वाले,कभी मैंने लेख लिखा था "भृगु सहिंता के बारे में मेरी अल्प जानकारी", उस लेख पर किसी ने जो भ्रिगुसहिंता वाले स्थान पर गये थे,उन्होंने मेरी बात का पुष्टिकरण किया था,और उस स्थान के बारे में,पर्याप्त जानकारी भी दी थी,इस लेख श्रृंखला में,बहुत प्रकार के विवादित लेख आयेंगे, लेकिन सोच अपनी,अपनी,मैंने राजीव जी को संक्षिप्त में मेल में लिखा था,और कहा था यह सब सार्वजानिक नहीं होना चाहिए,बाद में राजीव जी ने कहा आप एडिट कर के लिख दीजिये, लेकिन अब मेरे को, किसी प्रकार से बुरी लगने वाली टिप्पणी का कोई प्रभाव नहीं होता, इसलिए में स्पष्ट रूप से बिना एडिट किये यह लेख माला लिख रहा हूँ |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जैसा जिसका व्यक्तिव और सोच वैसी ही टिप्पणी&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-6576667556942444251?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/6576667556942444251/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=6576667556942444251&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6576667556942444251'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6576667556942444251'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='यह लेखों की श्रृंखला राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी कहने पर लिख रहां हूँ |    प्रथम भाग'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-166450743396635269</id><published>2010-07-30T01:23:00.000-07:00</published><updated>2010-07-30T01:23:36.268-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्या आपने इसीलिए सृष्टि की रचना की नीली छत्री वाले'/><title type='text'>ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनाई ?</title><content type='html'>"दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई&lt;br /&gt;काहे तूने दुनिया बनाई&lt;br /&gt;काहे बनाये तुने यह पुतले&lt;br /&gt;क्यों उनको दे दी खुदाई "&lt;br /&gt;यह राजकपूर द्वारा "तीसरी कसम फ़िल्म में गाया हुआ यह गीत मझे भी यदा,कदा विचलित करता है, मेरा भी उस ईश्वर,खुदा,&lt;br /&gt;गोड, परमपिता परमेश्वर से यही प्रश्न है,क्यों तूने इस सृष्टि का निर्माण किया?आप को बहुत से&amp;nbsp; नामों से पुकारा जाता है, हिन्दू धर्म में परमात्मा,ईश्वर, भगवान,आदि,आदि,मुस्लिम धर्म में,खुदा और अल्लाह,और इसाई धर्म में गोड,जिसके बेटे इसा मसीह थे,और मुस्लिम समुदाय के पेगेम्बेर थे मोहम्मद साहब, प्रभु इंसान ने जन्म लिया था,उस समय तो उसका कोई धर्म नहीं था,पर आपके बन्दों ने तो आते ही &amp;nbsp;जाती,धर्म में बटवारा कर दिया,और अलग,अलग जाती और धर्म वाले अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ बताने लगे,है परमपिता यह आपने इंसानों को इस प्रकार की बुद्धि देकर कौन सा खेल रचा था? &amp;nbsp;और है ईश्वर इसी से&amp;nbsp;इंसान का मन नहीं भरा तो,एक ही जाती और धर्म मानने वाले भी तो अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ बताने लगे हैं, हिन्दू धर्म में सगुण,और निर्गुण मर्गियों में आपस में मतभेद,सगुण कहते हैं,सगुण श्रेष्ठ और निर्गुण कहते हैं,निर्गुण श्रेष्ठ,फिर द्वैतवाद और अद्वैतवाद का यही आपस में तर्क है ईश्वर ? मुस्लिम सम्प्रदाय में शिया और सुन्नी में भी यही तर्क, इसाईओं में भी यही कथोलिक,प्रोटेसटेंट इत्यादि में यही तर्क ऐसा क्यों प्रभु?&lt;br /&gt;और तो और है ईश्वर हिन्दू धर्म के चार और उपजातियां बन गयीं,ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र, इंसानों ने तेरी इस दुनिया में&lt;br /&gt;है मालिक,यह हिन्दू धर्म में उपजातियां बना कर,ब्राहमण को सर्वश्रेष्ठ,फिर क्षत्रिय,वैश्य को क्रमतर श्रेष्ठता के आधार पर वरिनिकृत किया है &amp;nbsp;और शुद्रो को निकृष्ट, और कहीं,कहीं तो शूद्रों से ऐसा व्यवहार कि नित्य परतिदिन की आवश्यकता जैसे कुँए का पानी सार्वजानिक कुओं से नहीं ले सकतें,उनसे छूना दोष है, ऐसा क्यों प्रभु,जब सब की आत्मा एक हैं,सब आपकी संतान है,तो यह भेदभाव कैसा है ईश्वर?&lt;br /&gt;इस सृष्टि में,आपने प्राकर्तिक आपदाएं क्यों बनाई,जिसमें नीरीह,भोले,भाले जीवों की मृत्यु हो जाती है,और उनके संगी,साथी कुछ नहीं कर पातें हैं , सिवाय रोने बिलखने के, ऐसा क्यों है परमात्मा ?&lt;br /&gt;और तो और सबके हिर्दय में,मृत्यु का ऐसा भय इस कारण बैठा दिया है, मृत्यु के ऐसी अनजानी मंजिल बना दी जहाँ से कभी कोई लौट के नहीं आता है, और यह भय सबमें व्याप्त कर दिया ऐसा क्यों है परमात्मा ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;क्या आपने इसीलिए सृष्टि की रचना की नीली छत्री वाले &lt;/b&gt;?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-166450743396635269?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/166450743396635269/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=166450743396635269&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/166450743396635269'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/166450743396635269'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html' title='ईश्वर ने यह सृष्टि क्यों बनाई ?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-7214547087040071544</id><published>2010-07-21T06:27:00.000-07:00</published><updated>2010-07-21T06:27:51.653-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धन्यवाद ब्लोगवाणी का नया स्वरुप हमारीवाणी'/><title type='text'>धन्यवाद    हमारीवाणी |</title><content type='html'>जब से आपका अस्थायी संकलक बंद हुआ था,और ज्ञात ही नहीं था,कब दुबारा अपने सवरूप में आएगा,में तो अपने को अपाहिज सा अनुभव कर रहा था, यह तो अच्छा हुआ कि चर्चा मंच को मैंने जोड़ रक्खा है,और उसमें रूप चन्द्र शास्त्री के द्वारा सूचित करने पर मैंने तुरंत आपके नए स्वरुप "हमारीवाणी.कोम &amp;nbsp;में,अपना खाता,तथा प्रोफाइल और अपने ब्लोगों को जोड़ा,और अनामिका की सदायें को धन्यावाद देता हूँ,जिन्होंने मेरे ब्लॉग को चर्चा मंच में जोड़ा,और में इस हमारीवाणी को उनके कारण देख सका |&lt;br /&gt;और मेरे पास कहने को शब्द नहीं हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"&lt;b&gt;धन्यवाद ब्लोगवाणी का नया स्वरुप हमारीवाणी&lt;/b&gt;"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-7214547087040071544?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/7214547087040071544/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=7214547087040071544&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7214547087040071544'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7214547087040071544'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/07/blog-post_21.html' title='धन्यवाद    हमारीवाणी |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2014055317725317838</id><published>2010-07-17T09:22:00.000-07:00</published><updated>2010-07-17T09:22:51.907-07:00</updated><title type='text'>महिलओं के नामो से परेशान हुआ</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;पत्नी ने पूछा क्या कर रहे हो ?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;मैंने कहा अपनी कविता के साथ हूँ&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;तमतमा के बोली पत्नी यह कविता कौन है ?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;उत्तर था मेरा यह तो मेरी रचना है |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;अब वोह बोली अभी तो कविता के साथ थे ||&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;यह रचना कहाँ से आ गयी |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;में बोला अरे में प्रगति की ओर जा रहा हूँ |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;फिर तो वोह बोली अभी तो कविता,रचना कर रहे थे?&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;क्या इनसे मन नहीं भरा जो चल दिए प्रगति की ओर ||&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;अब मेरा उत्तर था अरे में काव्य की बात कर रहा हूँ |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;गुस्से में तो थीं ही श्रीमती जी काव्य को काव्या सुना |&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;बोली फूटी किस्मत मेरी अब यह काव्या कहाँ से आ गयी ||&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;जब मैंने अंग्रेजी में कहा पोइट्री तो श्रीमती शांत हुईं|&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;-----------------------------------------------------------------------------&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2014055317725317838?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2014055317725317838/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2014055317725317838&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2014055317725317838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2014055317725317838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/07/blog-post_17.html' title='महिलओं के नामो से परेशान हुआ'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-5523442131282058709</id><published>2010-07-16T07:42:00.000-07:00</published><updated>2010-07-17T09:06:50.940-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्यों थी वर्णव्यवस्था दूषित'/><title type='text'>वर्णव्यवस्था दूषित क्यों हो गयी थी ?</title><content type='html'>कहा जाता है,जब इस पृथ्वी पर प्रलय हो चुकी थी,और उस प्रलय के बाद केवल &amp;nbsp;स्वयंभू&amp;nbsp; मनु और श्रधा इस संसार में जीवित बचे थे, पृथक,पृथक धर्मो में,एक कथा तो लगभग सभी धर्मो में एक सी ही है, जब इस पृथ्वी पर प्रलय हुई थी,तो सर्वत्र जल का समराज्य था,हमरे देश में, विष्णु भगवान ने मतस्य अवतार लेकर,एक नौका को अपने से बांध कर मतस्य अवतार लेकर उस जल में से खींच कर के सुरक्षित स्थान पर ले गये थे,और उस नौका में वोह लोग वैठे हुए थे,जिनको पता चल गया था,प्रलय के समय सर्वत्र जल का सम्राज्य होगा,और वोह लोग बच गये थे,परन्तु अधिकतर वर्णन आता है,श्रधा और मनु का&amp;nbsp;,और उसके पश्चात मानव ने इस धरा पर जन्म लिया,इसी प्रकार मुस्लिम और इसाई धर्म में भी,नूह और नोहा का वर्णन आता है, इन लोगों ने भी जब जल सर्वत्र था,परमेश्वर के द्वारा बताने के बाद,उसी प्रकार सुरुक्षित स्थान पहुँच गये थे, जैसे &amp;nbsp;विष्णु भगवान के&amp;nbsp;मतस्य अवतार लेने के बाद,वोह लोग पहुँच गये थे, जो लोग उस नौका में बैठे थे,जिसको विष्णु भगवान ने मतस्य रूप में खींचा था, बाकि धर्मो को छोड़ कर हिन्दू धर्म को लेतें हैं,जो कि भारतवर्ष में हैं,और जिसमें मनु और श्रधा हुए थे, और जो मनु और श्रधा के बाद और मानव,मानवी इस हिंदुस्तान की धरा पर आये,और उसके पश्चात बनी वर्णव्यवस्था,ब्राहमण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र,सब के अलग,अलग कर्तव्य निर्धारित कर दिए गये,ब्राह्मणों का कार्य पठन, पाठन क्षत्रियों का काम सुरक्षा,वैश्य का कार्य धनोउपार्जन,और शूद्रों का कार्य सबकी सेवा करना, यह बात पृथक है,जब देश की सुरक्षा का सवाल आया तो, सबसे पहले देश और शास्त्रों की रक्षा करने के लिए,ब्राह्मणों ने क्षत्रियों &amp;nbsp;के प्रकार शस्त्र भी उठा लिए थे, और तत्कालीन राजाओं ने ब्रहामणों के लिए एक शाही दिन इनके लिए निर्धारित कर दिया था, कुम्भ पर होने वाला शाही स्नान इसी बात का प्रतीक है, ब्राहमण,क्षत्रियों,वैश्यों के साथ तो सम भाव रहा,परन्तु शुद्रो के साथ उपेक्षित व्यवहार क्यों था, अगर शुद्रो वेद सुन लें तो उनके कानो में पिघला हुआ सीसा डालने का कानून था,उनसे छूना वर्जित था, बहुत से रुर्डीवादी तो आज कल भी यह छुआ छूत की परम्परा निबाह रहें हैं, जब कालांतर में सब मनु और श्रधा की संतान बने तो आपस में इस प्रकार की मानसिकता क्यों थी,एक ही प्रकार की संतान में वैर क्यों था ?क्या माँ बाप अपनी संतानों को सिखाते हैं आपस में वैर भाव रखो? &amp;nbsp;कहा जाता है,"आत्मा अंश जीव अविनाशी ",और आत्मा को परमात्मा का अंश कहा गया है,शुद्रो को मंदिर में जाने की आज्ञा नहीं थी,यह कैसा विरोधाभास था, एक ओर तो कहा जाता था,आत्मा परमात्मा का अंश है,क्या शूद्रों की आत्मा परमात्मा का अंश नहीं थी?आत्मा अगर परमात्मा का अंश है, तो परमात्मा का परमात्मा से वैर कैसा ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;शूद्रों को उच्च जाती के लोगों के साथ बैठना, उनके कुओं से पानी लेना सर्वथा वर्जित था,यह किस प्रकार की वर्णव्यवस्था थी ?&lt;br /&gt;यह भी कहा जाता है,ब्राह्मणों की उत्पत्ति,ब्रह्मा जी के मुख से, क्षत्रियों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी की भुजाओं से, वैश्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी के उदर से,और शूद्रों की उत्पत्ति ब्रह्मा जी की टांगो से हुई थी, फिर एक ही शरीर से उतपन्न लोगों का आपस में वैर? समझ नहीं आता |&lt;br /&gt;अंत मे कहना चाहूँगा, शरीर के अलग,अलग भागो को भी इस प्रकार से विभक्त क्या गया है, सिर को ब्राहमण, भुजाओं को क्षत्रिय,उदर को वैश्य कहा गया और पैरो को शुद्र कहा गया है, तो इस शरीर के भागो का आपस में वैर कैसा ?&lt;br /&gt;&lt;b&gt;क्यों थी वर्णव्यवस्था दूषित&lt;/b&gt;?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-5523442131282058709?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/5523442131282058709/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=5523442131282058709&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5523442131282058709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5523442131282058709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/07/blog-post_16.html' title='वर्णव्यवस्था दूषित क्यों हो गयी थी ?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-5569017885272903568</id><published>2010-07-08T05:40:00.000-07:00</published><updated>2010-07-08T05:40:42.908-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जागो बही'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहनों जागो कुछ अपने में भी तो सामाजिक चेतना लाओ'/><title type='text'>हमारे देश में सामाजिक चेतना का अभाब क्यों है ?</title><content type='html'>हमारे देश भारत में सामाजिक चेतना का अभाव क्यों है, समझ नहीं आता क्या यह अशिक्षा का प्रभाव है ?, या स्वार्थ की भावना&lt;br /&gt;है ? या इन दोनों का मिला,जुला प्रभाव है ?&lt;br /&gt;इस सामाजिक चेतना का लाभ उठातीं हैं,राजनीतिक पार्टियाँ और हानि किसकी होती हैं,जनता की, विरोधी पार्टियों को कोई मुद्दा मिला नहीं,और उतर आतीं हैं,अन्दोलोनो पर, आन्दोलन करना तो ठीक है, परन्तु &amp;nbsp;निजी,सरकारी संपत्तियों को हानि पहुँचाना कहाँ तक उचित है, कुछ राजनीतिक शरारती तत्व भोली जनता तो उकसाते हैं,और यह भोली जनता उनके बहकावे में,आकर के तोड़,फोड़,आगजनी,रेलगाड़ियों तथा बसों को रोकना प्रारम्भ कर देते हैं, इससे हानि किसे होती है,जरा सोचिये,अगर रेलगाड़ियों को रोका जाये तो कोई अपने विशेष प्रयोजन के लिए या आवश्यक काम के लिए जा रहा हो,जैसे किसी का व्यवसाय के लिए साक्षात्कार हो और वोह रेलगाड़ी रुकने के कारण वोह साक्षात्कार के लिए उपस्थित ना हो पाए,गया ना उस समय आजीविका कमाने का साधन वोह वंचित रह जाये&amp;nbsp;,वोह आपका भी तो बही,बंधू हो सकता है,|&lt;br /&gt;बसों को जलाने या बसों को&amp;nbsp;तोड़,फोड़ करने से क्या लाभ,कोई रोगी बस में बैठ कर अस्पताल के लिए जा रहा हो,और बस के चलने&amp;nbsp;में बाधा पड़ने के कारण वोह अस्पताल ना पहुँच पाए और दम तोड़ दे, वोह हम लोगों में से कोई भी हो सकता है,आप लोग यह क्यों नहीं सोचते ? अभी कुछ दिनों पहले विरोधी पार्टियों ने महंगाई के विरोध में&amp;nbsp; बंध का एलान किया और बाजार बंद करवाए,यह तो सही है,परन्तु सोचिये निजी,सार्वजानिक संपत्तियों को हानि पहुँचाने से किसी हानि होगी ? सन 1984 में हमारी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या हुई थी,और उस समय&amp;nbsp; एसी दंगो की आग भड़की की,अधिकतर सिक्खों की जान पर बन आई, वोही आगजनी,वोही तोड़,फोड़ और उस हानि की भरपाई आज तक नहीं हो पायीं है,अगर सरकारी संपत्तियों को हानि &amp;nbsp;पहुंचाई जाएगी तो सरकार उस हानि को किसके द्वारा क्षतिपूर्ति करेगी,जाहिर है,जनता से कर के रूप में, इन्टरनेट से तो यह सन्देश अधिक लोगों को नहीं पहुँच पायेगा,क्योंकि हमारी अधिकतर जनता में शीक्षा का आभाव है,मत आओ भाई,बहनों इन बहकावों में |&lt;br /&gt;जब कोई धार्मिक कार्यक्रम जैसे जागरण इत्यादि इस प्रकार के कार्यक्रम होतें हैं,तो अक्सर शामियाने इस प्रकार लगाय जाते हैं की सड़क के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक यह शामियाने स्थान ले लेतें हैं, इससे सड़क पर निकलने में कठिनाई होती है, जैसे ऊपर लिखा गया है, अगर&amp;nbsp;कोई किसी आवशयक काम के लिए जा रहा हो और उसको वोही रास्ता ज्ञात हो तो पड़ गयी ना उसके काम में बाधा,और इस प्रकार के धार्मिक अयोजोनो में,लाउडस्पीकर लगा कर जोर,जोर से &amp;nbsp;भजन इत्यादि गाए जाते हैं,अगर कोई आसपास में रोगी हो या कोई परीक्षा की तय्यारी कर रहा हो,यह कृत्य बाधक बनेगा की नहीं ? अरे भगवान का तो कार्य कर रहे हो,और भगवान के बन्दों को दुखी कर रहे हो,ये कैसी पूजा है ?&lt;br /&gt;और तो और जागरण में नाम ले लेकर पुकारा जाता है, इसकी इतने रूपये की अरदास,क्या भगवान गरीबों का नहीं हैं,इसको व्यापर क्यों बनाते हो?&lt;br /&gt;रामायण की इस चोपाई पर तनिक ध्यान दो "छल कपट मोहे नहीं भावा",इसका अर्थ समझो भगवान को प्राप्त करना है तो&lt;br /&gt;छोड़ो यह आडम्बर भगवान प्रसन्न होतें हैं,निर्मल भक्ति से,अगर कोई धार्मिक आयोजन करना है,तो पार्क इत्यादि सार्वजानिक व्यवस्था करो,आप भी खुश,जनता भी खुश और ईश्वर भी प्रसन्न |&lt;br /&gt;आज कल सड़को पर देखो तो कैसे अव्यवस्था नजर आयगी,हर किसी को जल्दी है,आगे निकालने का स्थान नहीं हैं,पीछे से भोपुओं के शोर अगर रात्रि काल हो तो पीछे से कार के दिप्पर,यह लोगों के अपने बनाये हुए नियम जो की,वाहन चलाने के लिखित नियोमो में तो नहीं हैं |&lt;br /&gt;बहुत बार यह भी होता है,कोई बच्चा खेलता,खेलता बोरवेल या मन्होल में गिर जाता है,जो कि ठेकेदार या सरकारी कर्मचारियों का काम है,इनको सुरक्षित तरीके से ढक कार रखें,हो सकता है,अगला बच्चे का गिरने का नम्बर ठेकेदार या सरकारी कर्मचारी में से किसी का हो |&lt;br /&gt;जागो बही,बहनों जागो कुछ अपने में भी तो सामाजिक चेतना लाओ |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-5569017885272903568?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/5569017885272903568/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=5569017885272903568&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5569017885272903568'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5569017885272903568'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='हमारे देश में सामाजिक चेतना का अभाब क्यों है ?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-8398374327662875843</id><published>2010-06-15T02:17:00.000-07:00</published><updated>2010-06-15T02:19:22.300-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धन्यवाद |'/><title type='text'>और सोशल साईट से जुड़ने में असमर्थ हूँ |</title><content type='html'>आज कल सोशल साईट की बाड़ सी आ गयी है,नित नए,नए सोशल साईट का निमंत्रण मिलता है,आखिर कितने सोशल साईट का निमंत्रण स्वीकार करुँ? सबसे पहले ऑरकुट पर अपना खाता खोला था, फिर याहू मेसेंजर पर अमरीका की&amp;nbsp; पेटरिका से चैट कर रहा था, और उन्होंने पूछा "क्या कर रहे हो "? मैंने उत्तर दिया" कुछ नही", तो वोह बोलीं मैंने फेसबुक पर अपने पारिवारिक फोटो लगाये हैं, और इस प्रकार मेरा खाता फेसबुक में भी खुल गया, किसी मेरे पुराने मित्र ने मुझे hi 5 पर निमन्त्रन मिला और इस प्रकार इस साइट में मेरा खाता खुल गया, इसी प्रकार से मेरा खाता नेटलोग और झूस में भी खुल चुकें हैं, इन सब में, मिला कर बहुत सारे&amp;nbsp; इन्टरनेट पर मित्र हो गएँ हैं, और याहू मेसेंजर, जी मेल और हॉट मेल पर भीबहुत सारे मित्र हैं, इन सब को मेनेज करना बहुत कठिन है,और उसके साथ याहू,रेडिफ,जी मेल,हॉट मेल पर आने वाले सन्देश और उनका उत्तर भी देना होता है, में इस कारण से बहुत से लोगों के निमंत्रण को सवीकार नहीं करता हूँ, बहुत से लोगों को यह मेरा रूखापन लगता होगा,यह मेरी विवशता है,इसके अतिरिक्त में परिवार वाला हूँ, परिवार के बहुत से कर्तव्य भी निभाने होते हैं,और बहुत से काम घर गृहस्ती चलाने के लिए करने होतें हैं |&lt;br /&gt;में और सोशल साईट में खाता खोलने में असमर्थ हूँ,जिस,जिसने मुझे अपना सोशल साईट पर मित्र बनाना चाह,उनको हार्दिक &lt;b&gt;धन्यवाद &lt;/b&gt;|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-8398374327662875843?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/8398374327662875843/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=8398374327662875843&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8398374327662875843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8398374327662875843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/06/blog-post_15.html' title='और सोशल साईट से जुड़ने में असमर्थ हूँ |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total><georss:featurename>Ghaziabad, Uttar Pradesh, India</georss:featurename><georss:point>28.661968 77.426482</georss:point><georss:box>28.511341 77.1930225 28.812595 77.65994149999999</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-3388460824979194368</id><published>2010-06-10T04:00:00.000-07:00</published><updated>2010-06-10T21:48:58.626-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाठकों की प्रतिक्रियाएं सर आँखों पर धन्यबाद'/><title type='text'>ज्योतिष,तंत्र,मन्त्र,यंत्र या इस प्रकार की विद्याओं का अध्यन सार्थक या निरर्थक |</title><content type='html'>&lt;a href="http://avinashvachaspati.blogspot.com/"&gt;आज कल वैज्ञानिक युग है&lt;/a&gt;,और विज्ञान के बहुत से पृथक,पृथक विषय हैं,भोतिक विज्ञान,रासायनिक विज्ञान,जीव विज्ञान इत्यादि अगर&amp;nbsp; सारे विज्ञानिक विषयओं के बारे लिखे जाये तो यह वेगयानिक विषयों की सूची बहुत लम्बी हो जाएगी,और इस प्रकार के विज्ञानिक विषयों पर शोध ही आजकल प्रचलन में हैं, इन्ही विज्ञानिक विषयों पर निरंतर शोध होने के करण मानव की बहुत सी आवश्यकताएं पूरी हो रही हैं, नयी,नयी बस्तुओं का अविष्कार हो रहा है, आज इन शोध के करण बहुत प्रकार के क्लोन बन चुके हैं &amp;nbsp;,और अब तो विज्ञान के करण रासायनिक क्रियाओं के द्वारा जीता जगता सेल बनाने में वैज्ञानिकों को सफलता मिल गयी हैं,अगर विज्ञानिक सिद्ध हुए प्रयोगों को जितनी बार दोहराया जाये तो परिणाम सदा एक रहेगा,विज्ञानिक सदा जिज्ञासु परवर्ती के होते हैं,और अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए तार्किक प्रयोग करते रहते हैं | जब आईसक न्यूटन ने पेड़ से सेव को गिरते देखा तो न्यूटन का पहला गुरुत्वाकर्षण का नियम बना,फिर इसी प्रकार न्यूटन &amp;nbsp;का दूसरा नियम बना "जो वस्तु चल रही है चलती रहेगी" और इसी श्रृंखला में न्यूटन का तीसरा&amp;nbsp; नियम बना," परतेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है" |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;कालांतर में जब महान नोबल पुरुस्कार प्राप्त&amp;nbsp; वैज्ञानिक &amp;nbsp;ईनसटीईन &amp;nbsp;का समय आया तो उनकी जिज्ञासा के करण न्यूटन के नियोमों पर &amp;nbsp;ईनसटीईन &amp;nbsp;ने कुछ संशोधन किये जैसे न्यूटन के दूसरे नियम "जो वस्तु चल रही है,चलती ही रहेगी,या जो वस्तु रुकी है रुकी रहेगी", पर ईनसटीन ने कहा जब तक उस पर वाहिये बल ना लगाया जाये, इसी प्रकार न्यूटन के तीसरे नियम "परतेक क्रिया की पर्तिक्रिया होती है", पर उन्होंने संशोधन किया उसके "विपरीत और बराबर", विवाद तो हमेशा बने रहे हैं हैं,गलेलियो ने अपने समय में कहा था कि " पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है",जो आज के युग में सत्य है,पर उस युग में सत्य नहीं था,क्योंकि धर्मग्रन्थ में लिखा हुआ था," सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है", इस कारण गलेलियो को बहुत अधिक विरोध सहना पड़ा था , इसी प्रकार इटली में,"सुकरात लोगों को कहता था,किसी बात को ऐसे ही नहीं अपनाओ,अपनी बुद्धि से सोचो फिर अपनाओ ", तो उसको विष का प्याला पीना पड़ा,जो आज के युग में सत्य है |,आर्किमिडिज़ ने जब सनान के लिए टब में प्रवेश किया तो,कुछ जल बहार निकला और आर्किमिडिज़ "यूरेका,उरेका चिल्लाते हुए निवस्त्र ही भाग निकले, मतलब कि पता चल गया,और आर्किमिडिज़ का सिधांत बन गया,"जो भी वस्तु द्रव में जाती है,वोह अपने भार के बराबर द्रव को विस्थापित करती है", इस तर्क को मान लिया गया,मतलब कि कभी विरोधाभास और कभी अपना लेना तो सदा ही चलता रहा है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;यह तो केवल अनुसन्धान की ही बात है,परन्तु अब बात करते हैं अविष्कारों की,जैसे के ऊपर लिखा आज तो विज्ञान ने प्राणयुक्त सेल निर्मित कर लिया है,और आगे चल कर क्या,क्या वैज्ञानिक अविष्कार हो जाएँ,कुछ कहा नहीं जा सकता है,निरन्तर वैज्ञानिक विषयों पर शोध होते रहते हैं,और नए,नए अविष्कार होते हैं, इसी सन्दर्भ में अगर बात करें थोमस अल्वा&lt;br /&gt;एडिसन ने जब बल्ब के अविष्कार के बारे में कहा तो लोग हंसने लगे,परन्तु उन्होंने बल्ब का अविष्कार कर लिया,और जब उसको विद्युत् उर्जा के द्वारा प्रकशित किया गया,तो प्रकाश तो हुआ और आधे घंटे के बाद,उस बल्ब के अन्दर के धातु के तार जल गये,फिर एडिसन की उस समय किरकरी हुई,क्योंकि वोह धातु के तार ओक्सजीन के कारण ओक्ससीडाइज होने के कारण जल गये थे,फिर एडिसन ने उस बल्ब में सारी वायु नीकाल कर वेकुयम बना दिया,और इसी प्रकार हो गया बल्ब का अविष्कार,और आज तो ट्यूबलाइट,सी.ऍफ़.एल इत्यादि हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;यह तो रहा विज्ञान के बारे में,अब आतें हैं मूल विषय पर&amp;nbsp;ज्योतिष,तंत्र,मन्त्र,यंत्र या इस प्रकार की विद्याओं का अध्यन सार्थक या निरर्थक, विज्ञान से अधिकतर लोग परिचित है,पर इन विवादित विषयों से बहुत कम लोग परिचित है, में भी विज्ञान का शिष्य रहा हूँ, इन विवादित विषयों से अधिक परिचित नहीं हूँ,ज्योतिष के बारे में इतना ही जानता हूँ, ग्रह इत्यादि की गणना की जाती है,और भविष्यवाणी करना कला है,फिर ज्योतिष में विभिन्न ग्रहों का प्रभाव कम या अधिक करने के लिए रत्न धारण किये जाते हैं, और जिस प्रकार की रश्मियों की शरीर की आवशयकता है,यह रत्न उस प्रकार की रश्मियों को वातावरण से लेकर शरीर को पहुंचाते हैं|&lt;br /&gt;अब आता हूँ,जड़ी,बूटियों के द्वारा रोग निवारण, हमारे पूर्वज इसके बारे में जानते थे,परन्तु जैसे,जैसे समय बीतता गया इस विद्या का ज्ञान कम होता रहा, परन्तु चिकत्सा क्षेत्र में,दूसरी पद्दतिया की चिक्त्साए जीवित हैं,जैसे एलोपेथी,होमोपेथी, यूनानी इत्यादि,लेकिन जड़ी,बूटियों से चिकत्सा के बारे में शोध नहीं होता,इसी प्रकार आता हूँ तंत्र,मंत्र यंत्र पर यह विद्याएँ जीवित तो हैं, परन्तु इन विद्याओं के साधक नहीं मिल पाते,अगर मिल भी जाएँ तो इस क्षेत्र में इतना पाखंड हैं,कि कौन सही और कौन गलत इस पर सहज विश्वास नहीं हो पाता,इन्सान इनके चंगुल में फँस सकता ना ही इन विषयों पर शोध नहीं होता है, अब इस बात को पाठकों के ऊपर छोड़ता हूँ,यह विद्याएँ सार्थक हैं या&amp;nbsp; निरर्थक,मेरी ओर से इस विषय पर &amp;nbsp;कोई प्रतिक्रिया नहीं हैं, बस पाठको कि क्या राए अच्छी या बुरी जानने की उत्सुकता है,सबका स्वागत है |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;पाठकों की प्रतिक्रियाएं सर आँखों पर धन्यबाद&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-3388460824979194368?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/3388460824979194368/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=3388460824979194368&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3388460824979194368'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3388460824979194368'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='ज्योतिष,तंत्र,मन्त्र,यंत्र या इस प्रकार की विद्याओं का अध्यन सार्थक या निरर्थक |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-4082858421433677427</id><published>2010-05-27T04:24:00.000-07:00</published><updated>2010-05-27T04:24:12.669-07:00</updated><title type='text'>हमारे देश के सत्ता पक्ष और विपक्ष क्या मिल कर देश की प्रगति के लिए आम सहमती नहीं बना सकते ?</title><content type='html'>जब भी समाचार पत्रों को उठा के देखो तो कोई भी मुद्दा हो, जैसे आज कल जातिगत जनगणना को मुद्दा,या नक्सल बाद का मुद्दा तो विपक्ष अक्सर सत्ता पक्ष पर आक्षेप ही लगाता ही दिखाई&amp;nbsp;देता है, सत्ता पक्ष से उस मुद्दे का उत्तर माँगा जाता है,परन्तु अपनी और से कोई भी सुझाव देता नहीं देता&amp;nbsp; &amp;nbsp;है, आज कल विपक्ष आसमान छूती महंगाई के विरोध में प्रदर्शन कर रहा है,परन्तु यह सुझाव नहीं दे रहा है,कि इस बड़ती हुई महंगाई कि रोकथाम कैसे हो, क्या विपक्ष का यही काम है सत्ता पक्ष के विरुद्ध आवाज उठाना, अगर इस समय का चुनाव के बाद विपक्ष का स्थान ले लेता है, जैसा होता आया है&amp;nbsp;तो यह भी बस बदले हुए सत्ता पक्ष पर आरोप ही लगता नजर आयेगा&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अगर विपक्ष आक्षेप लगाये और उसके साथ सुझाव भी दे और सत्ता पक्ष उन सुझावों&amp;nbsp;वों को कार्यान्वित करे तो देश की प्रगति के आसार अधिक हो जायेंगे, देश की प्रगति के लिए स्वस्थ बहस तो अच्छी है, प्रतेक कार्य में गुण दोष तो होते ही हैं, अगर विपक्ष दोष तो बताये और उसके साथ उसका निवारण भी बताये और सत्ता पक्ष उन दोषों को सुन कर उनका निवारण करे तो देश उन्नति की ओर अग्रसर होगा |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;कोई भी राजनितिक पार्टी सत्ता पक्ष में आती है, उसकी अपनी उपलब्धियां तो होतीं ही हैं,जैसे इस समय के सत्ता पक्ष के द्वारा मेट्रो ट्रेन लाना और उसका विस्तार करना, लेकिन दोष भी होतें हैं, जैसे सदन पर हमला करने वाले अफजल गुरु का कोई फैसला नहीं हो पा रहा हैं, उसकी फाइल एक विभाग से दूसरे विभाग में सरका दी जाती है,परन्तु कुछ निष्कर्ष ही नहीं निकल पा रहा, यह तो सरकार के गले की फाँस बना हुआ है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;आखिर यह लोग जनता के द्वारा चुने होतें हैं, और जनता इन से आशाएं रखतीं हैं,जब इन नेताओ के द्वारा जनता की आशाएं पूरीं नहीं हो पाती तो लोग यह समझ नहीं पातें किसको वोट दे कर अपना पर्तिनिधि&amp;nbsp; चुना जाये,और चुनाव के समय यह प्रचार होता कि हर नागरिक को वोट देना चाहिए,अगर कोई भी पार्टी सकारात्मक कार्य करेगी तो जनता का उस पार्टी पर विश्वास बढेगा और जनता उस पार्टी को स्वत: ही वोट देगी,इस प्रकार के प्रचार की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;आखिर यह लोग लोकतान्त्रिक देश के राजनेता हैं,और जनता की आवश्यकताओं को पूरा करना इनका कर्त्यव्य है,जनता का आत्मविश्वास तो इनके हाथ में |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;अगर प्राक्रतिक आपदाओं के कारण, यह नेता संभावित कार्य नहीं कर पाते तो यह तो इनकी विवशता हो सकती है, जैसे गत वर्ष में वरिश ना होने के कारण फसल की हानि,और इस कारण महंगाई बड़ने का तो कारण था, लेकिन अगर प्राक्रतिक आपदाएं ना हो,और जनता की आशाओं पर तुषारापात हो तो,राजनेता कहलाने वालों से क्या आशा की जा सकती है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;जब कोई पार्टी चुनाव में हार जाती है, तो उस पार्टी के लोगों में पार्टी के हार का कारण ढूँढा जाता है, कि वोह पार्टी क्यों हारी&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;है, परन्तु यह नहीं ढूँढा जाता देश के विकास में क्या अवरोध आयें हैं,जिसके कारण पार्टी हारी है ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;यह सदन में गरमा,गर्मी वाक आउट के स्थान पर अगर विपक्ष सत्ता पक्ष के दोष बता कर उनका निवारणका हल भी बताये&amp;nbsp;&amp;nbsp;तो देश प्रगति कर सकता है |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;जनता को यह अधिकार ही नहीं है,कि इन लोगों से प्रश्न पूछ सके,तो यह आम जनता क्या करे? बस कभी,कभी प्रेस कोंफ्रेंस हो जाती है,और इन नेताओं से मीडिया ही अधिकतर प्रश्न पूछता है ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;जब जनता त्रस्त हो जाती है,तो आन्दोलन पर उतर आती है, तब सत्ता पक्ष समाधान की बात करता है, अगर अकारण ही मूल भूत सुविधा ना मिले तो जनता में रोष तो होगा ही |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पक्ष हो या विपक्ष कभी विपक्ष सत्ता पक्ष में आयेगा और सत्ता पक्ष विपक्ष में आएगा अगर आम जनता का विश्वास प्राप्त कर सकेगा तो जनता स्वत: ही वोट देगी |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;देश हित में सत्ता पक्ष में निजी मतभेद मिटा कर देश हित में एकमत तो होना ही पड़ेगा |&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: 23px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman'; font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 14px; line-height: 25px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; font-size: small;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: 13px; line-height: normal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-4082858421433677427?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/4082858421433677427/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=4082858421433677427&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/4082858421433677427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/4082858421433677427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='हमारे देश के सत्ता पक्ष और विपक्ष क्या मिल कर देश की प्रगति के लिए आम सहमती नहीं बना सकते ?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1569033479229185251</id><published>2010-05-09T03:51:00.000-07:00</published><updated>2010-05-09T03:51:07.398-07:00</updated><title type='text'>कल 10 मई हम दोनों पाती,पत्नी के लिए विशेष है |</title><content type='html'>आज सुबह मेरी पत्नी ने कहा कि उसके स्कूल में कल 10 मई को सब लोग उससे मिठाई मांगेगे, मुझे उस क्षण तो कुछ याद नहीं आया परन्तु दूसरे ही पल याद आ गया कि हम दोनों को विवाह बंधन में बंधे हुए 32 वर्ष हो जायेंगे, आज से 32 वर्ष से १ दिन कम में हमारा विवाह हुआ था,और जैसे ही मुझे दूसरे क्षण स्मरण हो आया कि कल हमारी ३२ वीं वर्षगांठ है, तो 32 साल पहले की विवाह बंधन में बंधने की घटना आँखों के सामने आने लगी, मुझे अपने काम के कारण अलग,अलग शहरों में जाना पड़ता था, इसलिए उस समय की फोटो रील द्वारा खिंची हुई फोटो जो कि हमारी शादी का प्रमाण थीं,ना जाने कहाँ गम हो गयीं,बस जो रह गयीं हैं,मानस पटल पर खिंची हुईं सम्रतियाँ |&lt;br /&gt;आज से 33 साल पहले जब किंचित मुझे कार्य करते हुए एक साल व्यतीत हो चुका था, तब मेरी माँ ने समाचार पत्रों में मेरे लिए बधु खोजना प्रारंभ कर दिया था, उस समय तो यही एक उपाय था,बर बधु खोजने का,और मेरे माँ और पिता जी कभी इस शहर में या कभी उस शहर में मुझे लेकर जाते थे,वधु की तलाश में,और कभी लड़की वाले आते थे हमारे घर में,इस प्रकार एक वर्ष बीत गया था,मेरी माँ ने समाचार पत्र में, मेरी पत्नी के घर का पता और दूरभाष नंबर देखा और मिला दिया मेरी पत्नी के घर पर फ़ोन और इस प्रकार हमारे विवाह का सूत्रपात हुआ था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;उसके पश्चात विवाह की प्रारम्भिक रस्मों गोद भराई सगाई इत्यादि रस्मों का सिलसला आरंभ हो गया था, और क्षणे,क्षणे खिसकता हुआ आ गया 10 मई का वोह दिन जब हम दोनों प्रणय बंधन में,बंध गए |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1569033479229185251?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1569033479229185251/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1569033479229185251&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1569033479229185251'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1569033479229185251'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/05/10.html' title='कल 10 मई हम दोनों पाती,पत्नी के लिए विशेष है |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-137979357157047400</id><published>2010-04-17T08:13:00.000-07:00</published><updated>2010-04-17T08:13:57.296-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्राक्रतिक आपदाओं का परिणाम'/><title type='text'>प्राक्रतिक आपदाओं का परिणाम |</title><content type='html'>अभी हाल ही में, हैती में आये भूकंप ने हाहाकार उत्पन्न कर दिया था, अत्यधिक जान माल की हानि हुई थी, सब ओर इस प्रकार से अस्त,व्यस्ता की सुरक्षा का कोई रास्ता ही नहीं बचा था, सड़के क्षतिग्रस्त हो गयी थीं, सडको का मार्ग अवरुद्ध, हवाई अड्डे तहस,नहस सडकों की ओर से सहयता पहुचना दुर्लभ हो गया था, हवाई सहायता भी पहुचना भी दुर्लभ हो गया था, इमारते तहस नहस होने के कारण हजारो लाखो लोग मलबे के नीचे दब गए थे |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;और इसी वर्ष में चीन में भी ऐसा ही भूकंप आया है,और वोही दृश्य जैसा कि हैती में हुआ था,लोग जब तक संभले इससे पहले इस भूकंप ने लोगों को अपनी चपेट में लिया था, यह तो थी भूकंप की त्रासदी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;और अभी हाल ही में आइसलैंड के ग्लेशिअर में जवालामुखी ऐसा भड़का की उससे कई किलोमीटर तक धुआ उठा और इस धुंए ने बहुत से देश अपनी चपेट में ले लिए , हवाई सेवाएँ युरोप के बहुत से देशो अवरुद्ध हो गयीं हैं, इस धुए के कारण लोगों को साँस की समस्या हो सकती हैं, इस धुंए में सल्फर की अधिक मात्रा होने के कारण बारिश होने पर यह सल्फर यह पानी के साथ मिल कर तेजाब बनाएगा (सल्फुरिक असिड ) जो कि त्वचा को हानि पहुंचाएगा,और यही बारिश का पानी धरतीऔर लावा में निकले कांच धरती&amp;nbsp;पर पड़ कर उसको बंजर बनायेंगे&amp;nbsp; जो फसलो को उत्पन्न होने में कठिनाई पैदा करेगा, इस प्रकार की प्राक्रतिक आपदाए सुनने और पड़ने&amp;nbsp;में ऐसा लगता है,जैसे कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय पर हिरोशिमा नागासाकी पर परमाणु बम गिरा था,और अनेको वर्षो तक इस परमाणु बम ने रेडशीयन के कारण लोगों को हानि पहुंचाई थी, यह &amp;nbsp;रेडशीयन उसी प्रकार से हानि पहुँचाता है,जैसे कि दिल्ली के &amp;nbsp;स्थान पर कोबाल्ट-60 ने कुछ लोगों को हानि पहुचाई है, इसकी किरणे विकरण के कारण त्वचा को भेदता हुआ हड्डियो और खून को क्षतिग्रस्त करता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अपने ही देश की बात लो गत वर्ष सुनामी ने हजारो लोगों को अपनी चपेट में लिया था, सुनामी के कारण कितने ही लोग बह गए कितनो के ही घर उजड़ गये थे, और मानसून के दिनों में एल नेनो मानसूनी हवाओ को क्षीण कर दिया था, और परिणाम वर्षा भी नाममात्र की हुई थी, फसल कम हुई थी और इस कारण फल सब्जिओ के दाम आसमान छुने लगे हैं, वैसे तो यह अर्थशास्त्र को नियम है,अगर किसी वस्तु की मांग अधिक होती है, और उपलब्धता कम तो उस वस्तु के दाम बड़ने लगते हैं, और ऊपर से यह सटोरिये जो अपने पास फल सब्जियों का अपने पास भंडार रख लेते हैं, और कमी होने के कारण यह सटोरिये अपना लाभ सोच कर ऊँची,ऊँची कीमतों में बेचते है, इन सटोरियों को आम जनता से कोई मतलब नहीं इनको तो अपने लाभ से मतलब |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;आज कल विश्व उतरोतर बडते हुए तापमान से ग्रसित हो रहा है, इसका कारण तो में अपने एक लेख में लिख चुका हूँ, अब ऐसी एसी प्राकर्तिक आपदाए आ रही हैं,जो पहले सुनने और पड़ने में बहुत कम आती थीं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;क्या प्रक्रति की विनाश लीला प्रारंभ हो गयी है &lt;/b&gt;|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-137979357157047400?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/137979357157047400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=137979357157047400&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/137979357157047400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/137979357157047400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='प्राक्रतिक आपदाओं का परिणाम |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1707583382220895125</id><published>2010-03-20T04:50:00.000-07:00</published><updated>2010-03-20T05:05:31.558-07:00</updated><title type='text'>मेरी  मेरे ब्लॉग की यह शतकीय पोस्ट है |</title><content type='html'>&lt;b&gt;|मेरी मेरे ब्लॉग की&amp;nbsp; यह शतकीय पोस्ट है |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;यह तो मुझे याद नहीं कब मैंने ब्लॉग लिखने प्रारम्भ किये थे, हाँ बस लिखता चला गया, दो निजी ब्लॉग बनाये थे,www.vinay-mereblog.blogspot.com और दूसरा www.snehparivar.com , शेष दो ब्लॉग में से एक ब्लॉग पिता जी अविनाश जी ने मेरे डेशबोर्ड पर पहुँचाया था,और एक और ब्लॉग कबीरा खड़ा बाजार में किसी और ने मेरे डेशबोर्ड पर पहुँचाया था, मैंने तो युहीं अपनी पहली पोस्ट मेरी जीवनी से www.vinay-mereblog.blogspot.कॉम में&amp;nbsp; लिखी थी,मुझे ज्ञात ही नहीं था,मेरी पोस्ट पड़ी जाएँगी और उन पर टिप्पणियाँ भी आयंगी, उससे पहले भी एक ब्लॉग बनाया था,और उस ब्लॉग का पता ही नहीं चला,ब्लॉगर के अपडेट होने के बाद वोह ब्लॉग कहीं खो गया, हो सकता है, ब्लॉगर के मुख्य सर्वर पर भी ना हो |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;मेरा ना ब्लोगवाणी से कोई परिचय था,ना चिटठा जगत का, एक बार अविनाश जी से दूरभाष पर बात हो रही थी, मैंने यह उनसे पूछा कि " आप लोग किसी नए लिखने को कैसे जान लेते हैं ?" , तब अविनाश जी ने मेरा परिचय ब्लोगवाणी और चिट्ठाजगत से करवाया था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;यहाँ ब्लॉगर पर आकर के बहुत से लोगों से पहचान हुई, और भिन्न,भिन्न विषयों का ज्ञान मिला, बस एक बात की कसक रह गयी, मेरी रिहायश के आस पास दो स्थान पर ब्लागरों का सम्मलेन हुआ, लेकिन कुछ निजी कारणों से ना वहाँ जा सका, इसलिए आमने,सामने किसी से मुलाकात नहीं हुई, एक बार तो कुछ पेमेंट करनी थी, और दूसरी बार पत्नी को मलेरिया हो गया था, अविनाश जी तो गाजिआबाद के पास दिल्ली में ही रहते हैं, उनका दो बार हमारे घर आने को प्रोग्राम भी बना, एक बार तो वोह हमारे घर आने वाले थे, परन्तु उनका बीच में ही उनका प्रोग्राम बदल कर नोयडा जाने का बन गया, दूसरी बार उनका किसी शादी में फिर गाजियाबाद आने का था,और बहुत देर रात्रि में आने के कारण वोह, दोबारा हमारे घर नहीं आ पाए थे, पाबला जी भी एक ब्लॉगर सम्मलेन में गाजिआबाद आये थे, पाबला जी ने तो मेरी दो ब्लॉगर की दो तकनिकी समस्या का भी&amp;nbsp;समाधान किया था, सब ब्लोग्गरो के जन्मदिन,वैवाहिक वर्षगांठ और ब्लोग्गरो की समाचार पत्रों में, ब्लोग्गोरो द्वारा लिखी हुई पोस्ट को स्मरण करा कर ख़ुशी देने वाली इस शख्सियत से मिलने की बहुत हसरत थी, लेकिन एन मौके पर पत्नी को मलेरिया बुखार हो गया, उनसे तो दूरभाष पर इस सम्बन्ध में बात भी हो चुकी थी, होना तो वोही होता है,जो ऊपर वाले को मंजूर होता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;ब्लॉग बनाने से यह भी लाभ हुआ, ज्योतिष का ज्ञान मिला जिसमे संगीता जी, पंडित डी.के वत्स जी अग्रणी हैं, अलका जी के द्वारा लिखे हुए लेखो से ज्ञात हुआ कैसे फल,सब्जियों से रोगों की चिकत्सा संभव है, लवली जी के लिखे हुए मनोवेग्यानिक लेख से मनोविज्ञान की जानकारी मिली, आशीष जी के कारण में में हिंदी में टिप्पणी दे पाता हूँ, उनका तकनिकी ज्ञान भी मिलता है| आप सब लोगों को तहदिल से धन्यबाद&amp;nbsp; में तो यह भी नहीं जानता था, इसमें अनुसरण करता बन जाते हैं, उन सब अनुसरण कर्ताओं को धन्यबाद, जब पहला ब्लॉग स्नेह परिवार बनाया था,तब सबसे पहली अनुसरण करता थीं&amp;nbsp;,शमा जी जो की बहुत सी कला की धनी हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;उड़न तश्तरी जी को कौन भूल सकता है, उनकी टिप्पणियाँ तो, लगभग सारे ब्लोगों में मिल जातीं हैं, और अपनी कहानी परिवर्तन के समय में लिखे हुए पहले भाग से मुझे लगा,वोह लेखों को बहुत ध्यान से पड़ते हैं, क्योंकि मेरी कहानी परिवर्तन के पहले भाग में मेरी त्रुटी की ओर ध्यान दिलाया था, और वोह जो त्रुटी थी बहुत ही सूक्ष्म थी, उड़न तश्तरी जी आपको बहुत,बहुत धन्यवाद |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;समय,समय पर मनु जी,अविनाश जी,संगीता जी,शमा जी,अनीता जी,पावला जी,अलका जी,पूर्णिमा जी&amp;nbsp; से चैटिंग होती रहती है,और मुझे अपना परिवार सा ही लगता है,ब्लॉग की एक पोस्ट जिसमे गणेश उत्सव के समय मैंने गणपति जी से प्रार्थना करी थी,वोह समाचार पत्र हरिभूमि में छप गया था, जिसकी सूचना मुझे अविनाश जी ने एक टिप्पणी देकर करी थी,में तो आश्चर्य चकित था|&lt;br /&gt;में कोई साहित्यकार तो नहीं,बस एक लिखने का शौक है, साहित्यक त्रुटी तो होतीं हैं ही, एक बार पूर्णिमा जी को होली की शुभकामनाये दे रहा था,और अधिकतर चैत्तिंग में पूर्णिमा लिख रहा था,तब पूर्णिमा जी ने मजाक में&amp;nbsp; कहा जब आप पूर्णिमा लिखेंगे,तब शुभकामनाये लूंगी,लेकिन फिर मैंने पूर्णिमा लिखा तब वोह बोली फिर गलत,उसके बाद मैंने अपनी त्रुटी सूधार के पूर्णिमा लिखा तो वोह बोलीं, "यही हुई ना बात" |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1707583382220895125?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1707583382220895125/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1707583382220895125&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1707583382220895125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1707583382220895125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_20.html' title='मेरी  मेरे ब्लॉग की यह शतकीय पोस्ट है |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-5905163592559321138</id><published>2010-03-19T09:15:00.000-07:00</published><updated>2010-03-19T09:15:21.861-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गृहस्थ जीवन सबसे बड़ा तप या तपस्या है |'/><title type='text'>गतांक से आगे (गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है )</title><content type='html'>गतांक से आगे गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है &lt;br /&gt;यह शेष लेख तुलसीदास जी की इन पंक्तियों से आरम्भ कर रहा हूँ, &lt;br /&gt;&amp;nbsp; नारी मुई,धन संपत्ति नासी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मूड,मुड़ाये भये सन्यासी ||&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp; मतलब कि स्त्री का देहावसन हो गया,संपत्ति का नाश हो गया,बस मुंडन करा के सनाय्सी हो गये, इस प्रकार सन्यासी होना तो कायरता है, अब आगे की बात कहता हूँ, जब मनुष्य गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है, तो पुरष के सिर पर सेहरा रखा जाता है,मतलब यह कि अब गृहस्थ जीवन के कठिन तप के लिए,अपनी जिम्मेदारियों को उठाने के लिए अपना जीवन प्रारंभ करो और अग्नि को साक्षी मान कर सात बचनो में बंध कर स्त्री,पुरष का गठबंधन हो जाता है, अब उन सात वचनों के हिसाब से स्त्री पुरष एक दूसरे के दुख सुख के भागीदार&amp;nbsp; होते है, प्रारम्भ हो गया ना गृहस्थ जीवन का तप,अगर स्त्री कोई कष्ट हो तो पुरुष उसका साथ दे,अगर पुरुष को कोई कष्ट हो तो स्त्री उसका साथ दे, दोनों में से कोई बीमार हो जाये तो दोनों को ही&amp;nbsp; कष्ट सहना ही पड़ता है, अब जब परिवार का प्रारंभ हुआ है,तो ऐसी आय का साधन रखना पड़ता है जो बंद ना हो,यह भी तो तप ही है, आजकल तो एकाकी परिवार हो गए हैं,परन्तु सयुंक्त परिवार में उस स्त्री को जो नयी,नवेली दुल्हन बन कर अपने परिवार को छोड़ कर आई है,उसको&amp;nbsp; वर के माता,पिता भाई,बहनो से सामंजस्य रखना पड़ता है, और वर तथा वधु के मित्रो, करीबी और दूर के रिश्तेय्दारो का भी दायरा बड़ जाता है,और इस समय वर तथा वधु के लिए एक दूसरे के मित्रो, करीबी और दूर के रिश्तेदारों के सुख,दुःख अपने सुख दुःख की ओर अधिक ध्यान देकर के&amp;nbsp; में भागी होना पड़ता है, यह भी तो&amp;nbsp; तप ही है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इसके बाद अगला चरण आता है,संतान उत्पत्ति का, साथ में रहता है,वर और वधु पक्षों के परिवार का संतान उत्पत्ति का दवाब, आज तो युग बदल गया है, परन्तु पुराने समय में अगर वधु संतान नहीं कर पाती थी,तो उसको बाँझ जैसे &amp;nbsp; शब्द से अलंकृत किया जाता था, चाहे दोष वर में हो, लेकिन अब तो समय बदल गया है, लोग समझदार हो गए हैं,और अब वर तथा बधू दोनों का इस सन्दर्भ में डाक्टरी परिक्षण होता है, और इसका इलाज भी हो जाता है, कोई भी विवाहित स्त्री मातृत्व सुख प्राप्त करना चाहती है, और संतान उत्पन्न होते ही, माँ और पिता को अनेको कष्ट सहेने पड़ते हैं, माँ को अनेको रात जाग कर गुजारनी पड़ती है,और बच्चे को सूखे में सुला कर गीले में सोना पड़ता है,एक नन्ही जान के लिए ना जाने कौन, कौन से कष्ट सहने पड़ते है, संतान बीमार पड़ती है,चाहे दिन हो या रात पिता को&amp;nbsp; डाक्टर का प्रबंध करना पड़ता है,यह तप नहीं तो और क्या है ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अब संतान जैसे,जैसे बड़ी होती है,उसका पहले स्कूल की शिक्षा का प्रबंध और उसके बाद कोलेज की शिक्षा और उच्च शिक्षा का प्रबंध तो पिता को करना ही&amp;nbsp; पड़ता है, और माँ को घर में बच्चे को अच्छे संस्कार देना, उसकी घर में&amp;nbsp; पड़ाइ की देखभाल तो माँ को करनी पड़ती है, और पती,पत्नी दोनों ही काम काजी हों तो यह कार्य और भी कठिन हो जाता है,यह भी तो तपस्या नहीं तो और क्या है ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;संतान जैसे,जसे बड़ी होती है,उसके मित्र भी बनते जाते हैं, माँ बाप की यह भी जिम्मेदारी बन जाती है,बच्चा बुरी सांगत में ना पड़ जाये और अपने मित्रो से मधुर सम्बन्ध रखे,यह तप नहीं तो और क्या है, यह क्रम संतान के विवाह तक चलता रहता है,और उसके पश्चात अपनी संतानों की संतानों को उचित मार्गदर्शन देना पड़ता है,यह भी तो तपस्या ही है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इसी लिए तो कहा गया है, &lt;b&gt;गृहस्थ जीवन सबसे बड़ा तप या तपस्या है |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अब इस विषय को हल्का फुल्का कर देते हैं,इस आलेख के पहले भाग में स्त्रियों यानि की गर्लफ्रेंड के बारे में लिखा था,अब पुरषों के लिए कबीर दास जी का दोहा संशोधित करके लिखता हूँ |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;रूखी,सूखी कहा कर ठंडा पानी पी&lt;br /&gt;&amp;nbsp;देख के परायी नार मत ललचावे जी&lt;br /&gt;समाप्त&amp;nbsp; ||&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-5905163592559321138?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/5905163592559321138/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=5905163592559321138&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5905163592559321138'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/5905163592559321138'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_19.html' title='गतांक से आगे (गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है )'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-3329820999573531540</id><published>2010-03-18T23:41:00.000-07:00</published><updated>2010-03-19T00:00:18.527-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रमश:'/><title type='text'>गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है |</title><content type='html'>इस लेख का प्रारंभ कर रहा हूँ,एक प्राचीन काल की घटना से,आज के युग में नारियों को अभी बराबरी का हिस्सेदार नहीं समझा जाता है, वनिस्पत आज नारियां बहुत से वोह कार्य कर रहीं हैं, जिनपर पुरषों का एकाधिकार था,आज सेना में नारियां हैं,परन्तु उनका सेवा काल केवल चोदह वर्ष है,जबकि पुरषों का सेवाकाल पद के हिसाब से अधिक है, वायु सेना में स्त्रिया हवाई जहाज उड़ा रहीं हैं, लेकिन फाइटर वायुयान के लिए नारियां नहीं हैं,इसी प्रकार इन्फेंटरी वोह सेना जो जंग के समय युद्ध मोर्चे पर आगे रहती&amp;nbsp; हैं, उसमें स्त्रिया नहीं हैं,कारण यह है,की नारियां कहीं युध्बंदी ना हो जाये, हाँ बोर्डर सिकुयुरीटी में नारियों का समावेश अवश्य&amp;nbsp; किया गया है ,आज संसद में जब&amp;nbsp; 33&amp;nbsp; प्रतिशत&amp;nbsp; महिला आरक्षण का बिल पास किया गया था,तो इसके विरोध में जोरदार प्रदर्शन हुआ था, जो हुआ था वोह तो सर्वविदित है | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;लेकिन हमारे प्राचीन भारतवर्ष में स्त्रियों को उचित सम्मान दिया जाता था और स्त्री पुरष को एक समान समझा जाता था, और उस समय बहुत सी विदुषी स्त्रियाँ भी हुई थीं, उनमे से एक थीं गार्गी शस्त्रों में प्रकांड पंडित,उस समय शस्त्रों की अधिकतर वाद विवाद प्रोतियुगता हुआ करती थी, शास्त्रार्थ करने के लिए लोग दूर,दूर से पुस्तकों लेकर आते थे, जिसके बारें में कबीर दास जी का दोहा भी है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; पोथी पड पड जग मुआ पंडित भया ना कोय |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; ढाई आखर प्रेम के जो पड़े सो पंडित होय ||&lt;br /&gt;गार्गी के समय एक ऋषि हुए थे,याग्यवाल्य्क्य ऋषि, ऋषि याग्वालाक्य के साथ गार्गी का शास्त्रार्थ होने लगा, जैसे कबीर दास जी ने अपने ऊपर लिखे हुए दोहे में,से पहली पंक्ति में कहा है,उसके अनुसार जो शास्त्रार्थ में विजयी हो जाता था, उसको हारने वाले से उच्च कोटि का पंडित माना जाता था, अब ऋषि याग्यवालाक्य और गार्गी का शास्त्रार्थ होने लगा, दिन बीतते गये पर ना गार्गी हार मान रही थीं ना ऋषि यागाय्वाल्क्य, ऋषि यागयावालाय्क्य को गृहस्थ जीवन का अनुभव नहीं था, परन्तु गार्गी तो गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहीं थीं, और गार्गी ने ऋषि यागावालाक्य से गृहस्थ जीवन के बारे में प्रश्न पूछ लिया, जिसका उत्तर ऋषि यागावाल्य्क्य नहीं दे पाए और शास्त्रार्थ में हार गये,और गार्गी विजयी हो गयीं, तत्पश्चात ऋषि यागावालाक्य ने माँ के गर्भ में प्रवेश कर के गृहस्थ जीवन का अनुभव लिया, वास्तव में तप क्या है, अपने को तपाना, इसका अर्थ यह नहीं है अपने शरीर को बिभिन्न प्रकार के कष्ट दो, इसका अर्थ है दूसरों के लिए विभिन्न प्रकार के कष्ट सहना, और इन कष्टों को सेहन करते हुए,प्रभु को समरण करना, इसी सन्दर्भ में एक और कथा है, सीता जी के पिता राजा जनक और राजा परीक्षत को भगवद्गीता सुनाने वाले शुकदेव जी के बारे में |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;शुकदेव जी को किसी ने कहा राजा जनक को अपना गुरु बनाने को, और शुकदेव जी पुस्तकों का बोझ लादे हुए पहुँच गए राजा जनक के यहाँ,और देखते क्या हैं राजा जनक शानदार महल है,अनेकों रानियाँ हैं, शुकदेव जी सोचने लगे कि इतनी भोग विलासिता वाला मेरा गुरु कैसे हो सकता है, राजा जनक को शुकदेव जी की बात का ज्ञान हुआ,तो राजा जनक के हाथ में एक दिया दिया और राजा जनक शुकदेव जी से बोले,इस दिए को लेकर मेरे महल का चक्कर लगाओ और यह दिया बुझना नहीं चाहिए,शुकदेव जी का ध्यान तो केवल दिए पर ही केन्द्रित था,कहीं यह दिया बुझ ना जाये,और जब शुकदेव जी महल का चक्कर लगा कर राजा जनक के पास पहुंचे,तो राजा जनक ने पूछा महल में क्या देखा, शुकदेव जी का ध्यान तो दिए पर ही केन्द्रित था,तो उन्होंने उत्तर दिया मेरा ध्यान दिए पर ही केन्द्रित था,फिर बाकि में क्या देख पाता ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; राजा जनक ने फिर शुकदेव जी के हाथ में दिया,दिया और बोले महल की सब वस्तुएं देखना,और ध्यान रखना दिया ना बुझे,अब शुकदेव जी महल की वस्तुएं तो देखते ही थे,और बीच,बीच में दिए को भी देखते थे,और अब जब शुकदेव जी महल का चक्कर लगा कर राजा जनक के पास पहुंचे,तो राजा जनक ने पुन: पूछा महल में क्या देखा ? तो शुकदेव जी ने महल की सारी भव्यता राजा जनक को सुना दी,और दिए की लौ भी जल रही थी, तब राजा जनक ने कहा जिस प्रकार तुमने दिए में भी ध्यान रखा और महल को भी अच्छी प्रकार से देखा,उसी प्रकार में इस भोग विलासिता में रह कर गृहस्थ जीवन के सारे कर्म करता हूँ,और प्रभु को भी हर समय स्मरण करता हूँ, यही गृहस्थ जीवन का तप है,जो कि सबसे बड़ा तप है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अपने गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को छोड़ कर, तप के लिए,पर्वतों,कंदराओ,जंगलो में भटकना तो पाप है | &lt;br /&gt;&amp;nbsp; थोड़ा गंभीर हो गया है,यह लेख चलो कुछ हंसी भी हो जाये |&lt;br /&gt;परीक्षा और गर्लफ्रेंड एक समान हैं&lt;br /&gt;दोनों में ही कठिन प्रश्न होते हैं&lt;br /&gt;और उनकी व्याख्या बहुत करनी पड़ती है &lt;br /&gt;हिंदुस्तान टाइमस के देल्ही टाइमस के सोजन्य्स से | &amp;nbsp; &lt;br /&gt;बस एक हल्का फुल्का चुटकुला&lt;br /&gt;कृपया कोई बुरा ना माने &lt;br /&gt;क्रमश:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-3329820999573531540?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/3329820999573531540/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=3329820999573531540&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3329820999573531540'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3329820999573531540'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_130.html' title='गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-6933674240258737181</id><published>2010-03-18T07:48:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T07:48:27.657-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जय माता की |'/><title type='text'>माँ की दुर्गा स्तुति पुस्तक का चमत्कार</title><content type='html'>यह मेरे साथ हुई सत्य घटना है, उन दिनों में इन्जिनीरिंग के तीसरे वर्ष की पड़ाइ कर रहा था, और इन्जिनीरिंग कोलेज के छात्रावास में रह रहा था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; पहले दो वर्ष यानि की चार सेमेस्टर उतीर्ण कर चुका था, हर छे महीने के बाद सेमस्टर की परीक्षा होती थी, दो सेमेस्टर की परीक्षा उतीर्ण करने के बाद,अगले वर्ष में दाखिला मिलता है, तीसरे वर्ष का पहला सेमेस्टर पास कर चुका था, और तीसरे वर्ष के दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा देकर,परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा था, परीक्षा परिणाम आने पर मैंने अपने को अनूतिर्ण पाया, हर दो सेमेस्टर के बाद अवकाश हो जाता था और हम लोग अपने,अपने घरो को आ जाते थे, अभी परिपक्वता तो आई नहीं थी, इस कारण घर में अपने को अनुतीर्ण बताने पर मेरे साथ क्या व्यवहार होगा,इस डर के कारण में अपने एक सीनियर जो कि नौकरी करता था,उसके घर आ गया था, लेकिन कितने दिन उसके घर में रहता,आना तो लौट के घर में ही था,सो में अपने घर आ गया |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;यहाँ पर एक बात और बता दूं,मेरी लौकिक माँ हमारे किसी नजदीकी रिश्तेदार जो कि ज्योतिष भी थे,उनसे पूछती रहती थी, कि मेरा बेटा नियत समय में ही अपनी इन्जिनीरिंग की पड़ाइ कर के आ जायगा,तो वोह सदा हाँ ही कहा करते थे, इस बात को यहीं छोड़ते हैं |&lt;br /&gt;होता ऐसे था कि, कुल प्राप्त अंक 50 प्रतिशत से ऊपर होने चाहिए थे, मेरे अंक उस समय 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं थे, और मेरे तीन विषय में भी कुल प्राप्तांक में भी 50 प्रतिशत से ऊपर नहीं थे,और 50&amp;nbsp; परतिशत से कम अंक किसी भी विषय में पाने पर, उस विषय में भी अनूतिर्ण माना जाता था, और तीन विषय में अनुतीर्ण छात्र को अनूतिर्ण माना जाता था, यही मेरे साथ हुआ था,घर तो आ ही चुका था,और मुझे बताना पड़ा कि में, तीसरे वर्ष में अनूतिर्ण हो गया |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;मेरी माँ तो तब नहा कर के स्वछ वस्त्र पहन कर,दुर्गा स्तुति की पुस्तक हाथ में लेकर मन में मेरे पास होने की कामना लेकर बैठ गयीं |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अब पाठ करते,करते पंद्रह दिन हो गये थे, और जगजननी माँ की कृपा से यह चमत्कार होता है, कि पंजाब विश्वविद्यालय में, यह नियम बदलने के लिए आन्दोलन हो जाता है, जो भी छात्र 50 प्रतिशत से कम किसी विषय में प्राप्त करे उसको अनूतिर्ण ना समझा जाये, चाहे कुल प्राप्तांक कुछ भी हों |&lt;br /&gt;जब मेरी माँ को पाठ करते,करते इक्कीसवां दिन हो गया,तो एक और चमत्कार हुआ कि, पंजाब विश्विद्यालय का वर्षो से चला आ रहा नियम बदल गया,और में दोबारा परीक्षा दिए हुए उतीर्ण हो गया,अब मेरा भी उत्साह बड़ा मैंने अपनी उत्तर पुस्तिका की दोबारा जाँच करवाई ,जो कि इन्जिनीरिंग कोलेजो में संभव नहीं था, परन्तु जगजननी माँ की कृपा से मेरे प्राप्तांक उन विषयों में 60 प्रतिशत से ऊपर निकले, तो निकले, पर कुल प्राप्तांक भी 60 प्रतिशत से ऊपर थे |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;अब इसको क्या कहा जाये,सयोंग या जगतमाता की कृपा में तो माँ की कृपा ही समझता हूँ,और उस समय अनायास मेरे मुख से श्रद्धावश निकला,&lt;b&gt;जय माता की |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-6933674240258737181?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/6933674240258737181/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=6933674240258737181&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6933674240258737181'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6933674240258737181'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_18.html' title='माँ की दुर्गा स्तुति पुस्तक का चमत्कार'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-8533769733814689959</id><published>2010-03-16T22:34:00.000-07:00</published><updated>2010-03-17T01:02:46.379-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ मेरे सभी अपराध क्षमा करना'/><title type='text'>ईश्वर दसों दिशाओं में वर्तमान है, फिर गुनाह क्यों?</title><content type='html'>&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;b&gt;ॐ गंग गणपतय: नम :&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;img alt="http://4.bp.blogspot.com/_redPB1TXsyY/SLuXxlxY1LI/AAAAAAAABVE/A58csoYn_0w/s400/ganesh.jpg" height="390" src="http://4.bp.blogspot.com/_redPB1TXsyY/SLuXxlxY1LI/AAAAAAAABVE/A58csoYn_0w/s400/ganesh.jpg" style="cursor: -moz-zoom-in;" width="297" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;b&gt;&amp;nbsp; जय माता की&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="http://www.jaimaathawewali.com/images/jai_maa_durga.jpg" height="390" src="http://www.jaimaathawewali.com/images/jai_maa_durga.jpg" style="cursor: -moz-zoom-in;" width="520" /&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;b&gt;पहली शैलपुत्री कहलावे |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; दूसरी ब्रह्मचारनी मन भावे&amp;nbsp; || &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; तीसरी  चंद्रघंटा शुभनाम | &amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; चौथी कुष्मांडा सुखधाम ||&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; पांचवी देवी  स्कंदमाता |&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; छटीकत्यानी विख्याता || &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; सातंवी कालरात्रि महामाया |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आठवीं महागौरी जगजाया ||&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; नौवीं सिद्धि दात्री जगजाने &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &lt;/b&gt;माँ&amp;nbsp; के पवित्र नवरात्रों के दूसरे दिन, श्री गणेश जी और जगजननी&amp;nbsp; माँ के सभी नौ रूपों और&amp;nbsp;दसों, विद्याओं,को प्रणाम करके,माँ की अनुकम्पा और प्रेरणा से यह लेख लिख रहा हूँ | माँ के प्रमुख नौ रूप हैं,जो मैंने दुर्गा स्तुति के श्लोक में वर्णित किया है, और माँ दुर्गा में यह सब समाये&amp;nbsp; हुए हैं, इन रूपों का पृथक,पृथक सवरूप और स्वव्हाव है,और माता रानी इन स्वरूपों से,भक्तों की रक्षा और दुष्टों का नाश करती हैं, और यह इतनी भोली हैं, कि इनके दुर्गा सप्तशती के मंत्र इतने सशक्त हैं, कि कोई भी इनका लाभ उठा सकता है, इन मंत्रो का कोई लाभ ना उठा ले, इसलिए महादेव जी को इन मंत्रो को कीलित करना पड़ा |&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&amp;nbsp; नवरात्रों के आंठ्वे या नौवें दिन को, इन के कंजक स्वरुप में कन्या पूजन का विधान है, कथा इस प्रकार है,पंडित श्री धर जी,माँ के कंजंक स्वरुप को माँ मान कर प्रतिदिन पूजा करते थे, और कालांतर में माँ ने पंडित श्री धर जी ने दर्शन दिए और अपनी पवित्र गुफा,जिसमें माँ वैष्णो देवी, माँ महाकाली,महालक्ष्मी और महासरस्वती के साथ पिंडी रूप में विराजमान है,उसकी खोज करने को कहा | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &lt;img alt="http://1.bp.blogspot.com/_ZurSbxUErUI/SpTarlmISxI/AAAAAAAAAIg/dnKMV39ZoNg/s400/vaishno-devi.jpg" src="http://1.bp.blogspot.com/_ZurSbxUErUI/SpTarlmISxI/AAAAAAAAAIg/dnKMV39ZoNg/s400/vaishno-devi.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब प्रश्न यह उठता है, जिन कन्यायों को माँ स्वरुप मान कर अष्टमी या नौवीं को पूजा जाता है, पर उनके साथ ही भ्रूण हत्या, बलात्कार और जैसे जघन्य अपराध या छेड़,छाड़ क्यों कि जाती है, अब कोई भी कह सकता है, कन्या पत्नी स्वरुप में भी तो होती है, वोह तो मंत्रो के द्वारा अग्नि को साक्षी मान कर विवाह कराया जाता है,वास्तव में हर पति और पत्नी शिव और शिवा का जोड़ा है, और अब पर स्त्री के साथ कुदृष्टि डालना या कुकृत्य करना अब समझा जा सकता है,यही बात स्त्री के लिए भी है,परपुरष पर कुदृष्टि और समागम करना उनको सोचना चाहिए यह&amp;nbsp; कर्म किसके साथ हो रहा है,इस प्रकार हर मनुष्य और स्त्री में ईश्वर समाया हुआ है,और यह सर्वत्र फेले हुए हैं, और यही तो सिद्ध करता है,&lt;b&gt;यत्र,तत्र,सर्वत्र&lt;/b&gt;&amp;nbsp; मतलब सब और ईश्वर है, यह तो हुई लौकिक बात और , एक और कथा सिखों के पहले गुरु,गुरु नानक जी के बारें में प्रचलित है, एक बार गुरु नानक देवजी आज के पाकिस्तान में कावा कि ओर चरण रख कर लेट गए, तब किसी मुस्लिम समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले को अच्छा नहीं लगा तो,वोह बोला कावे की ओर पैर रख कर नहीं लेटो, गुरु नानक जी ने कहा,मेरे पैर उस ओर कर दो जहाँ कावा ना हो, जहाँ,जहाँ वोह व्यक्ति श्री गुरु नानक देव जी के चरण करता वहीँ,वहीँ उस व्यक्ति को कावा दिखाई देने लगता, मतलब कि खुदा हर ओर है, मानव बुरे कर्म करते हुए सोचने लगता है,मुझे कोई नहीं देख रहा परन्तु, खुदा कहो,ईश्वर कहो हर ओर विद्यमान है,और वोह सबके अच्छे बुरे कर्म देख रहा है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;img alt="http://www.justsikh.com/files/images/Guru%20Nanak-800X600.preview.jpg" height="390" src="http://www.justsikh.com/files/images/Guru%20Nanak-800X600.preview.jpg" style="cursor: -moz-zoom-in;" width="520" /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; एक बार किसी गुरु ने अपने दो शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए, दोनों को फल दिए और बोले की, इस फल को उस स्थान पर खाना जहाँ पर कोई देख ना रहा हो, दोनों शिष्य चल पड़े,ऐसे स्थान पर जहाँ कोई नहीं देख रहा हो, दोनों को पृथक,पृथक निर्जन स्थान मिल गया, और एक शिष्य ने तो वोह फल खा लिया, परन्तु दूसरे कहीं पर भी जाता,उसको लगा यहाँ पर पशु,पक्षी,&amp;nbsp; देख रहें हैं,और कहीं भी जाता तो उसको लगा यहाँ पर पेड़,पौधे देख रहें हैं, उस शिष्य को लगा,प्रभु की इस सरंचना में,हर जड़ और चेतन वस्तु में,ईश्वर विद्यमान है,तो उसने फल नहीं खाया,और दोनों आखिरकार लौट आये गुरु जी के पास,और गुरु जी ने परीक्षा में सफल पाया, उस शिष्य को जिसने फल नहीं खाया था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह अंतरात्मा की आवाज ही तो थी, जिसने दूसरे शिष्य को फल नहीं खाने दिया, यही अंतरात्मा की आवाज हर किसी को गुनाह करने से पहले चेतावनी देती है,और जो इस चेतवानी को सुनते हैं,उनकी अंतरात्मा की आवाज, सदा जीवित रहती है,और जो इस चेतवानी को अनसुना करके,गुनाह, पर गुनाह किये जातें हैं,उनकी यह चेतना या अंतरात्मा या अन्दर की आवाज मृत हो जाती है,यही अंतरात्मा की आवाज ईश्वर की आवाज है,इसका अर्थ तो येही हुआ,घट,घट में ईश्वर विद्यमान |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; पंडित डी.के वत्स जी ने अपने लेख में यही तो सपष्ट किया था, मन्त्र,कर्मकांड,उपासना का लाभ क्यों नहीं मिलता,पहले अपने अन्तकरण को साफ करने के बाद ही तो लाभ मिलेगा,क्योंकि ईश्वर तो अन्तकरण में वास करता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इसीलिए तो कहा गया है,&lt;b&gt;यम नियम,प्रतिहार,&lt;/b&gt;यम अर्थार्त अपना व्यवहार,इसके पश्चात आता है नियम,और इसके पश्चात प्रतिहार अर्थात,जप,तप इत्यादी,और यह सब भी होना चाहिए,मनसा वाचा कर्मणा, अर्थार्त मन से बचन से और कर्मों के द्वारा,&lt;br /&gt;&amp;nbsp;हमारे मन से सूक्ष्म तरेंगे निकलती हैं,और यही वातावरण को प्रभावित करती हैं,और यही तरेंगे ईश्वर तक पहुँचती है, ईश्वर सब ओर विद्यमान है,और हर स्वरुप में है, जो जिस स्वरुप की पूजा,अर्चना करता है,उसको ईश्वर के उसी स्वरुप के दर्शन हो जाते हैं,जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इसीलिए तो गुनाह करने वाले को कहा जाता है,ईश्वर से डरो,वोह तो हर स्वरुप में दसो दिशाओं में,जड़ चेतन में विद्यमान है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;माँ सब पर अपनी अनुकम्पा बनाये रखना&lt;br /&gt;आप के शस्त्र धारण का कारण यही तो है,भक्तो कि रक्षा और दुष्टों का नाश |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;माँ मेरे सभी अपराध क्षमा करना&amp;nbsp;&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;  &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt; &lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-8533769733814689959?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/8533769733814689959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=8533769733814689959&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8533769733814689959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8533769733814689959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_16.html' title='ईश्वर दसों दिशाओं में वर्तमान है, फिर गुनाह क्यों?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_redPB1TXsyY/SLuXxlxY1LI/AAAAAAAABVE/A58csoYn_0w/s72-c/ganesh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-7461201441013771681</id><published>2010-03-10T05:18:00.000-08:00</published><updated>2010-03-10T05:18:13.971-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असफल इन्सान अंधकार से निकल कर सफलता का उजाला दें |'/><title type='text'>परिश्रम करके भी असफल लोगों को सफल होने के लिए प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलता</title><content type='html'>बहुधा मेरे मन में विचार आता है&amp;nbsp; जो लोग जीवन में कुछ उपलब्धि पा लेते हैं, उनकी जयजयकार होती हैं, उनके लिए बधाईओं का ताँता सा लग जाता है, और वोह लोग जीवन में सफलता की सीडिया चड़ते जातें हैं,और&amp;nbsp; उनका उदहारण दिया जाता है, परन्तु जो लोग परिश्रम करके भी असफल हो जातें हैं, वोह हताश हो जातें हैं, और बहुत बार अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ओर अग्रसर हो जातें हैं,जिसका उदहारण विद्यार्थियों में देखा जाता है,किसी ने परीक्षा में परिश्रम करके भी कम अंक प्राप्त किये या कोई परीक्षा में असफल हो गया तो वोह हताश हो कर आत्महत्या की ओर अग्रसर हो गया, हाँ जिसने कोई परिश्रम ही नहीं किया अगर वोह असफल हो गया या हो गयी तो उसको कहाँ हताशा या निराशा ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह तो रहा विद्यार्थिओं के बारे में, अगर नौकरी करने वालों की बात करें तो वोह लोग जो अपनी आजीविका कमाने के लिए बहुत परिश्रम से काम करते रहे और उनका आजीविका का सहारा समाप्त हो गया,कारण कुछ भी रहा हो जैसे नौकरी के वातावरण को ना समझ पाना, झूठा दोशारापन या अपनी रुचि का काम नहीं मिलना, बस आजीविका ना कमाने का कोई भी कारण हो, तो वोह इंसान हताश,निराश हो कर अपनी जीवन लीला समाप्त करने का प्रयास करता है,कभी वोह इसमें सफल हो पाता है कभी नहीं,वयापार में अपनी सारी जमा पूँजी और कर्ज लेकर पैसा लगा दिया,और व्यापर में ऐसा घाटा हुआ और सारी पूँजी समाप्त हो गयी तो फिर यही कदम,और भी बहुत से असफल होने के कारण हैं,&amp;nbsp; यह तो सच है संघर्ष तो करते रहना चाहिए,इसके लिए आवश्यक है, आत्मविश्वास,मनोबल, और सदा अच्छा होने की आशा रखना, केवल सच्चे मित्र, परिवार के वोह सदस्य जो की उक्त इंसान का अच्छा होने की कामना करते हैं,वोह ही लोग उसको धीरज देतें हैं और कोई नहीं , और दूसरा उपाय है,मनोवेग्यानिक का सहारा लेना, परन्तु मनोवेग्यानिक चिकत्सा के बारे में तो पड़े,लिखे लोग जानते हैं, अब तो&amp;nbsp; मनोवेगाय्निक के बारे में जन जाग्रति हो रही है, परन्तु अभी भी अधिकतर ग्रामीण लोगों को इसके बारे में समझ नहीं है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अब प्रश्न उठता है, तो इस प्रकार के लोगों की सहायता के लिए क्या करना चाहिए, वैसे तो बहुत सी समाजसेवी संस्थाए है, अनाथ बच्चों के लिए, उपेक्षित वृद्धों के लिए और भी अनेक वर्गों के लिए, इस प्रकार के परिश्रम करके भी असफल व्यक्तियों के लिए भी ऐसी संस्थाए होनी चाहिए,जो इस प्रकार के इंसानों को दृरता&amp;nbsp; आत्मविश्वास,आशा को जीवित रखना जैसे गुणों को इनमे विकसित करे, अगर इस प्रकार इन असफल लोगों को सहारा मिलेगा,तो यह भी सफल लोगों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चलेगा, तो समाज,देश और विश्व का भला होगा |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;असफल लोगों को सफलता की सीडिया चडाने के लिए, स्वयं अपने पर विश्वास और उनकी इस प्रकार सहायता करना नितांत ही आवश्यक है,कि उसको लगे किउनको&amp;nbsp; ठीक आवलंबन मिल गया |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;b&gt;असफल इन्सान अंधकार से निकल कर सफलता का उजाला दें |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-7461201441013771681?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/7461201441013771681/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=7461201441013771681&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7461201441013771681'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7461201441013771681'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html' title='परिश्रम करके भी असफल लोगों को सफल होने के लिए प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलता'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-8704888492681264205</id><published>2010-03-09T05:58:00.000-08:00</published><updated>2010-03-09T05:58:19.903-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='या कुछ और |'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बड़ती आयु एक संख्या है'/><title type='text'>क्या बड़ती उम्र क्या केवल एक संख्या है या कुछ और</title><content type='html'>बहुत पहेले दूरदर्शन पर एक च्यवनप्राश&amp;nbsp;एक&amp;nbsp; विज्ञापन आया करता था,जिसमें एक नौजवान दम्पति में से उसकी पत्नी,ऊँचे पेड़ से कुछ तोड़ने को कहती है,परन्तु ऊंचाई के कारण वोह उतार नहीं पाता, फिर एक प्रोड़ दम्पति में से वोह प्रोड़ उसको तोड़ लेता है | &lt;br /&gt;यह तो रहा दोनों प्रकार के दम्पति में शारीरिक शक्ति की तुलना, जो कि दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला विज्ञापन था, शरीर जब प्रोड़ अवस्था में पहुँचता है,तब मानव के शरीर में अनेक प्रकार के वदलाव होते हैं,जैसे बालों में सफेदी,चेहरे पर धीरे,धीरे झुरियो का आना और उस समय तक अनेकों प्रकार के खट्टे,मीठे अनुभव हो जातें हैं, लेकिन उन प्रोड़ लोगों को कहा जाता है,बुड़ापे में यह बात यावोह&amp;nbsp; बात शोभा नहीं देती, कम से कम उम्र का लिहाज करो, आखिर दिल तो सभी का होता है,और बहुधा कहा जाता है,बुडे हो गए हैं&amp;nbsp; तो दिल तो जवान है, यह कैसा विरोधावास है ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;इस समय मेरे मस्तिष्क में सदी के महानायक अमिताभ वच्चन का विचार आ रहा है, वोह अपनी इस 67 वर्ष की आयु में अब तक काम कर रहें है, और बहुत से एक से एक बड़ कर प्रस्तुति दे रहे हैं, यह बात तो&amp;nbsp; ठीक है सिने कलाकार निर्माता,निर्देशक के अनुसार काम करता है, अब&amp;nbsp; उनके समकक्ष कलाकार अब अभिनय नहीं करते, लेकिन अपनी आयु की और ना देख कर वोह एक से बड़ कर चलचित्र को योगदान दे रहें है,&amp;nbsp; दूसरे निर्माता,अभिनेता मेरे मस्तिष्क में आ रहें है,सदाबहार हीरो देवानंद उन्होंने भी अपनी बड़ती आयु को ना देख कर, बहुत से चलचित्र के निर्माता बने और उसमे अभिनय भी किया,&amp;nbsp; अब मेरे मस्तिष्क में आ रही हैं सिने अदाकारा रेखा, बहुत आयु तक उन्होंने ने अपनी शारीरिक खूबसूरती का ध्यान रक्खा |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह तो रही सिने कलाकारों की बात परन्तु प्रोड़ शिक्षा की बात होती है, यह नहीं कहा जाता,बुड्ढे तोते क्या खाक पड़ेंगे ", अगर प्रोड़ शिक्षा की और देखा जाये तो इसका अभियान चलता रहता है, प्रोड़ शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाता है,हाँ यह अवश्य है की प्रोड़ और नौजवान लोगों की विचारधारा अलग,अलग होती है,जिसको "जनरेशन गेप कहा जाता है", समझ नहीं आता &lt;b&gt;बड़ती आयु एक संख्या है,या कुछ और |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-8704888492681264205?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/8704888492681264205/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=8704888492681264205&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8704888492681264205'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8704888492681264205'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post_09.html' title='क्या बड़ती उम्र क्या केवल एक संख्या है या कुछ और'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1234171587305668177</id><published>2010-03-02T08:00:00.000-08:00</published><updated>2010-03-02T08:00:19.064-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='केवल शेर क्यों इन जीव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंतुओं का सरंक्षण दो'/><title type='text'>शेर क्यों और भी जीव विलुप्त होते जा रहे हैं |</title><content type='html'>आज कल दूरदर्शन पर विभिन सेलिब्रिटीयों के द्वारा सन्देश दिया जा रहा है, हमारे देश में केवल 1411 शेर रह गएँ हैं, परन्तु इसके अतिरिक्त और भी वोह जीव साधारनतया बाग,बगीचों और घरों में पाए जाते थे,वोह भी तो लुप्तप्राय: होते जा रहें हैं,&lt;br /&gt;&lt;img alt="http://www.impactlab.com/wp-content/uploads/2009/12/Bees-5432145.jpg" src="http://www.impactlab.com/wp-content/uploads/2009/12/Bees-5432145.jpg" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहचाना आपने,जी हाँ फूल से रस चूसती मधुमक्खी, जो फूलों से मकरंद चूस कर,शहद में परिवर्तित करती हैं, इन मधुमक्खियों के छत्ते पेड़ो पर लटकते दिखाई दे जाते थे, और जिन छत्तों पर यह मधुमक्खियाँ पर दिखाईं देतीं थी, अब कहाँ यह शेहद के छत्ते और यह मधुमखियाँ कहाँ दृष्टिगोचर होतीं हैं ?,अब तो यह नजारा देखना दुर्लभ सा हो गया है, धरती पर तेजी से बनते घरों के कारण,इनका आशियाना बाग़,बगीचें छिनते जा रहें हैं,और&amp;nbsp; यह शेहद की मक्खियाँ लुप्तप्राय: होतीं जा रहीं हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="http://freeartisticphotos.com/wp-content/uploads/2009/07/free-close-up-photo-butterfly-and-flowers.jpg" src="http://freeartisticphotos.com/wp-content/uploads/2009/07/free-close-up-photo-butterfly-and-flowers.jpg" style="cursor: -moz-zoom-out;" /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अब आते हैं,रंगबिरंगी, मनमोहक बागों में,फूलों का रस चूसती हुईं,तितलियों पर, बच्चों को यह रंगबिरंगी&amp;nbsp; तितलियाँ इतनी भाती थीं, कि इनकों पकड़ने के लिए इनका पीछा करतें थे, और जब यह तितलियाँ पकड़ में आ जातीं थीं तो ,इनके रंगबिरंगे रंग हाथों की उँगलियों पर लग जातें थें, इनका भी आशियाना बाग़,बगीचें ही थे, लोगों के अपना आशियाना बनाने के स्थान,पर इन रंगबिरंगी तितलियों का आशियाना बहुत हद तक छिन लिया हैं | &lt;br /&gt;&amp;nbsp;यह नन्हे,नन्हे जीव उड़ते हुए, एक फूल पर बैठ कर और फिर दूसरे फूल पर बैठ कर, फूलों के परागन में सहायता करतें हैं,और इस प्रकार से फूलों से लदी हुई बगिया के निर्माण में सहायक होतें हैं,परन्तु यह भी लुप्त होने की ओर अग्रसर हो रहें हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img alt="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/3/32/House_sparrow04.jpg" height="390" src="http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/3/32/House_sparrow04.jpg" style="cursor: -moz-zoom-in;" width="584" /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; इस नन्ही सी चिड़िया से कौन परिचित नहीं होगा, हमारे,आपके घरों में लटकी हुई फोटों के पीछे यह अपना घोंसला बनाती थी, लेकिन अब तो गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण होने लगा हैं, यह चिड़ियाँ तो धारा पर बसे हुए घरों में अधिक स्थान होने के कारण,यह उन घरों में अपना घोसला बनातीं थीं ,परन्तु गगनचुम्बी इमारतों में इनकों घोस्लां बनाना कठिन हैं, इनका भी आशियाना छिनता जा रहा है, यह चिड़िया बारिश के जमीन पर पड़े हुए पानी में नहाते हुयें दिखाई दे जातीं थी,पर अब कहाँ वोह नजारा देखने को मिलता है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp; आज कल प्रक्रति का सफाई कर्मचारी यानि कि गिद्ध जो मरे हुए जीव,जंतुओं को कहा,कहा करके सफाई को अंजाम देते हैं,वोह भी तो लुप्त होते जा रहें हैं, केवल शेरो की संख्यां तो कम हो गयीं हैं,परन्तु यह जीव जंतु भी तो लुप्त होने के कगार की ओर अग्रसर हो रहें हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;केवल शेर क्यों इन जीव,जंतुओं का सरंक्षण दो&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1234171587305668177?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1234171587305668177/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1234171587305668177&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1234171587305668177'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1234171587305668177'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='शेर क्यों और भी जीव विलुप्त होते जा रहे हैं |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2810570963639382107</id><published>2010-02-27T05:17:00.000-08:00</published><updated>2010-02-27T05:17:10.964-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्थायी  ख़ुशी की प्रतीक्षा है'/><title type='text'>जब भगवान से साक्षात्कार की ख़ुशी नहीं,मिलती तो इंसान क्षणिक ख़ुशी खोजता है |</title><content type='html'>अभी,अभी पंडित दी.के वत्स जी का लेख पड़ा,मन्त्र,कर्मकांड,उपासना से लाभ क्यों नहीं मिलता, में पंडित जी के लेख बहुत मनोयोग से पड़ता हूँ, जिसमें पंडित जी ने जो लिखा है, हमें&amp;nbsp; इस योग्य होना चाहिए कि, हम इन चीजों का लाभ उठा सकें, मेरे मन में बहुत से अनसुलझे प्रश्न उठते हैं, ईश्वर के एक बार दर्शन करने के बाद यहाँ,वहाँ भटकता रहा कि पुन: दर्शन हो जाएँ, किसी ने कहा कोई गुरु बनाओ, फिर गुरु की खोज में,भटकता रहा, यह भी कहा जाता है,"पानी पियो छान के,गुरु बनाओ जान के", एक गुरु भी बनाये, प्रारंभ में तो वोह गुरु तो मुझे अच्छे लगे, और लगभग तीन साल के बाद मुझे लगा कि उनकी अपने सब शिष्यों पर सम दृष्टि नहीं है, लेकिन यह बात मैंने प्रकट नहीं करी, लेकिन एक दिन मैंने उन गुरु जी से जिज्ञासावश कोई प्रश्न पूछा तो उन्होंने मुझे बहुत बुरी तरह से धुत्कार दिया, और मेरे को चार दिन तक तो रात को नींद ही नहीं आई, और तो और उनके एक और शिष्य हैं, मुझे ज्ञात नहीं वोह मेरे मनोभावों को कैसे पड़ लेते थे, मेरी उनके उन शिष्य से अच्छी मित्रता हो गयी थी,उनके पास मुझे कुछ मानसिक आराम मिलता था,परन्तु वोह तथाकथित गुरु जी,अपने उन शिष्य और मेरे मित्र के पास सुबह,शाम आया करते थे,मेरे पास भी वोही समय होता था, इसलिए मैंने अपने उन मित्र के पास जाना छोड़ दिया |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मेरी विडंबना यह रही,मैंने श्री परमहंस योगानंद जी को गुरु बनाने के लिए आवेदन किया था, योगानंद जी तो इस दुनिया में नहीं थे, परन्तु उनके अध्याय ही गुरु की तरह प्रेरणा देते थे,वोह केवल एक माह में एक ही प्रति आती थी, और उन अध्यायों का मेरी बहुत मानसिक,शारीरिक और अध्यात्मक उन्नति कर रहे थे, आप विश्वास करें या नहीं करें,में लोगों की चिकत्सा योग से करने लगा,और उक्त घटना के बाद मेरे मन में वोह अध्याय पड़ने की रूचि बिलकुल समाप्त हो गयी थी, और एक और विद्या जो कि संभवत: चीन कि थी,प्राणिक हीलिंग जिसमें दूरस्थ या समीप लोगों की चिकत्सा बिना छुये और बिना दवाइयों के में कर लेता था,और यही काम में योग द्वारा कर लेता था, परन्तु यह विद्याएँ मेरे में उस घटना के बाद समाप्त हो चुकीं हैं |&lt;br /&gt;पंडित जी का वोह लेख भी पड़ा है,जिसमें उन्होंने अंत:कारण को गुरु बताया है, यह बात तो यहीं पर छोड़ता हूँ, जब यह सब समाप्त हो गया तो में तो क्षणिक ख़ुशी की खोज करता हूँ, मुझे मालूम हैं यह क्षणिक खुशियाँ क्षणिक ही हैं, स्थायी नहीं हैं,और यह क्षणिक खुशियाँ नहीं मिल पातीं तो मन बहुत खिन्न हो जाता है,फिर भी मन क्षणिक खुशियों की ओर भागता है, यह सब मेरे मन के उदगार हैं, पंडित जी का वोह लेख पड़ कर में भावुक हो उठा, मैंने एक बार लिखा था कि में विवादित लेख नहीं लिखूंगा,पर क्या करुँ दिल है कि मानता नहीं |&lt;br /&gt;पुन: कहता हूँ,यह मेरे हिर्दय से निकले हुए उदगार हैं,कोई माने या नहीं माने, पंडित जी की इस सार्थक लिखी हुई पोस्ट से भावुक हो गया |&lt;br /&gt;इसी प्रतीक्षा में हूँ, क्षणिक ख़ुशी के स्थान पर वास्तविक और स्थायी ख़ुशी मिल जाये&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;b&gt;स्थायी&amp;nbsp; ख़ुशी की प्रतीक्षा है &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंडित जी से क्षमायाचना सहित &amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2810570963639382107?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2810570963639382107/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2810570963639382107&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2810570963639382107'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2810570963639382107'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/02/blog-post_27.html' title='जब भगवान से साक्षात्कार की ख़ुशी नहीं,मिलती तो इंसान क्षणिक ख़ुशी खोजता है |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1259035356742694564</id><published>2010-02-22T03:50:00.000-08:00</published><updated>2010-02-22T03:50:55.002-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्या करुँ मेरे ऊपर मेरे मस्तिष्क से अधिक मेरा हिर्दय राज करता है |'/><title type='text'>मनोभावों को बहुत सी कला के माध्यम से पर्दर्शित करने का प्रयत्न किया</title><content type='html'>मेरा हिर्दय मेरे पर मेरे मस्तिष्क से अधिक राज करता है, और हिर्दय में अनेकों उदगार हिलोरे लेते रहेतें हैं, इसी कारण अपनी दिल की भावनाए को अपनी किशोरावस्था में डायरी में अंकित किया करता था, परतिदिन डायरी में अपनी भावनाओ को लिखने में भी,मेरे हिर्दय को आराम नहीं मिलता था, इंसान में गुण दोष तो दोनों ही होतें हैं, और यह गुण दोष में अपनी डायरी में प्राय: लिखा करता था, और इसी कारण से यह डायरी में लोगों की निगाह से बचा कर,छुपा कर गुप्त स्थान पर रखता था, परन्तु मुझे यह डायरी लिखने पर यह प्रतीत होता था कि,में अपने से ही वार्तालाप कर रहा हूँ, अब डायरी तो नहीं लिखता,परन्तु यदा कदा अपने से वार्तालाप करता ही रहता हूँ, हर प्रकार की वार्तालाप अच्छी,बुरी दोनों ही और इस प्रकार अपने आप से वार्तालाप करने में मुझे सुखद अनुभूति होती है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इस प्रकार अपने आप से वार्तालाप करने का कारण यह है, बहुत प्रकार की कला के माध्यम से अपने मनोभावों को पर्दर्शित करने का प्रयत्न किया,परन्तु अपने मनोभावों को औरो तक ना पंहुचा सका, अगर एक दो लोगों से बोल कर बात करता तो मेरे मन के भाव अधिक लोगों तक ना पहुंचते, इसी लिए मैंने कला का सहारा लिया, सब से पहले गाना गाने का सहारा लिया, परन्तु अगर में कोई गीत गुनगुनाता तो लोगों से गायकी की ही प्रशंसा मिलती, जो गीतों में छुपे हुए मनोभावों को कोई नहीं समझता था, गीत गाने के साथ वाद्य यन्त्र बजाने का प्रयत्न किया पर सफल ना हो सका, फिर लिया चित्र बनाने और उनमें रंग भरने की कला का सहारा, चित्र बना के रंग भी भर लेता था परन्तु अपने चित्रों में, हाव भाव के द्वारा अपने हिर्दय की भावनाए ना उकेर सका, रहीं मोडर्न आर्ट की बात, जब तक उसको समझाया नहीं जय तो समझ में नहीं आते, लिहाजा मैंने इस दिशा में कोई प्रयत्न नहीं किया,और अंत में कविता लिखना और बोलना प्रारंभ किया, और काव्य के लिए विशेष प्रकार के श्रोता होने चाहिए,और उन श्रोताओं&amp;nbsp; से कविता के शब्द और उसकी प्रस्तुति से बस वाहवाही मिलती थी,लेकिन दिल के उदगार समझने वाले मिल नहीं पाते थे |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अब तो काव्य बन नहीं पाता, कुछ कहानी लिखने का प्रयत्न किया पर सफल नहीं हो पाया, हाँ ब्लॉग का माध्यम मिला नहीं जानता इसमें कहाँ तक सफल हो पाया हूँ, मेरे ब्लॉग किसी निश्चित विषय पर तो होते नहीं,जो दिल में आता है लिख देता हूँ, बस इसीलिए अपने आप से बात करता हूँ |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;b&gt;क्या करुँ मेरे ऊपर मेरे मस्तिष्क से अधिक मेरा हिर्दय राज करता है |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1259035356742694564?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1259035356742694564/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1259035356742694564&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1259035356742694564'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1259035356742694564'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/02/blog-post_22.html' title='मनोभावों को बहुत सी कला के माध्यम से पर्दर्शित करने का प्रयत्न किया'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-639619314034053809</id><published>2010-02-17T04:50:00.000-08:00</published><updated>2010-02-17T05:00:34.133-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टी.आर.पी बढाने की होड़ में कब बंद होगा बच्चों के साथ इस प्रकार का  खिलवाड़'/><title type='text'>बच्चो को रियलटी शो में क्यों लाया जा रहा है |</title><content type='html'>आज कल दूरदर्शन अनेकों प्रकार के चेनल हैं,भक्ति के लिए संस्कार और आस्था जैसे चेनल, ख़बरों के लिए आजतक,इंडिया टी.वी और भी अनेकों प्रकार के चेनल, मनोरंजन के लिए कलर,सोनी,जी टी.वी इत्यादि अनेकों चेनल,अंग्रेजी भाषा के अनेकों चेनल,चलचित्रों के लिए अनेकों चेनल, मनोरंजन वाले चेनलो पर धाराबाहिकों और रियल्टी शो दिखाने वाले अनेकों चेनल हैं, रिअलिटी शो आते,जाते रहतें हैं, जिसमें सभी उम्र के लोगों के लिए मनोरंजन होता है, और इन रियलटी शो में भी भाग लेने वाले भी प्राय: बच्चो से लेकर व्यस्क लोग होतें हैं, धराबहिकों में भी बच्चो से लेकर व्यस्क और प्रोड़ लोग होतें हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; रिअलिटी शो में, परतिस्पर्धा होती तो है ही ,और उनको जज करने वाले जज होतें हैं, और रियल्टी शो में भाग लेने वालों को जजों के द्वारा कमेंट्स दिए जातें हैं,तत्पश्चात मार्क्स दिए जातें हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;यह चेनल टी.आर.पी बढाने के लिए अनेकों प्रयत्न करतें हैं, इन चेनलो में टी.आर.पी बढाने की होड़ सी लगी,रहती है, यह चेनल वाले यह नहीं सोचते कि बच्चों के लिए रियल्टी शो बनाने से उनके कोमल मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा, बस उनको तो अपनी टी.आर.पी कि चिंता है, धराबहिकों में तो बच्चों के द्वारा किया हुआ अभिनय तो फिर भी एक सीमा तक उचित है, इसमें बच्चो की कई,कई घंटो की रिहर्सल के कारण इन बच्चों की पडाई की हानि तो होती है,परन्तु उस पडाई की हानि को&amp;nbsp; तो जैसे,तैसे यह बच्चे पूरी कर लेते हैं, परन्तु रियल्टी शो में जो बच्चे भाग लेते हैं, बहुत बारउन बच्चों को&amp;nbsp; जजों के कठोर शब्द सुनने पडतें हैं,और बच्चों का मन तो फूल सा कोमल होता है,और यह जजों के कठोर शब्द बहुत बार इन बच्चों के मन पर ऐसा प्रभाव डालता है, इनका फूल सा मन मुरझा जाता है, एक रियल्टी शो में एक बच्ची को जज के कठोर शब्द सुन कर पक्षाघात हो गया था,और एक दूसरी बच्ची ने जज के कठोर शब्द सुन कर आत्महत्या को गले लगा लिया था, धरबाहिकों में तो नंबर नहीं मिलते ना ही जजों के कोमेंट्स होतें है,वहाँ तो केवल अभिनय ही होता है,इसमें भी घंटो का रियाज़ करना पड़ता है,परन्तु यहाँ बच्चों के मनोभावों पर वोह प्रभाव नहीं पड़ता जो कि रियल्टी शो में पड़ता है, रियल्टी शो के लिए घंटो का रियाज़ और परिणाम में अंक पाना और जजों के कठोर कोमेंट्स सुनना बच्चो को झकझोर देता है, हाँ कोमेंट्स अच्छे,बुरे सब प्रकार के होतें है, बच्चों में इतनी परिवक्ता नहीं होती कि वोह कठोर स्थितयों का सामना कर पायें, और हरने के बाद या कठोर कोमेंट्स सुनने के बाद यह बच्चे टूट जातें हैं,और घातक कदम उठा लेतें हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; दूसरी ओर इन बच्चों पर स्टारडम का नशा छा जाता है,जिससे इनका बहार निकलना कठिन हो जाता है, इस कारण अपनी पडाई पर यह बच्चे उचित ध्यान नहीं दे पाते, बच्चो के लिए ऐसे कार्यक्रम तो होने चाहिए,जिसमें इन बच्चों की प्रतिभा तो उजागर हो परन्तु उसमें परतिस्पर्धा ना हो, ना अंको का सिलसिला |&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;b&gt;टी.आर.पी बढाने की होड़ में कब बंद होगा बच्चों के साथ इस प्रकार का&amp;nbsp; खिलवाड़ &lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-639619314034053809?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/639619314034053809/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=639619314034053809&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/639619314034053809'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/639619314034053809'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/02/blog-post_17.html' title='बच्चो को रियलटी शो में क्यों लाया जा रहा है |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2995244590829095870</id><published>2010-02-13T05:25:00.000-08:00</published><updated>2010-02-13T05:25:20.253-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यह सब सोच कर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मन कांप उठता है'/><title type='text'>विगड़ते ज़माने में बच्चो का भविष्य देख कर सिहर जाता हूँ |</title><content type='html'>यह युग निरंतर कठिन हालातों की ओर अग्रसर होता जा रहा है, आसमन छूती महंगाई,बड़ता भ्रसटाचार,मिलावटी खाद्य पदार्थ, तेजी से होती पेड़ों की कटाई, बच्चों पर स्कूल की किताबों से बड़ते हुए बस्ते का बोझ&amp;nbsp; और ना जाने क्या,क्या ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह सोच,सोच कर मन सिहर जाता है, की हम बड़े लोगों को इन कष्टों से गुजरना पड़ रहा है, तो हमारी भावी पीड़ी का भविष्य क्या होगा ? सुनते आयें हैं,कि हमारी बुजुर्ग पीड़ी की मासिक आय बहुत कम थी, मतलब कि 100,200 रूपये और उसमें भी उन लोंगो की अच्छी,खासी बचत हो जाती थी, फिर आया हम लोगों का युग, हम लोगों के प्रारंभ के दिनों में हम लोगों की आय में अच्छी खासी बचत हो जाती थी, परन्तु पता ही नहीं चला कि कैसे महंगाई बड़ती गयी,और यह हाल हो गया कि आमदनी अठन्नी और खर्चा रूपया, और बचत की आशा करना व्यर्थ लगने लगा, और पति,पत्नी अपने घर की व्यवस्था के लिए धनोउपार्जन करने लगे, इसी प्रकार महंगाई तेजी से आसमान छूने लगी&amp;nbsp; और इस महंगाई पर नियत्रण नहीं लगा, तो हमारी भावी पीड़ी किस प्रकार से चलाएगी अपनी घर,गृहस्ती? आज के युग में जब पाती,पत्नी दोनों ही धन कमाने में लगे रहते हैं, इस कारण से बच्चो की ओर अपेछिकित ध्यान नहीं दे पाते हैं, उनकी इस विवशता के कारण बच्चो में उत्पन्न हो जाती है,भावनात्मक शुन्येता,&amp;nbsp; यह भावनात्मक बच्चों के&amp;nbsp; सर्वागीण विकास के लिए निहायत ही अवशयक है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; आज बच्चो के कन्धों पर झूलते बस्तों में कितबों का बड़ता हुआ बोझ तो है ही जो इन नाजुक बच्चों के कंधो को पीडा तो पहुँचाता हैं, और गृहकार्य इन नन्हे,नन्हे बालक,बालिकाओं इतना मिलता है,इन के पास खेलने,कूदने का समय संभवत: मिल ही नहीं पाता तो कैसे हो इन शिशुओं का शारीरिक विकास? और आज कल धरती पर मैदान तो सिमटते जा रहे हैं, इन बच्चों को दोड़ने,भागने का स्थान नहीं मिल पा रहा है, इस दिशा में पता नहीं काम क्यों नहीं होता ? यह तो सच हैं,आज कल इन्टरनेट का विडियो गेम का युग आ गया है,और बच्चे इन चीजों में लग रहें हैं, इसी सन्दर्भ में मेरे मस्तिष्क में उभर रहा है,अमरीका के सर वाल्ट डिस्नी का नाम,जिनोहने बच्चों के लिए डिस्नेलैंड बनाया,जिसमें बच्चों के लिए सब प्रकार के मनोरंजन हैं, डिस्नीलैंड के&amp;nbsp; मिकी मौस,टॉम ओर जेर्री जैसे कार्टून तो&amp;nbsp; विश्विखायत है, हमारे यहाँ इस दिशा में काम क्यों नहीं होता?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; और तो और दिल्ली में जो बच्चों के लिए अप्पू घर बना था, उसका अब कहीं नाम ही नहीं है,जब बच्चा किशोरावस्था में पहुँच जाता है,माता,पिता के पास उसको भावनात्मक समय देने का समय नहीं है, और उसको इस उम्र के पड़ाव में हारमोंस के कारण शारीरिक और मानसिक बदलाव के बारे में उठने वाली जिगयासओं का समाधान नहीं मिल पाता, तो इस युग में इन्टरनेट पर उपलब्ध सब प्रकार की सामग्री विशेष कर व्यसक सामग्री के कारण युवक,युवितियाँ भटक जातें&amp;nbsp; है, और इन युवाओं को भुगतने पड़ते हैं,दुष्परिणाम विशेषकर युवा लड़कियों को, इन लड़कियों के लिए तो असमय माँ बनना,गर्भपात कराना इत्यादि तो बहुत ही असुविधाजनक हैं,और विशेषकरइसके द्वारा होने वाला&amp;nbsp; मानसिक दवाब,&amp;nbsp; आज कल तो लिव इन रिलेशनशिप चल पड़ा है,जिसमें यह संभावनाएं बहुत बड़ जाती हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;आजकल जिस खाद्य पदार्थ के बारे में सोचो उसमें मिलावट ही मिलावट है, क्या होगा वड़ते बच्चों का स्वास्थ्य ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;माँ,बाप का समयअभाव के कारण बच्चों को भावनात्मक प्यार ना दे पाना, सुरसा के मूह की तरह बड़ती महंगाई,बच्चों के खेलने की दिन,परतिदिन स्थान की कमी होते जाना,बस्ते का और पडाई का बड़ता बोझ, पेडो की कटाई के कारण शुद्ध हवा की तेजी से होती हुई कमी,खाद्य पदार्थों में मिलावट पर कोई नियंत्रण नहीं,क्या होगा हमारी भावी पीड़ी का भविष्य ? देश के कर्णाधार क्यों नहीं सोचते इस बारें में ?,बस एक दूसरे पर दोषारोपण के कारण अतिरिक्त कोई काम नहीं इनके पास,में यह नहीं कहता देश का विकास नहीं हुआ,परन्तु अगर एक दूसरे पर दोषअपरण करना छोड़ कर,देश के भावी कर्णाधार पर भी दें तो कितना अच्छा हो |&lt;br /&gt;पहले तो बहुतयात से पेड़ पौधे हुआ करते थें,लोग प्रात भ्रमण के लिए जाते थे तो पेडो से निकलने वाली स्वछ हवा का सेवन करते थे,और आज क्या मिलता है,प्रदूषित वायु, पौधों पर रंग विरंगी तितलियों के पीछे बच्चे भागते,दौड़ते थे, परन्तु अब फूलों पर मंडराती तितलियों के इस प्रदुषण के कारण देखना दुर्लभ हो गया है,यह बच्चों का भोला मनोरंजन भी समय की गर्त में चला गया है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;मन कांप उठता है,यह सब सोच कर&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2995244590829095870?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2995244590829095870/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2995244590829095870&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2995244590829095870'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2995244590829095870'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html' title='विगड़ते ज़माने में बच्चो का भविष्य देख कर सिहर जाता हूँ |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1094420540884142902</id><published>2010-02-03T05:08:00.000-08:00</published><updated>2010-02-03T05:08:23.164-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मानव किंचित सीखो प्रक्रति का अनुशाशन और मेल जोल'/><title type='text'>प्रक्रति भेद भाव नहीं करती पर इन्सान क्यों?</title><content type='html'>अक्सर मेरे मस्तिष्क में यह प्रश्न उपजता है, साधारणत: प्रकर्ति भेद भाव नहीं करती कुछ अपवादों को छोड़ कर, अपने नियमित और अनुशासन्तक कर्मो में सदा बंधी रहती है, प्रातकाल कीसूर्य की&amp;nbsp; स्वर्णिम रश्मियाँ इस धरा को आलोकित कर देती हैं, पक्षियों का कलरव वातावरण में गूंजने लगता है, और सूर्य की प्रात: काल की किरने हमारे शरीर को विटामिन डी उपलब्ध करातीं है, इस प्रकार सूर्य मानव के स्वास्थ्य लाभ पहुंचाती हैं,और सूर्य की रश्मियाँ नदी तालाब,पोखर और सागर पड़ पड़ती हैं,तो जल वाष्प के रूप में परिवर्तित हो कर बादलों का स्वरुप ले लेतीं हैं, और जब इस वाष्प की अधिकता हो जाती है,तब पड़ती हैं रिमझिम वर्षा&amp;nbsp; और यह रिमझिम वर्षा का जल कुछ तो धरती की प्यास बुझाता है,और कुछ अधिकतर चला जाता है, धरती के गर्भ में और जल और यह जल पेड़ सूर्य की किरणों के साथ मिल कर पेड़ पौधों को जीवन प्रदान करता है, वर्षा के कारण इन्सान को झुलसती गर्मी से भी राहत मिलती है, और यह पेड़,पौधे भूमिगत जल को मजबूती से पकड़ कर रखतें हैं, और यही पेड़ पौधे हैं,जो सूर्य की किरणे प्राप्त करके हमारी प्राण वायु ओक्सीजन निष्कासित करतें हैं, और इसी वायुमंडल में नईटरोजन और कार्बोनडाईओक्सीइड इस ओक्सीजन के मिश्रण से हमारें साँस लेने की वायु का निर्माण होता है, और जब हम कार्बोनडाई ओक्सईड साँस के द्वारा निष्कासित करतें हैं, यही कार्बोनडाओक्सइड दिन में पेड़,पौधे ग्रहण करतें है,और ऑक्सीजन निष्कासित करतें हैं, जब वर्षा की अधिकता हो जाती है, तब आती है शीत ऋतू और, पर्वतों की उचाईयों पर वर्फ जमने लगती है,और ग्रीष्म ऋतू आते ही यह हिम पिघल कर नदियों में जाता है,इस कारण नदियों में जल का संतुलन बना रहता है, कभी प्रक्रति को भेद,भाव करते किसी ने भी अनुभव किया है? सूर्य&amp;nbsp; धरा के प्रतेयक स्थान पर अपनी रश्मियाँ विखेरता है,क्या इसका धरा से भेद भाव है ? क्या वर्षा हर स्थान पर नहीं पड़ती ? क्या इसका धरा से भेद भाव है ? वायु सब जो सारे प्राणियों का जीवन आधार है,कभी उसने किसी को भी इसने अपने से वंचित किया है ? जल ने&amp;nbsp; &amp;nbsp; कभी किसी को अपने उपयोग से वंचित रखता है ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मानव क्यों इस प्रक्रति से नहीं सीखता ? क्यों लोग धर्म,जाती भूमि के लिए एक दूसरे की जान लेने तक पर आतुर हो जातें हैं ?&lt;br /&gt;प्रक्रति ने तो ऐसा कभी नहीं किया, और तो और मानव इस प्रक्रति का ही शत्रु हो गया है,तेजी से पेडो की कटाई जिसके कारण प्रक्रति के द्वारा स्वस्थ और&amp;nbsp; जल&amp;nbsp; वायु का अभाव और भूमिगत जल का गिरता स्तर, लोग प्रात: काल में भ्रमण के लिए जाते थे और जाते है,और अब उनको कहाँ वोह स्वस्थ वायु मिल पाती है ? तेजी से बड़ते हुए पेट्रोल अथवा डीजल से चलते हुए वाहन यह वाहन भी प्रक्रति का संतुलन बिगाड़ रहें हैं &amp;nbsp; ,चलो अब विकसित शहरों में, गैस से चलने वाले वाहन (C.N.G) आ गयें हैं,परन्तु अधिकतर स्थानों पर नहीं, और नाही लोगों में यह समझ की अधिक इन वाहनों के स्थान पर कम वाहनों का उपयोग करें, जब कोई भी इस प्रकार की&amp;nbsp; प्रक्रिया जब जलने की क्रिया पूर्ण रूप से सक्रिय ना हो,तो कार्बोनमोनोऑक्सआइड गैस निष्कासित होती है,और यह गैस कार्बोनडाईओक्सइड से भी अधिक घातक है,और यह गैस हमारे वायुमंडल की ओजोने की पर्त को और पतला कर देतीं हैं, जिसके कारण सूर्य की हानिकारक किरणों को जो यह ओजोन पर्त रोकती हैं, उनकी सक्षमता कम हो जाती है, और वायुमंडल का तापमान भी बड़ने लगता है, और ग्लोबल वार्मिंग को कोलाहल प्रारम्भ हो जाता है, इंसान प्रक्रति से मिल जुल कर रहना तो सीखता नहीं और इसको हानि पहूचाने पर तुला हुआ है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;b&gt;मानव किंचित सीखो प्रक्रति का अनुशाशन और मेल जोल &lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1094420540884142902?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1094420540884142902/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1094420540884142902&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1094420540884142902'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1094420540884142902'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='प्रक्रति भेद भाव नहीं करती पर इन्सान क्यों?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-6285508117026737308</id><published>2010-01-28T04:12:00.000-08:00</published><updated>2010-01-28T04:12:39.411-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम सिक्के के दो पहलु में से अच्छा पहलु क्यों नहीं देखें ?'/><title type='text'>राज पिछले जन्म के सीरियल से बहुत से लोग लाभान्वित हुए |</title><content type='html'>राज पिछले जन्म का सीरियल जो दूरदर्शन पर आ रहा था, और कुछ ही दिन पहले समाप्त हुआ है, इस सीरियल पर इस बात में ना पड़ कर कि यह सच है कि नहीं,मुझे यह बहुत अच्छा लगा बहुत से लोग इस राज पिछले जन्म के सीरियल के माध्यम से,जिसमे डाक्टर तृप्ति जैन लोगों को,रिसेशन के माध्यम से पूर्व जन्म में ले जातीं थीं लाभान्वित हुए, और इस प्रक्रिया में से बहुत से लोगों के डर, उनके अपने बारे में संदेहों का निवारण हो गया है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह सीरियल में दूरदर्शन पर यदा,कदा देखा करता था, और सोचा करता था कि जो भी लोग इस प्रक्रिया से गुजरे हैं,उनका अनुसरण भी होना चाहिए,कि उनको वास्तव में लाभ हुआ कि नहीं, इस सीरियल पर बहुत से विवाद उठे थे, इतने वर्षों तक आत्मा कहाँ रहीं ?, किसी ने यह नहीं बताया कि वोह पुर्ब जन्म में जानवर था या थी ? इस सीरियल में बहुत सी जानी,मानी हस्तियाँ और साधारण लोग आये थे, और उन सबको अपनी,अपनी समस्यों का समाधान मिल गया था, बहुतों का डर निकल गया था,वोह लोग जो भी समस्याओं को लेकर आये थे,वोह समस्याएं जिन के बारें में वोह लोग जानना चाहते थे,जिस का उत्तर उनको नहीं कहीं भी मिल पता था,वोह उत्तर इन लोगों को मिल गया था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; किसी को छुरी से डर लगता था, किसी को पानी से डर लगता था और भी अनेकों प्रकार के डर, कोई जानना चाहती थी उसके सम्बन्ध अपने पिता से इतने मधुर क्यों नहीं, या किसी को पीठ में दर्द होता था,वोह दर्द जो कहीं और ठीक नहीं हो पाया वोह ठीक हो गया,किसी को पानी से डर और किसी को भीर से डर,किसी को उचाई से डर सब निकल गयें |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; में इस सीरियल को देख कर सोचता था,इन लोगों का अनुसरण होगा कि नहीं, आखिरकार वोह दिन आ ही गया,इन लोगों ने यह बताया कि उन लोगों की समस्याएँ दूर हो गयीं थी, इन लोगों ने यह भी बताया था कि इन लोगों को कोई भी स्क्रिप्ट नहीं दी गयी थी, सब कुछ स्वाभाविक था, इस विवाद में ना पड़ कर कि यह ढकोसला है,या हकीकत, अगर&amp;nbsp; इस प्रक्रिया से लोग लाभान्वित होतें हैं,तो यह बहुत अच्छी प्रक्रिया है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;b&gt;हम सिक्के के दो पहलु में से अच्छा पहलु क्यों नहीं देखें ?&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-6285508117026737308?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/6285508117026737308/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=6285508117026737308&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6285508117026737308'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6285508117026737308'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post_28.html' title='राज पिछले जन्म के सीरियल से बहुत से लोग लाभान्वित हुए |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-571925070922603827</id><published>2010-01-27T04:58:00.000-08:00</published><updated>2010-01-27T04:58:30.193-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आई.पी.एल का क्या औचित्य है ?'/><title type='text'>क्यों हो रहा है, क्रिकेट का व्य्वासिकरण मतलब (आई.पी.एल )</title><content type='html'>आज के युग में देखा जाये,हर वस्तु का व्य्वासिकरण हो रहा है, जैसे कला का व्यवसायीकरण कला भी व्यवसायीकरण की शिकार हो रही है, जिस वस्तु का कोई मापदंड नहीं होना चाहिए, उसको दूरदर्शन पर दिखाया जाता है,और और उसको पॉइंट्स दिए जाते हैं, मेरा मतलब कला से है,और अगर खेल जगत में आयें तो बहुत से हमारे देश में होने वाले खेल हैं, जो की क्रिकेट के खेल के आगे गोण हैं, और बहुत से खेल तो दुर्दशा की कगार पर हैं, जैसे हमारा राष्ट्रीय खेल होकी,जिसका पूर्व में विश्व में डंका बजा करता था, वोह तो इस कगार पर पहुँच चुका है, होकी इंडिया को होकी के खिलाडियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं,जैसे तैसे पुरुष होकी खिलाडियों की दशा में सूधार हुआ, परन्तु अ़ब होकी इंडिया को उन होकी की महिला खिलाडियों के लिए पैसे नहीं हैं,जिन्होंने हाल में ही बहुत से कीर्तिमान स्थापित किये हैं, और इन महिला खिलाडियों ने अपना बैंक अकाउंट खोल कर जनता से पैसों की अपील करके,होकी इंडिया को एक एक गहरा आघात दिया है,और जनता ने भी इन महिला खिलाडियों का बखूबी बहुत साथ दिया है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह तो रही होकी की दुर्दशा, और भी बहुत से खेल हैं, जिनमें खिलाडी परसिद्ध हो जाते हैं,लोग उन खिलाडियों की पहचान तो बना लेते हैं, पर खेलो की नहीं, टेनिस की खिलाडी सानिया मिर्जा को लोग पहचानते हैं,परन्तु टेनिस का उतना महत्व नहीं, इसी प्रकार बेडमिन्टन की खिलाडी साईंना नेहवाल जैसी शीर्ष खिलाडी को तो पहचानते हैं, परन्तु बेडमिन्टन का कितना महत्व है,सर्वविदित है, इसी प्रकार मुक्केबाजी के खिलाडी विजेंदर या शूटिंग के खिलाडी अभिनव बिंद्रा को लोग पहचानते हैं,पर यह खेल कितने लोकप्रिय सब जानते हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; और हमारे देश में क्रिकेट की तो जैसे पूजा सी होती है, सबसे अधिक लोकप्रिय खेल है तो यही क्रिकेट है, लोग अपने देश क्या विदेशों के क्रिकेट के खिलाडियों तक को पहचानते हैं, और इस खेल के आगे होकी,फूटबाल,वोल्लीवोल इत्यादि सब खेल तो जैसे बोने हो जातें हैं, और जब यह खेल क्रिकेट खेला जाता है,तो सारे के सारे कार्यकलाप स्थगित से हो जाते हैं, लोग दूरदर्शन से चिपट कर बैठ जातें हैं,और जब दूरदर्शन नहीं था, तब लोग सारे के सारे काम काज छोड़ कर रेडियो,ट्रांसिस्टर से कान लगा कर बैठ जाते थे, इसकी दीवानगी इस हद तक थी,कि ओफ्फिसों में एक सन्नाटा सा पसर जाता था, प्रारंभ में तो पॉँच दिनों का क्रिकेट होता था, उस समय जो भी अपने देश और विदेश की क्रिकेट की टीमें आपस में भिड़ती थी तो एक रोमांच सा पैदा होता था, फिर आया एक दिन का क्रिकेट वोह भी रोमनचित करने वाला होता था, फिर आया रात दिन खेलने वाला क्रिकेट वोह भी रोमांचक अनुभूति करता था, फिर जमाना आया 50,50 ओवर का क्रिकेट तब तक भी गनीमत थी, इन सब प्रकार के क्रिकेट में तो खिलाडियों की क्षमता का आकलन होता था, और इसके बाद आया 20,20 ओवर का क्रिकेट,अब यह क्रिकेट कहाँ रह गया था,बस एक प्रकार का जुआ ही तो है, जिस टीम का तुक्का अधिक रन बनाने का लग गया वोह टीम जीत गयी,खिलाडियों की क्षमता का प्रश्न तो उठता ही नहीं,उनका आकलन इस प्रकार के क्रिकेट में किस प्रकार हो ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; और एक और क्रिकेट का प्रचलन हो गया है, आई.पी.एल, खिलाडियों की नीलामी लगी और इन खिलाडियों को अलग,अलग मालिकों ने खरीद लिया, अब यह खेल खिलाडियों के बीच में कहाँ रह गया, यह खेल तो मालिको के लिए हो गया है, और टीमयें भी कैसी,एक देश के एक टीम के&amp;nbsp; कुछ खिलाडी एक मालिक के पास और उसी देश के कुछ खिलाडी दूसरे मालिक के पास,और खेल भी कैसा इन दोनों मालिकों के खिलाडियों के बीच में मैच, अब कहाँ रहा उस प्रकार का रोमांच जब एक देश के खिलाडी और दूसरे देश के खिलाडियों के बीच में मैच होता था, जब कोई चीज कभी,कभी देखने को मिलती है,तो अच्छी लगती है, परन्तु जो चीज रोज,रोज होने लगे तो उसमें स्वाभाविक है, रुचि कम होने लगती है,और इस प्रकार के आई.पी.एल के मैच नित,प्रतिदिन होने लगे हैं,तो कहाँ रहेगी वोह रुचि ? और यह भी जाहिर सी बात है ,अगर दिन प्रतिदिन खेल खेला जायेगा तो खिलाडियों को चोटे लगना तो निश्चित ही है, शरीर को अभी आराम भी नहीं मिला,और अपने मालिकों के लिए खेलने को फिर तय्यार तो इस प्रकार के मैच की क्या दशा होगी,सहज अनुमान लगाया जा सकता है, इन्सान को पैसे का लालच तो स्वाभाविक है ही,यह खिलाडी पैसे के लालच में आकर अपने मालिकों के लिए नीलाम हो कर यह खेल क्रिकेट खेलते है,तो इसमें स्वाभाविक आकर्षण कहाँ&amp;nbsp; से आएगा?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; यह तो सब रहा पुरष क्रिकेट का हाल, लेकिन महिला क्रिकेट को कौन जानता हैं ? कौन जनता भारत की महिला&amp;nbsp; क्रिकेट की कप्तान झूलन गोस्वामी है,या कौन जनता है अंजुम चोपरा को, वस पुरष क्रिकेट के आगे यह महिला क्रिकेट और अन्य खेल गौण और इसमें भी आई.पी.एल क्रिकेट आज चरम पर है, और इस आई.पी.एल के कारण हमारे पडोसी देश पाकिस्तान के खिलाडियों को आई.पी.एल में ना लेना एक विवाद बन गया है,आगे चल कर पता नहीं क्या,क्या होगा,हो सकता है,इन आई.पी.एल क्रिकेट टीम के स्वामियों में झगड़े,विवाद इत्यादि हों&amp;nbsp; | &lt;br /&gt;&amp;nbsp; क्रिकेट बोर्ड के पास तो बेशुमार दौलत है, सरकार ऐसा नियम क्यों नहीं बनाती की सब प्रकार के खेलों के सामान रूप से धन मिले,तो और खेलों को भी प्रोत्साहन मिलेगा,और हमारे राष्ट्रीय खेल होकी की ऐसी दुर्दशा नहीं होगी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &lt;b&gt;आई.पी.एल का क्या औचित्य है ?&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-571925070922603827?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/571925070922603827/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=571925070922603827&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/571925070922603827'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/571925070922603827'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post_27.html' title='क्यों हो रहा है, क्रिकेट का व्य्वासिकरण मतलब (आई.पी.एल )'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-7855146953668241503</id><published>2010-01-20T05:16:00.000-08:00</published><updated>2010-01-20T05:16:56.088-08:00</updated><title type='text'>परिवर्तन (भाग 6)</title><content type='html'>अब नरेश,उस घर में आ चुका था, जो उसके पिता जी ने ख़रीदा था,क्योंकि सुषमा ने बी.एड कर लिया था इस कारण यहाँ के एक अच्छे स्कूल में,वोह उच्च क्लासों की प्राध्यापिका हो चुकी थी, और बहुत अच्छा वेतन प्राप्त करती थी, मतलब समय चक्र के अनुसार वोह उस स्थान पर पहुँच चुकी थी,जिस स्थान पर कभी नरेश था, इससे पहले वाली जिस&amp;nbsp; कम्पनी से नरेश को&amp;nbsp; निकाला गया था, वोह भी एक बड़ी कम्पनी थी, और इस कम्पनी में भी,उसको और दूसरी बड़ी कंपनियों जहाँ वोह काम कर चुका था,उसी प्रकार का&amp;nbsp; मेडिकल और लीव ट्रवेल का खर्चा मिलता था, वोह सुषमा और उसके बाद संध्या तथा सुषमा को भारत के बहुत से रमणीक,पर्यटन स्थलों पर घुमा चुका था, अब वोह इस घर में उदास सा बैठा रहता था,उसके ससुर इस घर में आते थे, पर वोह नरेश से कुछ भी बात,चीत नहीं करते थे, बस सुषमा में से बात करके चले जाते थे,मतलब जब उसको सांत्वना कि आवयश्कता थी,उसको सांत्वना देने वाला कोई नहीं था,अब नरेश की आँखों पर पड़ने वाला चश्मा लग चुका था, और अभी भी नरेश काम खोजता रहता था,और कुछ समय खाली रहने के बाद उसको एक कम्पनी में जर्नल मेनेजेर की नौकरी मिल चुकी थी, उस में मनोवेग्यानिक कमियां तो थी हीं,सो वोह इस जर्नल मेनेजर की नौकरी पर कहाँ तक चल सकता था,और यहाँ से भी निकाला गया, उसके बाद उसने दो तीन छोटी,मोटी नौकरी करी,और वोह अधिक ना चल सका, अब नरेश प्रोड़ हो चुका था,उसके सिर के बालों में सफेदी आ चुकी थी,और उसकी बेटी भी बड़ी हो चुकी थी, इस प्रकार खाली रहने पर उसके अर्जित किये हुए धन का बहुत सा प्रतिशत समाप्त हो चुका था, घर का खर्चा अब सुषमा के वेतन से चल रहा था, क्योंकि संध्या और नरेश की बेटी बड़ी हो चुकी थी,सो उसका विवाह तो करना ही था, सुषमा और नरेश ने संध्या के लिए उपयुक्त वर खोजना प्रारंभ किया,और दोनों को एक लड़का पसंद आ गया,इसलिए संध्या का विवाह उस लड़के&amp;nbsp; आशीष के साथ हो गया था, और संध्या के विवाह के लिए नरेश ने अपनी सारी जमा पूँजी लगा दी,और इसके साथ सुषमा के घर वालों ने भी संध्या के विवाह के समय बहुत आर्थिक सहयता की, अब नरेश के पास कुछ भी धन नहीं रह गया था, सुषमा के वेतन से घर का खर्चा चल रहा था,और सुषमा के पिता जी अर्थार्त नरेश के ससुर आते,जाते रहते थे,और केवल सुषमा से बात कर के चले जाते थे, वस नरेश को जो थोड़ा बहुत सुकून मिलता था,वोह अपने पिता जी से, कुछ समय के बाद नरेश के ससुर का तो स्वर्गवास हो चुका था, और नरेश के पिता जी भी कब तक नरेश का साथ देते वोह भी चल बसे, नरेश ने अपने पिता जी के देहांत के बाद अपनी माता जी को अपने साथ रख लिया है, और अब स्थिति इस प्रकार बदल चुकी है, सुषमा नरेश को कोई खास महत्व&amp;nbsp; नहीं देती है, और नरेश से कोई छोटी,मोटी गलती हो जाती है,उसको खरी खोटी सुनाती है,नरेश से अब भी जो कुछ बन पड़ता है,वोह सुषमा के लिए करता है, नरेशअब&amp;nbsp; इन विचारों में खोये रहते हैं,अगर उसके पिता जी ने उसके स्वाभाव में इस प्रकार की मनोवेग्यानिक कमियां नहीं होने देते तो उनका यह हाल नहीं होता,नरेश का तो साहित्य में सबसे अधिक रुचि थी,परन्तु जब तक कोई प्रसिद्ध साहित्यकार नहीं हो जाता उसको धन और प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती, वोह जाएँ तो जाये कहाँ बेटी तो परबस होती है, सोचतें है,अगर बेटी संध्या से इस विषय में बात करें तो उनके दामाद आशीष क्या सोचेंगे?, अब नरेश के भाई सुरेश भी प्रोड़अवस्था में पहुँच चुकें हैं, और उनका बेटा अर्जुन भी युवावस्था में पहुँच चुका है, और नरेश के मस्तिष्क में यह विचार भी कौनधता रहता है, अगर सुरेश इस विषय में बात करतें हैं,तो ना जाने सुरेश की पत्नी विभा क्या सोचेगी? &lt;br /&gt;&amp;nbsp;इस प्रकार नरेश के जीवन में परिवर्तन हो चुका है,जो स्थान उनका होना चाहिए था,वोह विभा ने ले लिया , क्योंकि अब नरेश कुछ नहीं करते उनको विभा और आस पास के लोग हेय दृष्टि से देखते हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाप्त&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-7855146953668241503?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/7855146953668241503/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=7855146953668241503&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7855146953668241503'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7855146953668241503'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/6.html' title='परिवर्तन (भाग 6)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-8460625318851070155</id><published>2010-01-19T06:11:00.000-08:00</published><updated>2010-01-19T06:11:05.737-08:00</updated><title type='text'>परिवर्तन (भाग 5)</title><content type='html'>और स्वाभाव में तेज होने के कारण,आनन फानन में विभा ने,तुरंत सुरेश को लेकर उस नरेश और सुरेश के पिता जी के द्वारा खरीदे हुए घर में रहने का निर्णय लिया, और सुरेश को लेकर चल पड़ी उस घर में रहने के लिए, अब सुरेश तथा विभा उस घर में रहने लगे, समय बीतता गया और विभा ने एक पुत्र को जन्म दिया, और सुरेश उस घर से अपने,उस शहर में नौकरी करने के लिए,जाने लगा जहाँ पर सुरेश नौकरी करता था, और बेचारा नरेश&amp;nbsp; अपनी पत्नी सुषमा और अपनी बेटी संध्या को लेकर, अपनी माँ,पिता जी के साथ रहने को विवश था, कम्पनी में हर समय तो नरेश काम नहीं करता था,नरेश क्या कोई भी नहीं हर समय काम नहीं करता, हाँ जब कम्पनी में कोई उच्च अधिकारी हो जाता है, तब वोह कम्पनी को समर्पित हो जाता है,उसके पास अपना निजी समय होता ही नहीं,परन्तु नरेश अपनी मनोवेगाय्निक कमियों के कारण,उच्च पद पर आसीन कैसे होता ? चूंकि वोह अपने कोलेज में क्रिकेट का अच्छा खिलाडी था, और जब वोह कम्पनी में काम नहीं कर रहा होता, वोह अपना समय क्रिकेट खेल कर बिताता, अब क्रिकेट तो दिन में ही खेला जा सकता है,और रह जाता संध्या समय उस समय वोह क्या करता,इसलिए वोह संध्या समय वोह कम्पनी के&amp;nbsp; के इनडोर&amp;nbsp; बेडमिन्टन कोर्ट में,बेडमिन्ट खेल कर बिताता था, ऐसा नहीं था वोह अपनी पत्नी और अपनी बेटी की और ध्यान नहीं देता था, वोह दोनों तो उसके लिए जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी थी,इंसान को अपने&amp;nbsp; मन को खुश करने के लिए,कुछ ना कुछ तो चाहिए ही,इसलिए वोह यह खेल,खेल कर अपना मन खुश करता था, और कुछ सालों के बाद,बेडमिन्टन खेलने में हाफ्ने लगता, सो उसने संध्या समय बेडमिन्टन,छोड़ के बिल्लीयर्ड खेलना प्रारंभ कर दिया,और अपने इस घर से दूर नौकरी करने के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन देखता रहता था,और आखिरकार वोह समय आ गया,जिस समय की उसको पर्तीक्षा थी,मतलब उसको अपने मतलब का विज्ञापन दिखाई दे गया,और उसने तुरंत उस नौकरी के लिए अर्जी डाल दी,और उस विज्ञापन के उत्तर में उसको इस नौकरी के साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया,और वोह वहाँ गया तो उसका उस नौकरी के लिए,चुनाव हो गया, यह नहीं कि उसने औरकम्पनियों में&amp;nbsp; विज्ञापन देख कर अर्जी नहीं डाली थी,परन्तु और नौकरियों में उसके हाथ मासूमियत लगी थी, परन्तु यहाँ पर भी उसके भाग्य ने उसका साथ इस प्रकार नहीं दियाथा, यह शहर बहुत महंगा था, वोह तो बेचारा अपने उस माहोल से निकलना चाहता था,उसने इस शहर के बारे में सोचा ही नहीं था, वोह बेचारा इस कम्पनी में उसी सेलरी पर हाँ कर बैठा था,जो सेलेरी उसको पिछली कम्पनी में मिलती थी, बस लाभ यही था,कि इस कम्पनी में नरेश उच्च पद पर आसीन हो गया था, इस शहर में तो अपना सारा पीछे का कमाया हुआ धन समाप्त कर चुका था, और अब वोह अपनी आजीविका कमाने के लिए,अपने पिता से धन मंगाने लगा, और नरेश के पिता जी,अपनी पत्नी अर्थार्त नेरश कि माँ से चोरी,छुपे नरेश को उसकी और उसकी पत्नी सुषमा,और बेटी संध्या कि जीविका के लिए धन,भेजने लगे, और संध्या अब कक्षा चार में,पड़ने लगी थी, और नरेश की पत्नी अब उसी स्कूल में,जहाँ पर संध्या पड़ रही थी,वही वोह कक्षा आठ में पड़ा रही थी, चूंकि नरेश अ़ब उच्च पद पर आसीन था, और उसी के समकक्ष उसके साथी भी थे, परन्तु उच्च पद पर तो लोग, ऐसे होते हैं,अपने लाभ के लिए,दूसरे का गला काट कर आगे बडते हैं, बेचारा भोला नरेश इस प्रकार की प्रतिस्पर्धा को नहीं समझ पाया,और उसको अपनी इस नौकरी से हाथ धोना पड़ा,नरेश को जो कम्पनी से गाड़ी और ड्राईवर मिला हुआ था,उससे भी महरूम हो गया, बस एक बात जो अच्छी थी,इसी बीच संध्या ने बी.एड कर लिया था, अब तो नरेश के साथ ऐसा सिलसिला चल पड़ा,वोह इसी शहर में,और कंपनियों में काम करता,रहा और वोह इस सिलसिला इस प्रकार चलता रहा,उसके नौकरियों के लिए,कम्पनी छोटी होती रहीं,और उसका पद बड़ा होता रहा, अब उसको पैसे की समस्या नहीं थी, लेकिन एक कम्पनी को छोड़ कर दूसरी कम्पनी में,काम करने का कारण यह था,एक स्थान से वोह निकाला जाता,तो दूसरी कम्पनी में काम करने लगता,लेकिन यह सिलसिला एक शहर में कब तक चलता, अब वोह अधेर&amp;nbsp; भी हो चला था, और उसके साथ एक बात अच्छी हुई कि,अबकी बार उसको उस शहर के पास नौकरी मिल गयी,जिस शहर से वोह इस शहर में,आया था, आजीविका की कोई समस्या नहीं थी, सुषमा यहाँ पर भी एक स्कूल में पड़ा रही थी,और संध्या अब कक्षा दस में आ चुकी थी,परन्तु इस बार फिर नरेश को एक झटका लगा, संध्या उसकी बेटी कक्षा दस में,और नरेश को यहाँ से भी निकाल दिया गया,और अब तक नरेश के भाई सुरेश का दूर,शहर में स्थान्तरण हो चुका था, सुरेश,बिभा,अपने पुत्र जिसका नाम उन लोगों ने अर्जुन रक्खा था,उस शहर में जा चुका था,जहाँ पर उसका स्थान्तरण हो चुका था,बस नरेश को जैसे डूबते को सहारा मिल गया था,अब वोह अपनी पत्नी सुषमा,बेटी को लेकर उसी घर में आ गया था जो उसके पिता जी ने ख़रीदा था |&lt;br /&gt;क्रमश:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-8460625318851070155?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/8460625318851070155/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=8460625318851070155&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8460625318851070155'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8460625318851070155'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/5.html' title='परिवर्तन (भाग 5)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-7270213736395817869</id><published>2010-01-18T07:37:00.000-08:00</published><updated>2010-01-19T03:55:02.005-08:00</updated><title type='text'>परिवर्तन (भाग 4)</title><content type='html'>समय बीतता गया,और समय के साथ नरेश की पत्नी सुषमा ने एक बच्ची को जन्म दिया, और बच्ची के जन्म के कुछ समय के पश्चात सुषमा ने, उस शहर के एक स्कूल में साक्षात्कार दिया, और स्कूल नरेश के घर के पास था,इसी कारण स्कूल का चपरासी कुछ नर्सरी स्कूल की किताबें लेकर&amp;nbsp; और इस समाचार के साथ,कि सुषमा का स्कूल की नर्सरी कक्षाकी अध्यापिका&amp;nbsp; के लिए चयन हो गया है आया , जब यह समाचार सुषमा की सास अर्थार्त नरेश की माँ ने सुना तो वोह बोली,"में बच्ची को अपने साथ नहीं रखूंगी,सुषमा जाने उसका काम जाने", और सुषमा की सास का यह वाक्य सुन कर सुषमा के हिर्दय पर तो जैसे तुषारापात सा हो गया, और भारी मन से सुषमा ने उस स्कूल के चपरासी को लौटा दिया, समय ने तो चलना ही था, और वोह चलता गया,इस अन्तराल में सुषमा की बच्ची तीन साल की हो चुकी थी, सुषमा और नरेश ने उस बच्ची जिसका नाम उन लोगों ने संध्या रखा था,उसी स्कूल में दाखिल करवा दिया,जहाँ पर सुषमा का चयन हो गया था, और कुछ अन्तराल के बाद सुषमा ने उसी स्कूल में अर्जी दी,और उसका दुबारा भी वहाँ नर्सरी की अध्यापिका के लिए&amp;nbsp; चयन हो गया था, सुषमा की दिनचर्या यह थी,वोह रात को बारह बजे तो सोती थी,और प्रात: चार बजे उठती,अपने ससुर,नरेश,सास के लिए पूरा नाश्ता और खाना बना के स्कूल जाती,और दोपहर में स्कूल से आने के बाद घर का सारा काम संभालती,इसी कारण उसको रात के बारह बज जाते थे, अब संध्या पॉँच साल की हो चुकी थी,और सुषमा ने एक बालक को जन्म दिया, परन्तु विधि को कुछ और ही मंजूर था, और वोह बालक एक माह का होकर बहुत बीमार हो गया था, नरेश ने जो कुछ भी कमाया था, वोह सारी अपनी पूँजी उस बच्चे के इलाज में लगा दी,उसको कहीं से पैसे की ओर से सहायता नहीं थी ,और विडम्बना यह की सुषमा और नरेश के बालक ने दो माह का होकर दम तोड़ दिया, नरेश को तो आजीविका तो कमाने ही थी,वोह बेचारा माँ और पत्नी के बीच में इस प्रकार फंसा हुआ&amp;nbsp; जीविका अर्जन में लगा हुआ था,और नरेश के ससुर को भी उसकी भावना का कोई ख्याल नहीं था, नरेश तो इस दुविधा में फंसा हुआ था,और इसी बीच नरेश के भाई सुरेश का भी विवाह हो चुका था और सुरेश दूसरे शहर में नौकरी करता था , चूँकि नरेश और सुरेश की माँ,सुरेश को अधिक महत्व देती थी,इस कारण सुरेश और उसकी पत्नीविभा&amp;nbsp; का महत्व,नरेश और सुषमा से अधिक था, इस कारण&amp;nbsp; नरेश अपने को और अधिक उपेक्षित समझने लगा था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; वैसे तो नरेश प्रखर बुद्धि का मालिक था, परन्तु अपनी कम्पनी के जर्नल मेनेजर के जोर से बोलने के कारण घबरा जाता था, हाँ कभी,कभी अपने बोस और अपने बोस के समकक्ष लोगों के सामने उसकी घबराहट समाप्त हो जाती थी, और इसी कारण एक दो बार नरेश ने अपने विभाग की महीने की रिपोर्ट बिना घबराहट के बहुत अच्छी प्रकार से अपने बोस,और अपने बोस के समकक्ष लोगों के सामने मीटिंग में पेश की,और उसकी उस समय की वाक प्रतिभा,और उसके द्वारा पेश किये बहुत से पॉइंट से मीटिंग में उपस्थित लोग प्राभित हो गये थे,लिहाजा अगले माह की मीटिंग में उस कम्पनी के जर्नल मेनेजर को बुलया गया,और गत&amp;nbsp; माह की मीटिंग में प्रभावित करने के कारण,इस बार फिर नरेश को इस मीटिंग में उसके अपने विभाग की रिपोर्ट पेश करने के लिए बुलाया गया,परन्तु अब जर्नल मेनेजर के सामने घबराहट के कारण बोल निकल ही नहीं पा रहें थे,और नरेश कुछ बोलने का प्रयत्न करता भी तो वोह कुछ का कुछ बोलता, कम्पनी में काम करने वालों की मनोवेगाय्निक कमीं कौन देखता है? सुरेश अपने विवाह के समय तो कुछ समय तो अपनी विवाह के कारण ली हुई छुट्टियों के कारण,उसी घर में रहा जहाँ पर नरेश,सुषमा और उनके दोनों बच्चे और सुरेश और नरेश के माँ बाप रह रहे थे, फिर सुरेश अपनी पत्नी विभा को लेकर उस शहर में चला गया,जहाँ पर वोह नौकरी कर रहा था,परन्तु सुरेश का अपने भाई नरेश और अपने माँ बाप के पास आना तो लगा रहता था, विभा कुछ तेज स्वाभाव की थी, जहाँ पर इस शहर में नरेश तथा सुरेश के पिता जी नौकरी कर रहे थे, उससे पहले वाले शहर में जहाँ,नरेश और सुरेश के माँ,बाप थे वहाँ पर नरेश तथा सुरेश के पिता जी ने एक घर खरीद लिया था, और एक दिन नरेश ने परेशान हो कर कहा,"में उस शहर में उसी खरीदे हुए घर में जा कर रहूँगा, और उसी शहर से इस शहर में नौकरी करने के लिए आता,जाता रहूँगा", और यह बात विभा ने सुन ली,तो वोह बोली,"उस घर में में जा कर दिखतीं&amp;nbsp; हूँ"&lt;br /&gt;क्रमश:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-7270213736395817869?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/7270213736395817869/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=7270213736395817869&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7270213736395817869'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7270213736395817869'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/4.html' title='परिवर्तन (भाग 4)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-9125356980629080746</id><published>2010-01-17T04:30:00.000-08:00</published><updated>2010-01-18T03:48:04.652-08:00</updated><title type='text'>परिवर्तन (भाग 3)</title><content type='html'>अब नरेश इंजिनियर बन चुका था, लेकिन उसके व्यक्तित्व में प्रालंबन,अपने को औरो से हीन समझना और घबराहट भी समां चुके थे, इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के समय में,कम्पोनियों के वरिष्ठ अधिकारी अपनी कम्पोनियों में&amp;nbsp; नए बने हुए इंजिनियर को नौकरी देने के लिए चयन करने के परक्रिया आरम्भ कर देते हैं, वोही परक्रिया नरेश के कोलेज में भी प्रारंभ हो गयी थी, और चयन के लिए कोलेज के प्राध्यापक लडको का नाम उन से पूछ कर उन कम्पोनियों के अधिकारीयों को देते हैं, क्योंकि नरेश में घबराहट थी,इसलिए वोह अपना नाम, किसी भी कम्पनी के लिए प्राध्यपक को नहीं दे पाया, लेकिन एक दिन उस कम्पनी के अधिकारी जो नरेश के शहर से आये थे, वोह अपने शहर की कम्पनी में काम करने का इछुक था, उस कम्पनी की चयन प्रक्रिया के लिए&amp;nbsp; अपनी घबराहट के कारण,अपने किसी प्राध्यापक को अपना&amp;nbsp; नाम नहीं दे पाया था, परन्तु और लडको का साक्षात्कार देखता रहा, और जब सब लड़कों का साक्षात्कार हो गया,तो वोह साहस कर के उन अधिकारीयों के पास साक्षात्कार के लिए पहुंचा,और उन अधिकारीयों ने नरेश का चयन कर लिया था, कम्पनी के अधिकारी चुने हुए लड़कों का नाम,कोलेज के प्राध्यपकों को दे देते थे ,और प्राध्यापक चुने हुए लडको को उनके चयन के बारे में सूचित कर देते थे,परन्तु नरेश के बारे में तो उन प्राध्यापको को कुछ पता ही नहीं था, इसलिए वोह नरेश को कुछ भी सूचित नहीं कर पायें, हो सकता हो कोई प्रक्रिया हो जिसके कारण कमपनी के अधिकारी चयनित लड़कों का नाम, कम्पनी के अधिकारी कोलेज के प्राध्यापकों को बता देते हों,शायद उस प्रक्रिया में कुछ चूंक रह गयी हो,जिसके कारण कोलेज के प्राध्यापक नरेश को उसके चयन के बारे में ना सूचित कर पायें हों |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; खैर नरेश अपने शहर में लौट चुका था,और उसका एक सिनीयर इसी शहर में रहता था,और उसी कम्पनी में कार्यरत था,जिस कम्पनी में नरेश का चयन हो गया था, कुछ समय ने ऐसी करवट ली कि नरेश उसी सीनियर जिसका नाम अश्वनी था,उसके पास बैठा हुआ था, और बातों,बातों में अश्वनी ने नरेश से कहा,"कल तो तेरा कम्पनी के चीफ एक्सीकुटिव के साथ साक्षात्कार&amp;nbsp; है",  इसी कारण नरेश को जानकारी प्राप्त हुई कि उसका अब चयन परक्रिया का आखरी साक्षात्कार है, कल तो आ ही गया था,और देखते,देखते उसका चीफ एक्ससीकुटिव&amp;nbsp; के साथ साक्षात्कार का नंबर आ गया था, और बेचारा नरेश साक्षात्कार के लिए पहुंचा, और सामने चीफ एक्सीकुटिव और दूसरे वरिष्ठ अधिकारीयों को देख कर, घबराहट के कारण उसके माथे,और हांथों में पसीना आ रहा था,और साक्षात्कार के समय नरेश घबराहट के कारण,उन लोगों को उनके उन प्रश्नों का उत्तर भी ठीक से नहीं दे पाया जिनका वोह उत्तर बहुत ही सरलता से दे सकता था,और नरेश का उस कम्पनी में चयन नहीं हो पाया था, अब नरेश के पिता जी ने,अपना सरकार के वरिष्ठ अधिकारी होने के कारण,उस कम्पनी पर दवाब डाला और उस कम्पनी ने दवाब में आकर नरेश को अपने यहाँ रख तो लिया, परन्तु उस विभाग में जिसका महत्व सबसे कम था, रमेश युवक तो हो ही चुका था,और इस आयु में युवकों में मेह्तावाकान्षा तो होती हैं,वोह तो इस कम्पनी के सबसे महतवपूर्ण विभाग में जाना चाहता था, परन्तु हमारे देश में विडंबना तो यही है,कर्मचारियों का कोई मनोवेग्यानिक विश्लेषण तो होता ही नहीं,अगर होता तो युवकों की मनोवेग्यानिक कमियों को दूर करके कम्पनी उनको तराश के लिए,अपने लिए हीरे बना सकतें हैं, नरेश प्रखर बुद्धि का मालिक तो था,बस मनोवेग्यानिक कमियों के कारण उसकी प्रतिभा उभर कर सामने नहीं आ पा रही थी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अ़ब चूँकि नरेश की नौकरी लग चुकी थी, और जैसा होता है, कि हमारे देश में बच्चे की नौकरी लगी नहीं,और उसके माँ बाप उसका विवाह करा देना चाहते हैं, यही नरेश के साथ भी हो रहा था, और नरेश में तो पर्तिरोध करने की शमता भी नहीं थी, हाँ माँ,बाप के व्यवहार के कारण वोह बहार सहानभूति ढूँढता था, सो उसने सोचा कि शादी कर लेतें हैं शायद कुछ सुकून मिल जाएँ और परिणय सूत्र में बंध गया था, लेकिन यहाँ तो उसकी परेशानी और बड़ गयी थी, नरेश की माँ ने तो नरेश की पत्नी सुषमा&amp;nbsp; के साथ दुर्व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया था,अगर नरेश इस बात का विरोध करता तो उसकी माँ उसको,"जोरू के गुलाम की उपाधि से नवाजती", और चूंकि पत्नी अभी नयी,नवेली थी, तो नरेश अपनी नयी,नवेली पत्नी पर अत्यचार नहीं सेहन कर पाया था, और उसके ससुर जिनको नरेश की भावनाओं से कोई मतलब नहीं था, बस अपनी बेटी को दुखी देख कर किसी और कम्पनी में भेजने का यतन किया,और नरेश का उस कम्पनी में चयन भी हो गया था, परन्तु उस कम्पनी में उसके साथ दुर्व्यवहार होता था,तो नरेश ने दुखी हो कर उस कम्पनी को छोड़ने को सोचा,इसी बीच में नरेश के पिता जी अवकाश प्राप्त हो चुके थे,और एक कम्पनी में कार्यरत थे, और नरेश का दुर्भाग्य की नरेश भी उसी कम्पनी में आ गया था,जहाँ पर उसके पिता जी कार्यरत थे,और फिर नरेश और उसकी पत्नी सुषमा को नरेश के माँ,बाप के साथ रहने को परिस्थितयों ने विवश कर दिया था, और यहाँ पर फिर वोही परिस्थति उसके साथ,उसके सहकर्मी उसको निशाना बना कर उसका उपहास करते थे, इन परिस्थतियों से विवश हो कर वोह दूसरे स्थान पर नौकरी करने के अवसर खोज रहा था |&lt;br /&gt;क्रमश :&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-9125356980629080746?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/9125356980629080746/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=9125356980629080746&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/9125356980629080746'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/9125356980629080746'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/3.html' title='परिवर्तन (भाग 3)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-7142177804920313505</id><published>2010-01-16T05:35:00.000-08:00</published><updated>2010-01-16T05:35:09.226-08:00</updated><title type='text'>परिवर्तन अगला भाग (2)</title><content type='html'>नरेश तो फेल हो चुका था,परन्तु सुरेश परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हो चुका था, और अवसाद से ग्रसित,अपने को हीन समझने वाले नरेश ने और अधिक परिश्रम किया तो नरेश अबकी बार परीक्षा में अच्छे नम्बरों से परीक्षा में,उतीर्ण हो गया है था, परन्तु एक बार परीक्षा में अनुतीर्ण होने के बाद नरेश का उत्साह कोई क्यों बड़ाता, आगे नरेश को पड़ना तो था ही,  सो उसने बी.स.सी में दाखिला ले लिया था,परन्तु नरेश की होनी में क्या लिखा था? यहाँ पर भी उसके साथी उसका उपहास करते थे, उसके कुछ साथी उसको निशाना बना कर उसका उपहास करते थे, और शेष बचे हुए उसके साथी उस बेचारे निशाना बने हुए नरेश को लेकर हंसते थे,संभवत:&amp;nbsp; संभवत: उसके भोले स्वाभाव के कारण, उसने बी .एस .सी का विकल्प इसलिए चुना था, कि और रास्ता नहीं था, बी.एस.सी के कारण वोह कुछ बन सकता था, लेकिन मूल रूप से उसका झुकाव हिंदी और अंग्रेजी की ओर था, इसके साथ वोह समाचार पत्रों में इंजीनियरिंग कोलेजो का विगयापन देखता रहता था, उस समय भविष्य के लिए दो ही विकल्प थे, नरेश इंजीनियरिंग के विकल्प को डाक्टर के विकल्प से अच्छा समझाता था, इसी बीच में नरेश का बी.एस .सी प्रथम वर्ष का परीक्षाफल आ चुका था, लेकिन उसके नम्बर बहुत कम, मतलब कि तृतीय श्रेणी के नम्बर, अब उसके माँ था पिता दोनों कहने लगे इतने कम नम्बरों में बी.एस सी कर के क्या करोगे? &lt;br /&gt;&amp;nbsp;लेकिन इस बार नरेश का भाग्य कुछ अच्छा था, यह तो नहीं कह सकता बहुत अच्छा, नरेश ने रासयन की इंजीनियरिंग और सिविल इंजीनियरिंग दोनों का फार्म भरा, उसकी सिविल इंजीनियरिंग में रसायन की इंजीनियरिंग से अधिक रुचि थी, लेकिन नरेश,था सुरेश की आयु ऐसी हो चुकी थी,जहाँ पर बच्चों को स्वयं निर्णय ले कर स्वालंबी बनना चाहिए,वहाँ पर पिता अपने निर्णय देते&amp;nbsp; थे,और तो और जहाँ पर बच्चों को चुनोतियाँ का सामना करना आना चाहिए,वहाँ पर उन चुनोतियों को उनके पिता जी स्वयं अपने अनुभव के कारण दूर कर देते थे, और बहुत बार दोनों बच्चों से यह भी बोलते थे, "तुम्हारे बस का नहीं है", नरेश का स्वाभाव में इस बात का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वोह स्वालंबी ना होकर प्रालम्बी हो गया था,जबकि सुरेश इस बात को चेलेंज के रूप में स्वीकार करता था, यहं भी विधि को जैसा स्वीकार था, नरेश के पास रसायन इंजीनियरिंग&amp;nbsp; फार्म पहले आ चुका था, उसके पिता जी नरेश को लेकर रसायन इंजीनियरिंग के कालेज में लेकर पहुंचे,और उसका उस रासयन इंजीनियरिंग के लिए चयन हो गया था, चूंकि नरेश सिविल का भी फार्म भर चुका था, तो उसने अपना साक्षात्कार उस रासयन शास्त्र के इंजीनियरिंग कोलेज में इस प्रकार दिया कि उसका चयन ना हो पायें,परन्तु उसके साक्षात्कार लेने वालों को नरेश के बारे में क्या लगा उसका चयन हो गया,लेकिन उन लोगों में से किसी ने नरेश के पिता जी को बुला कर कुछ कहा, चूँकि पिता जी के सामने बात करते हुए वोह,उनसे घबराहट के कारण कुछ शब्द चबा जाता था, तो नरेश के पिता जी नरेश से&amp;nbsp; पूछा,"क्या तुम शब्द चबा&amp;nbsp; गये थे?",बस नरेश चुप, अभी नरेश को रसायन शास्त्र वाले कोलेज में ज्वाइन करने का कुछ समय शेष था,और इसी बीच में सिविल इंजीनियरिंग वाले कोलेज से भी आमंत्रण आ गया था,परन्तु नरेश को तो पिता की जबरदस्ती के कारण अपनी मर्जी के विरुद्ध&amp;nbsp; उसे रासयन शास्त्र वाले कोलेज में ही दाखिला लेना ही पड़ा |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;मालूम नहीं नरेश के भाग्य में क्या बदा था,उसके यहाँ भी उसके सहपाठियों द्वारा उसका उपहास, किसी प्रकार उसने अपने कोलेज के पड़ाइ को पूरा किया, लेकिन उसके रसायन शास्त्र के इंजीनियरिंग कोलेज के अंतिम वर्ष में,वोह किसी गलती के कारण परीक्षा अनूतिर्ण घोषित हो गया, लेकिन बाद में उसकी परीक्षा की गलती में सूधार हो गया था,और उसको रासयन शास्त्र के सनातक की डिग्री मिल चुकी थी,और वोह बन गया केमिकल इंजिनियर, बस अ़ब सुरेश और नरेश के&amp;nbsp; पिता जी तथा माँ का भी&amp;nbsp; वर्णन सुरेश के साथ कर दूं,दोनों बच्चों के यह पिता जी और माँ दोनों&amp;nbsp; कुछ डरपोक स्वाभाव के भी थे, चूंकि सुरेश तो पिता जी की बातों को एक चेलेंज की भांति लेता था, इसलिए उसका चयन हर स्थान पर हो जाता था,और एक बार सुरेश का चयन नोसेना में हो गया, और नेवी में ज्वाइन करने के लिए सुरेश का वारंट आ गया था, तो डर के कारण सुरेश के पिता जी ने फाड़ दिया वोह वारंट,और माँ भी घबरा गयी थी |&lt;br /&gt;क्रमश :&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-7142177804920313505?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/7142177804920313505/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=7142177804920313505&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7142177804920313505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/7142177804920313505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/2.html' title='परिवर्तन अगला भाग (2)'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-8735054241513970235</id><published>2010-01-15T06:40:00.000-08:00</published><updated>2010-01-15T22:15:42.276-08:00</updated><title type='text'>परिवर्तन</title><content type='html'>यह एक कहानी लिख रहा हूँ, जिसमें समाज पुरषों को घर के खर्चो के लिए कमाने वाला और स्त्री को घर चलाने वाला समझता है, सदियों से शास्वत नियम चला आ रहा है, हाँ आजकल अपवाद स्वरुप स्त्री कमाने लगी है,या स्त्री,पुरष दोनों कमाने लगें हैं, परन्तु अगर किसी कारणवश मर्द जीविका चलाने के उप्पयुक्त नहीं रह जाता,शारीरिक विकलांगता या किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होने के कारण तो अपवाद हैं, परन्तु यदि पुरष हष्ट,पुष्ट है,और जीविका नहीं ला पाता तो उसको समाज और उसका परिवार हेय दृष्टि से देखता है, किंचित इसी सामाजिक परिवेश का यह परिणाम है,अगर मर्द जीविका लाता है,उसका सम्मान रहता है, और कोई परिवार में उंच,नीच हो भी जाये,जिसमे मर्द को दोषी बनाया जाये,तो वोह कोई शिकायत नहीं करता परन्तु अगर स्त्री कमाने वाली हो जाती है,और मर्द अकर्मण्य तो मर्द का अपमान तो प्रारंभ तो हो ही जाता है,और हर प्रकार की हानि पर उस पर दोशार्पण प्रारंभ हो जाता है |&lt;br /&gt;इस कहानी को आरंभ करने से पहले, इस प्रकार के पुरष के बचपन से होकर युवावस्था, विवाहित अवस्था, प्रोड़ अवस्था का विवरण देना किंचित उचित होगा, क्योंकि वोह योग्य तो था,परन्तु उसका जीवन इस प्रकार से व्यतीत हुआ था, बहुत सारी मानसिक यातनाओं के कारण, उसमें मनोवेग्यानिक कमियां हो गयीं थी,जिसके कारण वोह जीविका अधेरावस्था के बाद नहीं कमा पाया और हो गया उसके अपमान का सिलसिला प्रारम्भ हो गया&amp;nbsp; |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; बचपन से प्रारंभ कर रहा हूँ,एक परिवार में दो भाई थे,नरेश और सुरेश, नरेश सुरेश से दो वर्ष बड़ा था, उनके पिता का नरेश और सुरेश के साथ,सामान व्यवहार था, एक ही परिवेश में रहते हुए दोनों भाइयों का स्वाभाव भिन्न था, हर किसी पर एक ही व्यवहार का भिन्न,भिन्न प्रभाव पड़ता है, नरेश बहुत ही संवेदनशील था,और सुरेश इसके विपरीत, पिता का व्यवहार दोनों भाइयों को हतौत्साहित करने वाला, उनके मित्रों के सामने उनका अपमान करने वाला था, और माँ का स्वाभाव&amp;nbsp; दोनों भाइयों में भेद भाव करने वाला था, माँ तो&amp;nbsp; सुरेश को नरेश से अधिक महत्व देती थी, वैसे तो कहा जाता है,माँ के लिए तो यह दो ऑंखें होतीं हैं,जिनमे कोई भेद भाव नहीं होता,परन्तु उनकी माँ नरेश से अधिक सुरेश को&amp;nbsp; महत्व देती थी, नरेश संवेदन शील तो था ही,पिता के इस प्रकार के व्यवहार के कारण नरेश अपने को अपने मित्रों से हेय समझने लगा, और पिता&amp;nbsp; के व्यवहार के कारण&amp;nbsp; सुरेश पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था सुरेश तो तो जैसे चिकना घड़ा था,और माँ तो सुरेश को नरेश से&amp;nbsp; अधिक महत्व देती थी,और इसलिए नरेश में हीन भावना भी पनपने लगी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;समय बीतता गया,और दोनों भाई किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकें थें, नरेश में कुछ शारीरक कमियां भी थी, और एक बार उसके&amp;nbsp; दसवीं कक्षा के अंग्रेजी के अध्यापक अचानक समूची क्लास के सामने उसकी शारीरक कमियों के बारें में पूछ लिया, तो और विद्यार्थिओं को क्या चाहिए था बस उपहास करने का बहाना मात्र ,वोह उसकी उस&amp;nbsp; शारीरिक कमियों को लेकर उपहास करतें थे, और बेचारा नरेश खून के घूँट पी कर रह जाता था,बेचारा कर भी क्या सकता था?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;एक बार नरेश परीक्षा में,फेल हो गया तो उसकी माँ ने उसको बिना कारण जाने,उसका अपमान प्रारंभ कर दिया, जबकि नरेश ने बहुत परिश्रम किया था,परन्तु उसके भाग्य ने साथ नहीं दिया, और बेचारा नरेश अवसाद में रहने लगा,और उसके अवसाद को बिना समझें उसके पिता ने उसकी पिटाई कर दी |&lt;br /&gt;क्रमश:&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-8735054241513970235?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/8735054241513970235/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=8735054241513970235&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8735054241513970235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8735054241513970235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post_15.html' title='परिवर्तन'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1539266859996531800</id><published>2010-01-11T04:50:00.000-08:00</published><updated>2010-01-11T06:09:46.895-08:00</updated><title type='text'>खुशियाँ</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;embed align="middle" flashvars="cy=bb&amp;amp;il=1&amp;amp;channel=3530822107899304808&amp;amp;site=widget-68.slide.com" name="flashticker" quality="high" salign="l" scale="noscale" src="http://widget-68.slide.com/widgets/slideticker.swf" style="height: 320px; width: 400px;" type="application/x-shockwave-flash" wmode="transparent"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: left; width: 400px;"&gt;&lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=1" target="_blank"&gt;&lt;img border="0" ismap="ismap" src="http://widget-68.slide.com/p1/3530822107899304808/bb_t000_v000_s0un_f00/images/xslide1.gif" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=2" target="_blank"&gt;&lt;img border="0" ismap="ismap" src="http://widget-68.slide.com/p2/3530822107899304808/bb_t000_v000_s0un_f00/images/xslide2.gif" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=2" target="_blank"&gt;&lt;img border="0" ismap="ismap" src="http://widget-68.slide.com/m/3530822107899304808/bb_t000_v000_s0un_f00/images/xslide9_1.gif" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=F" target="_blank"&gt;&lt;img border="0" ismap="ismap" src="http://widget-68.slide.com/p4/3530822107899304808/bb_t000_v000_s0un_f00/images/xslide42.gif" /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;यह &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=F" target="_blank"&gt;सलायीड शो&amp;nbsp; हमारे नाना ने बनाया है , इसमें हमारे मम्मी,पापा,दादी,और नानी हैं,इसमें में सपाईडर मेन की ड्रेस मैं हूँ,और नीचें मेरी बहिन करोल कर रही है, हमारी नानी को शायद आप जानतें हैं,और दूसरी हमारी दादी हैं |&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #444444; font-size: large;"&gt;और दूसरी वाली मेरे ताऊ जी की बेटी है |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: #444444;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=F" target="_blank"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=F" target="_blank"&gt;आप को यह सलायीड शो कैसा लगा?&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;आप बताएंगे तो हमें अच्छा लगेगा |&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;धन्यवाद् !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.slide.com/pivot?cy=bb&amp;amp;at=un&amp;amp;id=3530822107899304808&amp;amp;map=F" target="_blank"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1539266859996531800?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1539266859996531800/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1539266859996531800&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1539266859996531800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1539266859996531800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post_11.html' title='खुशियाँ'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-3795345419943375547</id><published>2010-01-10T05:00:00.000-08:00</published><updated>2010-01-10T05:00:57.735-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हर किसी के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयत्न करें |'/><title type='text'>किसी की भी प्रशंसा करें तो मन से</title><content type='html'>आज मेरे मन में एक विचार आया किसी भी मानव जाति की प्रशंसा&amp;nbsp; करें तो मन से करें, अथवा बुझे मन से या चापलूसी करने के बहाने ना करें, व्यंग,बझे मन से प्रशंसा और चापलूसी के कारण प्रशंसा पाने वाले के मन पर तुषारापात सा हो जाता है, इस विचार का मेरे मन में आने का कारण है,किसी मेरे मित्र की उपलब्धि पाने पर किसी ने कहा कि, मालूम नहीं "इसको यह उपलब्धि किस प्रकार मिल गयी ?",जबकि उसकी उपलब्धि असाधारण थी और दूसरे लोग उसकी उपलब्धि की भूरी,भूरी प्रशंसा कर रहे थे,परन्तु उस व्यक्ति द्वारा की गयी टिप्पणी ने मेरे मित्र की ख़ुशी को अत्यंत आघात पहुँचाया और अपनी उस उपलब्धि के कारण, उसका चेहरा बुझा,बुझा सा हो गया, यह मानव स्वाभाव हैं, उसको लाख खुशियाँ मिलें, परन्तु एक इस प्रकार की टिप्पणी उसको आघात पहुंचा जाती हैं,और संवेदनशील व्यक्ति को कुछ अधिक ही व्यथित कर देती है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; मैंने आज ही अंग्रेजी के समाचार पत्र की एक पत्रिका में किसी का व्यान पड़ा था, "love is giving all those things which you can give which you have", प्रेम की उस व्यक्ति की दी हुआ यह व्यान मुझे बहुत अच्छा लगा था, कि प्रेम वोह जिसमें आप वोह सब चीज दे दें जो आप दे सकतें हैं,और उक्त घटना में तो मैंने इसके विपरीत ही देखा, अगर मेरे उस मित्र को उसकी इस उपलब्धि पर,बिना मोल की प्रशंसा मिल जाती तो उसको प्रोत्साहन मिल जाता, और वोह और उत्साह से अपने उस कर्म में लग जाता, मालूम नहीं यह द्वेष की भावना थीया उसको महत्वविहीन दिखाने की भावना थी, या स्वयं को उससे अधिक श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास या जिसको यह बात कही गयी थी, उसको मेरे मित्र से श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; में तो बहारी सुन्दरता से अधिक आंतरिक सुन्दरता को महत्व देता हूँ, अगर वोह व्यक्ति&amp;nbsp; उक्त टिप्पणी ना देकर उसकी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी देखता तो उसमें उसकी आन्तरिक सुन्दरता&amp;nbsp; ही झलकती, &lt;b&gt;दूसरे के चेहरे पर मधुर मुस्कान लाना&amp;nbsp; ही मेरे अनुसार वास्तविक&lt;/b&gt; प्रेम है,उक्त टिप्पणी के साथ में इस लेख का समापन करता हूँ |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-3795345419943375547?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/3795345419943375547/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=3795345419943375547&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3795345419943375547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3795345419943375547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post_10.html' title='किसी की भी प्रशंसा करें तो मन से'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2228714857769343479</id><published>2010-01-08T06:33:00.000-08:00</published><updated>2010-01-08T06:33:40.694-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हंसी के साथ थ्री इडइयटस अच्छे सन्देश दे गयी |'/><title type='text'>थ्री इडीयटस  पिक्चर बहुत से अच्छे सन्देश दे गयी</title><content type='html'>नववर्ष के पहले दिन हमारे बेटी दामाद आ गए थे,मेरी पत्नी बहुत दिनों से कह रही थी, मैंने थ्री इडइयटस&amp;nbsp;  पिक्चर की बहुत प्रशंसा सुनी कि यह पिक्चर बहुत हंसी की है, नववर्ष का समय था,और बेटी दामाद आ गये थे,यह पिक्चर देखने का अच्छा कारण बन गया था, पिक्चर 3.50 पर प्रारंभ होनी थी और घर से निकलते,निकलते 3.20 का समय हो गया था,मेरी पत्नी और हमारे दामाद को यह थ्री इडइयटस पिक्चर देखने की बहुत बेसब्री थी, खैर हमारे घर से सिनेमा हॉल नजदीक ही था,और दामाद एक दिन पहले इस पिक्चर की टिकेट ले आये थे, सिनेमा हॉल तक पहुंचते,पहुंचते पॉँच,दस मिनट ऊपर हो गये थे |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इस चलचित्र का पहला सीन चल रहा था, और जैसे,जैसे यह पिक्चर आगे की ओर अग्रसर हो रही थी, मुझे अपने इंजीनियरिंग कोलेज के क्लास रूम और छात्रावास की याद आ रही थी, वैसे ही स्वस्थ रेगिंग,उसी प्रकार छात्रों में सहयोग,फ्रेशर डे के बाद हमारे यहाँ रेगिंग समाप्त हो जाती थी,सीनियर,जुनीयर का आपस में मित्रवत व्यव्हार होने लगता था, परन्तु सीनियर,जूनियर को अनुशाशन में तो हर वर्ष रखते थे, अगर कोई जूनियर बाजार में कोलेज की गरिमा का ख्याल नहीं रखता था,तो&amp;nbsp; सीनियर बाजार में तो कुछ नहीं कहतें थे,परन्तु उक्त जूनियर को छात्रावास में अच्छा सबक सिखलाते थे,&amp;nbsp; और क्लास रूम का वातावरण याद आता है , आज कल तो इस प्रकार के अनेकों,मेडिकल,इंजीनियरिंग कोलेज हो चुके हैं,और सुप्रीम कोर्ट के आर्डर से पहले इन कोलेजों में बहशी रेगिंग होती थी, और खेद के साथ कहना पड़ रहा है, बहुत से छात्र,छात्रओं को इस प्रकार की बहशी रेगिंग के कारण आत्महत्या करने को विवश होना पड़ा था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इस पिक्चर में भी दो अताम्हात्यों का प्रयास दिखाया गया है,एक में तो एक छात्र की मृत्यु इस कारण से होती हैं,कि उस छात्र के हवाई जहाज बनाने की ओर उस कोलेज का डिरेक्टर कोई ध्यान नहीं देता और विवश हो कर वोह छात्र आत्महत्या को गले लगा लेता है, और दूसरे छात्र से उसके घर वालों को इस कोलेज का डिरेक्टर, उसी को निष्कासित करने की चिट्ठी लिखवाता हैं, खैर यह पिक्चर है,पर हमारे कोलेज में ऐसा नहीं होता था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; चलो अ़ब आता हूँ,इस पिक्चर के संदेशों पर |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; १.) रूचि के अनुसार कोर्स का चुनाव करना :- इसके बारें में तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है,तो इस बारें में अधिक ना लिख कर इतना ही कहना चाहूँगा, यदि कोर्स के चुनाव के बारें में रूचि से विपरीत अगर सरंक्षक दवाब डालेंगे,तो छात्र की रूचि अनुसार प्रतिभा दिखलाने के अवसर ना मिलने के कारण,उसकी अपनी रूचि की प्रतिभा दब तो जाएगी,और जीवन भर अपनी रूचि का काम ना करने के कारण ,हीन भावना से ग्रसित तो हो ही जायेगा,और उसकी उन्नति भी बाधक हो जाएगी,इसी कारण विदेशों में एपटीचुड टेस्ट होता है,और उसी हिसाब से छात्र को कोर्स दिया जाता है | &lt;br /&gt;२.) अभी तक इंजीनियरइंग कोलेजों में किताबों में ही लिखे विषयों को पड़ाया जाता है,और उसी की परीक्षा होती है, इसलिए प्रारंभ से नयी खोज,नए शोध नहीं हो&amp;nbsp; पाते,हाँ में यह मानता हूँ,प्रारंभ में मूल सिधान्तों का ज्ञान तो देना आवश्यक है,परन्तु प्रारंभ से ही शोध के बारें में ध्यान दिया जाये तो नयी,नयी प्रतिभा उभर कर आएँगी, इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में तो प्रोजेक्ट होता है, जिसमें नईं चीज को प्रस्तुत करना होता है, अच्छा तो है,परन्तु प्रारंभ इस बात की और ध्यान दिया जाये,तो प्रतिभाओं को संपन्न होने का और अवसर मिलेंगे | &lt;br /&gt;&amp;nbsp; अंत में इस लेख का समापन इस बात से करता हूँ, हमारे कोलेज में तो इस औरों की सहायता करने के , अपनी गरिमा बना के रखने के संस्कार मिलते थे,जिस प्रकार इस पिक्चर में,एक छात्र के पिता जी का जीवन बचाना&amp;nbsp; गया था,इसी प्रकार के संस्कार मिलते थे, और कोलेजों का तो मुझे ज्ञात नहीं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;b&gt;हंसी के साथ थ्री इडइयटस अच्छे सन्देश दे गयी |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2228714857769343479?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2228714857769343479/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2228714857769343479&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2228714857769343479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2228714857769343479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html' title='थ्री इडीयटस  पिक्चर बहुत से अच्छे सन्देश दे गयी'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-8672163161436433766</id><published>2010-01-05T05:26:00.000-08:00</published><updated>2010-01-05T05:26:49.145-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हमारा देश परम्परागत विज्ञान और आधुनिक विज्ञान से समृद्ध हो'/><title type='text'>हमारा परम्परगत ज्ञान लिपिबद्ध होगा |</title><content type='html'>आज हिंदी समाचार पत्र अमर उजाला पड़ रहा था, और इस समाचार पत्र के पन्ने पलटते हुए सहसा मेरी दृष्टि एक खबर पर पड़ी, कि "नानी,दादी के नुस्खे लिपिबद्ध होंगे", पड़ कर हर्ष हुआ, समाचार पत्र में वर्णन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश जी ने कहा है, कि नानी दादी के नुस्खे अधिकतर मोखिक हैं उनको लिपिबद्ध किया जायेगा, चिकत्सा क्षेत्र के आयुर्वेदिक ज्ञान को लिपिबद्ध किया जायेगा, और इनको पेटेंट भी किया जायेगा जिससे इस हमारे देश को लाभ होगा, लिपिबद्ध ना होने के कारण यूरोप के देश और अमरीका इन नुस्खो को पेटेंट करा के लाभ उठा रहें हैं, (इस खबर के लिए देखें आज का दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला दिनांक 5 जनबरी 2010 ).&lt;br /&gt;&amp;nbsp;आज सुबह इसी विषय पर संगीता जी का लेख भी पड़ा था, और मुझे यह पड़ कर अच्छा लगा,आखिरकार हमारी सरकार का ध्यान इस ओर गया, में सामायिक विषयों पर कदाचित ही लिखता हूँ,हाँ समाचार पत्रों में छपी ख़बरों को पड़ अवश्य लेता हूँ, परन्तु इस खबर की ओर धय्नाकर्षण हुआ और मुझे यह लेख लिखने को प्रेरित किया, हमारे इस देश में अनेकों प्रतिभाएं हैं,जो लोप होती जा रहीं हैं, और कुछ तो लुप्त हो गयीं हैं, जैसे कि यह परसिद्ध हैं,ढाका जो अब बंगला देश में हैं, उसके कारीगरों के द्वारा बनाई गयी मलमल इतनी बारीक़ होती थी, कि एक पूरा थान एक अंगूठी के अन्दर से निकल जाये, इसके बारे में एक किवदंती परसिद्ध है कि, मुग़ल शासक औरंगजेब की बेटी को इस मलमल की सात सतह बना कर पहनाया गया था,और फिर भी इस वस्त्र में उसके अंग दिखाई दे रहे थे, कुछ दिन पहले मैंने हैदराबाद का गोलकुंडा किला देखा था, उस किले की विशेषताओं में से एक विशेषता थी, जब किले के नीचे प्रवेश द्वार पर जब गाईड ताली बजाता था,तो वोह ताली किले की सबसे ऊँचा स्थान जो कि प्रवेश द्वार से बहुत ऊंचाई पर था वहाँ पर भी सुनाई देती थी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; में तो कहता हूँ सरकार को एक ऐसा बीभाग बनाना चाहिए जो हमारी प्राचीन धरोअर की खोज करे और उसका प्रसार,प्रचार करे |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अंत में इसी बात से अपनी लेखनी को यहाँ विराम देता हूँ, कितना अच्छा हो, &lt;b&gt;यह हमारा भारत देश अपनी परम्परागत विद्याओं और आधुनिक विज्ञान के सम्मिश्रण से समृद्ध हो |&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-8672163161436433766?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/8672163161436433766/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=8672163161436433766&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8672163161436433766'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/8672163161436433766'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='हमारा परम्परगत ज्ञान लिपिबद्ध होगा |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1781043421051444284</id><published>2009-12-30T07:57:00.000-08:00</published><updated>2009-12-30T07:57:35.808-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नववर्ष की शुभकामनायें |'/><title type='text'>उड़न तश्तरी जी नववर्ष के एक दिन पहले की टिप्पणियों बहुत प्रभावित किया |</title><content type='html'>नववर्ष द्वार पर दस्तक दे रहा है, सभी पाठकों को नववर्ष की मंगलकामना और शुभकामनाये, नववर्ष की बधाई तो सब लोग देतें हैं, और अपने,अपने लिए नववर्ष में कुछ नियम बनाते हैं,और उन नियोमों पर चलने के लिए प्रण करतें हैं, लेकिन उड़न तश्तरी जी ने तो सर्व हिताय की बात कही है मन को भा गयी , यदा,कदा ब्लॉग पड़ने पर उड़न तश्तरी जी की टिप्पणियों पर दृष्टि पड़ी, और टिप्पणियों में नए ब्लोग्गरों को जोड़ने और पुराने ब्लोग्गरों को प्रोत्साहित करने की बात लिखी थी, उनकी यह सहहिर्द्यता मन को छु गयी, वोह तो हैं ही हिंदी लेखन को समर्पित परन्तु सब के बारें उनका सोचना बहुत प्रभावित कर गया |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; बुडे हुए जाते हुए नववर्ष के साथ,अपनी वोह बुराइयाँ जो आपको लगती हैं, बीते हुए वर्ष के साथ भेज कर,स्नेहिल मधुर वातावरण बनाएं |&lt;br /&gt;अंत में सभी पाठकों और उनके परिवार &amp;nbsp; जो भी नयें आने वाले हैं, उन लोगों का इस नववर्ष पर हार्दिक स्वागत और उनके मंगलमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ इस लेख का समापन करता हूँ |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;b style="color: red;"&gt; नववर्ष की शुभकामनायें |&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1781043421051444284?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1781043421051444284/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1781043421051444284&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1781043421051444284'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1781043421051444284'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_30.html' title='उड़न तश्तरी जी नववर्ष के एक दिन पहले की टिप्पणियों बहुत प्रभावित किया |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-3835852965220720261</id><published>2009-12-28T07:26:00.000-08:00</published><updated>2009-12-28T07:26:02.152-08:00</updated><title type='text'>राज पिछले जन्म का सीरियल में मुझे एक संदेह है</title><content type='html'>आज कल दूरदर्शन पर पूर्वजनम से सम्ब्धन्दित एक सीरियल दिखाया जा रहा है, "राज पिछले जन्म का", जिसमे जानी मानी हस्ती डाक्टर तृप्ति जैन लोगों का इस जन्म का डर निकालने के लिए, या उनकी शंका का समाधान करने के लिए पूर्वजन्म में ले जातीं हैं, डाक्टर तृप्ति जैन के बारे में में इस सीरियल के प्रारंभ होने से पहले से जानता हूँ, और यह भी ज्ञात था कि हिप्नोसिस कर के लोगों को पूर्व जन्म में ले जातीं है, मेरे को अक्सर उरिसा की रहने वाली सुप्रसिद्ध लेखिका फेसबुक में अक्सरमुझे अपने लेखो को&amp;nbsp; मेल करतीं&amp;nbsp; रहतीं है, उनकी एक मेल इसी सीरियल के सन्दर्भ में आया था, उनको तो दो तीन संदेह थे, पर उसमें से एक संदेह तो मुझे भी है, डाक्टर तृप्ति यदा कदा पुर्बजन्म में ले जाने से ऐसी बातें पूछतीं हैं,जैसे कि पुर्बजन्म में ले गए इन्सान के द्वारा देखे हुए दृश्यों को वोह सवयं भी देख रहीं हों, ऐसे लोगों को तो अंग्रेजी &amp;nbsp; क्लेरोवेनेट में&amp;nbsp; कहा जाता है, परन्तु उनके बारे में तो क्लेरोवेनेट का कोई वर्णन नहीं है, यह वर्णन है तो पूनम सेठी जी के बारे में है,पर तृप्ति जैन के बारे में नहीं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; हिप्नोतिस्म का मेरे पिता जी को ज्ञान होने के कारण इस विद्या को में, बहुत समीप से जानता हूँ, इसके तीन प्रमुख नियम हैं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पहला हिप्नोटाइस होने वाले व्यक्ति को इस क्रिया के लिए सहयोग देना आवश्यक है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दूसरा हिप्नोटाइस होने वाला कभी भी वोह काम नहीं करेगा जो कि वोह जागृत अवस्था में नहीं कर सकता |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; तीसरा हिप्नोटाइस करने वाले व्यक्ति की यह क्रिया प्रारंभ होने से पहले उसकी बातों पर पूर्ण मनोयोग से ध्यान देना |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अब इसमें कहीं भी यह नहीं आता कि इस क्रिया में हिप्नोटाइस होने वाले व्यक्ति के दृश्यों को हिप्नोटाइस करने वाला देख रहा है, अब रहा पुर्बजन्म के बारे में,इसके बारे में सुना और पड़ा अवश्य है,पर देखा कभी नहीं,इसका वर्णन हमारे आदि ग्रंथो में तो है,और समाचार पत्रों में कभी,कभी छप जाता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;कहा जाता है कि चोरासी लाख योनिया है,परन्तु इस सीरियल "राज पिछले जन्म का ", में मनुष्य का जन्म मन्युष का ही दिखाया है,हाँ एक सीरियल में,स्त्री का पुर्बजन्म पुरष का दिखाया था, परन्तु मानव जाती का पुर्बजन्म मानव ही दिखाया गया है, अभी तक और किसी योनी में नहीं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुछ समय पहले अमर उजाला में एक बालक के बारे में समाचार छपा था,उसके पॉँच जन्म हुए थे, मक्खी,बर्र सांप और बालक के दो जन्म, हो सकता है,किसी को इस सीरियल में पुर्बजन्म&amp;nbsp; किसी और योनी में दिखा दें,देखते हैं क्या होता है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-3835852965220720261?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/3835852965220720261/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=3835852965220720261&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3835852965220720261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3835852965220720261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_28.html' title='राज पिछले जन्म का सीरियल में मुझे एक संदेह है'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1895041482780610522</id><published>2009-12-27T20:17:00.000-08:00</published><updated>2009-12-27T20:17:35.686-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हमारी ख़ुशी का दूसरा स्रोत'/><title type='text'>आ गयी हमारी दूसरी ख़ुशी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; color: orange; text-align: center;"&gt;मैंने तो राखी पर भाई से चोकलेट मांगी थी, पर भाई ने एक फ्राक में टरका दिया,कंजूस कहीं का &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szd1-gkPaAI/AAAAAAAAAWE/4o3EzuInEqs/s1600-h/100_0866.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szd1-gkPaAI/AAAAAAAAAWE/4o3EzuInEqs/s320/100_0866.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szd1Fe0KGMI/AAAAAAAAAV8/w8_Vk2C8vW8/s1600-h/100_0864.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szd1Fe0KGMI/AAAAAAAAAV8/w8_Vk2C8vW8/s320/100_0864.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szdy9jEH0AI/AAAAAAAAAV0/SnlUfKWbLBg/s1600-h/100_0846.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szdy9jEH0AI/AAAAAAAAAV0/SnlUfKWbLBg/s320/100_0846.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/SzdwgCxeufI/AAAAAAAAAVk/BojTEzpfAX0/s1600-h/100_0772.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://4.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/SzdwgCxeufI/AAAAAAAAAVk/BojTEzpfAX0/s320/100_0772.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szdl4Rs0b8I/AAAAAAAAAVE/FprmYKZHNxM/s1600-h/100_0734.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szdl4Rs0b8I/AAAAAAAAAVE/FprmYKZHNxM/s320/100_0734.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: lime;"&gt;बैठने के बाद तो मेरा ख़ुशी का ठिकाना ना रहा, कोई जलता है तो जले मेरे ठेंगे से&lt;/span&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;पहली बार में बैठने में में सफल हुई (नीचे दायें नजर तो डालो )&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;span id="0" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;&lt;span id="0" title="Click to correct"&gt;&lt;span id="8" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मेरा नामकरण हो रहा है, हमें क्या? (ऊपर )&lt;span style="background-color: #ffe599;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: lime;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/SzdvwIvHJWI/AAAAAAAAAVc/ShwH9gEJnvs/s1600-h/100_0806.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;span id="0" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;&lt;span id="0" title="Click to correct"&gt;&lt;span id="8" title="Click to correct"&gt;मेरा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span id="1" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;&lt;span id="1" title="Click to correct"&gt;जन्म&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt; 8 &lt;/span&gt;&lt;span id="4" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;जून&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt; 2009 &lt;/span&gt;&lt;span id="5" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;को&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span id="6" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;हुआ&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span id="7" style="color: #ff6666;" title="Click to correct"&gt;था&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt; |&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #ff6666;"&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span id="0" title="Click to correct"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1895041482780610522?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1895041482780610522/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1895041482780610522&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1895041482780610522'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1895041482780610522'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_27.html' title='आ गयी हमारी दूसरी ख़ुशी'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_eJ0p4k_ilBw/Szd1-gkPaAI/AAAAAAAAAWE/4o3EzuInEqs/s72-c/100_0866.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-9205913154473840932</id><published>2009-12-09T06:50:00.000-08:00</published><updated>2009-12-09T06:50:14.977-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छुड़वाने का सरकार की ओर से  प्रवाधान क्यों नहीं?'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिगरेट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुटखा'/><title type='text'>सिगरेट,गुटखा, छुड़वाने का सरकार की ओर से  प्रवाधान क्यों नहीं?</title><content type='html'>समाचार पत्रों में पड़ा था,सिगरेट के पेकेट पर सिगरेट से होनेवाले नुक्सान का फोटोग्राफिक सन्देश के बारे में विचार हो रहा है,और उसके बाद सिगरेट के पेकेट पर फेफरों का नुक्सान पहूचाने वाला चित्र बन गया,और उससे पहले सिगरेट के पेकेट पर हिंदी में लिखा होता था,"सिगरेट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है",और अंग्रेजी में भी लिखा होता था, " cigrette smoking is injurious for health", यह भी सर्वविदित है कि सिगरेट पीने से केंसर जैसी मृत्यु के कगार पर ले जाने वाली वीमारी हो जाती है,यही सबब होता है, गुटखे खाने वाले का उस गुटखे के पाउच पर भी हिंदी में लिखा होता है,"गुटखा खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है",यही सन्देश अंग्रेजी में लिखा होता है,"chewing tobacco is injurious for health", परन्तु ना सिगरेट पीने वाला सिगरेट छोड़ पाता है,और ना गुटखा खाने वाला,यह तो सच है,अगर इच्छा शक्ति हो तो सब कुछ संभव हो जाता है,परन्तु सिगरेट और गुटखा खाने वाले में इच्छा शक्ति प्रबल हो तो वोह इन व्यसनों को छोड़ पाता है, अन्यथा नहीं |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अगर कोई सिगरेट ना पीने वाला या गुटखा ना खाने वाला, किसी सिगरेट पीने वाले और गुटखा खाने वाले से कोई यह प्रश्न करे कि सिगरेट क्यों पीते हो या गुटखा क्यों खाते हो, तो इन व्यसनों को करने वाला इसका कारण समझा ही नहीं पाता,ना तो यह व्यसन भूख को शांत करते हैं,ना प्यास को तो समझाए तो समझाए क्या? असल में इनमें पाया जाने वाला निकोटिन दिमाग में एसा प्रभाव डालता है,कि दिमाग को एक ख़ुशी होती है,दिमाग को उस प्रकार की ख़ुशी होती है,जैसे कोई पुरुस्कार मिल गया हो, और इसी कारण से मानसिक तनाव के कारण इंसान इन व्यसनों की संख्या बड़ा देता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; में भी सिगरेट पीता था और गुटखा भी खाता था,गुटखा तो मैंने पहले छोड़ दिया था,संभवत: इस कारण कि यह व्यसन बहुत बाद में लगा था,पर सिगरेट चाहते हुए भी नहीं छोड़ पाया था,यह आदत तो बहुत पुरानी थी, इन्टरनेट पर ढूँढा तो एक साईट सिगरेट छुड़ाने वाला मिल गया था,उसमें बहुत प्रकार की चीजे बताई गयीं थीं, चेविगुम, निकोटिन पेच और भी बहुत कुछ और साथ में मनोवेगाय्निक के पास कोंसिलिंग के लिए बताया गया था, सब कुछ ढूँढा हमारे देश में चेविन्ग्म ही मिल पाई थी जिसका नाम निकोतेक्स है, ५० रुपए की दस चेविन्ग्म,और शुरू के कुछ हफ़्तों में जब भी सिगरेट की इच्छा हो तो वोह चेविन्गुम खाने का निर्देश,मतलब की पॉँच,छे चेविन्गुम और धीरे,धीरे चेविन्गुम की और सिगरेट की इच्छा भी कम होने लगेगी बताया हुआ था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अब इतना महंगा इलाज जो कि साधारण इंसान के बस में नहीं, और भिन्न,भिन्न प्रकार की सरकार की और से सिगरेट,और गुटखे के पेकेट पर चेतावानिया, पड़ा लिखा इंसान तो जानता है,इस से केंसर हो सकता है,परन्तु सरकार अगर केंसर को रोकना चाहे तो इसका रोकथाम उस प्रकार क्यों नहीं जैसे पल्स पोलियो का बच्चों के लिए होता है, और तो और बीडी के पेकेट पर कोई चेतवानी नहीं होती, बीडी पीने वाले गरीब इंसान को अँधेरे में क्यों रखा हुआ है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-9205913154473840932?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/9205913154473840932/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=9205913154473840932&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/9205913154473840932'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/9205913154473840932'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_09.html' title='सिगरेट,गुटखा, छुड़वाने का सरकार की ओर से  प्रवाधान क्यों नहीं?'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-6778598667108216686</id><published>2009-12-05T08:39:00.000-08:00</published><updated>2009-12-05T08:39:25.972-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मत करो बदनाम  इस माँ पारवती और शिव के जोड़े को |'/><title type='text'>प्राचीन काल में प्यार की उत्पत्ति</title><content type='html'>आज कल प्यार का मतलब तो विकृत&amp;nbsp; वासना से हो गया है, परन्तु सब से पहले प्यार का उदहारण हमारे ऋग्वेद में मिलता है, और उस समय के ऋषि मुनि यह मानते थे, पूरे विश्व को प्यार का सन्देश हमरे देश भारत से मिला था, हमरे ग्रंथो में प्यार के देवता कामदेव का काम का सन्देश पहूचाने के लिए बहुत सुन्दर उदहारण मिलता है, जब कामदेव को किसी के हिर्दय में प्यार जगाना होता है,तो वसंत ऋतू का आगमन हो जाता है,और चारो ओर सुरमय वातावरण हो जाता, सुन्दर,सुन्दर फूल खिल जाते हैं, ना ग्रीष्म ऋतू की गर्मी, ना शरद ऋतू की शीत, आम के पेड़ों पर लगे बोर, और कामदेव के हाथों में, धनुष जिससे फूलों वाला तीर सीधे प्रेमी और प्रेमिका के हिर्दय पर अघात करता है, और प्रेमी और प्रेमिका के मन में प्यार जागृत हो जाता है, यह भी वासना है,परन्तु विकृत ना होकर वासना का सुन्दर स्वरुप |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कामदेव का पहले शरीर होता था, परन्तु उन्के शरीर ना होने का कारण के पीछे एक कथा है, एक बार किसी राक्षस का वध करना था,जो कि केवल देवों के देव महादेव कर सकतें थे, लेकिन उस समय महादेव जी समाधि में बैठे थे, और राक्षस का वध करने के लिए उनकी समाधी का टूटना आवश्यक था, तो देवताओं ने कामदेव से प्रार्थना की आप भगवान् शिव की समाधी तोड़ें,तब कामदेव ने शिव भगवान् के मन में प्यार का अंकुर जगाने का प्र्यतन किया,और भगवान् शिव का तीसरा नेत्र खुल गया और कामदेव के शरीर का नाश हो गया,कामदेव की पत्नी रति रोती,बिलखती भगवान् शिव के पास गयीं तो महादेव जी ने कहा,कामदेव का शरीर तो नहीं मिल पायेगा परन्तु तुम दोनों मिल कर लोगों के हिर्दय को प्रेम से अंकुरित करोगे |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; हमारे देश में खुजराहो और कोणार्क के मंदिरों को देखने के लिए दूर,दूर से लोग आते हैं, खजुराहो के मंदिरों में बहार की दीवारों पर काम कला को पर्दर्शित करने वाले भित्ति चित्र हैं, परन्तु मंदिरों के अन्दर कुछ नहीं,जिसका आशय है, भित्ति चित्र इंसान के अन्दर की बुराई को पर्दर्शित करते हैं,और जब इंसान मंदिर के अन्दर जाता है,तो उसकी बुराइयाँ बहार रह जातीं हैं|&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इन खजुराहों के मंदिर का इतिहास यह है, उन दिनों चंदेल राजा का राज्य था, और उनकी प्रजा के लोग सन्यास ले रहे थे, तब राजा को लगा की जब सब लोग सन्यास ले लेंगे तो उसके राज्य का अस्तित्व तो कुछ नहीं रह जायेगा,तब उसने प्रजा को इन मंदिरों का निर्माण करके यह सन्देश दिया, सन्यास के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है, और इस प्रकार इन मंदिरों का निर्माण हुआ&lt;br /&gt;&amp;nbsp; हमारे देश की ही देन है,वात्सायन का कामसूत्र परन्तु लोग भागते हैं, विदेशों के विकृत वासना के साहित्य और विकृत चलचित्रों के ओर |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; आज कल तो लिव इन रिलेशन का स्वरुप देखने को मिल रहा है, परन्तु हमारे प्राचीन ग्रंथों में,शिव पारवती के प्रेम का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है, यह तो सर्विदित है, माता पारवती ने भगवान् शिव को अपने पिता दक्ष के पूजा पर ना बुलाने पर हवन कुंड में अपने तन को स्वहा कर दिया,और महादेव जी माता पारवती का मृत शरीर लिए हुए सब ओर घूमते रहे, ऐसा था महादेव जी का और पारवती जी का प्रेम,और बाद में विष्णु भगवान् ने अपने सुदर्शन चक्र से पारवती के शरीर के ५१ टूकरे कर दिए,और जहाँ,जहाँ माता पारवती के शरीर के टूकरे गिरे वहाँ,वहाँ शक्ति पीठ बन गये |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;कहा जाता है,विवाहित स्त्री पुरुष शिव पारवती का जोड़ा है, मत करो बदनाम&amp;nbsp; इस माँ पारवती और शिव के जोड़े को |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-6778598667108216686?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/6778598667108216686/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=6778598667108216686&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6778598667108216686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/6778598667108216686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_05.html' title='प्राचीन काल में प्यार की उत्पत्ति'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-3739561227588870236</id><published>2009-12-04T05:52:00.000-08:00</published><updated>2009-12-04T05:52:21.894-08:00</updated><title type='text'>सहानभूति पर्दर्शित करने से उत्तम है,अनुभूति करना</title><content type='html'>बहुत दिनों से मन में विचार आ रहा था,सहानुभूति पर्दर्शित करने से उत्तम है के बारे में लिखूं ,अनुभूति करना,सहानभूति के शब्द तो इंसान के मन को रहत देता है,और अनुभूति तो मानव को अपना बना लेती है, सहानभूति तो कुछ समय के लिए राहत देती है,और अनुभूति तो सदा के लिए अपना बना लेती है, सहानुभूति का तो अर्थ है,किसी बेबस को देखकर चंद शब्द कह देना या उस बेबस की कुछ सहायता कर देना,परन्तु अनुभूति करना का अर्थ है,किसी बेबस की परिसिथित्यों को,उसी बेवस के अनुसार महसूस करना और फिर उसी की सहायता करने के लिए उसी के अनुरूप क्रिया कलाप करना,यह चीज किसी विवश को एक बहुत ही सुखद एहसास कराती है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अनुभूति करना तो एक कला है,इसमें अपने स्वाभाव,और परिस्थितयों&amp;nbsp; को गौण रख कर किसी दूसरे के व्यक्तिव और परिस्थितयों के अनुसार अपने को ढालना पड़ता है, इसमें सुनने की कला आवश्यक रूप से आनी चाहिए, और उसके साथ,साथ मनन करना भी अति आवश्यक है, वाद विवाद का तो विल्कुल ही स्थान नहीं है, किसी का दुःख,सुख के अनुभव उसके अनुसार करना तो अति कठिन काम है,अगर दूसरे इंसान की बात गलत लगती हो,तो अपना आचरण इस प्रकार से बनाना पड़ता है,की उसका अंत:कारण बदल जाये, यह प्रभाव ऐसा होना चाहिए,आप उसके रोल माडल बन जाएँ |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; इसीलिए मनोचिक्त्सक किसी मानसिक रोगी की चिकत्सा के लिए,उसके परिवार के सदस्यों को बुला कर,उनसे बात करके उनको परामर्श देते हैं,कि उक्त रोगी के साथ कैसा व्यव्हार किया जाये |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-3739561227588870236?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/3739561227588870236/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=3739561227588870236&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3739561227588870236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/3739561227588870236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_924.html' title='सहानभूति पर्दर्शित करने से उत्तम है,अनुभूति करना'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-4725902399326478286</id><published>2009-12-04T04:41:00.000-08:00</published><updated>2009-12-04T04:41:59.780-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आप माने या ना माने'/><title type='text'>ऐसे हुआ माता रानी का चमत्कार |</title><content type='html'>अक्सर दूरदर्शन पर श्रीडी के साईं बाबा के चमत्कार देखता हूँ, और इन दिनों में,मुझे अपने छोटे भाई के साथ हुआ माता रानी का चमत्कार याद आ गया, बहुत पुरानी बात है, मेरे पिता जी की पोस्टिंग उन दिनों मेरठ में थी,और हम दोनों भाई छोटे,छोटे थे,उस समय हम दोनों की आयु क्या होगी ठीक से याद नहीं, मेरा भाई मेरे से २ साल ८ माह छोटा है , में आठवीं कक्षा में और मेरा छोटा भाई छटी कक्षा में पड़ता था |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; वोह दिन दिवाली से एक दिन पहले था, और मेरा भाई धागे में बांध के एक कंकर घुमा रहा था (जिसको लंगर बोला जाता है),वोह कंकर का टूकरा उसकी बायीं आँख में लग गया,और उसकी आँख सूज गयी थी, उस समय मेरठ में आँखों के विघयात डाक्टर वीर चन्द्र हुआ करते थे,मेरी माँ और पिता जी उसको उस डाक्टर के पास ले गए, उन आँखों के डाक्टर ने बताया की आंख की पुतली(कोर्निया) में,आंख का मांस फस गया है,इस बच्चे को सीतापुर ले जाओ,और उन्होंने आँख में,आंख की दवाई अतरोपीन डाल दी,जिससे आंख की पुतली फेल जाये और कहा इसको मेरे पास कल सुबह लाना, अगले दिन मेरे भाई को उन्ही डाक्टर के पास ले कर गए, तो आँख में कोई लाभ नहीं हुआ, आंख की पुतली में उसी प्रकार से आंख का मांस फसा हुआ था, अतरोपीन दवाई की बूंदे आंख में डालने के २४ घंटे के&amp;nbsp; बाद पुतली फेल जाती है,और आंख की पुतली में फसी हुई वस्तु निकल जाती है,परन्तु मेरे भाई की आंख की पुतली में से आंख का फसा हुआ मांस नहीं निकला&amp;nbsp; |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; उन दिनों मेरे पिता जी के पास उन्ही के महकमे में काम करने वाले,माता के भक्त दुर्गसिंह आया करते थे, वोह मुझे गणित की टूशन भी पडाते थे, वोह उस दिवाली के एक दिन पहले भीसुबह&amp;nbsp; आये थे, और जब उनको मेरे छोटे भाई की आंख के बारे में पता चला तो वोह बोले में रात को आता हूँ,और वोह रात में आये और उन्होंने रात भर माँ दुर्गा का हवन किया,और अगले दिन की सुबह,मेरे माँ,पिता जी,और दुर्गासिंह मेरे भाई को लेकर उन्ही आँखों के&amp;nbsp; डाक्टर वीरचन्द्र के पास लेकर गये, उन डाक्टर सहाब ने मेरे भाई की चोट लगी आंख को चेक किया,और वोह हैरान रह गये कि यह आंख की पुतली में से आंख का&amp;nbsp; मांस निकल गया,यह तो चमत्कार है, मेरे माँ,पिता जी ने कहा यह इन दुर्गासिंह के कारण हुआ है,तब डाक्टर साहब ने कहा इस आदमी को पहले क्यों नहीं बुलाया था, दुर्गासिंह जी ने हवन के समय&amp;nbsp; एक मिटटी की माँ दुर्गा की परतिमा बनाई थी, और पूजा के बाद उस परतिमा को वोह ले जाना भूल गये थे,जब भी हम लोग उस कमरे में जाते थे,तो हम लोगों को एक करंट सा लगता था,तब वोह बोले में इस परतिमा को ले जाना तो भूल गया,और उन्होंने वोह परतिमा अपनी जेब में रख ली, और हम लोगों को करेंट लगना समाप्त हो गया था, यह घटना मुझे याद आ गयी जो की हमारे साथ घटित हो चुकी है, इसलिए लिख दी |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt; आप माने या ना माने &lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-4725902399326478286?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/4725902399326478286/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=4725902399326478286&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/4725902399326478286'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/4725902399326478286'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post_04.html' title='ऐसे हुआ माता रानी का चमत्कार |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2193429074244170487</id><published>2009-12-01T07:57:00.000-08:00</published><updated>2009-12-01T07:57:12.986-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विवाद समाप्त करकेअपने इस देश को उसी प्राचीन गौरव से सम्मानित करना चाहिए'/><title type='text'>हमारे घर में ही हो विवाद तो कैसे लहरायेगे अपनी संस्कृति का परचम |</title><content type='html'>यह लेख में प्रारंभ कर रहा हूँ, अत्यधिक विघयात चलचित्र स्लम डोग मिल्लिओनोरे से, हमरे मुंबई शहर की झुग्गी झोपड़ी की गरीबी पर विदेशी चलचित्र बना देते हैं,और इस चलचित्र को अनेकों सम्मानित ओस्कार इनाम मिल जाते हैं, हाँ यह तो सच इस फ़िल्म के कलाकार&amp;nbsp;रुबीना और अझर भी विश्विघ्यात हो जाते हैं, इससे क्या विश्व को सन्देश मिला कि, हमारे देश में गरीबी है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; लेकिन आज के युग में,मुझे कोई ऐसी फ़िल्म नहीं याद आती,जिसमें हमारे देश कि संस्कृति का विश्व में प्रचार हुआ हो, केवल एक ही फ़िल्म याद आती है, रिचर्ड अटएनबरो द्वारा निर्देशित,और बेन किंग्सले द्वारा अभिनीत गाँधी,हाँ उस चलचित्र में गाँधी जी के आदर्शो के बारे में बताया था,लेकिन यह बहुत पुरानी बात हो गयी है, नयी पीड़ी का आगमन होता रहता है,उन लोगों को अपनी पुरानी संस्कृति का आभास नहीं हो पाता,और पुरानी पीड़ी के भी मानसपटल पर छबी धूमिल होती जाती है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;आज कल तमाम समाचार पत्रों में,&amp;nbsp; सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं में,आरोप,आक्षेप और पर्तिअक्षेप का ही सिलसिला चलता रहता है, सत्ता पक्ष और विपक्ष कभी भी एकमत होते नहीं देखे जाते, और हमारे इन समाचार पत्रों को हमारे देश में आने वाले विदेशी भी पड़ते हैं, और इसका उन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा,कोई भी सोच सकता है, हमारे यहाँ के सद्भाव को तो यह गोण ही कर देता है |&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; हमारे देश के महान ग्रन्थ हैं,रामायण और गीता,और जिनको विदेशों में मिथ कहा जाता है,और इस देश में भी विवाद हो जाता है, इनके चरित्र मिथक अर्थात कोरी परिकल्पना है, और यह ग्रन्थ मिथ हैं,मतलब की कोरी गप्प, तो हम इसके वारे में विश्व को कैसे बताएँगे? रामायण में मर्यादा पुरषोत्तम राम का चरित्र है, अगर हमारे देश में इस ग्रन्थ पर विवाद होगा तो हम उसके आदर्शो को कैसे विश्व को बताएँगे?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; गीता में कृष्ण भगवान् द्वारा अर्जुन को दिया हुआ गीता का ज्ञान है, जब कौरवों और पांडवों की सेना आमने सामने हो गयी,और अर्जुन अपने गुरुओं,चचरे भाईओं को देख कर अपना गांडीव उठा कर रख दिया,तब श्री कृष्ण भगवान् पार्थ के रथ को रणभूमि में दोनों सेनाओं के मध्य में ले गए तब उन्होंने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था, श्री कृष्ण भगवान् ने कहा,जो में तुमको यह ज्ञान दे रहा हूँ,वोह मैंने तुमसे पहले सूर्य को दिया था, अर्जुन ने कहा आप से तो सूर्य तो बहुत पहले आ गए थे,तब कृष्ण भगवान् ने कहा "है पार्थ में और तुम हर जन्म में थे,मुझे सब कुछ याद है,पर तुम्हे नहीं", यह श्री कृष्ण का उपदेश पुर्ब्जन्म को प्रमणित करता है, और कृष्ण भगवान् ने यह भी कहा कि, "आत्मा अजर अमर है, शरीर का नाश होता है,और जिस प्रकार से मन्युष नए वस्त्र धारण करता है,इसी प्रकार आत्मा नया शरीर धारण करती है",यह दोनों बातें भी विवादित है, संभवत: इसी लिए इन ग्रंथो को मिथ और इन चरित्रों को मिथ्या कहा जाता हो,लकिन रामायण के राम के चरित्र और गीता के ज्ञान का प्रचार क्यों नहीं होता?&lt;br /&gt;&amp;nbsp;यह तो सही है,रामायण और महाभारत पर सीरियल तो बने,पर यह सीमित तो हमारे देश तक ही थे,परन्तु इन ग्रंथो के आदर्शों पर कोई की फ़िल्म नहीं, बनी,इन ग्रंथों के आदर्शों पर चलचित्र बनना चाहिए,और इनका प्रचार भी स्लम डोग मिल्लोनोर की तरह होना चाहिए |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-2193429074244170487?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/2193429074244170487/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=2193429074244170487&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2193429074244170487'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/2193429074244170487'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='हमारे घर में ही हो विवाद तो कैसे लहरायेगे अपनी संस्कृति का परचम |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-1918498158686838953</id><published>2009-11-29T07:47:00.000-08:00</published><updated>2009-11-29T07:49:46.572-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अ़ब अगले शनिवार या रविवार तक के लिए अलविदा'/><title type='text'>मेरी पत्नी को ऐसा कमर में दर्द हुआ जो मुझे समझ में ही   नहीं आया |</title><content type='html'>हमारी श्रीमती जी को गृहकार्य के अतिरिक्त,घर के रख रखाव में भी दिलचस्पी है, वैसे तो गृहकार्य तो अधिकतर हमारी काम वाली करती है, परन्तु हर रविवार को बिस्तरों की चादरें बदलना तो उनका नियमित कार्य है, मेरे और अपने मोबइलों को चार्जर पर लगाना उनका नित्यक्रम है, और इसके अतिरिक्त इन्वेर्टर की बेटरी में,रविवार को आवश्यकता अनुसार पानी डालना भी उन्होंने अपने जिम्मे ले रखा है | &lt;br /&gt;बात गत रविवार की है,उस दिन वोह इन्वेर्टर की बेटरी में पानी डाल रही थी,और में नहा रहा था,सिर पर अभी साबुन ही लगाया था, तो उनकी आवाज आई सुनो,सुनो मेरे को पुकारने के लिए इसी संबोधन का प्रयोग करती हैं, में कमर पर टावल बांध कर सिर पर लगा साबुन लेकर,बाथरूम&amp;nbsp; से बहार निकला तो देखा वोह कुर्सी का सहारा लेकर खड़ी हुईं थीं, मेरे पूछने पर उन्होंने कहा इन्वेर्टर की बेटरी में पानी डालने के लिए झुकी तो झुकी की झुकी रह गयीं, और अब ना बैठा जा रहा और ना ही लेटा जा रहा, मुझे तो समझ में ही नहीं आया यह क्या हुआ ?&lt;br /&gt;&amp;nbsp; रविवार को अपने फॅमिली&amp;nbsp; डाक्टर से फ़ोन पर पूछा यह क्या हुआ,उन्होंने बताया की मसल खीच गयी है,और कुछ दवाइयां बतायीं जो में उस रविवार को ले आया था|&lt;br /&gt;&amp;nbsp; दो दिन पहले वोही डाक्टर आये थे,और हमारी श्रीमती जी को सुखी रोटी और उबली सब्जी खाने की हिदयात दे गए थे, और कमर पर बाँधने के लिए एक बेल्ट दे गये थे,अब एक सप्ताह के बाद मेरी श्रीमती जी को आराम है,लेकिन यह चीज मेरे लिए तो बिलकुल अप्रताय्षित थी | &lt;br /&gt;&amp;nbsp; इसका मुझे लाभ यह हुआ, अधिकतर समय घर में उनके पास रह कर शनिवार और रव्विवार को तीन पोस्ट लिख दीं,और समयावकाश ना होने के कारण ब्लोगवाणी के क्रमांक एक की भी सारी पोस्ट नहीं पड़ पाता था,वोह सब तो पड़ ही लीं,शेष नए ब्लोग्गोरों को भी पड़ लिया,और ब्लोगवाणी के ब्लोगों तथा नए ब्लोग्गोरों को टिप्पणी भी दे दी |&lt;br /&gt;&amp;nbsp; अ़ब अगले शनिवार या रविवार तक के लिए अलविदा &lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3401854626725493169-1918498158686838953?l=vinay-mereblog.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/feeds/1918498158686838953/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3401854626725493169&amp;postID=1918498158686838953&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1918498158686838953'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3401854626725493169/posts/default/1918498158686838953'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://vinay-mereblog.blogspot.com/2009/11/blog-post_29.html' title='मेरी पत्नी को ऐसा कमर में दर्द हुआ जो मुझे समझ में ही   नहीं आया |'/><author><name>vinay</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14896278759769158828</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/-Au7-ynbqORY/TaMIWiysWtI/AAAAAAAAAYk/SMjdTZGuD1E/s220/vinaysharma.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3401854626725493169.post-2708864598178461172</id><published>2009-11-28T08:11:00.000-08:00</published><updated>2009-11-28T08:11:17.100-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिकत्सा शास्त्र का नया शोध'/><title type='text'>चिकत्सा शास्त्र का नया शोध का विषय (अंग प्रत्यारोपण करवाने वाले का स्वाभाव अंग देने वाले के स्वाभाव की तरह हो जाता है)</title><content type='html'>यह तो सर्वविदित है की मानव स्वाभाव सामाजिक परिवेश,उसका लालन पालन,बदलती परिस्थितिओं के अनुसार होता है, यह भी कहा जाता है कि उसकी जन्म के समय की गृह स्थितिओं के का
